भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 362

पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३४३ यशवस्तु द्वितीयेन गंधर्वाप्सरसस्त्वनु । अंधजाः पितरश्चैव चतुर्थस्वरजीविनः ॥१०७॥ मंद्रत्वेनोपजीवंति पिशाचासुरराक्षसाः । अतिस्वरेण नीचेन जगत्स्थावरजंगमाः ॥१०८॥ सर्वाणि खलु भूतानि धार्यंते सामिकैः स्वरैः । दीप्तायताकरुणानां मृदुमध्यमयोस्तथा ॥१०८॥ श्रुतीनां योऽविशेषज्ञो न स आचार्य उच्यते । दीप्ता मंद्रे द्वितीये च प्रचतुर्थे तथैव च ॥११०॥ अतिस्वरे तृतीये च क्रुष्टे तु करुणा श्रुतिः । श्रुतयो या द्वितीयस्य मृदुमध्यायततः स्मृताः ॥१११॥ तासामपि तु वक्ष्यामि लक्षणानि पृथक् पृथक् । आयतत्वं भवेन्नीचे मृदुता तु विपर्यये ॥११२॥ स्वे स्वरे मध्यमत्वं तु तत्समीक्ष्य प्रयोजयेत् । द्वितीये विरता या तु क्रुष्टश्च परतो भवेत् ॥११३॥ दीप्तां तां तु विजानीयात्प्राथम्येन मृदुः स्मृतः । अत्रैव विरता या तु चतुर्थेन प्रवर्तते ॥११४॥ तथा मंद्रे भवेद्दीप्ता साम्नश्चैव समापने । नातितारश्रुतिं कुर्यात्स्वरयोर्नापि चांतरे ॥११५॥ तं च ह्रस्वे च दीर्घे च न चापि घुटसंज्ञके । द्विविधा गतिः पदांतस्थितसंधिः सहोष्मभिः ॥११६॥ स्थानेषु पंचस्वेतेषु विज्ञेयं घुटसंज्ञकम् । स्वरांतराविरतानि ह्रस्वदीर्घघुटानि च ॥११७॥ स्थितिस्यानेष्वशेषाणि श्रुतिवत्स्वरतो वदेत् । दीप्तामुदात्ते जानीयाद्दीप्तां च स्वरिते विदुः ॥११८॥ अंधकार से उत्पन्न योनि वाले और पितर चतुर्थ स्वरजीवी हैं ॥१०६-१०७॥ मन्द्र से पिशाच, असुर और राक्षस जीते हैं । नीच स्वर अतिस्वार से जगत् के स्थावर-जंगम जीवित होते हैं। सब भूत (प्राणी) सामिक स्वर से जीवित रहते हैं ॥१०८॥ दीप्त, आयत, करुण, मृदु, मध्यम और श्रुतियों का जो विशेषज्ञ नहीं होता है उसको आचार्य नहीं कहते हैं। मन्द्र, द्वितीय और चतुर्थ में दीप्ता श्रुति, अतिस्वार, तृतीय और क्रुष्ट में करुणा श्रुति होती है ॥१०९-११०॥ द्वितीय की जो मृदु, मध्य और आयत श्रुतियां हैं, उनके लक्षण पृथक्-पृथक् कहता हूँ । नीच में अर्थात् तृतीय स्वर परे रहने पर आयता, विपर्यय में (चतुर्थस्वर परे रहने पर) मृदु और अपने स्वर में मध्यमा श्रुति होती है, इनको भली-भांति समीक्षा कर प्रयोग में लाना चाहिए ॥१११-११२॥ क्रुष्ट स्वर होने पर द्वितीय स्वर में स्थित जो श्रुति है, उसको दीप्ता समझना चाहिए। प्रथम स्वर में तो मृदु समझना चाहिए । यदि चतुर्थ स्वर में हो तो वही श्रुति मृदु कहलाती है तथा मन्द्र स्वर में हो तो दीप्ता होती है। साम की समाप्ति होने पर जिस किसी भी स्वर में स्थित श्रुति दीप्ता ही होती है। स्वर के समाप्त होने से पहले आय- तादि श्रुति का प्रयोग न करे । स्वर समाप्त होने पर भी जब तक गान का विच्छेद न हो जाय, दो स्वरों के मध्य में श्रुति का प्रयोग न करे ॥११३-११५॥ ह्रस्व तथा दीर्घ अक्षर का गान होते समय भी श्रुति नहीं करनी चाहिए । (केवल प्लुत में ही श्रुति का प्रयोग न करे ।) तथा जहाँ घुट-संज्ञक स्वर हो, वहाँ श्रुति का प्रयोग न करे । तालव्य इकार का 'आ' 'इ' भाव होता है और 'आ' 'उ' भाव होता है, ये दो प्रकार की गतियां हैं। तथा ऊष्म वर्णं 'श ष स' के साथ जो त्रिविध पदान्त सन्धि है—ये सब मिलकर पांच स्थान हैं; इन स्थानो में घुट संज्ञक स्वर जानना चाहिए (इनमें श्रुति नहीं करनी चाहिए) । श्रुति-स्थानों में जहाँ स्वर और स्वरान्तर समाप्त न हुए हों तथा जो ह्रस्व, दीर्घ एवं घुट-संज्ञक स्थल हैं, वे सब श्रुति से रहित हैं, उनमें श्रुति नहीं करनी चाहिए। वहाँ स्वर से ही श्रुतिवत् कार्य होता है ॥११६-११७३॥ (समासव्यतिरिक्त स्थलों में) उदात्त स्वर में 'दीप्ता' नाम वाली श्रुति को जाने । स्वरित में भी विद्वान् लोग 'दीप्ता' की ही स्थिति मानते हैं। अनुदात्त में 'मृदु' श्रुति जाननी चाहिए। गान्धवं गान में श्रुति का अभाव होने