बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
३२८ नारदीयपुराणम् स्थितस्तेन गृहीतार्थो निजवेश्म प्रवेशितः । प्रक्षालितांघ्रिपाणिं च कृतासनपरिग्रहम् ॥४२॥ उवाच स द्विजश्रेष्ठो भुज्यतामिति सादरम् । ऋभुरुवाच ॥४३॥ भो विप्रवर्य भोक्तव्यं यदत्र भवतो गृहे तत्कथ्यतां कदन्नेषु न प्रीतिः सततं मम । निदाघ उवाच सक्तुयावकव्रीहीनामपूपानां च मे गृहे । ॥४४॥ यद्रोचते द्विजश्रेष्ठ तावद्भुंक्ष्व यथेच्छया । ऋभुरुवाच ॥४५॥ कदन्नानि द्विजैतानि मिष्टमन्नं प्रयच्छ मे संयावपायसादीनि चेक्षुका रसवंति च । निदाघ उवाच ॥४६॥ गृहे शालिनि मद्गेहे यत्किंचिदतिशोभनम् भोज्येषु साधनं मिष्टं तेनास्यान्नं प्रसाधय । इत्युक्ता तेन सा पत्नी मिष्टमन्नं द्विजस्य तत् ॥४७॥ प्रसाधितवती तद्वै भर्तुर्वचनगौरवात् । तं भुक्तवंतमिच्छातो मिष्टमन्नं महामुनिम् ॥४८॥ निदाघः प्राह भूपाल प्रश्रयावनतः स्थितः । निदाघ उवाच ॥४९॥ अपि ते परमा तृप्तिरुत्पन्ना पुष्टिरेव च हाथ और पैर को धो कर उसने गुरु जी को उच्च आसन दिया । जब गुरुजी आसनासीन हो गए तब उस द्विज- श्रेष्ठ ने आदरपूर्वक भोजन करने के लिए कहा ॥४२½॥ ऋभु बोले- विप्रवर्य ! जो तुम्हारे घर में है उसी को खाना चाहिए । तो कहो मैं क्या खाऊँ ? कदन्न से तो मुझे कभी भी प्रीति नहीं रही । निदाघ बोला- द्विजश्रेष्ठ ! मेरे घर में सत्तू, जौ की लपसी और बाटी बनी हैं। इनमें से जो अच्छा लगे उसको आप यथेच्छ भोजन कीजिए ॥४३-४४½॥ ऋभु ने कहा- द्विज ! ये तो कदन्न हैं, मुझे मीठा अन्न भोजन के लिए दो । हलुआ, खीर और खांड़ के बने हुए पदार्थ भोजन कराओ ॥४५½॥ निदाघ ने कहा- गृहिणी ! मेरे घर में जो कुछ उत्तम अन्न और मीठे पदार्थ हैं उनका स्वादु भोजन बनाकर द्विजवर को परसो । पत्नी पति के कहने के अनुसार आदरपूर्वक अपने पति के वचन के अनुकूल ही स्वादु भोजन द्विज के आगे परोस दिया । भूपाल ! जब महामुनि इच्छानुकूल मधुर अन्न खा चुके तब निदाघ ने विनम्र नम्र होकर पूछा ॥४६-४८½॥ 'द्विज ! क्या आपको इस मधुर भोजन से पर्याप्त तृप्ति हुई ? कुछ शरीर में शक्ति आई ? अथवा दृढ
एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३२६ अपि ते मानसं स्वस्थमाहारेण कृतं द्विज । क्व निवासी भवान्विप्र क्व वा गंतुं समुद्यतः ॥५०॥ आगम्यते च भवता यतस्तच्च निवेद्यताम् । ऋभुरुवाच क्षुधितस्य च भुक्तेऽन्ने तृप्तिर्ब्रह्मन्व्जायते ॥५१॥ न मे क्षुधा भवेत्तृप्तिः कस्मान्मां द्विज पृच्छसि । वह्निना पार्थिवेनादौ दग्धे वै क्षुत्समुद्भवः ॥५२॥ भवत्यंभसि च क्षीणे नृणां तृष्णासमुद्भवः । क्षुत्तृष्णे देहधर्माख्ये न ममैते यतो द्विज ॥५३॥ ततः क्षुत्संभवाभावात्तृप्तिरस्त्येव मे सदा । मनसः स्वस्थता तुष्टिश्चित्तधर्माविमौ द्विज ॥५४॥ चेतसो यस्य यत्पृष्टं पुमानेभिर्न युज्यते । क्व निवासस्तवेत्युक्तं क्व गंतासि च यत्त्वया ॥५५॥ कुतश्चागम्यते त्वैतत्त्रितयेऽपि निबोध मे । पुमान्सर्वगतो व्यापीत्याकाशवदयं यतः ॥५६॥ कुतः कुत्र क्व गंतासीत्येतदप्यर्थवत्कथम् । सोऽहं गंता च चागंता नैकदेशनिकेतनः ॥५७॥ त्वं चान्ये च न च त्वं त्वं नान्ये नैवाहमप्यहम् । मिष्टान्ने मिष्टमित्येषा जिह्वा सा मे कृता तव ॥५८॥ किं वक्ष्यतीति तत्रापि श्रूयतां द्विजसत्तम । मिष्टमेव यदामिष्टं तदेवोद्वेगकारणम् ॥५९॥ अमिष्टं जायते मिष्टं मिष्टादुद्विजते जनः । आदिमध्यावसानेषु किमन्नं रुचिकारणम् ॥६०॥ मृण्मयं हि मृदा यद्वद्गृहं लिप्तं स्थिरीभवेत् । पार्थिवोऽयं तथा देहः पार्थिवैः परमाणुभिः ॥६१॥ यवगोधूममुद्गादिधृतं तैलं पयो दधि । गुडः फलानीति तथा पार्थिवाः परमाणवः ॥६२॥ आहार से कुछ मानसिक तुष्टि प्राप्त हुई ? ॥४६ १/२॥ विप्र ! आप कहाँ के रहने वाले हैं ? इस समय कहाँ के लिए प्रस्थान किया है और कहाँ से आपका शुभागमन हुआ है ? कृपा कर मुझसे कहिए ॥५०॥ ऋभु ने कहा—भूखे व्यक्ति को भोजन करने से तृप्ति होती है । द्विज ! मुझे तो क्षुधा लगती नहीं तो फिर तुम तृप्ति के विषय में क्यों पूछते हो ? पार्थिव अग्नि से जलने पर भूख लगती है और जल के नष्ट होने पर मनुष्य में तृष्णा उत्पन्न होती है । द्विज ! क्षुधा और तृष्णा देह के धर्म हैं, मेरे नहीं । इसलिए क्षुधा के सर्वथा अभाव से मुझे तो सर्वदा तृप्ति रहती ही है ॥५१-५३ १/२॥ द्विज ! मन का स्वास्थ्य और तुष्टि ये दोनों चित्त के धर्म हैं । तो जब ये चित्त के धर्म हैं तो पुरुष इनसे कभी भी युक्त नहीं होता ॥५४ १/२॥ तुमने जो यह पूछा है कि कहाँ निवास स्थान है, कहाँ जाओगे और कहाँ से आ रहे हो, तो इन तीनों प्रश्नों का उत्तर भी मुझसे सुनो । चूंकि यह पुरुष आकाश की भाँति सर्वगत और सर्वव्यापक है इसलिए कहाँ से आये हो और कहाँ जाओगे, ये प्रश्न भी सार्थक कैसे हो सकते हैं ? ऐसा मैं न तो कहीं जाता हूँ, न आता हूँ और न तो किसी एक देश में मेरा निवास-स्थान ही है ॥५५-५७॥ तुम और दूसरे न तुम तुम हो न दूसरे दूसरे हैं और न मैं मैं हूँ । तुम्हारे मिष्टान्न को मेरी जिह्वा ने मीठा समझकर खाया है ॥५८॥ द्विजसत्तम ! इस विषय में मेरी जिह्वा कहा करती है उसको सुनो । यदि मीठे को मीठा न कहा जाय तो वही उद्वेग का कारण बन जाता है ॥५९॥ कभी कड़वा ही मीठा बन जाता और कभी मीठा ही मनुष्य को अरुचिकर हो जाता है । आदि, मध्य और अन्त में कभी ऐसा हो जाता है तो अन्न के रुचिकर होने में क्या कारण है इसको सुनो ॥६०॥ जिस प्रकार मिट्टी का घर मिट्टी से लीपने पर स्थिर (पुष्ट) होता है उसी प्रकार यह पार्थिव शरीर पार्थिव परमाणुओं से पुष्ट होता है ॥६१॥ यव, गेहूँ, उड़द, घी, तेल, दूध, दही, गुड़ और फल ये पार्थिव परमाणु हैं ॥६२॥ इसलिए आप मीठे और कड़वे का रहस्य ४२ ना० पु०
३३० नारदीयपुराणम् तदेतद्भवता ज्ञात्वा मिष्टामिष्टविचारि यत् । तन्मनः शमनालंबि कार्यं प्राप्यं हि मुक्तये ॥६३॥ इत्याकर्ण्य वचस्तस्य परमार्थाश्रितं नृप । प्रणिपत्य महाभागो निदाघो वाक्यमब्रवीत् ॥६४॥ प्रसीद महितार्थाय कथ्यतां यस्त्वमागतः । नष्टो मोहस्तवाकर्ण्य वचांस्येतानि मे द्विज ॥६५॥ ऋभुरुवाच ऋभुरस्मि तवाचार्यः प्रज्ञादानाय ते द्विज । इहागतोऽहं दास्यामि परमार्थं सुबोधितम् ॥६६॥ एक एवमिदं विद्धि न भेदि सकलं जगत् । वासुदेवाभिधेयस्य स्वरूपं परमात्मनः ॥६७॥ ब्राह्मण उवाच तथेत्युक्त्वा निदाघेन प्रणिपातपुरःसरम् । पूजितः परया भक्त्यानिच्छतः प्रययौ विभुः ॥६८॥ पुनर्वर्षसहस्रांते समायातो नरेश्वर । निदाघज्ञानदानाय तदेव नगरं गुरुः ॥६९॥ नगरस्य बहिः सोऽथ निदाघं दृष्टवान् मुनिम् । महाबलपरीवारे पुरं विशति पार्थिवे ॥७०॥ दूरस्थितं महाभागे जनसंमर्दवर्जकम् । क्षुत्क्षामकण्ठमायांतमरण्यात्ससमित्कुशम् ॥७१॥ दृष्ट्वा निदाघं स ऋभुरुपागत्याभिवाद्य च । उवाच कस्मादेकांते स्थीयते भवता द्विज ॥७२॥ निदाघ उवाच भो विप्र जनसंमर्द्दो महानेष जनेश्वरे । प्रविवक्षौ पुरे रम्ये तेनात्र स्थीयते मया ॥७३॥ जानकर अपने मन को स्थिर कीजिए और मुक्ति के उपायों को प्राप्त कीजिए ॥६३॥ नृप ! ऋभु की इस परमार्थ से भरी हुई वाणी को सुनकर महाभाग निदाघ उनके चरणों पर गिर पड़ा और बोला ॥६४॥ द्विज ! प्रसन्न होइए, मेरे कल्याण के लिए आप बतलाइए कि आप कौन हैं, जो यहाँ आये हुए हैं ? आपकी इन बातों को सुनकर मेरा सारा मोह नष्ट हो गया ॥६५॥ ऋभु बोले--मैं तुम्हारा आचार्य ऋभु हूँ। द्विज ! तुमको ज्ञान दान करने के लिए यहाँ आया हूँ। तुमको उचित और स्पष्ट परमार्थ ज्ञान दूंगा ॥६६॥ यह समस्त संसार परमात्मा वासुदेव का रूप है, एक है, और अभिन्न है ॥६७॥ ब्राह्मण बोला--निदाघ ने गुरु का उपदेश स्वीकार किया और अत्यन्त निष्ठा से गुरु का चरणवन्दन कर उनकी पूजा की। ऋभु गुरु भी उसकी पूजा से प्रसन्न होकर चले गए ॥६८॥ फिर एक हजार वर्ष बीत जाने पर गुरु जी इसी नगर में अपने शिष्य को ज्ञान देने के लिए आये ॥६९॥ उस समय उन्होंने नगर के बाहर मुनि निदाघ को बैठे हुए देखा। उसी समय राजा भी अपने सैनिकों और राजपुरुषों के साथ नगर में प्रवेश कर रहा था। मुनि निदाघ अरण्य से समिधा और कुश लिए हुए आ रहा था। भूख-प्यास से उसका कण्ठ सूख गया था और भीड़ से बचने के लिए वह दूर खड़ा था ॥७०-७१॥ ऋभु उसको देखकर समीप आये और अभिवादन कर पूछा--"द्विज ! आप यहाँ एकान्त में क्यों बैठे हैं ?" ॥७२॥ निदाघ बोला--विप्र ! आज नरेश्वर इस रम्य पुर में समारोह के साथ प्रवेश कर रहे हैं जिससे अधिक भीड़ हो गई है इसीलिए मैं यहाँ बैठा हूँ ॥७३॥
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का सम्पूर्ण देवनागरी पाठ (लाइन-दर-लाइन) दिया गया है:
एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३३१ ऋभुरुवाच नराधिपोऽत्र कतमः कतमश्चेतरो जनः । कथ्यतां मे द्विजश्रेष्ठ त्वमभिज्ञो मतो मम ॥७४॥ निदाघ उवाच योऽयं गजेन्द्रमुन्मत्तमद्रिशृंगसमुच्छ्रयम् । अधिरूढो नरेन्द्रोऽयं परितो यस्तथेतरः ॥७५॥ ऋभुरुवाच एतौ हि गजराजानौ दृष्टौ हि युगपन्मया । भवता निर्विशेषेण पृथग्वेदोपलक्षितौ ॥७६॥ तत्कथ्यतां महाभाग विशेषो भवतानयोः । ज्ञातुमिच्छाम्यहं कोऽत्र गजः को वा नराधिपः ॥७७॥ निदाघ उवाच गजो योऽयमधो ब्रह्मन्नुपर्यस्यैष भूपतिः । वाह्यवाहकसंबंधं को न जानाति वै द्विज ॥७८॥ ऋभुरुवाच ब्रह्मन्यथाहं जानीयां तथा मामवबोधय । अधः सत्त्वविभागं किं किं चोर्ध्वमभिधीयते ॥७९॥ ब्राह्मण उवाच इत्युक्त्वा सहसारुह्य निदाघः प्राह तं ऋभुम् । श्रूयतां कथयाम्येष यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥८०॥ उपर्यहं यथा राजा त्वमधः कुंजरो यथा । अवबोधाय ते ब्रह्मन्दृष्टांतो दर्शितो मया ॥८१॥
ऋभु बोले—इसमें नरेन्द्र कौन हैं और इतर जन कौन हैं, द्विजवर ! आप बताइए, जान पड़ता है कि आप अवश्य भली-भाँति परिचित हैं ॥७४॥ निदाघ बोला—जो पहाड़ की चोटी के समान ऊँचे मतवाले गजेन्द्र पर बैठे हुए हैं वे नरेन्द्र हैं और उनके चारों ओर इतर जन हैं ॥७५॥ ऋभु बोले—मैंने इन दोनों गजराज और राजा को पहले एक साथ ही देख लिया और आपने तो पृथक्-पृथक् भली भाँति देखा है तो महाभाग ! आप कुछ इन दोनों की विशेषता बतलाइए । मैं तो यह जानना चाहता हूँ कि कौन गज है और कौन राजा ॥७६-७७॥ निदाघ ने कहा—ब्रह्मन् ! जो नीचे है वह तो हाथी है और इसके ऊपर जो स्थित है वह राजा है। द्विज ! इस छोटी सी बात को-वाह्य-वाहक संबन्ध को कौन नहीं जानता ? ॥७८॥ ऋभु बोले--ब्रह्मन् ! जिस प्रकार मैं भली भाँति जान सकूँ उस प्रकार मुझे समझाओ । यहाँ दोनों पदार्थ में विभाग कैसे किया जाय ? इसलिए बतलाओ कि किसको अधः (नीचे) कहा जाय और किसको ऊर्ध्व (ऊपर) ॥७९॥ ब्राह्मण बोला--यह कह कर निदाघ एकाएक ऋभु के ऊपर चढ़ गया और कहा—सुनो बता रहा हूँ जो तुम मुझसे पूछ रहे हो । जिस प्रकार मैं ऊपर हूँ वैसे राजा हाथी के ऊपर है और तुम हाथी की भाँति नीचे हो । ब्रह्मन् ! तुमको भली भाँति समझाने के लिए यह दृष्टान्त के रूप में दिखलाया है ॥८०-८१॥
३३२ नारदोयपुराणम् ऋभुरुवाच त्वं राजेव द्विजश्रेष्ठ स्थितोऽहं गजवद्यदि। तदेवं त्वं समाचक्ष्व कतमस्त्वमहं तथा ॥८२॥ ब्राह्मण उवाच इत्युक्तः सत्वरस्तस्य चरणावभिवंद्य सः। निदाघः प्राह भगवन्नाचार्यस्त्वमृभुर्मम ॥८३॥ नान्यस्याद्वैतसंस्कारसंस्कृतं मानसं तथा। यथाचार्यस्य तेन त्वां मन्ये प्राप्तमहं गुरुम् ॥८४॥ ऋभुरुवाच तवोपदेशदानाय पूर्वशुश्रूषणात्तव। गुरुस्नेहादृभुर्नाम निदाघं समुपागतः ॥८५॥ तदेतदुपदिष्टं ते संक्षेपेण महामते। परमार्थसारभूतं यत्तदद्वैतमशेषतः ॥८६॥ ब्राह्मण उवाच एवमुक्त्वा ददौ विद्यां निदाघं स ऋभुर्गुरुः। निदाघोऽप्युपदेशेन तेनाद्वैतपरोऽभवत् ॥८७॥ सर्वभूतान्यभेदेन ददृशे स तदात्मनः। तथा ब्रह्मतनौ मुक्तिमवाप परमां द्विजः ॥८८॥ तथा त्वमपि धर्मज्ञ तुल्यात्मरिपुबांधवः। भव सर्वगतं ज्ञानमात्मानमवनीपते ॥८९॥ सितनीलादिभेदेन यथैकं दृश्यते नभः। भ्रांत दृष्टिभिरात्मापि तथैकः सन्पृथक् पृथक् ॥९०॥ ऋभु बोले—द्विजश्रेष्ठ ! तुम यदि राजा के समान हो और मैं गज के समान हूँ तो बताओ कि तुम कौन हो और मैं कौन हूँ ॥८२॥ ब्राह्मण बोला—यह सुनकर वह शीघ्र ही गुरु के चरणों की वन्दना कर बोला, भगवन् ! आप निश्चय ही मेरे गुरु ऋभुदेव हैं, क्योंकि आचार्य को छोड़कर दूसरे की ऐसी अद्वैत भावना से परिष्कृत बुद्धि नहीं है। इसलिए मुझे विश्वास है कि आज मैं अपने गुरु को पा गया हूँ ॥८३-८४॥ ऋभु ने कहा—तुम्हारी पूर्व की शुश्रूषा से प्रसन्न होकर मैं (ऋभु) तुम (निदाघ) को उपदेश देने के लिए वात्सल्य से आकृष्ट हो यहाँ आया हूँ। इसलिए महामते ! जो सम्पूर्ण तत्त्वों का सार अद्वैत तत्त्व है उसको इस प्रकार संक्षेप में पूर्णरूप से सुना दिया है ॥८५-८६॥ ब्राह्मण बोला—इस प्रकार गुरु ऋभु ने अपने शिष्य निदाघ को परम अद्वैत विद्या का उपदेश दिया। निदाघ भी गुरु के उस उपदेश से अद्वैत परायण हो गया। उस समय से वह अपने और इतर सब प्राणियों को अभेद भावना से देखने लगा। इस प्रकार उसने ब्राह्मण के शरीर में परम मुक्ति प्राप्त कर ली ॥८७-८८॥ धर्मज्ञ ! इसलिए तुम भी शत्रु और बन्धुओं में समान दृष्टि रखने वाले समदर्शी बनो। भूमिपते ! अपने को सबके रूप में देखने वाला आत्मज्ञानी बनो ॥८९॥ जिस प्रकार एक ही नभ श्वेत, नील आदि भेद से अनेक दिखाई पड़ता है उसी प्रकार भ्रान्तदृष्टि व्यक्ति एक आत्मा को पृथक्-पृथक् रूपों में देखता है ॥९०॥ यहाँ जो कुछ दिखाई देता है वह समस्त अच्युत से अतिरिक्त और कुछ नहीं। वह, मैं और तुम यह सब केवल मायातीत आत्मा की ही विभूति है ॥९१॥
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३३३ सनंदन उवाच एकः समस्तं यदिहास्ति किंचित्तदच्युतो नास्ति परं ततोऽन्यत् । सोऽहं स च त्वं स च सर्वमेतदात्मा स्वयं भात्यपभेदमोहः ॥६१॥ सनंदन उवाच इतोरितस्तेन स राजवर्यस्तत्याज भेदं परमार्थदृष्टिः । स चापि जातिस्मरणायबोधस्तत्रैव जन्मन्यपवर्गमाप ॥६२॥ परमार्थोऽध्यात्ममेतत्तभ्यमुक्तं मुनीश्वर । ब्राह्मणक्षत्रियविशां श्रोतॄणां चापि मुक्तिदम् ॥६३॥ यथा पृष्टं त्वया ब्रह्म स्तथा ते गदितं मया । ब्रह्मज्ञानमिदं शुद्धं किमन्यत्कथयामि वै ॥६४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वि० पा० एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥४६॥
अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
सूत उवाच श्रुत्वा सनंदनस्येत्थं वचनं नारदो मुनिः । असंतुष्ट इव प्राह भ्रातरं तं सनंदनम् ॥१॥
सनन्दन ने कहा- ब्राह्मण के मुख से इस प्रकार का उपदेश सुनकर राजा ने सारे भेद-भाव का त्याग कर परमार्थ दृष्टि प्राप्त कर ली और उसको जातिस्मर का ज्ञान हो जाने के कारण उसी जन्म में मुक्ति भी मिल गई ॥९२॥ मुनीश्वर ! इस परमार्थ अध्यात्म को तुमसे मैंने कह दिया जिसका सुनना ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सबको मुक्ति देने वाला है। ब्रह्मन् ! तुमने जैसे पूछा मैंने तदनुकूल उत्तर भी दे दिया, यही शुद्ध ब्रह्मज्ञान है। अब कहो और मैं क्या कहूँ ॥९३-९४॥ श्रीनारदीय महापुराण में उनचासवाँ अध्याय समाप्त ॥४९॥
अध्याय ५० शिक्षा-निरूपण सूत जी बोले- सनन्दन की बातों को सुनकर नारद असन्तुष्ट-से रहे और फिर अपने भाई सनन्दन से कहा ॥१॥
३३४ नारदीयपुराणम् नारद उवाच भगवन्सर्वमाख्यातं यत्पृष्टं भवतो मया । तथापि नात्मा प्रीयेत शृण्वन्हरिकथां मुहुः ॥२॥ श्रूयते व्यासपुत्रस्तु शुकः परमधर्मवित् । सिद्धिं सुमहतीं प्राप्तो निर्विण्णोऽवांतरं बहिः ॥३॥ ब्रह्मन्पुंसस्तु विज्ञानं महतां सेवनं विना । न जायते कथं प्राप्तो ज्ञानं व्यासात्मजः शिशुः ॥४॥ तस्य जन्मरहस्यं मे कर्मचाप्यस्य शृण्वते । समाख्याहि महाभाग मोक्षशास्त्रार्थविद्भवान् ॥५॥ सनंदन उवाच शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि शुकोत्पत्तिं समासतः । यां श्रुत्वा ब्रह्मतत्त्वज्ञो जायते मानवो मुने ॥६॥ न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बंधुभिः । ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥७॥ नारद उवाच अनूचानः कथं ब्रह्मन्पुमान्भवति मानद । तन्मे कर्म समाचक्ष्व श्रोतुं कौतूहलं मम ॥८॥ सनंदन उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि ह्यनूचानस्य लक्षणम् । यज्ज्ञात्वा सांगवेदानामभिज्ञो जायते नरः ॥६॥ शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं ज्यौतिषं तथा । छंदःशास्त्रं षडेतानि वेदांगानि विदुर्बुधाः ॥१०॥ ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः । वेदाश्चत्वार एवैते प्रोक्ता धर्मनिरूपणे ॥११॥ सांगान्वेदान्गुरोर्यस्तु समधीते द्विजोत्तमः । सोऽनूचानः प्रभवति नान्यथा ग्रंथकोटिभिः ॥१२॥ भगवन् ! मैंने जो कुछ आपसे पूछा, उसको आपने बता दिया; परन्तु इतनी अधिक हरि-कथा को बार-बार सुनकर भी मुझे प्रसन्नता नहीं हो रही है ॥२॥ सुना जाता है कि परम धर्मज्ञ व्यास-पुत्र शुक ने बिना किसी प्रकार के बाह्य और आभ्यन्तर साधना के ही परम सिद्धि प्राप्त कर ली थी ॥३॥ भगवन् ! पुरुष को बिना महात्माओं की सेवा के विज्ञान की प्राप्ति नहीं होती; किन्तु व्यास पुत्र शिशु शुक ने कैसे अनायास प्राप्त कर लिया ॥४॥ उनके जन्म के रहस्य और कर्म को कहिए महाभाग ! आप मोक्ष शास्त्र के ज्ञाता हैं। कृपाकर मुझ श्रोता को सुनाइए ॥५॥ सनन्दन बोले- विप्र ! सुनो, मैं तुमको संक्षेप में शुकोत्पत्ति को सुना रहा हूँ। मुने ! जिस कथा को सुनकर मानव ब्रह्म तत्त्व का ज्ञाता हो जाता है ॥६॥ न तो वयोवृद्ध होने से, न केश पकने से, न तो धन, और परिवार द्वारा महत्ता प्राप्त की जाती है। वस्तुतः ऋषियों ने कहा है कि जो अनूचान है वही महान् है ॥७॥ नारद बोले- सम्मान देने वाले ! मनुष्य अनूचान कैसे होता है, उसके कर्म को बतलाइए, मुझे सुनने के लिए कौतूहल हो रहा है ॥८॥ सनंदन बोले- नारद, सुनो, मैं अनूचान का लक्षण बता रहा हूँ जिसको जानकर मनुष्य अंग-सहित सब वेदों को जान जाता है ॥६॥ शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द शास्त्र इन्हीं को विद्वानों ने वेदांग कहा है ॥१०॥ धर्म निरूपण में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद, ये चार वेद ही प्रमाण कहे गये हैं। जो उत्तम ब्राह्मण गुरु से अंग सहित वेदों का अध्ययन करता है, उसको अनूचान कहते हैं अन्यथा करोड़ों ग्रन्थों के पढ़ने से द्विज अनूचान नहीं हो सकता ॥११-१२॥
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३३५ नारद उवाच अंगानां लक्षणं ब्रूहि वेदानां चापि विस्तरात् । त्वमस्मासु महाविज्ञः सांगेष्वेतेषु मानद ॥१३॥ सनंदन उवाच प्रश्नभारोऽयमतुलस्त्वया मम कृतो द्विज । संक्षेपात्कथयिष्यामि सारमेषां सुनिश्चितम् ॥१४॥ स्वरः प्रधानः शिक्षायां कीत्तितो मुनिभिर्द्विजैः । वेदानां वेदविद्भिस्तु तच्छृणुष्व वदामि ते ॥१५॥ आर्चिकं गाथिकं चैव सामिकं च स्वरान्तरम् । कृतान्ते स्वरशास्त्राणां प्रयोक्तव्यं विशेषतः ॥१६॥ एकांतरः स्वरो ह्यृप्सु गाथासु द्वयन्तरः स्वरः । सामसु त्र्यन्तरं विद्यादेतावत्स्वरतोऽन्तरम् ॥१७॥ ऋक्सामयजुरंगानि ये यज्ञेषु प्रयुंजते । अविज्ञानाद्धि शिक्षायास्तेषां भवति विस्वरः ॥१८॥ मंत्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह । ॥१९॥ स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेंद्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् उरः कंठः शिरश्चैव स्थानानि त्रीणि वाङ्मये । सवनान्याहुरेतानि साम वाप्यर्द्धतोऽन्तरम् ॥२०॥ नारद बोले-मानद ! आप सम्पूर्ण सांगोपाङ्ग वेदों के महान् पंडित हैं। इसलिये विस्तारपूर्वक अंगों और वेदों के लक्षण कहिये ॥१३॥ सनंदन बोले-द्विज ! तुमने तो बहुत बड़ा प्रश्न किया । इसलिए इनको संक्षेप में सिद्धान्त रूप से कह रहा हूँ ॥१४॥ वेदज्ञ ब्राह्मण मुनियों ने शिक्षा में स्वर की प्रधानता बताई है, उसको सुनो, मैं तुमसे कह रहा हूँ ॥१५॥ स्वर शास्त्रों के निश्चय के अनुसार विशेष रूप से आर्चिक (ऋक्-सम्बन्धी), गाथिक (गाथा-सम्बन्धी) और सामिक (साम-सम्बन्धी) स्वर व्यवधान का प्रयोग करना चाहिए। ऋचाओं में एक का अन्तर देकर स्वर होता है। गाथाओं में दो के व्यवधान से और साम-मन्त्रों में तीन के व्यवधान से स्वर होता है। स्वरों का इतना ही व्यवधान सर्वत्र जानना चाहिए ।१६-१७॥ ऋक्, साम और यजुर्वेद के अंगभूत जो याज्य, स्तोत्र, करण और मन्त्र आदि याज्ञिकों द्वारा यज्ञों में प्रयुक्त होते हैं, शिक्षा शास्त्र का ज्ञान न होने से उनमें विस्वर (विरुद्ध स्वर का उच्चारण) हो जाता है। स्वर और वर्ण से हीन मन्त्र और उसका मिथ्या प्रयोग जो कि यथार्थ अर्थ को न कहे यजमान का उसी प्रकार नाश कर देता है जिस प्रकार इन्द्र-शत्रु (वृत्र) का इन्द्रशत्रु शब्द के अशुद्ध स्वर प्रयोग के अपराध से नाश हो गया १ ॥१८-१९॥ वाङ्मय में उर, कण्ठ और शिर शब्दोच्चारण के तीन मूल स्थान माने जाते हैं। इनको ही सवन कहते हैं। अर्थात् वक्षः स्थान में नीच स्वर से जो शब्दोच्चारण होता है, उसे प्रातः सवन कहते हैं; कण्ठस्थान में मध्यम स्वर से किये हुए शब्दोच्चारण का नाम माध्यन्दिन सवन है तथा मस्तक रूप स्थान में उच्च स्वर से जो शब्दोच्चारण होता है, उसे तृतीय सवन कहते हैं। अधरोत्तर भेद से सप्त- १. तैत्तिरीय शाखा की कृष्णयजुः संहिता के द्वितीय काण्ड में पञ्चम प्रपाठक के द्वितीय अनुवाक की प्रथम पञ्चशती में मन्त्र आया है--'स्वाहेन्द्रशत्रुर्वर्धस्व' । पौराणिक गाथा के अनुसार त्वष्टा प्रजापति ने 'इन्द्र के शत्रु वृत्र के अभ्युदय के लिए इस मंत्र' का उच्चारण किया था। 'इन्द्रस्य शत्रुः' इस विग्रह के अनुसार षष्ठी समास में समासान्त प्रयुक्त अन्तोदात्त का उच्चारण अभीष्ट था; परन्तु प्रयोग में पूर्वपदप्रकृतिस्वर- आद्युदात्त बोला गया; अतः वह बहुव्रीहि के अर्थ का प्रकाशक हो गया। इसलिए 'इन्द्र है शत्रु (संहारक) जिसका वह' ऐसा अर्थ निकलने के कारण वृत्तासुर ही इन्द्र के हाथ से मारा गया।
३३६ नारदीयपुराणम् उरः सप्तविदारं स्यात्तथा कंठस्तथा शिरः । न च शक्तोऽसि व्यक्तस्तु तथा प्रावचनो विधिः ॥२१॥ कठकालापवृत्तेषु तैत्तिराह्वरकेषु च । ऋग्वेदे सामवेदे च वक्तव्यः प्रथमः स्वरः ॥२२॥ ऋग्वेदस्तु द्वितीयेन तृतीयेन च वर्तते । उच्चमध्यमसंघातः स्वरो भवति पार्थिवः ॥२३॥ तृतीये प्रथमकृष्टौ कुर्वन्त्याह्वरकान् स्वरान् । द्वितीयाद्यास्तु मद्रान्तांस्तैत्तिरीयाश्चतुःस्वरान् ॥२४॥ प्रथमश्च द्वितीयश्च तृतीयोऽथ चतुर्थकः । मंद्रः कृष्टो मुनीश्वर एतान्कुर्वंति सामगाः ॥२५॥ द्वितीयप्रथमावेतौ नांडिमाल्लविनौ स्वरौ । तथा शातपथावेतौ स्वरौ वाजसनेयिनाम् ॥२६॥ एते विशेषतः प्रोक्ताः स्वरा वै सार्ववैदिकाः । इत्येतच्चरितं सर्वं स्वराणां सार्ववैदिकम् ॥२७॥ सामवेदे तु वक्ष्यामि स्वराणां चरितं यथा । अल्पग्रंथं प्रभूतार्थं सामवेदांगमुत्तमम् ॥२८॥ तानरागस्वरग्राममूर्च्छनानां तु लक्षणम् । पवित्रं पावनं पुण्यं यथा तुभ्यं प्रकीर्तितम् ॥२६॥ शिक्षामानुद्विजातीनामृग्यजुः सामलक्षणम् । सप्त स्वरास्त्रयो ग्रामा मूर्च्छनास्त्वेकविंशतिः ॥३०॥ ताना एकोनपंचाशदित्येतत्स्वरमंडलम् । षड्जश्च ऋषभश्चैव गांधारो मध्यमस्तथा ॥३१॥ पंचमो धैवतश्चैव निषादः सप्तमः स्वरः । षड्जमध्यमगांधारास्त्रयो ग्रामाः प्रकीर्तिताः ॥३२॥ भूल्लो काज्जायते षड्जो भुवर्लोकाच्च मध्यमः । स्वर्गाच्चाच्चैव गांधारो ग्रामस्थानानि त्रीणि हि ॥३३॥
स्वरात्मक साम के भी पूर्वोक्त तीन ही स्थान हैं। उरोभाग, कण्ठ तथा सिर—ये सातों स्वरों के विचरण-स्थान हैं। किन्तु उरःस्थल में मन्द्र और अतिस्वार की अभिव्यक्ति न होने से उसे सातों स्वरों का विचरणस्थल नहीं कहा जा सकता, तथापि अध्ययनाध्यापन के लिए वैसा विधान किया गया है। (ठीक अभिव्यक्ति न होने पर भी उपांशु या मानस प्रयोग में वर्ण तथा स्वर का सूक्ष्म उच्चारण होता है) ॥२०-२१॥ कठ, कालाप, तैत्तिरीय तथा आह्नरक शाखाओं में और ऋग्वेद एवं सामवेद में प्रथम स्वर का प्रयोग करना चाहिए ॥२२॥ ऋग्वेद द्वितीय और तृतीय स्वर से भी परिगीत होता है। उच्च और मध्यम का संघात पार्थिव (लौकिक) स्वर होता है ॥२३॥ आह्नरक शाखा वाले तृतीय तथा प्रथम में उच्चारित स्वरों का प्रयोग करते हैं। तैत्तिरीय शाखा वाले द्वितीय से लेकर पञ्चम तक चार स्वरों का उच्चारण करते हैं। सामगान करने वाले विद्वान् प्रथम (षड्ज), द्वितीय (ऋषभ), तृतीय (गान्धार), चतुर्थ (मध्यम), मन्द्र (पञ्चम), कृष्ट (धैवत) तथा अतिस्वार (निषाद)—इन सातों स्वरों का प्रयोग करते हैं। द्वितीय और प्रथम—ये ताण्डी (ताण्ड्यपञ्चविंशादि ब्राह्मण के अध्येता कौथुम आदि शाखा वाले) तथा भाल्लवी (छन्दोग शाखा वाले) विद्वानों के स्वर हैं। शतपथ ब्राह्मण में आये हुए ये दोनों स्वर वाजसनेयी शाखा वालों के द्वारा भी प्रयुक्त होते हैं। ये सब वेदों में प्रयुक्त होने वाले स्वर विशेष रूप से बताए गए हैं। इस प्रकार सार्ववैदिक स्वर-संचार कहा गया है ॥२४-२७॥ अब सामवेद में स्वरों का जैसा प्रयोग होता है उसको कह रहा हूँ। सामवेद को थोड़े शब्दों में अत्यधिक अर्थ को व्यक्त करने वाला उत्तम वेद समझना चाहिए ॥२८॥ तान, राग, स्वर, ग्राम और मूर्च्छना का लक्षण पवित्र, पावन और पुण्यदायक है जैसा कि मैंने तुमसे पहले कहा था। द्विजाति के लिये ही ऋक्, यजु और साम संबन्धी शिक्षा कही गई है ॥२६३॥ सात स्वर, तीन ग्राम और मूर्च्छना इक्कीस प्रकार की होती है, तान उनचास प्रकार के होते हैं; इनकी स्वर-मण्डल कहा गया है। षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद ये सात स्वर हैं। षड्ज, मध्यम और गान्धार ये तीन ग्राम हैं ॥३०-३२॥ भूःलोक से षड्ज उत्पन्न होता है, भुवःलोक से मध्यम और स्वर्ग एवं मेघलोक से गान्धार उत्पन्न होता है। तीन ग्राम-स्थान हैं। स्वरों के विशेष रूप से ग्राम राग
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३३७ स्वराणां च विशेषेण ग्रामरागा इति स्मृताः । विशतिर्मध्यमग्रामे षड्जग्रामे चतुर्दश ॥३३॥ तानान्पंचदशेच्छंति गांधारे सामगायिनाम् । नदी विशाला सुमुखी चित्रा चित्रवतो मुखा ॥३४॥ बला चाप्यथ विज्ञेया देवानां सप्त मूर्च्छनाः । आप्यायिनी विश्वभृता चंद्रा हेमा कपर्दिनी ॥३५॥ मैत्रीच बार्हती चैव पितृणां सप्त मूर्च्छनाः । षड्जे तूत्तरमंद्रा स्यादृषभे चाभिरुहता ॥३६॥ अश्वक्रांता तु गांधारे तृतीया मूर्च्छना स्मृता । मध्यमे खलु सौवीरा हृषिका पंचमे स्वरे ॥३८॥ धैवते चापि विज्ञेया मूर्च्छना तूत्तरा मता । निषादे रजनीं विद्यादृषीणां सप्त मूर्च्छनाः ॥३६॥ उपजीवंति गंधर्वा देवानां सप्त मूर्च्छनाः । पितॄणां मूर्च्छनाः सप्त तथा यक्षा न संशयः ॥४०॥ ऋषीणां मूर्च्छनाः सप्त यास्त्वामा लौकिकाः स्मृताः । षड्जः प्रीणाति वै देवानृषीन्प्रीणाति चर्षभः ॥४१॥ पितॄन् प्रीणाति गांधारो गंधर्वा मध्यमः स्वरः । देवान्पितॄनृषींश्चैव स्वरः प्रीणाति पंचमः ॥४२॥ यक्षान्निषादः प्रीणाति भूतग्रामं च धैवतः । गानस्य तु दशविधा गुणवृत्तिस्तु तद्यथा ॥४३॥ रक्तं पूर्णमलंकृतं प्रसन्नं व्यक्तं विक्रष्टं श्लक्ष्णं समं सुकुमारं मधुरमिति गुणास्तत्र रक्तं नाम वेणुवीणास्वराणामेकीभावं रक्तमित्युच्यते पूर्ण नाम स्वरश्रुतिपूरणाच्छंदः पादाक्षरं संयोगात्पूर्णमित्युच्यते अलंकृतं नामोरसि शिरसि कंठयुक्तमित्यलंकृतं प्रसन्नं नामापगतागद्गदनिर्विशंकं प्रसन्नमित्युच्यते व्यक्तं नाम पदपदार्थप्रकृतिविकारगमनोप- कृतद्धितसमासधातुनिपातोपसर्गस्वरलिंगं वृत्तिवार्तिकविभक्त्यर्थवचनानां सम्यगुपपादनं व्यक्तमित्युच्यते विक्रष्टं नामोच्चैरुच्चारितं व्यक्तपदाक्षरं विक्रष्टमित्युच्यते श्लक्ष्णं नामाद्रुतमविलंबितमुच्चनीचप्लुतसमाहारहेलतालोपनयादिभि- कहे गए हैं। साम गाने वाले व्यक्ति मध्यम ग्राम में बीस, षड्ज में चौदह और गान्धार में पन्द्रह तान का प्रयोग करना चाहते हैं ॥३३-३४३॥ नंदी, विशाला, सुमुखी, चित्रा, चित्रवती, मुखा और बला ये देवों की सात मूर्च्छनायें मानी गई हैं ॥३५ ॥ आप्यायनी, विश्वभृता, चन्द्रा, हेमा, कपर्दिनी, मैत्री और बार्हती ये पितरों की सात मूर्च्छनायें हैं ॥३६ ॥ षड्ज में उत्तरमन्द्रा, ऋषभ में अभिरूढ़ता और गान्धार में अश्वक्रान्ता नाम की तीसरी मूर्च्छना है ॥३७ ॥ मध्यम में सौवीरा, पंचम स्वर में हृषीका और धैवत में उत्तरा नाम की मूच्छेना होती है । निषाद में रजनी नाम की मूर्च्छना समझनी चाहिए । इस प्रकार ऋषियों की ये सात मूर्च्छनायें हैं ॥३८-३९॥ गन्धर्व देवों की सात मूर्च्छनाओं को प्रयोग में लाते हैं और यक्ष पितरों की सात मूर्च्छनाओं को, इसमें सन्देह नहीं ॥४०॥ ऋषियों की जो सात मूर्च्छनायें हैं, उनका प्रयोग लौकिक गायक करते हैं। षड्ज देवों को प्रसन्न करता, ऋषभ ऋषियों को और गान्धार पितरों को, मध्यम स्वर गन्धर्वों को प्रसन्न करता है। पंचम स्वर देव-पितर और ऋषियों को प्रसन्न करता है ॥४१-४२॥ निषाद यक्षों को और धैवत सब प्राणियों को श्रुतिसुखद जान पड़ता है। गान की दस प्रकार की गुण- वृत्ति होतो है ॥४३॥ उसका जैसा रूप है सुनो - रक्त-वर्ण, पूर्णअलंकृत, प्रसन्न, व्यक्त, विकृष्ट, श्लक्ष्ण, सम, सुकुमार और मधुर ये दस गुण हैं। वेणुवीणा, और पुरुष के स्वरों का एकीभाव हो जाने से रक्त कहा जाता है। स्वर और श्रुति को पूर्ण करने से, छन्द एवं पादाक्षरों के संयोग से द्वितीय को पूर्ण कहा जाता है। उर, शिर और कण्ठ को अलंकृत करने के कारण तृतीय को अलंकृत कहते हैं। प्रसन्न उसको कहते हैं जो कंठ के गद्गद्भाव से रहित और निर्विशंक हो । पद, पदार्थ, प्रकृति, विकार, आगमन, कृत, तद्धित, समास, धातु, निपात, उपसर्ग, स्वर, तिङन्त, वृत्ति, वार्तिक, विभक्त्यर्थ और वचन, का भली-भाँति विचारपूर्वक उपपादनपूर्वक गान करने को व्यक्त कहते हैं। स्पष्टरूप से पदों और अक्षरों का उच्चारण करते हुए गान करने को विकृष्ट कहते हैं । द्रुत और विलम्बित दोषों से रहित उच्च-नीच, प्लुत, समाहार, हेल, ताल और उपनय आदि का उपपादान से ४३ ना० पु०
३३८ नारदीयपुराणम् रुपपादनाभिः श्लक्ष्णमित्युच्यते समं नामावापनिर्वापप्रदेशे प्रत्यंतरस्थानानां समासः सममित्युच्यते सुकुमारं नाम मृदुपदवर्णस्वरकुहरणयुक्तं सुकुमारमित्युच्यते मधुरं नाम स्वभावोपनीतललितपदाक्षरगुणसमृद्धं मधुरमित्युच्यते एवमेतैर्दशभिर्गुणैर्युक्तं गानं भवति ॥१॥ भवन्ति चात्र श्लोकाः । काकस्वरं मूर्द्धगतं तथा स्थानविवर्जितम् । शंकितं भीषणं भीतमुद्घुष्टमनुनासिकम् ॥४४॥ विस्वरं विरसं चैव विश्लिष्टं विषमाहतम् । व्याकुलं तालहीनं च गीतिदोषाश्चतुर्दश ॥४५॥ आचार्याः सममिच्छंति पदच्छेदं तु पंडिताः । स्त्रियो मधुरमिच्छंति विक्रुष्टमितरे जनाः ॥४६॥ पद्मपत्रप्रभः षड्ज ऋषभः शुकपिंजरः । कनकाभस्तु गांधारो मध्यमः कुंदसन्निभः ॥४७॥ पंचमस्तु भवेत्कृष्णः पीतकं धैवतं विदुः । निषादः सर्ववर्णः स्यादित्येताः स्वरवर्णताः ॥४८॥ पंचमो मध्यमः षड्ज इत्येते ब्राह्मणाः स्मृताः । ऋषभो धैवतश्चापीत्येतौ वै क्षत्रियावुभौ ॥४९॥ गांधारश्च निषादश्च वैश्यावर्द्धेन वै स्मृतौ । शूद्रत्वं विधिनाऽर्द्धेन पतितत्वान्न संशयः ॥५०॥ ऋषभो मूर्च्छनावर्जितो धैवतसहितश्च पंचमो यत्र । निपतति मध्यमरागे स निषादं षाड़जवं विद्यात् ॥५१॥ यदि पंचमो विरमते गांधारश्चांतरस्वरो भवति । ऋषभो निषादसहितस्तं पंचममीदृशं विद्यात् ॥५२॥ गांधारस्याधिपत्येन निषादस्य गतागतैः । धैवतस्य च दौर्बल्यान्मध्यमग्राम उच्यते ॥५३॥ ईषत्पृष्टो निषादस्तु गांधारश्चाधिको भवेत् । धैवतः कंपितो यत्र स षड्जग्राम ईरितः ॥५४॥ युक्त गीत को श्लक्ष्ण कहा जाता है। स्वरों के अवाप और निर्वाप (उतार-चढ़ाव) प्रदेश में प्रत्यन्तर स्थानों का समास सम कहा जाता है। मृदुपद, वर्ण, सर और कुहरण से युक्त गान को सुकुमार कहा जाता है। स्वभाव से ही ललित पद, अक्षर और गुणों से युक्त गान विधि की मधुर संज्ञा है इस प्रकार दस गुणों से गान होता है। इस विषय में और भी श्लोक कहे गए हैं—जिसका अभिप्राय यह है कि शंकित, भीषण, भीति, उद्घुष्ट, अनु- नासिक, काकस्वर, मूर्द्धगत, स्थानवर्जित, विस्वर, विरस, विश्लिष्ट, विषमाहत, व्याकुल, तालहीन, ये चौदह गीति के दोष हैं । ४४-४५॥ आचार्य सम स्वर को अधिक प्रिय समझते हैं, पंडित पदच्छेद को, स्त्रियां मधुर स्वर को और अन्य लोग विक्रुष्ट को उत्तम समझते हैं । ॥४६॥ षड्ज पद्मपत्र के समान और ऋषभ शुक के समान कुछ पीलापन लिए हुए हरे रंग का, गांधार सोने के और समान कान्तिवाला और मध्यम कुंद के समान श्वेत वर्ण का होता है ॥४७॥ पंचम काले रंग का धैवत पीले रंग का और निषाद सब रंगों के मिले-जुले रंग का होता है। ये ही स्वरों के वर्ण (रंग) हैं ॥४८॥ पंचम, मध्यम और षड्ज ब्राह्मण वर्ण कहे जाते हैं, ऋषभ और धैवत क्षत्रिय, गांधार और निषाद आधा वैश्य और आधा शूद्र वर्ण के होते हैं क्योंकि ये पतित स्वर हैं (उच्चारण करने वाले अंगों के नीचे के भाग से निकलते हैं) ॥४९-५०॥ जहाँ मूर्च्छना से रहित ऋषभ, धैवत सहित पंचम, मध्यम राग में मिलते हैं उस निषाद स्वरग्राम को षाड़जव जानना चाहिए ॥५१॥ यदि मध्यम स्वर में पंचम का विराम हो और अन्तर स्वर गान्धार हो जाय तथा उसके बाद क्रम से ऋषभ, निषाद एवं पंचम का उदय हो तो उस पंचम को भी ऐसा ही (षाडव या षाड्जव) समझना चाहिए ॥५२॥ गांधार की प्रधानता हो, निषाद बार-बार आता-जाता रहे और धैवत अप्रधान रूप से हो तो इसको मध्यम ग्राम कहा जाता है ॥५३॥ निषाद का ईषत् स्पर्श हो, गांधार का अधिक हो और धैवत कंपित हो तो उसको षड्ज ग्राम कहा जाता है ॥५४॥ जहाँ अन्तर स्वर से युक्त काकली (सूक्ष्म ध्वनि) दिखाई देती हो
[Header] पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३३६ [/Header]
अंतरस्वरसंयुक्तः काकलियंत दृश्यते । तं तु साधारितं विद्यात्पंचमस्थं तु कैशिकम् ॥५५॥ कैशिकम् भावयित्वा तु स्वरैः सर्वैः समंततः । यस्मात्तु मध्यमे न्यासस्तस्मात्कैशिकमध्यमः ॥५६॥ काकलिद्दृश्यते यत्र प्राधान्यं पंचमस्य तु । कश्यपः कैशिकं प्राह मध्यमग्रामसंभवम् ॥५७॥ गेति गेयं विदुः प्राज्ञा धेति कारुप्रवादनम् । वेति वाद्यस्य संज्ञेयं गंधर्वस्य परोचनम् ॥५८॥ यः सामगानां प्रथमः स वेणोर्मध्यमः स्वरः । यो द्वितीयः स गांधारस्तृतीयस्त्वृषभः स्मृतः ॥५९॥ चतुर्थः षड्ज इत्याहुः पंचमो धैवतो भवेत् । षष्ठो निषादो विज्ञेयः सप्तमः पंचमः स्मृतः ॥६०॥ षड्जं मयूरो वदति गावो रंभंति चर्षभम् । अजाविके तु गांधारं क्रौंचो वदति मध्यमम् ॥६१॥ पुष्पसाधारणे काले कोकिला वक्ति पञ्चमम् । अश्वस्तु धैवतं वक्ति निषादं वक्ति कुंजरः ॥६२॥ कंठादुत्तिष्ठते षड्जः शिरसस्त्वृषभः स्मृतः । गांधारस्त्वनुनासिक्य उरसो मध्यमः स्वरः ॥६३॥ उरसः शिरसः कंठादुत्थितः पंचमः स्वरः । ललाटाद्धैवतं विद्यान्निषादं सर्वसन्धिजम् ॥६४॥ नासा कंठमुरस्तालुजिह्वादन्तांश्च संश्रितः । षड्भ्यः संजायते यस्मात्तस्मात्षड्ज इति स्मृतः ॥६५॥ वायुः समुत्थितो नाभेः कंठशीर्षसमाहतः । नर्द्दर्द्यृषभमद्यस्मात्तस्मादृषभ उच्यते ॥६६॥ वायुः समुत्थितो नाभेः कंठशीर्षसमाहतः । वाति गंधवहः पुण्यो गांधारस्तेन हेतुना ॥६७॥ वायुः समुत्थितो नाभेह्रौ हृदि समाहतः । नाभिम्प्राप्तो मध्यवर्ती मध्यगत्वं समश्नुते ॥६८॥ वायुः समुत्थितो नाभेह्रोरूहृत्कंठकाहतः । पंचस्थानोत्थितस्यास्य पंचमत्वं विधीयते ॥६९॥
उसको साधारित समझना चाहिए, पंचमस्थ यदि काकलि हो तो उसको कैशिक कहा जाता है। जब कैशिक को चारों ओर से सब स्वरों से भावित कर मध्यम में न्यस्त किया जाता है तब उसको कैशिक मध्यम कहा जाता है ।।५५-५६।। जहाँ काकलि तो हो परन्तु पंचम की प्रधानता हो उसको कश्यप ने मध्यमग्राम से उत्पन्न कैशिक कहा है ।।५७।। विद्वान् पुरुष 'गा' का अर्थ गेय मानते हैं, 'ध' का अर्थ कलापूर्वक वाद्य बजाना कहते हैं और रेफसहित 'व' का अर्थ वाद्य सामग्री है। यही 'गान्धर्व' शब्द का लक्ष्यार्थ है ।।५८।। सामगायकों का जो प्रथम स्वर है वह वेणु का मध्यम स्वर है। जो उनका दूसरा है उसको गान्धार तथा उनके तीसरे को ऋषभ कहते हैं। चौथे को षड्ज और पाँचवें को धैवत कहते हैं। छठें को निषाद और सातवें को पंचम कहते है ।।५९-६०।। मयूर षड्ज में बोलता और गायें ऋषभ स्वर में बोलती हैं। भेड़-बकरियाँ गांधार स्वर में मिमियाती और क्रौंच मध्यम स्वर में कूजता है ।।६१।। साधारण रूप से जब वसन्त के आगमन काल में फूल खिलते हैं, उस समय कोकिला पंचम स्वर में कूकती है। अश्व धैवत स्वर में हिनहिनाता है और हाथी निषाद स्वर में चिंघाड़ता है ।।६२।। कण्ठ से षड्ज स्वर उठता ओर शिर से ऋषभ। गान्धार अनुनासिक से उत्पन्न होता और उरस् (छाती) से मध्यम स्वर निकलता है ।।६३।। उरस्, शिर और कण्ठ तीनों से पंचम स्वर निकलता है। ललाट से धैवत और सब सन्धियों से निषाद स्वर उत्पन्न होता है। ।।६४।। नासा, कण्ठ, उरस्, तालु, जिह्वा और दांत इन छह स्थानों से षड्ज स्वर निकलता है ।।६५।। नाभि से वायु ऊपर को उठता और कण्ठ से शिर से धक्का खाकर वह स्वर ऋषभ (बैल) के समान हुंकारता है इसलिए उसको ऋषभ स्वर कहते हैं ।।६६।। नाभि से वायु ऊपर उठकर जब कण्ठ और शिर से टकरा कर गंधवाही वायु के समान सन सनाता हुआ निकलता है तब उसको गांधार कहते हैं ।।६७।। नाभि सेवायु ऊपर उठकर ऊरु और हृदय से टकराकर नाभिस्थान में मध्यवर्ती होता है, अतः उससे निकले हुए स्वर को मध्यम कहा जाता है ।।६८।। नाभि से ऊपर उठा हुआ वायु जब ऊरु, हृदय, कण्ठ और शिर से टकराकर बाहर निकलता है तब पाँच स्थानों से निकलने वाले स्वर को पंचम
३४० नारदीयपुराणम् धैवतं च निषादं च वर्जयित्वा तु तावुभौ । शेषान्पंच स्वरांस्त्वन्ये पंचस्थानोत्थितान्विदुः ॥७०॥ पंचस्थानस्थितत्वेन सर्वस्थानाने धार्यते । अग्निगोतस्वरः षड्ज ऋषभौ ब्रह्मणोच्यते ॥७१॥ सोमेन गीतो गांधारो विष्णुना मध्यमः स्वरः । पंचमस्तु स्वरो गीतस्त्वयैवेति निधारय ॥७२॥ धैवतश्च निषादश्च गीतो तुंबुरुणा स्वरौ । आद्यस्य दैवतं ब्रह्मा षड्जस्याप्युच्यते बुधैः ॥७३॥ तीक्ष्णदीप्तप्रकाशत्वादृषभस्य हुताशनः । गावः प्रणीते तुष्यंति गांधारस्तेन हेतुना ॥७४॥ श्रुत्वा चैवोपनिष्ठंति सौरभेया न संशयः । सोमस्तु पंचमस्यापि दैवतं ब्रह्मराट् स्मृतम् ॥७५॥ निह्रासो यस्य वृद्धिश्च ग्राममासाद्य सोमवत् । अतिसंधीयते यस्मादेतान्पूर्वोत्थितान्स्वरान् ॥७६॥ तस्मादस्य स्वरस्यापि धैवतत्वं विधीयते । निषीदंति स्वरा यस्मान्निषादस्तेन हेतुना ॥७७॥ सर्वांश्चाभिभवत्येष यदादित्योऽस्य दैवतम् ॥७८॥ दारवी गात्रवीणा च द्वै वीणे गानजातिषु ॥७९॥ सामनी गात्रवीणा तु तस्यास्त्वं शृणु लक्षणम् । गात्रवीणा तु सा प्रोक्ता यस्यां गायंति सामगाः ॥८०॥ स्वरव्यंजनसंयुक्ता अंगुल्यंगुष्ठरंजिता । हस्तौ तु संयतौ धार्यो जानुभ्यामुपरिस्थितौ ॥८१॥ गुरोरनुकृतिं कुर्याद्यथान्या न मतिर्भवेत् । प्रणवं प्राक्प्रयुंजीत व्याहतीस्तदनंतरम् ॥८२॥ सावित्रीं चानुवचनं ततो वै गानमारभेत् । प्रसार्य चांगुलीः सर्वा रोपयेत्स्वरमंडलम् ॥८३॥ न चांगुलीभिरंगुष्ठमंगुष्ठेनांगुलीः स्पृशेत् । विरला नांगुलीः कुर्यान्मूले चैतां न संस्पृशेत् ॥८४॥ कहा जाता है ॥६९॥ अन्य विद्वान् धैवत और निषाद को छोड़कर शेष पाँच स्वरों को पाँच स्थानों से उत्पन्न मानते हैं ॥७०॥ पाँच स्थानों में स्थित होने के कारण वह सब स्थानों में धारण किया जाता है। षड्ज स्वर अग्नि द्वारा गाया जाता है। ब्रह्मा ऋषभ का गान करते हैं; सोम गान्धार का और विष्णु मध्यम स्वर का गान करते हैं। पंचम स्वर का गान तुम्हीं करते हो ऐसा समझो ॥७१-७२॥ तुम्बुरु धैवत और निषाद स्वर में गाते हैं। आदि स्वर के देवता ब्रह्मा हैं और षड्ज के भी देवता वही माने गए हैं। तीक्ष्ण और जाज्वल्यमान होने के कारण ऋषभ के अग्नि देवता हैं। गायें गान्धार स्वर को सुनकर प्रसन्न होती हैं; गायें उस गान्धार को सुनकर उपस्थित हो जाती हैं ॥७३-७४॥। पंचम स्वर के देवता सोम हैं, जिन्हें ब्राह्मणों का राजा कहा गया है। जैसे चन्द्रमा शुक्ल पक्ष में बढ़ता है और कृष्ण पक्ष में घटता है, उसी प्रकार स्वरग्राम में प्राप्त होने पर जिस स्वर का ह्रास होता और वृद्धि होती है तथा इन पूर्वोत्पन्न स्वरों की अतिसंधि होती है वह धैवत है। इसी से उसके धैवतत्व का विधान किया गया है। निषाद में सब स्वरों का निषादन (अन्तर्भाव) होता है, इसलिए वह निषाद कह- लाता है। यह सब स्वरों को अभिभूत कर लेता है ठीक उसी तरह, जैसे सूर्य सब नक्षत्रों को अभिभूत करता है, क्योंकि सूर्य ही इसके अधिदेवता हैं ॥७५-७८॥ काठ की वीणा और गात्रवीणा दो प्रकार की वीणाएं गान में प्रयुक्त होती हैं। जो सामकी गात्र- वीणा है उसका लक्षण सुनो। गात्रवीणा उसको कहते हैं जिस पर साम के गाने वाले गान करते हैं ॥७९॥ यह वीणा घुटनों के ऊपर रख कर बजाई जाती है। सबसे पहले वीणा को दो हाथों के बीच में भली भाँति रख कर उसको स्वर व्यंजन के अनुकूल अंगुलियों से बजाया जाता है ॥८०-८१॥ इस विषय में गुरु का ही अनुकरण करना चाहिए जिससे बुद्धि कहीं इतर वस्तु की ओर न जाय । पहले प्रणव को तत्पश्चात् सात महा व्याहृतियों को उस वीणा पर बजाना चाहिए। फिर सावित्री की स्तुति तब गान का प्रारम्भ करना चाहिए। पाँचों अंगुलियों को फैलाकर स्वरों पर रखना चाहिए ॥८२-८३॥ अंगुलियों से अंगूठे का और अंगूठे से अंगुलियों
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३४१ अंगुष्ठाग्रेण ता नित्यं मध्यमे पर्वणि स्पृशेत् । मात्राद्विमात्रवृद्धानां विभागाथ विभागवित् ॥८५॥ अंगुलीभिर्द्विमात्रां तु पाणेः सव्यस्य दर्शयेत् । त्रिरेखा यस्य दृश्येत संधिं तत्र विनिर्दिशेत् ॥८६॥ स पर्व इति विज्ञेयः शेषमंतरमंतरम् । पर्वान्तरं सामसु च ऋक्षु कुर्यात्तिलांतरम् ॥८७॥ स्वरान्मध्यमपर्वेषु सुनिविष्टं निवेशयेत् । न चात्र कंपयेत्किंचिदंगस्थावयवं बुधः ॥८८॥ अधस्तनं मृदं न्यस्य हस्तमात्रे यथाक्रमम् । अभ्रमध्ये यथा विद्युद्दृश्यते मणिसूत्रवत् ॥८९॥ पृष्ठच्छेदविवृत्तीनां यथा बालेषु कर्तरी । क्स्मोऽङ्गानि च संहृत्य चेतोदृष्टि दिशन्मनः ॥९०॥ स्वस्थः प्रशांतो निर्भीको वर्णानुच्चारयेद्बुधः । नासिकायास्तु पूर्वेण हस्तं गोकर्णवद्धरेत् ॥९१॥ निवेश्य दृष्टि हस्ताग्रे शास्त्रार्थमनुचिंतयेत् । सम्यक्प्रचारयेद्वाक्यं हस्तेन च मुखेन च ॥९२॥ यथैवोच्चारयेद्धूर्जा स्तथैवैनां समापयेत् । नात्याहन्यान्न निर्हण्यान्न प्रगायेन्न कंपयेत् ॥९३॥ समं सामानि गायेत व्योम्नि श्येनगतिर्यथा । यथा सुचरतां मार्गो मीनानां नोपलभ्यते ॥९४॥ आकाशे वा विहंगानां तद्वत्स्वरगता श्रुतिः । यथा दधिनि सर्पिः स्यात्काष्ठस्थो वा यथाऽनलः ॥९५॥ का स्पर्श नहीं होना चाहिए। अंगुलियों को अधिक फैलाना नहीं चाहिए और न तो मूल में स्पर्श ही होना चाहिए ॥८४॥ अंगूठे के अगले भाग से उनके मध्य पर्व पर आघात करना चाहिए। विभाग के ज्ञाता पुरुष को चाहिए कि मात्रा-द्विमात्रावृद्धि के विभाग के लिए बायें हाथ की अंगुलियों से द्विमात्रा का दर्शन करता रहे। जहां त्रिरेखा देखी जाय, वहाँ संधि का निर्देश करे; वह पर्व है, ऐसा जानना चाहिए। शेष अन्तर-अन्तर है। साम मंत्र में (प्रथम और द्वितीय स्वर के बीच) जौ के बराबर अन्तर करे तथा ऋचाओं में तिल बराबर अन्तर करे ॥८५-८७॥ मध्यम पर्वों में भली भाँति निविष्ट किये हुए स्वरों का ही निवेश करे। विद्वान् पुरुष यहाँ शरीर के किसी अवयव को कंपाये नहीं ॥८८॥ नीचे के अंग-ऊरु, जंघा आदि को सुखपूर्वक रखकर उन पर दोनों हाथों को प्रचलित परिपाटी के अनुसार रखे (अर्थात् दाहिने हाथ को गाय के कान के समान रखे और बायें को उत्तान भाव से रखे ।) जैसे बादलों में बिजली मणिमय सूत्र की भाँति चमकती दिखायी देती है, यही विवृत्तियों (पदादि विभागों) के छेद-बिलगाव-स्पष्ट निर्देश का दृष्टान्त है। जैसे सिर के बालों पर कैंची चलती है और बालों को पृथक् कर देती है, उसी प्रकार अन्य सब चेष्टाओं को विलोन करके मन और दृष्टि देकर विद्वान् पुरुष स्वस्थ, शान्त तथा निर्भीक होकर वर्णों का उच्चारण करे ॥८९-९०½॥ मन्त्र का उच्चारण करते समय नाक की सीध में पूर्व दिशा की ओर गोकर्ण के समान आकृति में हाथ को उठाये रखे, और हाथ के अग्रभाग पर दृष्टि रखते हुए शास्त्र के अर्थ का निरन्तर चिन्तन करता रहे। मन्त्रवाक्य को हाथ और मुख दोनों से साथ- साथ भली-भाँति प्रचार करे ॥९१-९२॥ वर्णों का जिस प्रकार द्रुतादि वृत्ति से आरम्भ में उच्चारण करे, उसी प्रकार उन्हें समाप्त भी करे। (एक ही मन्त्र में दो वृत्तियों की योजना न करे ।) अभ्याघात, निर्घात, प्रगान तथा कम्पन न करे, समभाव से साममन्त्रों का गान करे। जैसे आकाश में श्येनपक्षी समगति से उड़ता है, जैसे जल में विचरती हुई मछलियों अथवा आकाश में उड़ते हुए पक्षियों के मार्ग का विशेष रूप से पता नहीं चलता, उसी प्रकार सामगान में स्वरगत श्रुति के विशेष स्वरूप का अवधारण नहीं होता, सामान्यतः गीतमात्र की उपलब्धि होती है ॥९३-९४½॥ जैसे दही में घी अथवा काठ के भीतर अग्नि छिपा रहता है और प्रयत्न से उसकी उपलब्धि भी होती है, उसी प्रकार स्वरगत श्रुति भी गीत में छिपी रहती है, प्रयत्न से उसके विशेष स्वरूप की भी उपलब्धि होती है ॥९५½॥ प्रथम
३४२ नारदीयपुराणम् प्रयत्नेनोपलभ्येत तद्गतस्वरगता श्रुतिः । स्वरात्स्वरस्य संक्रामं स्वरसंधिमनुलवणम् ॥९६॥ अविच्छिन्नं समं कुर्यात्कासूक्ष्मच्छायातपोपमम् । अनागतमतिक्रांतं विच्छिन्नं विषमाहतम् ॥९७॥ तन्वंतमस्थितांतं च वर्जयेत्कर्षणं बुधः । स्वरः स्थानाच्च्युतोयस्तु स्वं स्थानमतिवर्तते ॥९८॥ विस्वरं सामगा ब्रूयुर्विरक्तमिति वीणिनः । अभ्यासार्थे द्रुतां वृत्तिं प्रयोगार्थे तु मध्यमाम् ॥९९॥ शिष्याणामुपदेशार्थं कुर्याद्वृत्तिं विलंबिताम् । गृहीतग्रंथ एवं तु ग्रंथोच्चारणशैक्षकान् ॥१००॥ हस्ते नाध्यापयेच्छिष्यान् शैक्षेण विधिना द्विजः । क्रुष्टस्य मूर्द्धनि स्थानं ललाटे प्रथमस्य तु ॥१०१॥ भ्रुवोर्मध्ये द्वितीयस्य तृतीयस्य तु कर्णयोः । कंठस्थानं चतुर्थस्य मंद्रस्य रसनोच्यते ॥१०२॥ अतिस्वरस्य नीचस्य हृदि स्थानं विधीयते । अंगुष्ठस्योत्तमे क्रुष्टो ह्यंगुष्ठे प्रथमः स्वरः ॥१०३॥ प्रदेशिन्या तु गांधार ऋषभोस्तदनंतरम् । अनामिकायां षड्जस्तु कनिष्ठायां तु धैवतः ॥१०४॥ तस्याधस्ताच्च योन्यास्तु निषादं तत्र निर्दिशेत् । अपर्वत्वादमध्यत्वादव्ययत्वाच्च नित्यशः ॥१०५॥ मंद्रो हि मंदीभूतस्तु परिस्रवार इति स्मृतः । क्रुष्टेन देवा जीवंति प्रथमेन तु मानुषाः ॥१०६॥ स्वर से दूसरे स्वर पर जो स्वर-संक्रमण होता है, उसे प्रथम स्वर से संधि रखते हुए करे, विच्छेद करके न करे और न वेग से ही करे । जैसे छाया एवं धूप सूक्ष्म गति से धीरे-धीरे एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं- न तो पूर्व स्थान से सहसा सम्बन्ध तोड़ते हैं और न नये स्थान पर ही वेग से जाते हैं, उसी प्रकार स्वर-संक- मण भी सम तथा अविच्छिन्न भाव से करे ॥९६ ॥ जब प्रथम स्वर को खींचते हुए द्वितीय स्वर होता है, तब उसे 'कर्षण' कहते हैं । विद्वान् पुरुष निम्नांकित छह दोषों से युक्त कर्षण का त्याग करे । अनागत तथा अतिक्रान्त अवस्था में कर्षण न करे । द्वितीय स्वर के आरंभ से पहले उसकी अनागत अवस्था है, प्रथम स्वर का सर्वथा व्यतीत हो जाना उसकी अतिक्रान्त अवस्था है; इन दोनों स्थितियों में प्रथम स्वर का कर्षण न करे । प्रथम मात्रा का विच्छेद करके भी कर्षण न करे । उसे विषमाहत--कम्पित करके भी द्वितीय स्वर पर न जाय । कर्षणकाल में तीन मात्रा में अधिक स्वर का विस्तार न करे । अस्थितान्त का त्याग करे अर्थात् द्वितीय स्वर में भी त्रिमात्रायुक्त स्थिति करनी चाहिए, न कि दो मात्रा से ही युक्त । जो स्वरस्थान से च्युत होकर अपने स्थान का अतिवर्तन (लंघन) करता है, उसे सामगान करने वाले विद्वान् 'विस्वर' कहते हैं और वीणा बजा कर गाने वाले गायक उसे 'विरक्त' नाम देते हैं ॥९७-९८ ॥ स्वयं अभ्यास करने के लिए द्रुतवृत्ति से मन्त्रोच्चा- रण करे । प्रयोग के लिए मध्यमवृत्ति का आश्रय ले और शिष्यों के उपदेश को लिए विलम्बित वृत्ति का अवलम्बन करे ॥९९ ॥ इस प्रकार गुरु स्वयं हाथ में पुस्तक लेकर ग्रन्थ का उच्चारण करने वाले शिष्यों को हाथ को घुमा-घुमा कर शिक्षण विधि के अनुसार शिक्षा दे ॥१००॥ क्रुष्ट का मूर्द्धा में स्थान है, प्रथम का ललाट में, द्वितीय का भौंहों के बीच में और तृतीय का कानों में है । चतुर्थ का स्थान कण्ठ और मन्द्र का रसना स्थान है, नीच अतिस्वार का हृदय में स्थान है ॥१०१-१०२ ॥ अंगूठे के उपरी भाग में क्रुष्ट, अंगूठे में प्रथम स्वर, प्रदेशिनी (तर्जनी) में गांधार और उसके बाद की अंगुली अर्थात् मध्यमा में ऋषभ, अनामिका में षड्ज तथा कनिष्ठा में धैवत रहता है ॥१०३-१०४॥ धैवत के नीचे निषाद का स्थान कहा गया है। अपर्व, अमध्य और नित्य अव्यय होने के कारण मंदीभूत स्वर मन्द्र को परिस्रवार कहा जाता है ॥१०५½॥ क्रुष्ट से देवता जीते हैं, प्रथम से मानुष, द्वितीय से पशु और तृतीय से गन्धर्व और अप्सरायें जीती हैं।
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३४३ यशवस्तु द्वितीयेन गंधर्वाप्सरसस्त्वनु । अंधजाः पितरश्चैव चतुर्थस्वरजीविनः ॥१०७॥ मंद्रत्वेनोपजीवंति पिशाचासुरराक्षसाः । अतिस्वरेण नीचेन जगत्स्थावरजंगमाः ॥१०८॥ सर्वाणि खलु भूतानि धार्यंते सामिकैः स्वरैः । दीप्तायताकरुणानां मृदुमध्यमयोस्तथा ॥१०८॥ श्रुतीनां योऽविशेषज्ञो न स आचार्य उच्यते । दीप्ता मंद्रे द्वितीये च प्रचतुर्थे तथैव च ॥११०॥ अतिस्वरे तृतीये च क्रुष्टे तु करुणा श्रुतिः । श्रुतयो या द्वितीयस्य मृदुमध्यायततः स्मृताः ॥१११॥ तासामपि तु वक्ष्यामि लक्षणानि पृथक् पृथक् । आयतत्वं भवेन्नीचे मृदुता तु विपर्यये ॥११२॥ स्वे स्वरे मध्यमत्वं तु तत्समीक्ष्य प्रयोजयेत् । द्वितीये विरता या तु क्रुष्टश्च परतो भवेत् ॥११३॥ दीप्तां तां तु विजानीयात्प्राथम्येन मृदुः स्मृतः । अत्रैव विरता या तु चतुर्थेन प्रवर्तते ॥११४॥ तथा मंद्रे भवेद्दीप्ता साम्नश्चैव समापने । नातितारश्रुतिं कुर्यात्स्वरयोर्नापि चांतरे ॥११५॥ तं च ह्रस्वे च दीर्घे च न चापि घुटसंज्ञके । द्विविधा गतिः पदांतस्थितसंधिः सहोष्मभिः ॥११६॥ स्थानेषु पंचस्वेतेषु विज्ञेयं घुटसंज्ञकम् । स्वरांतराविरतानि ह्रस्वदीर्घघुटानि च ॥११७॥ स्थितिस्यानेष्वशेषाणि श्रुतिवत्स्वरतो वदेत् । दीप्तामुदात्ते जानीयाद्दीप्तां च स्वरिते विदुः ॥११८॥ अंधकार से उत्पन्न योनि वाले और पितर चतुर्थ स्वरजीवी हैं ॥१०६-१०७॥ मन्द्र से पिशाच, असुर और राक्षस जीते हैं । नीच स्वर अतिस्वार से जगत् के स्थावर-जंगम जीवित होते हैं। सब भूत (प्राणी) सामिक स्वर से जीवित रहते हैं ॥१०८॥ दीप्त, आयत, करुण, मृदु, मध्यम और श्रुतियों का जो विशेषज्ञ नहीं होता है उसको आचार्य नहीं कहते हैं। मन्द्र, द्वितीय और चतुर्थ में दीप्ता श्रुति, अतिस्वार, तृतीय और क्रुष्ट में करुणा श्रुति होती है ॥१०९-११०॥ द्वितीय की जो मृदु, मध्य और आयत श्रुतियां हैं, उनके लक्षण पृथक्-पृथक् कहता हूँ । नीच में अर्थात् तृतीय स्वर परे रहने पर आयता, विपर्यय में (चतुर्थस्वर परे रहने पर) मृदु और अपने स्वर में मध्यमा श्रुति होती है, इनको भली-भांति समीक्षा कर प्रयोग में लाना चाहिए ॥१११-११२॥ क्रुष्ट स्वर होने पर द्वितीय स्वर में स्थित जो श्रुति है, उसको दीप्ता समझना चाहिए। प्रथम स्वर में तो मृदु समझना चाहिए । यदि चतुर्थ स्वर में हो तो वही श्रुति मृदु कहलाती है तथा मन्द्र स्वर में हो तो दीप्ता होती है। साम की समाप्ति होने पर जिस किसी भी स्वर में स्थित श्रुति दीप्ता ही होती है। स्वर के समाप्त होने से पहले आय- तादि श्रुति का प्रयोग न करे । स्वर समाप्त होने पर भी जब तक गान का विच्छेद न हो जाय, दो स्वरों के मध्य में श्रुति का प्रयोग न करे ॥११३-११५॥ ह्रस्व तथा दीर्घ अक्षर का गान होते समय भी श्रुति नहीं करनी चाहिए । (केवल प्लुत में ही श्रुति का प्रयोग न करे ।) तथा जहाँ घुट-संज्ञक स्वर हो, वहाँ श्रुति का प्रयोग न करे । तालव्य इकार का 'आ' 'इ' भाव होता है और 'आ' 'उ' भाव होता है, ये दो प्रकार की गतियां हैं। तथा ऊष्म वर्णं 'श ष स' के साथ जो त्रिविध पदान्त सन्धि है—ये सब मिलकर पांच स्थान हैं; इन स्थानो में घुट संज्ञक स्वर जानना चाहिए (इनमें श्रुति नहीं करनी चाहिए) । श्रुति-स्थानों में जहाँ स्वर और स्वरान्तर समाप्त न हुए हों तथा जो ह्रस्व, दीर्घ एवं घुट-संज्ञक स्थल हैं, वे सब श्रुति से रहित हैं, उनमें श्रुति नहीं करनी चाहिए। वहाँ स्वर से ही श्रुतिवत् कार्य होता है ॥११६-११७३॥ (समासव्यतिरिक्त स्थलों में) उदात्त स्वर में 'दीप्ता' नाम वाली श्रुति को जाने । स्वरित में भी विद्वान् लोग 'दीप्ता' की ही स्थिति मानते हैं। अनुदात्त में 'मृदु' श्रुति जाननी चाहिए। गान्धवं गान में श्रुति का अभाव होने
३४४ नारदीयपुराणम् अनुदात्ते मृदुज्ञेया गंधर्वाः श्रुतिसंपदे । उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितप्रचिते तथा ॥११८॥ निघातश्चेति विज्ञेयः स्वरभेदश्च पंचधा । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि आर्चिकस्य स्वरत्रयम् ॥१२०॥ उदात्तश्चानुदात्तश्च तृतीयः स्वरितः स्वरः । य एवोदात्त इत्युक्तः स एव स्वरितात्परः ॥१२१॥ प्रचयः प्रोच्यते तज्ज्ञैर्न चान्यान्त्स्वरांतरात् । वर्णस्वरोऽतीतस्वरः स्वरितो द्विविधः स्मृतः ॥१२२॥ मात्रिको वर्ण एवं तु दीर्घस्तूच्चारितादनु । स तु सप्तविधो ज्ञेयः स्वरः प्रत्ययदर्शनात् ॥१२३॥ पदेन तु स विज्ञेयो भवेद्यो यत्र यादृशः । सप्तस्वरान्प्रयुंजीत दक्षिणं श्रवणं प्रति ॥१२४॥ आचार्यैर्विहितं शास्त्रं पुत्रशिष्यहितैषिभिः । उच्चादुच्चतरं नास्ति नीचान्नीचतरं तथा ॥१२५॥ वैस्वर्यस्वरसंज्ञायां किंस्थानः स्वार उच्यते । उच्चनीचस्य यन्मध्ये साधारणमिति श्रुतिः ॥१२६॥ तं स्वारं स्वारसंज्ञायां प्रतिजानंति शिक्षिकाः । उदात्ते निषादगांधारावनुदात्ते ऋषभधैवतौ ॥१२७॥ स्वरितप्रभवा ह्येते षड्जमध्यमपंचमाः । यत्र कखपरा ऊष्मा जिह्वामूलप्रयोजनाः ॥१२८॥ तानप्याज्ञापयेन्मात्राप्रकृत्यैव तु सा कला । जात्यः क्षैप्रोऽभिनिहित स्तैर्व्यंजन एव च ॥१२९॥ तिरोविरामः प्रश्लिष्टोऽपादवृत्तश्च सप्तमः । स्वराणामहमेतेषां पृथग्वक्ष्यामि लक्षणम् ॥१३०॥
पर भो स्वर को ही श्रुति के समान करना चाहिए । वहां स्वर में ही श्रुति का वैभव निहित है । उदात्त, अनु- दात्त, स्वरित, प्रचय¹ तथा निघात²--ये पाँच स्वरभेद होते हैं ॥११८-११९½॥ इसके बाद मैं आर्चिक के तीन स्वरों का प्रतिपादन करता हूँ ! पहला उदात्त, दूसरा अनुदात्त और तीसरा स्वरित हैं । जिसको उदात्त कहा गया है, वही स्वरित से परे हो तो विद्वान् पुरुष उसे प्रचय कहते हैं। वहाँ दूसरा कोई स्वरान्तर नहीं होता । स्वरित के दो भेद हैं--वर्णस्वर और अतीतस्वर ॥१२०-१२२॥ इसी प्रकार वर्ण भी मात्रिक एवं उच्चरित के पश्चात् दीर्घ होता है। प्रत्यय-स्वरूप प्रत्यय का दर्शन होने से उसे सात प्रकार का जानना चाहिए ॥१२३॥ वह क्या, कहाँ और कैसा है, इसका ज्ञान पद से प्राप्त करना चाहिए । दाहिने कान में सातों स्वरों का श्रवण करावे ॥१२४॥ आचार्यों ने पुत्रों और शिष्यों के हित की इच्छा से ही इस शिक्षाशास्त्र का प्रणयन किया है। उच्च (उदात्त) से कोई उच्चतर नहीं है और नीच (अनुदात्त) से नीचतर नहीं है, उसमें स्वर का क्या स्थान है ? (इसके उत्तर में कहते हैं--) उच्च (उदात्त) और नीच (अनुदात्त) के मध्य में जो 'साधारण' यह श्रुति है, उसी को शिक्षाशास्त्र के विद्वान् स्वार-संज्ञा में 'स्वार' नाम से जानते हैं ॥१२५-१२६½॥ उदात्त में निषाद और गान्धार स्वर हैं, अनुदात्त में ऋषभ और धैवत स्वर में हैं। और ये- षड्ज, मध्यम तथा पञ्चम-स्वरित में प्रकट होते हैं ॥१२७½॥ जिसके परे 'क' और 'ख' हैं तथा जो जिह्वा- मूलीय रूप प्रयोजन को सिद्ध करने वाली है, उस 'ऊष्मा' (क ख) को 'मात्रा' जाने । वह अपने स्वरूप से ही 'कला' है (किसी दूसरे वर्ण का अवयव नहीं है । इसे उपध्मानीय का भी उपलक्षण मानना चाहिए) ॥१२८½॥ जात्य, क्षैप्र, अभिनिहित, तैरव्यञ्जन, तिरोविराम, प्रश्लिष्ट तथा सातवाँ अपादवृत्त--ये सात स्वार हैं। अब मैं इन सब स्वारों का पृथक्-पृथक् लक्षण बतलाता हूँ ॥१२६-१३०॥ लक्षण कहकर उन सबके यथायोग्य
१. स्वरित से आगे स्वरित ही हो तो उनकी 'प्रचय' संज्ञा होती है । २. प्रचय परे हो तो स्वरित का आहनन होने से उसकी 'निघात' संज्ञा होती है। प्रचय न हो, तब तो शुद्ध 'स्वरित' ही रहता है।
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३४५
उद्दिष्टानां तथा न्याय्यमुदाहरणमेव च । सयकारं सवं वापि ह्यक्षरं स्वरितं भवेत् ॥१३१॥ न चोदात्तं पुरो यस्य जात्यः स्वरः स उच्यते । इउवणौ यदोदात्तावापद्येते यवौ क्वचित् ॥१३२॥ अनुदात्तं प्रत्यये तु विद्यात्क्षैप्रस्य लक्षणम् । एओआभ्यामुदात्ताभ्यामकारो निहितश्च यः ॥१३३॥ अकारो यत्र लुप्यति तमभिनिहितं विदुः । उदात्तपूर्वं यत्किञ्चिच्छंदसि स्वरितं भवेत् ॥१३४॥ एष सर्वबहुस्वारस्तैरव्यंजन उच्यते । अवग्रहात्परं यत्र स्वरितं स्यादनंतरम् ॥१३५॥ तिरोविरामं तं विद्यादुदात्तो यद्यवग्रहः । इकारं यत्र पश्येयुरिकारेण संयुक्तम् ॥१३६॥ उदात्तमनुदात्तेन प्रश्लिष्टं तं विचारय । स्वरे चेत्स्वरितं यत्र विवृता यत्र संहिता ॥१३७॥ एतत्पादांतवृत्तस्य लक्षणं शास्त्रनोदितम् । तान्यः स्वारः स जात्येन श्रुत्यग्रे क्षैप्र उच्यते ॥१३८॥ ते मन्त्वताभिनिहितस्तैरव्यञ्जन ऊतये । तिरोविरामो विष्कभिते प्रश्लिष्टो हीहँगीर्वणः ॥१३६॥ पाद्वृत्तः कंदविदे स्वराः सप्तैवैमादयः । उच्चादेकाक्षरात्पूर्वात्स्वरं यद्यविहाक्षरम् ॥१४०॥ स्वाराणां जात्यवर्जनामेषा प्रकृतिरुच्यते । चत्वारस्त्वोदितः स्वाराः कंपंपुं श्रुतिशास्त्रतः ॥१४१॥ उवात्ते चैकनीचे वा जुह्वोऽग्निस्तन्निदर्शनम् । इकारांते पदे पूर्व उकारे परतः स्थिते ॥१४२॥ ह्रस्वं कंपं विजानीयान्मेधावी नात्र संशयः । इकारांते पदे चैवोकारद्वयं परे पदे ॥१४३॥
उदाहरण भी बताऊँगा । जो अक्षर 'य' कार और 'व' कार के साथ स्वरित होता है तथा जिसके आगे उदात्त नहीं होता, वह 'जात्य' स्वार कहलाता है ॥१३१॥ जब उदात्त 'इ' वर्ण और 'उ' वर्ण कहीं पदादि अनुदात्त अकार परे रहते सन्धि होने पर 'य' 'व' के रूप में परिणत हो स्वरित होते हैं तो वहाँ सदा 'क्षैप्र' स्वार का लक्षण समझना चाहिए ॥१३२॥ 'ए' और 'ओ' इन दो उदात्त स्वरों से परे जो वकारसहित अकारनिहित (अनुदात्त रूप में निपातित) हो और उसका जहाँ लोप (एकार या उकार में अनुप्रवेश) होता है, 'अभिनिहित' स्वार माना जाता है ॥१३३॥ छन्द में जहाँ-कहीं या जो कोई भी ऐसा स्वरित होता है, जिसके पूर्व में उदात्त हो, वह सर्व बहुस्वार (सर्वत्र बहुलता से होने वाला स्वर) 'तैरव्यञ्जन' कहलाता है ॥१३४॥ यदि उदात्त अवग्रह हो और अवग्रह से परे अनन्तर स्वरित हो, तो उसे 'तिरोविराम' समझना चाहिए ॥१३५॥ जहां उदात्त इकार को अनुदात्त इकार से संयुक्त देखिए, वहाँ विचार लीजिए कि 'प्रश्लिष्ट' स्वार है । जहाँ स्वर अक्षर अकारादि में स्वरित हो और पूर्वपद के साथ संहिता विभक्त हो, उसे पादवृत्त स्वार का शास्त्रोक्त लक्षण समझना चाहिए ॥१३६-१३७॥ 'जात्य' स्वार का उदाहरण है-- 'सजात्येन' इत्यादि । श्रुष्टि + अग्ने = श्रुष्ट्यग्ने आदि स्थलों में 'क्षैप्र' स्वार है। 'वे मन्वत' इत्यादि में अभिनिहित' स्वार जानना चाहिए । उ + ऊतये = ऊतये, वि + ईतये = वीतये इत्यादि में 'तैरव्यञ्जन' नामक स्वार है । 'विस्कभिते विस्कभिते' आदि स्थलों में 'तिरोविराम' है । 'हि इन्द्र गिर्वणः' = 'हीन्द्र०' इत्यादि में प्रश्लिष्ट स्वार है । 'क ईम् कई वेद' इत्यादि में 'पादवृत्त' नामक स्वार है । इस प्रकार ये सब सात स्वार हैं ॥१३८-१३६॥ जात्य स्वरों को छोड़कर एक पूर्ववर्ती उदात्त अक्षर से परे जो भी अक्षर हो, उसकी स्वरित संज्ञा होती है । यह स्वरित का सामान्य लक्षण बताया जाता है । पूर्वोक्त चार स्वार उदात्त अथवा एक अनुदात्त परे रहने पर शास्त्रतः 'कम्प' उत्पन्न करते हैं । (जिसका स्वरूप चल हो, उस स्वार का नाम कम्प है) इसका उदाहरण है 'जुह्वोम्निः' । 'उप त्वा जुहू', 'उप त्वा जुह्वो मम' इत्यादि ॥१४०-१४१॥ पूर्वपद इकारान्त हो और परे उकार की स्थिति हो तो मेधावी पुरुष वहाँ 'ह्रस्व कम्प' जाने, इसमें संशय नहीं । यदि उकारद्वय युक्त पद परे हो तो इकारान्त पद में दीर्घ कम्प जानना चाहिए । इसका दृष्टान्त है-- 'शग्ध्युषू' इत्यादि ॥१४२-१४३॥ तीन
४४ ना० पु०
३४६ नारदीयपुराणम्
दीर्घं कंपं विजानीयाच्चाऽध्दूष्विति निदर्शनम् । त्रयो दीर्घास्तु विज्ञेया ये च संध्यक्षरेषु वै ॥१४४॥ मन्या पथ्या न इंद्राभ्यां शेषा ह्रस्वाः प्रकीर्तिताः । अनेकानामुदात्तानामनुदात्तः प्रत्ययो यदि ॥१४५॥ शिवकंपं विजानीयादुदात्तः प्रत्ययो यदि । यत्र द्विप्रभृतीनि स्युरुदात्तान्यक्षराणि तु ॥१४६॥ नीचं वोच्चं च परतस्तत्रोदात्तं विदुबुंधाः । न रेफे वा हकारे वा द्विर्भावो जायते क्वचित् ॥१४७॥ न च वर्गद्वितीयेषु न चतुर्थे कदाचन । चतुर्थं तु तृतीयेन द्वितीयः प्रथमेन तु ॥१४८॥ आद्यमंत्यं च मध्यं च स्वाराक्षरेण पीडयेत् । अनंत्यश्च भवेत्पूर्वो ह्यंत्यश्च परतो यदि ॥१४९॥ तत्र मध्ये यमस्तिष्ठेत्स्ववर्णः पूर्ववर्णयोः । वर्गान्त्यान् शषसैः सार्द्धमंतस्थैर्वापि संयुतान् ॥१५०॥ दृष्ट्वा यमा निवर्तंते अदेशिकमिवाध्वगाः । तृतीयश्च चतुर्थश्च चतुर्थादिपरं पदम् ॥१५१॥ द्वौ तृतीयो हकारश्च हकारादिपरं पदम् । अनुस्वारोपधामूला तान् क्वचित्क्रमतः परम् ॥१५२॥ रहपूर्वे संयुते चाप्युत्तरं क्रमतेऽक्षरम् । संयोगो यत्र दृश्येत व्यंजनं विरते पदे ॥१५३॥ पूर्वांगमादितः कृत्वा परांगादौ निवेशयेत् । संयोगे स्वरितं यत्र उद्घातः प्रतनं तथा ॥१५४॥ पूर्वांगतद्विजानीयाद्येनांरभः परं हि तत् । संयोगात्तु विजानीयात्परं संयोगनायकम् ॥१५५॥
दीर्घ कम्प जानने चाहिए, जो सन्ध्यक्षरों में होते हैं। उनके क्रमशः उदाहरण ये हैं-मन्या, पथ्या, न इन्द्राभ्याम् । शेष ह्रस्व कहे गए हैं ॥१४४ 1/2॥ जब अनेक उदात्तों के बाद कोई अनुदात्त प्रत्यय हो तो एक उदात्त परे रहते दूसरे-तीसरे उदात्त की 'शिवकम्प' संज्ञा होती है अर्थात् वह शिवकम्पसंज्ञक आचुदात्त होता है ॥१४५ 1/2॥ किन्तु वह उदात्त प्रत्यय होना चाहिए। जहाँ दो, तीन, चार आदि उदात्त अक्षर हों, नीच-अनुदात्त हो और उससे पूर्व उच्च अर्थात् उदात्त हो और वह भी पूर्ववर्ती उदात्त या उदात्तों से परे हो तो वहाँ विद्वान् पुरुष 'उदात्त' मानते हैं ॥१४६ 1/2॥ रेफ या हकार में कहीं द्वित्व नहीं होता-दो रेफ या दो हकार का प्रयोग एक साथ नहीं होता ॥१४७ 1/2॥ कवर्ग आदि वर्गों के दूसरे और चौथे अक्षरों में भी कभी द्वित्व नहीं होता। वर्ग के चौथे अक्षर को तीसरे के द्वारा और दूसरे को प्रथम के द्वारा पीडित न करे, आदि, मध्य और अन्त्य (क, ग, ङ आदि को अपने ही अक्षर से पीडित (संयुक्त) करे ॥१४८ 1/2॥ यदि संयोगदशा में अन्त्य (जो अन्तिम वर्ण नहीं हैं, वह गकार आदि) वर्ण पहले हो और नकार आदि अनन्त्य वर्ण बाद में हो तो मध्य में यम (य व र ल व म ङ ण न) अक्षर स्थित होता है, वह पूर्ववर्ती अक्षर का सवर्ण हुआ करता है। पूर्ववर्ती श ष स तथा य र ल व-इन अक्षरों से संयुक्त वर्गान्त्य वर्णों को देखकर यमनिवृत्त हो जाते हैं-ठीक वैसे ही, जैसे चोर-डाकुओं को देखकर राही अपने मार्ग से लौट जाते हैं ॥१४९-१५० 1/2॥ संहिता में जब वर्ण के तीसरे और चौथे अक्षर संयुक्त हो तो पदकाल में चतुर्थ अक्षर से ही आरंभ करके उत्तर पद होगा। दूसरे, तीसरे और हकार-इन सबका संयोग हो तो उत्तर पद हकारादि ही होगा ॥१५१ 1/2॥ अनुस्वार, उपध्मानीय तथा जिह्वामूलीय के अक्षर किसी पद में नहीं जाते, उनका दो बार उच्चारण नहीं होता। यदि पूर्व में र या ह अक्षर से संयोग हो तो परवर्ती अक्षर का द्वित्व हो जाता है ॥१५२ 1/2॥ जहाँ संयोग में स्वरित हो तथा उद्धृत (नीचे से ऊपर जाने) में और पतन (ऊँचे से नीचे जाने) में स्वरित हो, वहाँ पूर्वांग को आदि में करके (नीच में उच्चत्व लाकर) परांग के आदि में स्वरित का संनिवेश करे ॥१५३ 1/2॥ संयोग के विरत (विभक्त) होने पर जो उत्तर पद से असंयुक्त व्यञ्जन दिखाई दे, उसे पूर्वांग जानना चाहिए तथा जिस व्यञ्जन से उत्तरपद का आरंभ हो, उसे परांग समझे ॥१५४ 1/2॥ संयोग से परवर्ती भाग को स्वरयुक्त करना चाहिए; क्योंकि वह उत्तम एवं संयोग का नायक है। वहीं प्रधानतया स्वर की विश्रान्ति होती है। तथा व्यञ्जन-संयुक्त वर्ण का पूर्व अक्षर स्वरित है, उसे बिना स्वर के ही बोलना चाहिए।
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३४७ संयुक्तस्य तु वर्णस्य तत्परं पूर्वमक्षरम् । अनुस्वारः पदतश्च क्रमजं प्रत्यये स्वके ॥१५६॥ स्वरभक्तिस्तथारेफः पूर्वपूर्वांगमुच्यते । पादादौ च पदादौ संयोगावग्रहेषु च ॥१५७॥ य्यशब्द इति विज्ञेयो योऽन्यः सय इति स्मृतः । पादादावप्यविच्छेदे संयोगान्ते च तिष्ठताम् ॥१५८॥ वर्जयित्वा रहणानामुपादेशः प्रदृश्यते । स्वसंयुक्तो गुरुज्ञेयः सानुस्वाराग्रिम स्फुटः अनुशेषो हिंगो वापि युगलादिरविस्फुटः ॥१५९॥ यदुदात्तमुदात्तं तद्यत्स्वरितं तत्पदे भवेत् । यन्नीचं नीचमेव तद्यत्प्रचयस्थं तदपि नीचम् ॥१६०॥ अग्निः सुतो मित्रमिदं तथा वयमयावहाः । प्रियं दूतं घृतं चित्तमतिशब्दस्तु नीचतः ॥१६१॥ अर्केष्वेव सुतेष्वेव यज्ञेषु कलशेषु च । शतेषु सवित्रेषु नीचादुच्चार्यते श्रुतिः ॥१६२॥ हारिवरुणवरेण्येषु धारापुरुषेषु स्वरितरेफः । विश्वानरोनकारश्च शेषास्तु स्वरिता नराः ॥१६३॥ द्वो वरुणो वस्वरित उदुत्तमंतवं वरुणधार चौहधारामुरुधारेस्वदोहते । मात्रिकं वा द्विमात्रं वा स्वर्यते यदिहाक्षरम् । तस्यादितोऽर्द्धमात्रं वै शेषं तु परतो भवेत् । अदीर्घं दीर्घवत्कुर्याद्विस्वरं यत्प्रयुज्यते ॥१६४॥ कंपोत्स्वरिताभिगीतं ह्रस्वकर्षणमेव च । निमेषकाला मात्रा स्याद्विद्युत्कालेति चापरे ॥१६५॥ अनुस्वार, पदान्त, प्रत्यय तथा सवर्ण पद परे रहने पर होने वाला द्वित्व तथा रेफस्वरूप स्वरभक्ति-यह सब पूर्वांग कहलाता है ॥१५५-१५६॥। पादादि में, पदादि में, संयोग तथा अवग्रहों में भी 'य' कार के द्वित्व का प्रयोग करना चाहिए, उसे 'य्य' शब्द जानना चाहिए। अन्यत्र 'य' केवल 'य' के रूप में ही रहता है ॥१५७॥। पदादि में रहते हुए भी विच्छेद (विभाग) न होने पर अथवा संयोग के अन्त में स्थित होने पर र् ह् रेफविशिष्ट य--इनको छोड़कर अन्य वर्णों का अयादेश (द्वित्वाभाव) देखा जाता है ॥१५८॥। स्वयं संयोगयुक्त अक्षर को गुरु जानना चाहिए। अनुस्वारयुक्त तथा विसर्गयुक्त वर्ण का गुरु होना तो स्पष्ट ही है। शेष अणु (ह्रस्व) है। 'हि' 'गोः' इनमें प्रथम संयुक्त और दूसरा विसर्गयुक्त है। संयोग और विसर्ग दोनों के आदि अक्षर का गुरुत्व भी स्पष्ट है ॥१५८-१५६॥। जो उदात्त है, वह उदात्त ही रहता है; जो स्वरित है, वह पद में नीच (अनुदात्त) होता है। जो अनुदात्त है, वह तो अनुदात्त रहता ही है; जो प्रचयस्थ स्वर है, वह भी अनुदात्त हो जाता है। विभिन्न मन्त्रों में आये हुए 'अग्निः' 'सुतः' 'मित्रम्' 'इदम्' 'वयम्' 'मया' 'प्रियम्' 'दूतम्' 'घृतम्' 'चित्तम्' तथा 'अभि'--ये पद नीच (अर्थात् अनुदात्त से आरम्भ) होते हैं ॥१६०-१६१॥। 'अर्क' 'सुत' 'यज्ञ' 'कलश' 'शत' तथा 'पवित्र'--इन शब्दों में अनुदात्त से श्रुति का उच्चारण प्रारंभ किया जाता है ॥१६२॥ 'हरि' 'वरुण' 'वरेण्य' 'धारा' तथा 'पुरुष'--इन शब्दों में रेफयुक्त स्वर ही स्वरित होता है। 'विश्वानर' शब्द में नकारयुक्त और अन्यत्र 'नर' शब्दों में रेफयुक्त स्वर ही स्वरित होता है ॥१६३॥। परन्तु 'उदुत्तमं त्वं वरुण' इत्यादि वरुण-सम्बन्धी दो मन्त्रों में 'व' कार ही स्वरित होता है, रेफ नहीं। 'उरु धारा मरं कृतम्' 'उरु धारेय दोहने' इत्यादि मन्त्रों में 'धारा' का 'धाकार' हो स्वरित होता है, रेफ नहीं। (यह पूर्व नियम का अपवाद है) ह्रस्व या दीर्घ जो अक्षर यहाँ स्वरित होता है, उसकी पहली आधी मात्रा उदात्त होती है और शेष आधी मात्रा उससे परे अनुदात्त होती है (पाणिनि ने भी यही कहा है--'तस्यादित उदात्तमर्धह्रस्वम्' ।) कम्प, उत्स्वरित और अभिगीत के विषय में जो द्विस्वर का प्रयोग होता है, वहाँ ह्रस्व को दीर्घ के समान करे और ह्रस्व कर्षण करे। पलक मारने में जितना समय लगता है, वह एक मात्रा है। दूसरे आचार्य ऐसा मानते हैं कि बिजली चमककर जितने समय में अदृश्य हो जाती है, वह एक मात्रा का मान है ॥१६४-१६५॥ कुछ विद्वानों का ऐसा