बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 347, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें३२८ नारदीयपुराणम् स्थितस्तेन गृहीतार्थो निजवेश्म प्रवेशितः । प्रक्षालितांघ्रिपाणिं च कृतासनपरिग्रहम् ॥४२॥ उवाच स द्विजश्रेष्ठो भुज्यतामिति सादरम् । ऋभुरुवाच ॥४३॥ भो विप्रवर्य भोक्तव्यं यदत्र भवतो गृहे तत्कथ्यतां कदन्नेषु न प्रीतिः सततं मम । निदाघ उवाच सक्तुयावकव्रीहीनामपूपानां च मे गृहे । ॥४४॥ यद्रोचते द्विजश्रेष्ठ तावद्भुंक्ष्व यथेच्छया । ऋभुरुवाच ॥४५॥ कदन्नानि द्विजैतानि मिष्टमन्नं प्रयच्छ मे संयावपायसादीनि चेक्षुका रसवंति च । निदाघ उवाच ॥४६॥ गृहे शालिनि मद्गेहे यत्किंचिदतिशोभनम् भोज्येषु साधनं मिष्टं तेनास्यान्नं प्रसाधय । इत्युक्ता तेन सा पत्नी मिष्टमन्नं द्विजस्य तत् ॥४७॥ प्रसाधितवती तद्वै भर्तुर्वचनगौरवात् । तं भुक्तवंतमिच्छातो मिष्टमन्नं महामुनिम् ॥४८॥ निदाघः प्राह भूपाल प्रश्रयावनतः स्थितः । निदाघ उवाच ॥४९॥ अपि ते परमा तृप्तिरुत्पन्ना पुष्टिरेव च हाथ और पैर को धो कर उसने गुरु जी को उच्च आसन दिया । जब गुरुजी आसनासीन हो गए तब उस द्विज- श्रेष्ठ ने आदरपूर्वक भोजन करने के लिए कहा ॥४२½॥ ऋभु बोले- विप्रवर्य ! जो तुम्हारे घर में है उसी को खाना चाहिए । तो कहो मैं क्या खाऊँ ? कदन्न से तो मुझे कभी भी प्रीति नहीं रही । निदाघ बोला- द्विजश्रेष्ठ ! मेरे घर में सत्तू, जौ की लपसी और बाटी बनी हैं। इनमें से जो अच्छा लगे उसको आप यथेच्छ भोजन कीजिए ॥४३-४४½॥ ऋभु ने कहा- द्विज ! ये तो कदन्न हैं, मुझे मीठा अन्न भोजन के लिए दो । हलुआ, खीर और खांड़ के बने हुए पदार्थ भोजन कराओ ॥४५½॥ निदाघ ने कहा- गृहिणी ! मेरे घर में जो कुछ उत्तम अन्न और मीठे पदार्थ हैं उनका स्वादु भोजन बनाकर द्विजवर को परसो । पत्नी पति के कहने के अनुसार आदरपूर्वक अपने पति के वचन के अनुकूल ही स्वादु भोजन द्विज के आगे परोस दिया । भूपाल ! जब महामुनि इच्छानुकूल मधुर अन्न खा चुके तब निदाघ ने विनम्र नम्र होकर पूछा ॥४६-४८½॥ 'द्विज ! क्या आपको इस मधुर भोजन से पर्याप्त तृप्ति हुई ? कुछ शरीर में शक्ति आई ? अथवा दृढ