भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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३४२ नारदीयपुराणम् प्रयत्नेनोपलभ्येत तद्गतस्वरगता श्रुतिः । स्वरात्स्वरस्य संक्रामं स्वरसंधिमनुलवणम् ॥९६॥ अविच्छिन्नं समं कुर्यात्कासूक्ष्मच्छायातपोपमम् । अनागतमतिक्रांतं विच्छिन्नं विषमाहतम् ॥९७॥ तन्वंतमस्थितांतं च वर्जयेत्कर्षणं बुधः । स्वरः स्थानाच्च्युतोयस्तु स्वं स्थानमतिवर्तते ॥९८॥ विस्वरं सामगा ब्रूयुर्विरक्तमिति वीणिनः । अभ्यासार्थे द्रुतां वृत्तिं प्रयोगार्थे तु मध्यमाम् ॥९९॥ शिष्याणामुपदेशार्थं कुर्याद्वृत्तिं विलंबिताम् । गृहीतग्रंथ एवं तु ग्रंथोच्चारणशैक्षकान् ॥१००॥ हस्ते नाध्यापयेच्छिष्यान् शैक्षेण विधिना द्विजः । क्रुष्टस्य मूर्द्धनि स्थानं ललाटे प्रथमस्य तु ॥१०१॥ भ्रुवोर्मध्ये द्वितीयस्य तृतीयस्य तु कर्णयोः । कंठस्थानं चतुर्थस्य मंद्रस्य रसनोच्यते ॥१०२॥ अतिस्वरस्य नीचस्य हृदि स्थानं विधीयते । अंगुष्ठस्योत्तमे क्रुष्टो ह्यंगुष्ठे प्रथमः स्वरः ॥१०३॥ प्रदेशिन्या तु गांधार ऋषभोस्तदनंतरम् । अनामिकायां षड्जस्तु कनिष्ठायां तु धैवतः ॥१०४॥ तस्याधस्ताच्च योन्यास्तु निषादं तत्र निर्दिशेत् । अपर्वत्वादमध्यत्वादव्ययत्वाच्च नित्यशः ॥१०५॥ मंद्रो हि मंदीभूतस्तु परिस्रवार इति स्मृतः । क्रुष्टेन देवा जीवंति प्रथमेन तु मानुषाः ॥१०६॥ स्वर से दूसरे स्वर पर जो स्वर-संक्रमण होता है, उसे प्रथम स्वर से संधि रखते हुए करे, विच्छेद करके न करे और न वेग से ही करे । जैसे छाया एवं धूप सूक्ष्म गति से धीरे-धीरे एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं- न तो पूर्व स्थान से सहसा सम्बन्ध तोड़ते हैं और न नये स्थान पर ही वेग से जाते हैं, उसी प्रकार स्वर-संक- मण भी सम तथा अविच्छिन्न भाव से करे ॥९६ ॥ जब प्रथम स्वर को खींचते हुए द्वितीय स्वर होता है, तब उसे 'कर्षण' कहते हैं । विद्वान् पुरुष निम्नांकित छह दोषों से युक्त कर्षण का त्याग करे । अनागत तथा अतिक्रान्त अवस्था में कर्षण न करे । द्वितीय स्वर के आरंभ से पहले उसकी अनागत अवस्था है, प्रथम स्वर का सर्वथा व्यतीत हो जाना उसकी अतिक्रान्त अवस्था है; इन दोनों स्थितियों में प्रथम स्वर का कर्षण न करे । प्रथम मात्रा का विच्छेद करके भी कर्षण न करे । उसे विषमाहत--कम्पित करके भी द्वितीय स्वर पर न जाय । कर्षणकाल में तीन मात्रा में अधिक स्वर का विस्तार न करे । अस्थितान्त का त्याग करे अर्थात् द्वितीय स्वर में भी त्रिमात्रायुक्त स्थिति करनी चाहिए, न कि दो मात्रा से ही युक्त । जो स्वरस्थान से च्युत होकर अपने स्थान का अतिवर्तन (लंघन) करता है, उसे सामगान करने वाले विद्वान् 'विस्वर' कहते हैं और वीणा बजा कर गाने वाले गायक उसे 'विरक्त' नाम देते हैं ॥९७-९८ ॥ स्वयं अभ्यास करने के लिए द्रुतवृत्ति से मन्त्रोच्चा- रण करे । प्रयोग के लिए मध्यमवृत्ति का आश्रय ले और शिष्यों के उपदेश को लिए विलम्बित वृत्ति का अवलम्बन करे ॥९९ ॥ इस प्रकार गुरु स्वयं हाथ में पुस्तक लेकर ग्रन्थ का उच्चारण करने वाले शिष्यों को हाथ को घुमा-घुमा कर शिक्षण विधि के अनुसार शिक्षा दे ॥१००॥ क्रुष्ट का मूर्द्धा में स्थान है, प्रथम का ललाट में, द्वितीय का भौंहों के बीच में और तृतीय का कानों में है । चतुर्थ का स्थान कण्ठ और मन्द्र का रसना स्थान है, नीच अतिस्वार का हृदय में स्थान है ॥१०१-१०२ ॥ अंगूठे के उपरी भाग में क्रुष्ट, अंगूठे में प्रथम स्वर, प्रदेशिनी (तर्जनी) में गांधार और उसके बाद की अंगुली अर्थात् मध्यमा में ऋषभ, अनामिका में षड्ज तथा कनिष्ठा में धैवत रहता है ॥१०३-१०४॥ धैवत के नीचे निषाद का स्थान कहा गया है। अपर्व, अमध्य और नित्य अव्यय होने के कारण मंदीभूत स्वर मन्द्र को परिस्रवार कहा जाता है ॥१०५½॥ क्रुष्ट से देवता जीते हैं, प्रथम से मानुष, द्वितीय से पशु और तृतीय से गन्धर्व और अप्सरायें जीती हैं।