बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४६ नारदीयपुराणम्
दीर्घं कंपं विजानीयाच्चाऽध्दूष्विति निदर्शनम् । त्रयो दीर्घास्तु विज्ञेया ये च संध्यक्षरेषु वै ॥१४४॥ मन्या पथ्या न इंद्राभ्यां शेषा ह्रस्वाः प्रकीर्तिताः । अनेकानामुदात्तानामनुदात्तः प्रत्ययो यदि ॥१४५॥ शिवकंपं विजानीयादुदात्तः प्रत्ययो यदि । यत्र द्विप्रभृतीनि स्युरुदात्तान्यक्षराणि तु ॥१४६॥ नीचं वोच्चं च परतस्तत्रोदात्तं विदुबुंधाः । न रेफे वा हकारे वा द्विर्भावो जायते क्वचित् ॥१४७॥ न च वर्गद्वितीयेषु न चतुर्थे कदाचन । चतुर्थं तु तृतीयेन द्वितीयः प्रथमेन तु ॥१४८॥ आद्यमंत्यं च मध्यं च स्वाराक्षरेण पीडयेत् । अनंत्यश्च भवेत्पूर्वो ह्यंत्यश्च परतो यदि ॥१४९॥ तत्र मध्ये यमस्तिष्ठेत्स्ववर्णः पूर्ववर्णयोः । वर्गान्त्यान् शषसैः सार्द्धमंतस्थैर्वापि संयुतान् ॥१५०॥ दृष्ट्वा यमा निवर्तंते अदेशिकमिवाध्वगाः । तृतीयश्च चतुर्थश्च चतुर्थादिपरं पदम् ॥१५१॥ द्वौ तृतीयो हकारश्च हकारादिपरं पदम् । अनुस्वारोपधामूला तान् क्वचित्क्रमतः परम् ॥१५२॥ रहपूर्वे संयुते चाप्युत्तरं क्रमतेऽक्षरम् । संयोगो यत्र दृश्येत व्यंजनं विरते पदे ॥१५३॥ पूर्वांगमादितः कृत्वा परांगादौ निवेशयेत् । संयोगे स्वरितं यत्र उद्घातः प्रतनं तथा ॥१५४॥ पूर्वांगतद्विजानीयाद्येनांरभः परं हि तत् । संयोगात्तु विजानीयात्परं संयोगनायकम् ॥१५५॥
दीर्घ कम्प जानने चाहिए, जो सन्ध्यक्षरों में होते हैं। उनके क्रमशः उदाहरण ये हैं-मन्या, पथ्या, न इन्द्राभ्याम् । शेष ह्रस्व कहे गए हैं ॥१४४ 1/2॥ जब अनेक उदात्तों के बाद कोई अनुदात्त प्रत्यय हो तो एक उदात्त परे रहते दूसरे-तीसरे उदात्त की 'शिवकम्प' संज्ञा होती है अर्थात् वह शिवकम्पसंज्ञक आचुदात्त होता है ॥१४५ 1/2॥ किन्तु वह उदात्त प्रत्यय होना चाहिए। जहाँ दो, तीन, चार आदि उदात्त अक्षर हों, नीच-अनुदात्त हो और उससे पूर्व उच्च अर्थात् उदात्त हो और वह भी पूर्ववर्ती उदात्त या उदात्तों से परे हो तो वहाँ विद्वान् पुरुष 'उदात्त' मानते हैं ॥१४६ 1/2॥ रेफ या हकार में कहीं द्वित्व नहीं होता-दो रेफ या दो हकार का प्रयोग एक साथ नहीं होता ॥१४७ 1/2॥ कवर्ग आदि वर्गों के दूसरे और चौथे अक्षरों में भी कभी द्वित्व नहीं होता। वर्ग के चौथे अक्षर को तीसरे के द्वारा और दूसरे को प्रथम के द्वारा पीडित न करे, आदि, मध्य और अन्त्य (क, ग, ङ आदि को अपने ही अक्षर से पीडित (संयुक्त) करे ॥१४८ 1/2॥ यदि संयोगदशा में अन्त्य (जो अन्तिम वर्ण नहीं हैं, वह गकार आदि) वर्ण पहले हो और नकार आदि अनन्त्य वर्ण बाद में हो तो मध्य में यम (य व र ल व म ङ ण न) अक्षर स्थित होता है, वह पूर्ववर्ती अक्षर का सवर्ण हुआ करता है। पूर्ववर्ती श ष स तथा य र ल व-इन अक्षरों से संयुक्त वर्गान्त्य वर्णों को देखकर यमनिवृत्त हो जाते हैं-ठीक वैसे ही, जैसे चोर-डाकुओं को देखकर राही अपने मार्ग से लौट जाते हैं ॥१४९-१५० 1/2॥ संहिता में जब वर्ण के तीसरे और चौथे अक्षर संयुक्त हो तो पदकाल में चतुर्थ अक्षर से ही आरंभ करके उत्तर पद होगा। दूसरे, तीसरे और हकार-इन सबका संयोग हो तो उत्तर पद हकारादि ही होगा ॥१५१ 1/2॥ अनुस्वार, उपध्मानीय तथा जिह्वामूलीय के अक्षर किसी पद में नहीं जाते, उनका दो बार उच्चारण नहीं होता। यदि पूर्व में र या ह अक्षर से संयोग हो तो परवर्ती अक्षर का द्वित्व हो जाता है ॥१५२ 1/2॥ जहाँ संयोग में स्वरित हो तथा उद्धृत (नीचे से ऊपर जाने) में और पतन (ऊँचे से नीचे जाने) में स्वरित हो, वहाँ पूर्वांग को आदि में करके (नीच में उच्चत्व लाकर) परांग के आदि में स्वरित का संनिवेश करे ॥१५३ 1/2॥ संयोग के विरत (विभक्त) होने पर जो उत्तर पद से असंयुक्त व्यञ्जन दिखाई दे, उसे पूर्वांग जानना चाहिए तथा जिस व्यञ्जन से उत्तरपद का आरंभ हो, उसे परांग समझे ॥१५४ 1/2॥ संयोग से परवर्ती भाग को स्वरयुक्त करना चाहिए; क्योंकि वह उत्तम एवं संयोग का नायक है। वहीं प्रधानतया स्वर की विश्रान्ति होती है। तथा व्यञ्जन-संयुक्त वर्ण का पूर्व अक्षर स्वरित है, उसे बिना स्वर के ही बोलना चाहिए।