भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 363

३४४ नारदीयपुराणम् अनुदात्ते मृदुज्ञेया गंधर्वाः श्रुतिसंपदे । उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितप्रचिते तथा ॥११८॥ निघातश्चेति विज्ञेयः स्वरभेदश्च पंचधा । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि आर्चिकस्य स्वरत्रयम् ॥१२०॥ उदात्तश्चानुदात्तश्च तृतीयः स्वरितः स्वरः । य एवोदात्त इत्युक्तः स एव स्वरितात्परः ॥१२१॥ प्रचयः प्रोच्यते तज्ज्ञैर्न चान्यान्त्स्वरांतरात् । वर्णस्वरोऽतीतस्वरः स्वरितो द्विविधः स्मृतः ॥१२२॥ मात्रिको वर्ण एवं तु दीर्घस्तूच्चारितादनु । स तु सप्तविधो ज्ञेयः स्वरः प्रत्ययदर्शनात् ॥१२३॥ पदेन तु स विज्ञेयो भवेद्यो यत्र यादृशः । सप्तस्वरान्प्रयुंजीत दक्षिणं श्रवणं प्रति ॥१२४॥ आचार्यैर्विहितं शास्त्रं पुत्रशिष्यहितैषिभिः । उच्चादुच्चतरं नास्ति नीचान्नीचतरं तथा ॥१२५॥ वैस्वर्यस्वरसंज्ञायां किंस्थानः स्वार उच्यते । उच्चनीचस्य यन्मध्ये साधारणमिति श्रुतिः ॥१२६॥ तं स्वारं स्वारसंज्ञायां प्रतिजानंति शिक्षिकाः । उदात्ते निषादगांधारावनुदात्ते ऋषभधैवतौ ॥१२७॥ स्वरितप्रभवा ह्येते षड्जमध्यमपंचमाः । यत्र कखपरा ऊष्मा जिह्वामूलप्रयोजनाः ॥१२८॥ तानप्याज्ञापयेन्मात्राप्रकृत्यैव तु सा कला । जात्यः क्षैप्रोऽभिनिहित स्तैर्व्यंजन एव च ॥१२९॥ तिरोविरामः प्रश्लिष्टोऽपादवृत्तश्च सप्तमः । स्वराणामहमेतेषां पृथग्वक्ष्यामि लक्षणम् ॥१३०॥


पर भो स्वर को ही श्रुति के समान करना चाहिए । वहां स्वर में ही श्रुति का वैभव निहित है । उदात्त, अनु- दात्त, स्वरित, प्रचय¹ तथा निघात²--ये पाँच स्वरभेद होते हैं ॥११८-११९½॥ इसके बाद मैं आर्चिक के तीन स्वरों का प्रतिपादन करता हूँ ! पहला उदात्त, दूसरा अनुदात्त और तीसरा स्वरित हैं । जिसको उदात्त कहा गया है, वही स्वरित से परे हो तो विद्वान् पुरुष उसे प्रचय कहते हैं। वहाँ दूसरा कोई स्वरान्तर नहीं होता । स्वरित के दो भेद हैं--वर्णस्वर और अतीतस्वर ॥१२०-१२२॥ इसी प्रकार वर्ण भी मात्रिक एवं उच्चरित के पश्चात् दीर्घ होता है। प्रत्यय-स्वरूप प्रत्यय का दर्शन होने से उसे सात प्रकार का जानना चाहिए ॥१२३॥ वह क्या, कहाँ और कैसा है, इसका ज्ञान पद से प्राप्त करना चाहिए । दाहिने कान में सातों स्वरों का श्रवण करावे ॥१२४॥ आचार्यों ने पुत्रों और शिष्यों के हित की इच्छा से ही इस शिक्षाशास्त्र का प्रणयन किया है। उच्च (उदात्त) से कोई उच्चतर नहीं है और नीच (अनुदात्त) से नीचतर नहीं है, उसमें स्वर का क्या स्थान है ? (इसके उत्तर में कहते हैं--) उच्च (उदात्त) और नीच (अनुदात्त) के मध्य में जो 'साधारण' यह श्रुति है, उसी को शिक्षाशास्त्र के विद्वान् स्वार-संज्ञा में 'स्वार' नाम से जानते हैं ॥१२५-१२६½॥ उदात्त में निषाद और गान्धार स्वर हैं, अनुदात्त में ऋषभ और धैवत स्वर में हैं। और ये- षड्ज, मध्यम तथा पञ्चम-स्वरित में प्रकट होते हैं ॥१२७½॥ जिसके परे 'क' और 'ख' हैं तथा जो जिह्वा- मूलीय रूप प्रयोजन को सिद्ध करने वाली है, उस 'ऊष्मा' (क ख) को 'मात्रा' जाने । वह अपने स्वरूप से ही 'कला' है (किसी दूसरे वर्ण का अवयव नहीं है । इसे उपध्मानीय का भी उपलक्षण मानना चाहिए) ॥१२८½॥ जात्य, क्षैप्र, अभिनिहित, तैरव्यञ्जन, तिरोविराम, प्रश्लिष्ट तथा सातवाँ अपादवृत्त--ये सात स्वार हैं। अब मैं इन सब स्वारों का पृथक्-पृथक् लक्षण बतलाता हूँ ॥१२६-१३०॥ लक्षण कहकर उन सबके यथायोग्य


१. स्वरित से आगे स्वरित ही हो तो उनकी 'प्रचय' संज्ञा होती है । २. प्रचय परे हो तो स्वरित का आहनन होने से उसकी 'निघात' संज्ञा होती है। प्रचय न हो, तब तो शुद्ध 'स्वरित' ही रहता है।

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