भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 364

पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३४५

उद्दिष्टानां तथा न्याय्यमुदाहरणमेव च । सयकारं सवं वापि ह्यक्षरं स्वरितं भवेत् ॥१३१॥ न चोदात्तं पुरो यस्य जात्यः स्वरः स उच्यते । इउवणौ यदोदात्तावापद्येते यवौ क्वचित् ॥१३२॥ अनुदात्तं प्रत्यये तु विद्यात्क्षैप्रस्य लक्षणम् । एओआभ्यामुदात्ताभ्यामकारो निहितश्च यः ॥१३३॥ अकारो यत्र लुप्यति तमभिनिहितं विदुः । उदात्तपूर्वं यत्किञ्चिच्छंदसि स्वरितं भवेत् ॥१३४॥ एष सर्वबहुस्वारस्तैरव्यंजन उच्यते । अवग्रहात्परं यत्र स्वरितं स्यादनंतरम् ॥१३५॥ तिरोविरामं तं विद्यादुदात्तो यद्यवग्रहः । इकारं यत्र पश्येयुरिकारेण संयुक्तम् ॥१३६॥ उदात्तमनुदात्तेन प्रश्लिष्टं तं विचारय । स्वरे चेत्स्वरितं यत्र विवृता यत्र संहिता ॥१३७॥ एतत्पादांतवृत्तस्य लक्षणं शास्त्रनोदितम् । तान्यः स्वारः स जात्येन श्रुत्यग्रे क्षैप्र उच्यते ॥१३८॥ ते मन्त्वताभिनिहितस्तैरव्यञ्जन ऊतये । तिरोविरामो विष्कभिते प्रश्लिष्टो हीहँगीर्वणः ॥१३६॥ पाद्वृत्तः कंदविदे स्वराः सप्तैवैमादयः । उच्चादेकाक्षरात्पूर्वात्स्वरं यद्यविहाक्षरम् ॥१४०॥ स्वाराणां जात्यवर्जनामेषा प्रकृतिरुच्यते । चत्वारस्त्वोदितः स्वाराः कंपंपुं श्रुतिशास्त्रतः ॥१४१॥ उवात्ते चैकनीचे वा जुह्वोऽग्निस्तन्निदर्शनम् । इकारांते पदे पूर्व उकारे परतः स्थिते ॥१४२॥ ह्रस्वं कंपं विजानीयान्मेधावी नात्र संशयः । इकारांते पदे चैवोकारद्वयं परे पदे ॥१४३॥

उदाहरण भी बताऊँगा । जो अक्षर 'य' कार और 'व' कार के साथ स्वरित होता है तथा जिसके आगे उदात्त नहीं होता, वह 'जात्य' स्वार कहलाता है ॥१३१॥ जब उदात्त 'इ' वर्ण और 'उ' वर्ण कहीं पदादि अनुदात्त अकार परे रहते सन्धि होने पर 'य' 'व' के रूप में परिणत हो स्वरित होते हैं तो वहाँ सदा 'क्षैप्र' स्वार का लक्षण समझना चाहिए ॥१३२॥ 'ए' और 'ओ' इन दो उदात्त स्वरों से परे जो वकारसहित अकारनिहित (अनुदात्त रूप में निपातित) हो और उसका जहाँ लोप (एकार या उकार में अनुप्रवेश) होता है, 'अभिनिहित' स्वार माना जाता है ॥१३३॥ छन्द में जहाँ-कहीं या जो कोई भी ऐसा स्वरित होता है, जिसके पूर्व में उदात्त हो, वह सर्व बहुस्वार (सर्वत्र बहुलता से होने वाला स्वर) 'तैरव्यञ्जन' कहलाता है ॥१३४॥ यदि उदात्त अवग्रह हो और अवग्रह से परे अनन्तर स्वरित हो, तो उसे 'तिरोविराम' समझना चाहिए ॥१३५॥ जहां उदात्त इकार को अनुदात्त इकार से संयुक्त देखिए, वहाँ विचार लीजिए कि 'प्रश्लिष्ट' स्वार है । जहाँ स्वर अक्षर अकारादि में स्वरित हो और पूर्वपद के साथ संहिता विभक्त हो, उसे पादवृत्त स्वार का शास्त्रोक्त लक्षण समझना चाहिए ॥१३६-१३७॥ 'जात्य' स्वार का उदाहरण है-- 'सजात्येन' इत्यादि । श्रुष्टि + अग्ने = श्रुष्ट्यग्ने आदि स्थलों में 'क्षैप्र' स्वार है। 'वे मन्वत' इत्यादि में अभिनिहित' स्वार जानना चाहिए । उ + ऊतये = ऊतये, वि + ईतये = वीतये इत्यादि में 'तैरव्यञ्जन' नामक स्वार है । 'विस्कभिते विस्कभिते' आदि स्थलों में 'तिरोविराम' है । 'हि इन्द्र गिर्वणः' = 'हीन्द्र०' इत्यादि में प्रश्लिष्ट स्वार है । 'क ईम् कई वेद' इत्यादि में 'पादवृत्त' नामक स्वार है । इस प्रकार ये सब सात स्वार हैं ॥१३८-१३६॥ जात्य स्वरों को छोड़कर एक पूर्ववर्ती उदात्त अक्षर से परे जो भी अक्षर हो, उसकी स्वरित संज्ञा होती है । यह स्वरित का सामान्य लक्षण बताया जाता है । पूर्वोक्त चार स्वार उदात्त अथवा एक अनुदात्त परे रहने पर शास्त्रतः 'कम्प' उत्पन्न करते हैं । (जिसका स्वरूप चल हो, उस स्वार का नाम कम्प है) इसका उदाहरण है 'जुह्वोम्निः' । 'उप त्वा जुहू', 'उप त्वा जुह्वो मम' इत्यादि ॥१४०-१४१॥ पूर्वपद इकारान्त हो और परे उकार की स्थिति हो तो मेधावी पुरुष वहाँ 'ह्रस्व कम्प' जाने, इसमें संशय नहीं । यदि उकारद्वय युक्त पद परे हो तो इकारान्त पद में दीर्घ कम्प जानना चाहिए । इसका दृष्टान्त है-- 'शग्ध्युषू' इत्यादि ॥१४२-१४३॥ तीन

४४ ना० पु०