भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 366

पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३४७ संयुक्तस्य तु वर्णस्य तत्परं पूर्वमक्षरम् । अनुस्वारः पदतश्च क्रमजं प्रत्यये स्वके ॥१५६॥ स्वरभक्तिस्तथारेफः पूर्वपूर्वांगमुच्यते । पादादौ च पदादौ संयोगावग्रहेषु च ॥१५७॥ य्यशब्द इति विज्ञेयो योऽन्यः सय इति स्मृतः । पादादावप्यविच्छेदे संयोगान्ते च तिष्ठताम् ॥१५८॥ वर्जयित्वा रहणानामुपादेशः प्रदृश्यते । स्वसंयुक्तो गुरुज्ञेयः सानुस्वाराग्रिम स्फुटः अनुशेषो हिंगो वापि युगलादिरविस्फुटः ॥१५९॥ यदुदात्तमुदात्तं तद्यत्स्वरितं तत्पदे भवेत् । यन्नीचं नीचमेव तद्यत्प्रचयस्थं तदपि नीचम् ॥१६०॥ अग्निः सुतो मित्रमिदं तथा वयमयावहाः । प्रियं दूतं घृतं चित्तमतिशब्दस्तु नीचतः ॥१६१॥ अर्केष्वेव सुतेष्वेव यज्ञेषु कलशेषु च । शतेषु सवित्रेषु नीचादुच्चार्यते श्रुतिः ॥१६२॥ हारिवरुणवरेण्येषु धारापुरुषेषु स्वरितरेफः । विश्वानरोनकारश्च शेषास्तु स्वरिता नराः ॥१६३॥ द्वो वरुणो वस्वरित उदुत्तमंतवं वरुणधार चौहधारामुरुधारेस्वदोहते । मात्रिकं वा द्विमात्रं वा स्वर्यते यदिहाक्षरम् । तस्यादितोऽर्द्धमात्रं वै शेषं तु परतो भवेत् । अदीर्घं दीर्घवत्कुर्याद्विस्वरं यत्प्रयुज्यते ॥१६४॥ कंपोत्स्वरिताभिगीतं ह्रस्वकर्षणमेव च । निमेषकाला मात्रा स्याद्विद्युत्कालेति चापरे ॥१६५॥ अनुस्वार, पदान्त, प्रत्यय तथा सवर्ण पद परे रहने पर होने वाला द्वित्व तथा रेफस्वरूप स्वरभक्ति-यह सब पूर्वांग कहलाता है ॥१५५-१५६॥। पादादि में, पदादि में, संयोग तथा अवग्रहों में भी 'य' कार के द्वित्व का प्रयोग करना चाहिए, उसे 'य्य' शब्द जानना चाहिए। अन्यत्र 'य' केवल 'य' के रूप में ही रहता है ॥१५७॥। पदादि में रहते हुए भी विच्छेद (विभाग) न होने पर अथवा संयोग के अन्त में स्थित होने पर र् ह् रेफविशिष्ट य--इनको छोड़कर अन्य वर्णों का अयादेश (द्वित्वाभाव) देखा जाता है ॥१५८॥। स्वयं संयोगयुक्त अक्षर को गुरु जानना चाहिए। अनुस्वारयुक्त तथा विसर्गयुक्त वर्ण का गुरु होना तो स्पष्ट ही है। शेष अणु (ह्रस्व) है। 'हि' 'गोः' इनमें प्रथम संयुक्त और दूसरा विसर्गयुक्त है। संयोग और विसर्ग दोनों के आदि अक्षर का गुरुत्व भी स्पष्ट है ॥१५८-१५६॥। जो उदात्त है, वह उदात्त ही रहता है; जो स्वरित है, वह पद में नीच (अनुदात्त) होता है। जो अनुदात्त है, वह तो अनुदात्त रहता ही है; जो प्रचयस्थ स्वर है, वह भी अनुदात्त हो जाता है। विभिन्न मन्त्रों में आये हुए 'अग्निः' 'सुतः' 'मित्रम्' 'इदम्' 'वयम्' 'मया' 'प्रियम्' 'दूतम्' 'घृतम्' 'चित्तम्' तथा 'अभि'--ये पद नीच (अर्थात् अनुदात्त से आरम्भ) होते हैं ॥१६०-१६१॥। 'अर्क' 'सुत' 'यज्ञ' 'कलश' 'शत' तथा 'पवित्र'--इन शब्दों में अनुदात्त से श्रुति का उच्चारण प्रारंभ किया जाता है ॥१६२॥ 'हरि' 'वरुण' 'वरेण्य' 'धारा' तथा 'पुरुष'--इन शब्दों में रेफयुक्त स्वर ही स्वरित होता है। 'विश्वानर' शब्द में नकारयुक्त और अन्यत्र 'नर' शब्दों में रेफयुक्त स्वर ही स्वरित होता है ॥१६३॥। परन्तु 'उदुत्तमं त्वं वरुण' इत्यादि वरुण-सम्बन्धी दो मन्त्रों में 'व' कार ही स्वरित होता है, रेफ नहीं। 'उरु धारा मरं कृतम्' 'उरु धारेय दोहने' इत्यादि मन्त्रों में 'धारा' का 'धाकार' हो स्वरित होता है, रेफ नहीं। (यह पूर्व नियम का अपवाद है) ह्रस्व या दीर्घ जो अक्षर यहाँ स्वरित होता है, उसकी पहली आधी मात्रा उदात्त होती है और शेष आधी मात्रा उससे परे अनुदात्त होती है (पाणिनि ने भी यही कहा है--'तस्यादित उदात्तमर्धह्रस्वम्' ।) कम्प, उत्स्वरित और अभिगीत के विषय में जो द्विस्वर का प्रयोग होता है, वहाँ ह्रस्व को दीर्घ के समान करे और ह्रस्व कर्षण करे। पलक मारने में जितना समय लगता है, वह एक मात्रा है। दूसरे आचार्य ऐसा मानते हैं कि बिजली चमककर जितने समय में अदृश्य हो जाती है, वह एक मात्रा का मान है ॥१६४-१६५॥ कुछ विद्वानों का ऐसा