बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३४१ अंगुष्ठाग्रेण ता नित्यं मध्यमे पर्वणि स्पृशेत् । मात्राद्विमात्रवृद्धानां विभागाथ विभागवित् ॥८५॥ अंगुलीभिर्द्विमात्रां तु पाणेः सव्यस्य दर्शयेत् । त्रिरेखा यस्य दृश्येत संधिं तत्र विनिर्दिशेत् ॥८६॥ स पर्व इति विज्ञेयः शेषमंतरमंतरम् । पर्वान्तरं सामसु च ऋक्षु कुर्यात्तिलांतरम् ॥८७॥ स्वरान्मध्यमपर्वेषु सुनिविष्टं निवेशयेत् । न चात्र कंपयेत्किंचिदंगस्थावयवं बुधः ॥८८॥ अधस्तनं मृदं न्यस्य हस्तमात्रे यथाक्रमम् । अभ्रमध्ये यथा विद्युद्दृश्यते मणिसूत्रवत् ॥८९॥ पृष्ठच्छेदविवृत्तीनां यथा बालेषु कर्तरी । क्स्मोऽङ्गानि च संहृत्य चेतोदृष्टि दिशन्मनः ॥९०॥ स्वस्थः प्रशांतो निर्भीको वर्णानुच्चारयेद्बुधः । नासिकायास्तु पूर्वेण हस्तं गोकर्णवद्धरेत् ॥९१॥ निवेश्य दृष्टि हस्ताग्रे शास्त्रार्थमनुचिंतयेत् । सम्यक्प्रचारयेद्वाक्यं हस्तेन च मुखेन च ॥९२॥ यथैवोच्चारयेद्धूर्जा स्तथैवैनां समापयेत् । नात्याहन्यान्न निर्हण्यान्न प्रगायेन्न कंपयेत् ॥९३॥ समं सामानि गायेत व्योम्नि श्येनगतिर्यथा । यथा सुचरतां मार्गो मीनानां नोपलभ्यते ॥९४॥ आकाशे वा विहंगानां तद्वत्स्वरगता श्रुतिः । यथा दधिनि सर्पिः स्यात्काष्ठस्थो वा यथाऽनलः ॥९५॥ का स्पर्श नहीं होना चाहिए। अंगुलियों को अधिक फैलाना नहीं चाहिए और न तो मूल में स्पर्श ही होना चाहिए ॥८४॥ अंगूठे के अगले भाग से उनके मध्य पर्व पर आघात करना चाहिए। विभाग के ज्ञाता पुरुष को चाहिए कि मात्रा-द्विमात्रावृद्धि के विभाग के लिए बायें हाथ की अंगुलियों से द्विमात्रा का दर्शन करता रहे। जहां त्रिरेखा देखी जाय, वहाँ संधि का निर्देश करे; वह पर्व है, ऐसा जानना चाहिए। शेष अन्तर-अन्तर है। साम मंत्र में (प्रथम और द्वितीय स्वर के बीच) जौ के बराबर अन्तर करे तथा ऋचाओं में तिल बराबर अन्तर करे ॥८५-८७॥ मध्यम पर्वों में भली भाँति निविष्ट किये हुए स्वरों का ही निवेश करे। विद्वान् पुरुष यहाँ शरीर के किसी अवयव को कंपाये नहीं ॥८८॥ नीचे के अंग-ऊरु, जंघा आदि को सुखपूर्वक रखकर उन पर दोनों हाथों को प्रचलित परिपाटी के अनुसार रखे (अर्थात् दाहिने हाथ को गाय के कान के समान रखे और बायें को उत्तान भाव से रखे ।) जैसे बादलों में बिजली मणिमय सूत्र की भाँति चमकती दिखायी देती है, यही विवृत्तियों (पदादि विभागों) के छेद-बिलगाव-स्पष्ट निर्देश का दृष्टान्त है। जैसे सिर के बालों पर कैंची चलती है और बालों को पृथक् कर देती है, उसी प्रकार अन्य सब चेष्टाओं को विलोन करके मन और दृष्टि देकर विद्वान् पुरुष स्वस्थ, शान्त तथा निर्भीक होकर वर्णों का उच्चारण करे ॥८९-९०½॥ मन्त्र का उच्चारण करते समय नाक की सीध में पूर्व दिशा की ओर गोकर्ण के समान आकृति में हाथ को उठाये रखे, और हाथ के अग्रभाग पर दृष्टि रखते हुए शास्त्र के अर्थ का निरन्तर चिन्तन करता रहे। मन्त्रवाक्य को हाथ और मुख दोनों से साथ- साथ भली-भाँति प्रचार करे ॥९१-९२॥ वर्णों का जिस प्रकार द्रुतादि वृत्ति से आरम्भ में उच्चारण करे, उसी प्रकार उन्हें समाप्त भी करे। (एक ही मन्त्र में दो वृत्तियों की योजना न करे ।) अभ्याघात, निर्घात, प्रगान तथा कम्पन न करे, समभाव से साममन्त्रों का गान करे। जैसे आकाश में श्येनपक्षी समगति से उड़ता है, जैसे जल में विचरती हुई मछलियों अथवा आकाश में उड़ते हुए पक्षियों के मार्ग का विशेष रूप से पता नहीं चलता, उसी प्रकार सामगान में स्वरगत श्रुति के विशेष स्वरूप का अवधारण नहीं होता, सामान्यतः गीतमात्र की उपलब्धि होती है ॥९३-९४½॥ जैसे दही में घी अथवा काठ के भीतर अग्नि छिपा रहता है और प्रयत्न से उसकी उपलब्धि भी होती है, उसी प्रकार स्वरगत श्रुति भी गीत में छिपी रहती है, प्रयत्न से उसके विशेष स्वरूप की भी उपलब्धि होती है ॥९५½॥ प्रथम