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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३४७ संयुक्तस्य तु वर्णस्य तत्परं पूर्वमक्षरम् । अनुस्वारः पदतश्च क्रमजं प्रत्यये स्वके ॥१५६॥ स्वरभक्तिस्तथारेफः पूर्वपूर्वांगमुच्यते । पादादौ च पदादौ संयोगावग्रहेषु च ॥१५७॥ य्यशब्द इति विज्ञेयो योऽन्यः सय इति स्मृतः । पादादावप्यविच्छेदे संयोगान्ते च तिष्ठताम् ॥१५८॥ वर्जयित्वा रहणानामुपादेशः प्रदृश्यते । स्वसंयुक्तो गुरुज्ञेयः सानुस्वाराग्रिम स्फुटः अनुशेषो हिंगो वापि युगलादिरविस्फुटः ॥१५९॥ यदुदात्तमुदात्तं तद्यत्स्वरितं तत्पदे भवेत् । यन्नीचं नीचमेव तद्यत्प्रचयस्थं तदपि नीचम् ॥१६०॥ अग्निः सुतो मित्रमिदं तथा वयमयावहाः । प्रियं दूतं घृतं चित्तमतिशब्दस्तु नीचतः ॥१६१॥ अर्केष्वेव सुतेष्वेव यज्ञेषु कलशेषु च । शतेषु सवित्रेषु नीचादुच्चार्यते श्रुतिः ॥१६२॥ हारिवरुणवरेण्येषु धारापुरुषेषु स्वरितरेफः । विश्वानरोनकारश्च शेषास्तु स्वरिता नराः ॥१६३॥ द्वो वरुणो वस्वरित उदुत्तमंतवं वरुणधार चौहधारामुरुधारेस्वदोहते । मात्रिकं वा द्विमात्रं वा स्वर्यते यदिहाक्षरम् । तस्यादितोऽर्द्धमात्रं वै शेषं तु परतो भवेत् । अदीर्घं दीर्घवत्कुर्याद्विस्वरं यत्प्रयुज्यते ॥१६४॥ कंपोत्स्वरिताभिगीतं ह्रस्वकर्षणमेव च । निमेषकाला मात्रा स्याद्विद्युत्कालेति चापरे ॥१६५॥ अनुस्वार, पदान्त, प्रत्यय तथा सवर्ण पद परे रहने पर होने वाला द्वित्व तथा रेफस्वरूप स्वरभक्ति-यह सब पूर्वांग कहलाता है ॥१५५-१५६॥। पादादि में, पदादि में, संयोग तथा अवग्रहों में भी 'य' कार के द्वित्व का प्रयोग करना चाहिए, उसे 'य्य' शब्द जानना चाहिए। अन्यत्र 'य' केवल 'य' के रूप में ही रहता है ॥१५७॥। पदादि में रहते हुए भी विच्छेद (विभाग) न होने पर अथवा संयोग के अन्त में स्थित होने पर र् ह् रेफविशिष्ट य--इनको छोड़कर अन्य वर्णों का अयादेश (द्वित्वाभाव) देखा जाता है ॥१५८॥। स्वयं संयोगयुक्त अक्षर को गुरु जानना चाहिए। अनुस्वारयुक्त तथा विसर्गयुक्त वर्ण का गुरु होना तो स्पष्ट ही है। शेष अणु (ह्रस्व) है। 'हि' 'गोः' इनमें प्रथम संयुक्त और दूसरा विसर्गयुक्त है। संयोग और विसर्ग दोनों के आदि अक्षर का गुरुत्व भी स्पष्ट है ॥१५८-१५६॥। जो उदात्त है, वह उदात्त ही रहता है; जो स्वरित है, वह पद में नीच (अनुदात्त) होता है। जो अनुदात्त है, वह तो अनुदात्त रहता ही है; जो प्रचयस्थ स्वर है, वह भी अनुदात्त हो जाता है। विभिन्न मन्त्रों में आये हुए 'अग्निः' 'सुतः' 'मित्रम्' 'इदम्' 'वयम्' 'मया' 'प्रियम्' 'दूतम्' 'घृतम्' 'चित्तम्' तथा 'अभि'--ये पद नीच (अर्थात् अनुदात्त से आरम्भ) होते हैं ॥१६०-१६१॥। 'अर्क' 'सुत' 'यज्ञ' 'कलश' 'शत' तथा 'पवित्र'--इन शब्दों में अनुदात्त से श्रुति का उच्चारण प्रारंभ किया जाता है ॥१६२॥ 'हरि' 'वरुण' 'वरेण्य' 'धारा' तथा 'पुरुष'--इन शब्दों में रेफयुक्त स्वर ही स्वरित होता है। 'विश्वानर' शब्द में नकारयुक्त और अन्यत्र 'नर' शब्दों में रेफयुक्त स्वर ही स्वरित होता है ॥१६३॥। परन्तु 'उदुत्तमं त्वं वरुण' इत्यादि वरुण-सम्बन्धी दो मन्त्रों में 'व' कार ही स्वरित होता है, रेफ नहीं। 'उरु धारा मरं कृतम्' 'उरु धारेय दोहने' इत्यादि मन्त्रों में 'धारा' का 'धाकार' हो स्वरित होता है, रेफ नहीं। (यह पूर्व नियम का अपवाद है) ह्रस्व या दीर्घ जो अक्षर यहाँ स्वरित होता है, उसकी पहली आधी मात्रा उदात्त होती है और शेष आधी मात्रा उससे परे अनुदात्त होती है (पाणिनि ने भी यही कहा है--'तस्यादित उदात्तमर्धह्रस्वम्' ।) कम्प, उत्स्वरित और अभिगीत के विषय में जो द्विस्वर का प्रयोग होता है, वहाँ ह्रस्व को दीर्घ के समान करे और ह्रस्व कर्षण करे। पलक मारने में जितना समय लगता है, वह एक मात्रा है। दूसरे आचार्य ऐसा मानते हैं कि बिजली चमककर जितने समय में अदृश्य हो जाती है, वह एक मात्रा का मान है ॥१६४-१६५॥ कुछ विद्वानों का ऐसा

३४८ नारदीयपुराणम् ऋक्स्वरा तुल्ययोगा वा कैश्चिदेवमुदीर्यते ॥१६६॥ समासेऽवग्रहं कुर्यात्पदं चात्रानुसंहितम् । यतोऽक्षरादिकरणं पदांतस्येति तं विदुः ॥१६७॥ (सर्वत्रमित्रपुत्रसखिशब्दा अहिशतक्रतोरवग्राह्याः । आदित्यविप्रजातवेदश्च सत्पतिगोपतिवृत्रहासमुद्राश्च । स्वरयुपुवोदेवयुवश्चाऽरतिं देवतात्तये) चिकितिश्चक्रुधं चैव नावगृह्णंति पंडिताः । ॥१६८॥ विवृतयश्चतस्रो वै विज्ञेया इति मे मतम् अक्षराणां नियोगेन तासां नामानि मे शृणु । ह्रस्वाद्दिवत्सानुसृता वत्सानुसारिणी चाग्रे ॥१६६॥ पाकवत्युभयोर्ह्रस्वा दीर्घा वृद्धा पिपीलिकाः । चतसृणां विवृतीनामंतरं मात्रिकं भवेत् ॥१७०॥ अद्धंमात्रिकमन्येषामन्येषामणुमात्रिकम् ॥१७१॥ आपद्यते मकारो रेफोष्मसु प्रत्ययेऽप्यनुस्वारम् । पवेषु परसवर्णं स्पर्शेषु चोत्तमार्पितम् ॥१७२॥ नकारांते पदे पूर्वे स्वरे च परतः स्थिते । अकारं रक्तमित्याहुस्तकारेण तु रज्यते ॥१७३॥ नकारांते पदे पूर्वे व्यंजनैश्च यवोहिषु । अर्द्धमात्रा तु पूर्वस्य रज्यते त्वणुमात्रया ॥१७४॥ नकारस्वरसंयुक्तश्चतुर्युक्तो विधीयते । रेफो रंगश्च लोपश्च सानुस्वारोऽपि वा क्वचित् ॥१७५॥ मत है। कि ऋ, छ, अथवा श के उच्चारण में जितना समय लगता है, उतने काल की एक मात्रा होती है ॥१६६॥ समास में यदि अवग्रह (विग्रह या पद-विच्छेद) करे तो उसमें समासपद को संहितायुक्त ही रखे। क्योंकि वहाँ जिससे अक्षरादिकरण होता है, उसी स्वर को उस समास-पद का अन्त मानते हैं ॥१६७॥ सर्वत्र पुत्र, मित्र, सखि, मद्रि, शतक्रतु, आदित्य, प्रजातवेद, सत्पति, गोपति, वृत्रहा, समुद्र--ये सभी शब्द अवग्राह्य (अवग्रह के योग्य) हैं। 'स्वर्युवः, 'देवयुवः' अरतिम्' 'देवतातये' 'चिकितिः' 'चुकृधम्'--इन सब में एक पद होने के कारण पण्डित लोग अवग्रह नहीं करते। अक्षरों के नियोग से चार प्रकार की विवृत्तियां जाननी चाहिए, ऐसा मेरा मत है ॥१६८॥ अब तुम मुझसे उनके नाम सुनो - वत्सानुसृता, वत्सानुसारिणी, पाकवती और पिपीलिका। जिसके पूर्वपद में ह्रस्व और उत्तरपद में दीर्घ है, वह ह्रस्वादि रूप बछड़ों से अनुगत होने के कारण 'वत्सानुसृता' विवृत्ति कही गई है। जिसमें पहले ही पद में दीर्घ और उत्तरपद में ह्रस्व हो, वह 'वत्सानुसारिणी' विवृत्ति है। जहाँ दोनों पदों में ह्रस्व हो, वह 'पाकवती' कहलाती है तथा जिसके दोनों पदों में दीर्घ है, वह 'पिपीलिका' कही गई है। इन चारों विवृत्तियों में एक मात्रा का अन्तर होता है। दूसरों के मत में यह अन्तर आधा मात्रा है और किन्हीं के मत में अणु मात्रा है ॥१६९-१७१॥ रेफ तथा श ष स--ये जिनके आदि में हों, ऐसे प्रत्यय परे होने पर 'मकार' अनुस्वार भाव को प्राप्त होता है। य व ल परे हों तो वह परसवर्ण होता है और स्पर्शवर्ण परे हों तो उन- उन वर्गों के पञ्चम वर्ण को प्राप्त होता है ॥१७२॥ नकारान्त पद पूर्व में हो और स्वर परे हो तो नकार के द्वारा पूर्ववर्ती आकार अनुरंजित होता है, अतः उसे 'रक्त' कहते हैं (यथा 'महाँ ३ असि' इत्यादि) ॥१७३॥ यदि नकारान्त पद पूर्व में हो और य व हि आदि व्यञ्जन परे हों तो पूर्व की आधी मात्रा--अणु मात्रा अनुरंजित होती है ॥१७४॥ पूर्व में स्वर से संयुक्त हलन्त नकार यदि पदान्त में स्थित हो और उसके परे भी पद हो तो वह चार रूपों से युक्त होता है। कहीं वह रेफ होता है, कहीं रंग (या रक्त) बनता है कहीं उसका लोप और कहीं उसका अनुस्वार हो जाता है। (यथा 'भवाँश्चिनोति' में रेफ होता है। 'महाँ ३ असि' में रंग है। 'महाँ इन्द्र' में न का लोप हुआ है। पूर्व का अनुनासिक या अनुस्वार हुआ है ॥१७५॥ 'रंग' हृदय से उठता

पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३४६ हृद्यादुत्तिष्ठते रंगः कांस्येन तु समन्वितः । मृदुश्चैव द्विमात्रश्च दधन्वांइति निदर्शनम् ॥१७६॥ यथा सौराष्ट्रिका नारी अरां इत्यभिभाषते । एवं रंगः प्रयोक्तव्यो नारदैतन्मतं मम ॥१७७॥ स्वरा गडदबाश्चैव ङणनमाः सहोष्मभिः । चतुर्णां पदजातीनां पदांता दश कीर्तिताः ॥१७८॥ स्वरः उच्चः स्वरो नीचः स्वरः स्वरित एव च । व्यंजना न तु वर्तन्ते यत्र तिष्ठति स स्वरः ॥१७६॥ स्वरप्रवादं त्रैस्वर्यमाचार्याः प्रतिजानते । मणिवद्व्यंजनं विद्यात्सूत्रवच्च स्वरं विदुः ॥१८०॥ दुर्बलस्य यथा राष्ट्रं हरते बलवान्नृपः । दुर्बलं व्यंजनं तद्वद्धरेत बलवान्स्वरः ॥१८१॥ ओभावश्च विवृत्तिश्च शषसा रेफ एव च । जिह्वामूलमुपध्मा च गतिरष्टविधोष्मणः ॥१८२॥ स्वरप्रत्यया विवृत्तिः संहितायां तु या भवेत् । विसर्गस्तत्र मंतव्यस्तालव्यश्चात्र जायते ॥१८३॥ संध्यक्षरे परे संधौ प्राप्तलुप्तौ यवौ यदि । व्यञ्जनाख्या विवृत्तिस्तु स्वराख्या प्रतिसंहिता ॥१८४॥ ऊष्मांतं विरते यत्र संभावी भवति क्वचित् । विवृत्तिर्या भवेत्तत्र स्वराख्यां तां विनिर्दिशेत् ॥१८५॥ यत्रोभावप्रसंधानमृकारादिवरं पदम् । स्वरांतं तादृशं विद्यादन्यद्व्यक्तमूष्मणः ॥१८६॥ प्रथमा उत्तमाश्चैव पदांतेषु यदि स्थिताः । द्वितीयं स्थानमापन्नाः शवसप्रत्यया यदि ॥१८७॥ प्रथमानूष्मसंयुक्तान् द्वितीयानिव दर्शयेत् । न चैतानप्रतिजानीयाद्यथा मत्स्यः क्षुरोप्सराः ॥१८८॥ छंदोमानं च वृत्तं च पादस्थानं त्रिकारणम् । ऋचः स्वच्छंदवृत्तास्तु पादास्त्वक्षरमानतः ॥१८९॥ है, कांस्य के वाद्य की भांति उसकी ध्वनि होती है। वह मृदु तथा दो मात्रा का (दीर्घ) होता है। दधन्वां २ यह उदाहरण है। नारद ! जैसे सौराष्ट्र देश की नारी 'अरां' बोलती है उसी प्रकार 'रंग' का प्रयोग करना चाहिए- यह मेरा मत है ॥१७६-१७७॥ नाम, आख्यात, उपसर्ग तथा निपात--इन चार प्रकार के अन्त पदों में स्वरपूर्वक ग ड द ब ङ ण न म ष स-ये दस अक्षर 'पदान्त' कहे गए हैं ॥१७८॥ उदात्त स्वर, अनुदात्त स्वर और स्वरित स्वर जहाँ भी स्थित हों, व्यञ्जन उनका अनुसरण करते हैं। आचार्य लोग तीनों स्वरों की ही प्रधानता बताते हैं। व्यञ्जनों को तो मणियों के समान समझे और स्वर को सूत्र के समान ॥१७६-१८०॥ जैसे बलवान् राजा दुर्बल के राज्य को हड़प लेता है, उसी प्रकार बलवान् स्वर दुर्बल व्यञ्जन को हर लेता है ॥१८१॥ ओभाव, विवृत्ति श ष स र, जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय-ये ऊष्मा की आठ गतियां हैं। ऊष्मा (सकार) इन आठ भावों में परिणत होता है ॥१८२॥ संहिता में जो स्वर-प्रत्यया विवृत्ति होती है, वहां विसर्ग समझे अथवा उसका तालव्य होता है। जिसकी उपधा में संध्यक्षर (ए, ओ, ऐ, औ) हों ऐसी सन्धि में यदि य और व लोप को प्राप्त हुए हों तो वहां व्यञ्जन नामक विवृत्ति और स्वर नामक प्रतिसंहिता होती है ॥१८३-१८४॥ जहां ऊष्मान्त विरत हो और सन्धि में 'व' होता हो, वहाँ जो विवृत्ति होती है, उसे 'स्वरविवृत्ति' नाम से कहना चाहिए ॥१८५॥ यदि 'ओ' भाव का प्रसंधान हो तो उत्तरपद ऋकारादि होता है, वैसे प्रसंधान को स्वरान्त जानना चाहिए। इससे भिन्न ऊष्मा का प्रसंधान होता है 'यथा 'वायो ऋ' इति । यहाँ ओ भाव का प्रसंधान है। 'क इ ह' यहाँ ऊष्मा का प्रसंधान है ॥१८६॥ जब श ष स आदि परे हों उस समय यदि प्रथम (वर्ग के पहले अक्षर) और उत्तम (वर्ग के अन्तिम अक्षर) पदान्त में स्थित हों तो वे द्वितीय स्थान को प्राप्त होते हैं ॥१८७॥ ऊष्मसंयुक्त होने पर अर्थात् सकारादि परे होने पर प्रथम जो तकार आदि अक्षर हैं, उनको द्वितीय (थकार आदि) की भांति दिखाये- थकार आदि की भाँति उच्चारण करे, उन्हें स्पष्टतः थकार आदि के रूप में ही न समझ ले। उदाहरण के लिए-'मत्स्यः' 'क्षुरः' और 'अप्सराः' आदि उदाहरण हैं ॥१८८॥ लौकिक श्लोक आदि में छन्द का ज्ञान कराने के लिए तीन हेतु हैं-छन्दोमान, वृत्त और पादस्थान (पदान्त) परन्तु ऋचाएं स्वभावतः गायत्री आदि छन्दों से आवृत हैं । उनकी पाद-गणना या गुरु, लघु एवं अक्षरों की गणना तो छन्दोविभाग को समझने के लिए ही

३५० नारदीयपुराणम् ऋग्वर्ण्यान् स्वरभक्तिं च छन्दोमानेन निर्दिशेत् । प्रत्ययेत सहारेफमिमीते स्वरभक्तया ॥१९०॥ ऋवर्णे तु पृथग्रेफः प्रत्ययस्तु वृथा भवेत् । विद्याल्लघुमृकारं तु यदि तूष्माणसंयुतः ॥१९१॥ ऊष्मणेव हि संयुक्त ऋकारो यत्र पीड्यते । गुरुवर्णः स विज्ञेयस्तृचं चात्र निदर्शनम् ॥१९२॥ ऋषभं च गृहीतं च बृहस्पतिं पृथिव्यां च । निर्ऋतिंपंचमा ह्यत्र ऋकारा नात्र संशयः ॥१९३॥ शषसहरादौ रेफः स्वरभक्तिर्जायते द्विपदसंधौ । इउवर्णाभ्यां हीना क्वचिदेकपदाक्रमवियुक्ता ॥१९४॥ स्वरभक्तिद्विधा प्रोक्ता ऋकारे रेफ एव च । स्वरोदा व्यञ्जनोदा च विहिताक्षरचिंतकैः ॥१९५॥ शषसेषु स्वरोदयां हकारे व्यञ्जनोदयाम् । शषसेषु विवृत्तां तु हकारे संवृतां विदुः ॥१९६॥ स्वरभक्तिं प्रयुञ्जानस्त्रीन्दोषान्विरिवर्जयेत् । इकारं चाप्युकारं च ग्रस्तदोषं तथैव च ॥१९७॥ संयोगपरं छपरं विसर्जनीयं द्विमात्रकं चैव । अथ सान्तिकं च नङ्भसानुस्वारं घुटतं च ॥१९८॥ यस्याः पादः प्रथमो द्वादशमात्रस्तथा तृतीयोऽपि । अष्टादशो द्वितीयः समापन्नः पञ्चदशमात्रः । यस्या लक्षणमुक्तं या त्वन्या सा स्मृता विपुला ॥१९६६॥ अक्षराणां लघुह्रस्वमसंयोगपरं यदि । तत्संयोगोत्तरं विद्याद् गुरुदीर्घाक्षराणि तु ॥२००॥ विवृत्तिर्यत्र दृश्येत स्वारस्यैवाग्रतः स्थितः । ॥२०१॥ गुरुस्वारः सविज्ञेयः क्षैप्रस्तत्र न विद्यते । अष्टप्रकारं विज्ञेयं पदानां स्वरलक्षणम् ॥२०२॥ हैं; उन लक्षणों के अनुसार ही ऋचायें हों, यह नियम नहीं है। लौकिक छन्द ही पाद और अक्षर-गणना के अनुसार होते हैं ॥१९८॥ ऋवर्ण और स्वरभक्ति में जो रेफ है, उसे अक्षरन्तर मानकर छन्द की अक्षर-गणना या मात्रागणना में सम्मिलित करे। किन्तु स्वरभक्तियों में प्रत्यय के साथ रेफसहित अक्षर की गणना करे ॥१९०॥ ऋवर्ण में रेफरूप व्यञ्जन की प्रतीति पृथक् होती है और स्वरूप अक्षर की प्रतीति अलग होती है। यदि 'ऋ' से ऊष्मा का संयोग न हो तो उस ऋकार को लघु अक्षर जाने ॥१९१॥ जहाँ ऊष्मा (शकार आदि) से संयुक्त होकर ऋकारपीडित होता है, उस ऋवर्ण को ही स्वर होने पर भी गुरु समझना चाहिए। यहाँ 'तृचम् उदाहरण है। (यहाँ ऋकार लघु है) ॥१९२॥ ऋषभ, गृहीत, बृहस्पति, तथा निर्ऋति--इन पाँच शब्दों में ऋकार स्वर ही है, इसमें संशय नहीं है ॥१९३॥ श, ष, स, ह, र-ये जिसके आदि में हो, ऐसे पद में द्विपद सन्धि होने पर कहीं 'इ' और 'उ' से रहित एकपदा स्वरभक्ति होती है, वह क्रमवियुक्त होती है ॥१९४॥ स्वरभक्ति दो प्रकार की कही गई है--ऋकार तथा रेफ। उसे अक्षर-चिन्तकों ने क्रमशः 'स्वरोदा' और 'व्यञ्जनोदा' नाम दिया है ॥१९५॥ श, ष, स के विषय में स्वरोदया एवं विवृता स्वरभक्ति मानी गई है और हकार के विषय में विद्वान् लोग व्यञ्जनोदया एवं संवृता स्वरभक्ति निश्चित करते हैं। (दोनों के क्रमशः उदाहरण हैं-- 'ऊर्षांत, अर्हति) ॥१९६॥ स्वरभक्ति का प्रयोग करने वाला पुरुष तीन दोषों को त्याग दे--इकार, उकार तथा ग्रस्त दोष। जिससे परे संयोग हो और जिससे परे छ हों, जो विसर्ग से युक्त हो, द्विमात्रिक (दीर्घ) हो अवसान में हो, अनुस्वार हो तथा घुङन्त हो--ये सब लघु नहीं माने जाते ॥१९७-१९८॥ पथ्या (आर्या) छन्द के प्रथम और तृतीय पाद बारह मात्रा के होते हैं। द्वितीय पाद अठारह मात्रा का होता है। यह पथ्या का लक्षण बताया गया है; जो इससे भिन्न है, उसका नाम विपुला है ॥१९९॥ अक्षर में जो ह्रस्व है, उससे परे यदि संयोग न हो तो उसको 'लघु' संज्ञा होती है। यदि ह्रस्व से परे संयोग हो तो उसे गुरु समझे तथा दीर्घ अक्षरों को भी गुरु जाने ॥२००॥ जहाँ स्वर के आते ही विवृत्ति देखी जाती हो, वहाँ गुरु स्वर जानना चाहिए; वहाँ लघु की सत्ता नहीं है। पदों के जो स्वर हैं, उनके आठ प्रकार जानने चाहिए--

पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३५१ अन्तोदात्तमाद्युदात्तमुदात्तमनुदात्तं नीचस्वरितम् । मध्योदात्तं स्वरितं द्विरुदात्तमित्येता अष्टौ पदसंज्ञाः ॥१२०३॥ अग्निः सोमः प्रवो वीर्यं हविषा स्वर्वंनस्पतिः । अंतर्मध्यमयोताम्युदमनुनिपात्य आद्यात्स्वरितमुपसर्गे द्विनौ च- माख्यात इति स्वरितात्पराणि यानि स्युर्धार्याक्षराणि तु । सर्वाणि प्रचयस्थान्युपोदात्तं निहन्यते ॥१२०४॥ प्रचयो यत्र दृश्येत तत्र हन्यात्स्वरं बुधः । स्वरितः केवलॊ यत्र मृदुस्तत्र निपातयेत् ॥१२०५॥ पंचविधमाचार्यकं नाम मुखं न्यासः करणं प्रतिज्ञोच्चारणा । अत्रोच्यते श्रेयः खलु वैश्याः- प्रतिज्ञातोच्चारणा यस्य कस्यचिद्वर्णस्य करणं नोपलभ्यते प्रतिज्ञा तत्र वोढव्याकरणं हि तदात्मकम् ॥१२०६॥ तुंबुरुर्भवद्विशिष्टविश्वावस्वादयश्च गंधर्वाः । सामसु निभृतं करणं स्वरसौक्ष्म्यान्नैव जानीयुः ॥१२०७॥ कौक्षेयाग्निं सदा रक्षेत्पथ्याशनं हेतुम् । जीर्णे हारः बुद्धः खलुषसिन्ब्रह्म चिंतयेत् ॥१२०८॥ शरदद्विषुवतोतीतादुषस्युत्थानमिष्यते । यावद्वासंतिकी रात्रिर्मध्यमा पयुपस्थिता ॥१२०६॥ आम्रपलाशबिल्वानांमपामार्गशिरीषयोः । वाग्यतः प्रातरुत्थाय भक्षयेद्दंतधावनम् ॥१२१०॥ खादिरश्च कदम्बश्च करवीरकरंजयॊः । सर्वे कंटकिनः पुण्याः क्षीरिणश्च यशस्विनः ॥१२११॥

अन्तोदात्त, आद्युदात्त, उदात्त, अनुदात्त, नीच स्वरित, मध्योदात्त, स्वरित तथा द्विरुदात्त—ये आठ पद संज्ञायें हैं ॥१२०१-२०३॥ 'अग्निर्वृत्राणि' इसमें 'अग्निः' अन्तोदात्त है । 'सोमः पवते' इसमें 'सोमः' आद्युदात्त है । 'प्र वो ह॒वम्' इसमें 'प्र' उदात्त और 'व' अनुदात्त है, 'हविषा विधेम' इसमें 'हविषा' मध्योदात्त है। 'भूर्भुवः स्वः' इसमें 'स्वः' स्वरित है । 'वनस्पतिः' में 'व' कार और 'स्प' दो उदात्त होने से यह द्विरुदात्त का उदाहरण है । नाम में अन्तर एवं मध्य में उदात्त होता है । निपात में अनुदात्त होता है । उपसर्ग में आद्य स्वर से परे स्वरित होता है तथा आख्यात में दो अनुदात्त होते हैं । स्वरित से परे जो धार्य अक्षर हैं (यथा 'निहोता सत्सि' इसमें 'ता' स्वरित है, उससे परे 'सत्सि' ये धार्य अक्षर हैं ), वे सब प्रचयस्थान हैं; क्योंकि 'स्वरित' प्रचित होता है । वहां आदिस्ररित का निघात स्वर होता है ॥१२०४॥ जहां प्रचय देखा जाय, वहां विद्वान् पुरुष स्वर का निघात करे । जहां केवल मृदु स्वरित हो, वहां निघात न करे ॥१२०५॥ आचार्य-कर्म पांच प्रकार का होता है—मुख, न्यास, करण, प्रतिज्ञा तथा उच्चारण । इस विषय में कहते हैं, सप्रतिज्ञ उच्चारण ही श्रेय है । जिस किसी भी वर्ण का करण (शिक्षादि शास्त्र ) नहीं उपलब्ध होता हो, वहाँ प्रतिज्ञा (गुरु परम्परागत निश्चय) का निर्वाह करना चाहिए । क्योंकि करण प्रतिज्ञा रूप ही है ॥१२०६॥ नारद ! तुम, तुम्बुरु, वसिष्ठजी तथा विश्वावसु आदि गन्धर्व भी साम के विषय में शिक्षा शास्त्रोक्त सम्पूर्ण लक्षणों को स्वर की सूक्ष्मता के कारण नहीं जान पाते ॥१२०७॥ जठराग्नि की सदा रक्षा करे । हितकर (पथ्य) भोजन करे । भोजन पच जाने पर उषाकाल में नींद से उठ जाय और ब्रह्म का चिन्तन करे । शरत्काल में जो विषुवद्योग (जिस समय दिन-रात बराबर होते हैं) आता है, उसके बीतने के बाद जब तक वसन्त ऋतु की मध्यम रात्रि उपस्थित न हो जाय तब तक वेदों के स्वाध्याय के लिए उषाकाल में उठना चाहिए ॥१२०८-२०६॥ आम, पलाश, अपामार्ग (चिचिड़ा) और शिरीष की दतौन को प्रातः काल उठकर मौन हो करना चाहिए । खैर, कदम्ब, करवीर, करंज सब कांटेदार वृक्षों की दतौन पुण्य देने वाली और दूध वाले वृक्षों की

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३५२ नारदीयपुराणम् तेनास्य करणे सौक्ष्म्यं माधुर्यं चोपजायते । वर्णांश्च कुरुते सम्यक्प्राचीनोदवतिर्यथा ॥१२१०॥ त्रिफलां लवणाख्येन भक्षयेच्छिष्यकः सदा । अग्निमेधाजनन्येषा स्वरवर्णकरी तथा ॥१२११॥ कृत्वा चावश्यकान्धर्मान्माञ्जाठरं पर्युपास्य च । पीत्वा मधु घृतं चैव शुचिर्भूत्वा ततो वदेत् ॥१२१४॥ मन्द्रेणोपक्रमेत्पूर्वं सर्वशाखास्वयं विधिः । सप्तमंत्रानतिक्रम्य यथेष्टां वाचमुत्सृजेत् ॥१२१५॥ न तां समीरयेद्वाचं न प्राणमुपरोधयेत् । प्राणानामुपरोधेन वैस्वर्यं चोपजायते । स्वरव्यंजनमाधुर्यं लुप्यते नात्र संशयः ॥१२१६॥ कुतीर्थादागतं दग्धमपवर्णैश्च भक्षितम् । न तस्य परमोक्षोऽस्ति पपाहिरिव किल्बिषात् ॥१२१७॥ सुतीर्थादागतं जग्धं स्वाम्नातं सुप्रतिष्ठितम् । सुस्वरेण स्ववक्त्रेण प्रयुक्तं ब्रह्म राजति ॥१२१८॥ न करालो न लंबोष्ठो न च सर्वानुनासिकः ॥१२१९॥ गद्गदो बद्धजिह्वश्च प्रयोगान्वक्तुमर्हति एकचित्तो निरुद्धांतः स्नातो गानविवर्जितः । स तु वर्णान्प्रयुंजीत दंतोष्ठं यस्य शोभनम् ॥१२२०॥ पञ्च विद्यां न गृह्णंति चंडा स्तब्धाश्च ये नराः । अलसाश्च सरोगश्च येषां च विसृतं मनः ॥१२२१॥ शनैर्विद्यां शनैरर्थानारोहेत्पर्वतं शनैः । शनैरध्वसु वर्तेत योजनानां परं व्रजेत् ॥१२२२॥ योजनानां सहस्रं तु शनैर्याति पिपीलिका । अगच्छन्वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति ॥१२२३॥ दतुअन यश देने वाली होती है। दतोन करने से वाणी में सूक्ष्मता और स्वर में मधुरता उत्पन्न होती है। वह वर्णों का स्पष्ट उच्चारण कर लेता है। जैसो कि प्राचीनोदवति आचार्य की मान्यता है ॥१२१०-१२११॥ सदा कुशल शिष्य नमक से त्रिफला को खाये। इसके सेवन से जठराग्नि और मेधा-शक्ति उद्दीप्त होती है; स्वर और वर्णोच्चारण में मृदुता आती है ॥१२१३॥ आवश्यक कार्यों को करके और भोजन से निवृत्त होकर मधु पान करना चाहिए। तदनन्तर घी पीकर पवित्र होकर वेदाध्ययन या गाना प्रारम्भ करना चाहिए ॥१२१४॥ पहले मन्द्र स्वर से प्रारम्भ करना चाहिए, यहो विधि प्रत्येक शाखाओं में कही गई है। सात मन्त्रों के पाठ के बाद इच्छानुकूल वाणी उच्चारण करना चाहिए ॥१२१५॥ उस समय वाणी पर किसी प्रकार की बाधा अथवा श्वासरोध नहीं करना चाहिए, ऐसा करने से स्वर भंग हो जाता है और स्वर-व्यंजन का जो माधुर्य है वह नष्ट हो जाता है ॥१२१६॥ कुतीर्थ से प्राप्त हुई दग्ध (अपवित्र) वस्तु को जो दुर्जन पुरुष खा लेते हैं, उनका उसके दोष से उद्धार नहीं होता--ठीक उसी तरह, जैसे पाप रूप सर्प के विष से जीवन की रक्षा नहीं हो पाती । इसी प्रकार कुतीर्थ (बुरे अध्यापक) से प्राप्त हुआ जो दग्ध (निष्फल) अध्ययन है, उसे लोग अशुद्ध वर्णों के उच्चारणपूर्वक भक्षण (ग्रहण) करते हैं, उनका पाप रूपी सर्प की भाँति पापी उपाध्याय से मिले हुए उस कुत्सित अध्ययन के दोष से छुटकारा नहीं होता ॥१२१७॥ उत्तम आचार्य से प्राप्त अध्ययन को ग्रहण करके अच्छी तरह अभ्यास में लाया जाय तो वह शिष्य में सु-प्रतिष्ठित होता है और उसके द्वारा सुन्दर मुख एवं शोभन स्वर से उच्चारित वेद की बड़ी शोभा होती है ॥१२१८॥ विकराल मुखवाला, लम्बोष्ठ, नाक से बोलने वाला, हकलाने वाला और रुँधे गले वाला व्यक्ति शब्दों का भली भाँति उच्चारण नहीं कर सकता ॥१२१९॥ एकाग्र होने वाला, नियमपूर्वक स्नान करने वाला, जिसका अन्तःकरण वश में हो, जो गाता नहीं और जिसके दांत और ओठ सुन्दर हों वे ही वर्णों का भली भाँति उच्चारण कर सकते हैं ॥१२२०॥ क्रोधी डरपोक, आलसी, रोगी और जिनका मन इधर-उधर लगा है, ये पाँच प्रकार के मनुष्य विद्या प्राप्त करने के योग्य नहीं हैं ॥१२२१॥ विद्या अध्ययन, धनोपार्जन और पर्वतारोहण धीरे-धीरे करना चाहिए। मार्ग में भी धीरे-धीरे चलना चाहिए। एक योजन से अधिक नहीं चलना चाहिए ॥१२२२॥ चींटी धीरे-धीरे चलकर सैकड़ों योजन चली जाती है परन्तु द्रुतगामी गरुड़ न चलने से एक पग भी आगे नहीं जा

पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३५३ नहि पापहता वाणी प्रयोगान्वक्तुमर्हति । बधिरस्येव जल्पस्य विदग्धा वामलोचना ॥२२४॥ उपांशुचरितं चैव योऽधीते वित्रसन्निव । अपि रूपसहस्रेण संदेहेष्वेव वर्तते ॥२२५॥ पुस्तकप्रत्ययाद्धातं नाधीतं गुरुसन्निधौ । राजते न सभामध्येजारगर्भेव कामिनी ॥२२६॥ अञ्जनस्य क्षयं दृष्ट्वा वल्मीकस्य तु संचयम् । अवन्ध्यं दिवसं कुर्यान्नाध्ययनकर्मसु ॥२२७॥ यत्कीटैः पांशुभिः श्लक्ष्णैर्वल्मीकः क्रियते महान् । न तत्र बलसामर्थ्यमुद्योगस्तत्र कारणम् ॥२२८॥ सहस्रगुणिता विद्या शतशः परिकीर्तिता । आगमिष्यति जिह्वाग्रे स्थला न्निम्नमिवोदकम् ॥२२९॥ हयानामिव जात्यानामर्द्ध रात्राद्धंशायिनाम् । नहि विद्यार्थिनां निद्रा चिरं नेत्रेषु तिष्ठति ॥२३०॥ न भोजनविलंबी स्यान्न च नारीनिबंधनः । समुद्रमपि विद्यार्थी व्रजेद्गरुडहंसवत् ॥२३१॥ अहिरिव गणाद्भीतः साहित्यान्नरकादिव । राक्षसीभ्य इव स्त्रीभ्यः स विद्यामधिगच्छति ॥२३२॥ न शठाः प्राप्नुवन्त्यर्थान्न क्लीवा न च मानिनः । न च लोकरवा दीना न च श्वःश्वःप्रतीक्षकाः ॥२३३॥ यथा खननखनित्रेण भूतलं वारि विदति । एवं गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥२३४॥ गुरुशुश्रूषया विद्या पुष्कलेन धनेन वा । अथवा विद्यया विद्या ह्यन्यथा नोपपद्यते ॥२३५॥

सकता ॥२२३॥ भली भाँति उच्चारण न करने से वाणी उचित अर्थों का बोध उसी प्रकार नहीं करा सकती है, जिस प्रकार बहिरे पति को वामलोचना का मधुर प्रेमालाप कुछ भी भाव बोध नहीं करा सकता ॥२२४। जो डरा हुआ सा धीरे-धीरे पढ़ता है वह हजार आवृत्ति करने पर भी सन्देह में ही पड़ा रहता है ॥२२५॥ जो गुरु से न पढ़कर केवल अपने मन से पुस्तकों का अध्ययन करता है वह पंडितों की सभा में उसी प्रकार शङ्कित रहता है जिस प्रकार जार पति से गर्भ धारण करने वाली स्त्री ॥२२६॥ प्रतिदिन व्यय किये जाने पर अंजन को पर्वतराशि का भी क्षय हो जाता है ओर दोमकों के द्वारा थोड़ी-थोड़ी मिट्टी के संग्रह से भी बहुत ऊँचा वल्मीक बन जाता है, इस दृष्टान्त को सामने रखते हुए मनुष्य को दिन रात, अध्ययन और कर्त्तव्य में श्रम करना चाहिए । छोटे-छोटे कीड़े इतने बड़े वल्मीक को बना देते हैं तो क्या इसमें उनका बल कारण है ? नहीं, केवल उद्योग हो कारण है ॥२२७-२२८॥ विद्या का सहस्र वार पाठ करने से और सो बार आवृत्ति करने से वह पाठक की जिह्वा पर उसी प्रकार स्वयं चली आती है जिस प्रकार जल ढालू या नीची भूमि पर ॥२२९॥ विद्या प्रेमी को उत्तम जाति के घोड़े के समान आधीरात के आधे भाग तक अर्थात् एक पहर सोना चाहिए । विद्यार्थियों की आँखों पर निद्रा चिर काल तक नहीं रहती है ॥२३०॥ विद्यार्थी को भोजन में विलम्ब नहीं करना चाहिए और न तो नारी में आसक्त होना चाहिए । विद्यार्थी गरुड़ और हंस की भाँति विद्योपार्जन के लिए समुद्र तक चला जाय ॥२३१॥ वह समूह से सर्प को भाँति डरे और शृङ्गार चर्चा (या दोस्ती बढ़ाने) को नरककुण्ड के समान समझे । इसी प्रकार जो स्त्रियों को राक्षसी की भाँति समझकर दूर से ही त्याग देता है वही विद्या प्राप्त करता है ॥२३२॥ दुष्ट व्यक्ति विद्योपार्जन या धनोपार्जन नहीं कर सकता और न तो नपुंसक (कायर) या अभिमानी ही सफल मनोरथ होते हैं । लोकापवाद से डरने वाले या लोक निन्दित और भाग्य के भरोसे रहने वाले, हमेशा कल को प्रतीक्षा करने वाले कभी भी विद्या नहीं प्राप्त कर सकते ॥२३३॥ जिस प्रकार खन्ती से भूतल को खोदता हुआ खनक पानी अवश्य प्राप्त कर लेता है उसी प्रकार गुरु की शुश्रूषा करने वाला शिष्य गुरु से विद्या प्राप्त कर लेता है ॥२३४॥ विद्या गुरुशुश्रूषा, प्रचुर सम्पत्ति और परस्पर विद्या के दान-आदान से ही प्राप्त होती है; इनके अतिरिक्त विद्या ४५ ना० पु०

३५४ नारदीयपुराणम् शुश्रूषारहिता विद्या यद्यपि मेधागुणैः समुपयाति । वन्ध्येव यौवनवती न तस्य साफल्यवती भवति ॥२३६॥ इति दिङ्मात्रमुद्दिष्टं शिक्षाग्रंथं मया तव । ज्ञात्वा वेदांगमात्रं तु ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥२३७॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५०॥

अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः अथातः संप्रवक्ष्यामि कल्पग्रंथं मुनीश्वर । यस्य विज्ञानमात्रेण स्यात्कर्मकुशलो नरः ॥१॥ नक्षत्रकल्पो वेदानां संहितानां तथैव च । चतुर्थः स्यादांगिरसः शांतिकल्पश्च पंचमः ॥२॥ नक्षत्राधीश्वराख्यातं विस्तरेण यथातथम् । नक्षत्रकल्पे निर्दिष्टं ज्ञातव्यं तदिहापि च ॥३॥ वेदकल्पे विधानं तु ऋगादीनां मुनीश्वर । धर्मार्थकाममोक्षाणां सिद्धयै प्रोक्तं सविस्तरम् ॥४॥ मंत्राणामृषयश्चैव छंदांस्यथ च देवताः । निर्दिष्टाः संहिताकल्पे मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥५॥ तथैवांगिरसे कल्पे षट्कर्माणि सविस्तरम् । अभिचारविधानेन निर्द्दिष्टानि स्वयंभुवा ॥६॥

प्राप्ति के दूसरे साधन नहीं हैं ॥२३५॥ यद्यपि गुरु शुश्रूषा के बिना भी विद्या मेधा के प्रभाव से मनुष्य को प्राप्त हो जाती है, परन्तु बन्ध्या युवती के समान वह सफल नहीं होती है । इस प्रकार मैंने संकेत रूप में शिक्षा ग्रन्थ की यहाँ चर्चा की है। इस आद्य वेदांग को जान कर मनुष्य ब्रह्म (ज्ञान) प्राप्त करता है ॥२३६-२३७॥ श्रीनारदीय महापुराण में पचासवाँ अध्याय समाप्त ॥५०॥

अध्याय ५१ वेद के द्वितीय अंग कल्प, गणेशपूजन, ग्रहशान्ति तथा श्राद्ध का निरूपण मुनीश्वर ! अब इसके बाद कल्प-ग्रन्थ का वर्णन कर रहा हूँ, जिसके ज्ञान मात्र से मनुष्य कर्म-कुशल हो जाता है ॥१॥ कल्प पाँच प्रकार के माने गये हैं--नक्षत्र कल्प, वेद.कल्प, संहिता कल्प आंगिरस चौथा और शान्ति कल्प पाँचवाँ है ॥२॥ विस्तारपूर्वक यथार्थ रूप से नक्षत्राधिपति का आख्यान नक्षत्र कल्प में कहा गया है। उसी को यहाँ कह रहा हूँ, जो प्रत्येक विप्र के लिए जानने योग्य है ॥३॥ मुनीश्वर ! वेद कल्प में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि के लिए ऋग्यजुस् और साम आदि वेदों के विधान को विस्तार के साथ कहा गया है ॥४॥ तत्त्वदर्शी मुनियों ने संहिता कल्प में मन्त्रों के ऋषियों, छन्दों और देवताओं का निर्देश किया है ॥५॥ उसी प्रकार आंगिरस कल्प में स्वयम्भू ने मारण, मोहन, उच्चाटण आदि अभिचार विधान से षट्कर्मों का वर्णन किया है ॥६॥

शांतिकल्पे तु दिव्यानां भौमानां मुनिसत्तम । तथांतरिक्षोत्पातानां शांतयो ह्युदिताः पृथक् ॥७॥ संक्षेपेणैतदुद्दिष्टं लक्षणं कल्पलक्षणे । विशेषः पृथगेतेषां स्थितः शंखांतरेषु च ॥८॥ गृह्यकल्पे तु सर्वेषामुपयोगितयाऽधुना । वक्ष्यामि ते द्विजश्रेष्ठ सावधानतया श्रृणु ॥६॥ ओंकारश्चाथ शब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा । कंठं भित्वा विनिर्यातो तस्मान्मांग्ल्यकाविमौ ॥१०॥ कृत्वा प्रोक्तानि कर्माणि तदूर्द्धानि करोतियः । सोऽथशब्दं प्रयुंजीत तदानंत्यार्थमिष्यते ॥११॥ कुशाः परिसमूह्याय व्यस्तशाखाः प्रकीर्तिताः । न्यूनाधिका निष्फलाय कर्मणोऽभिमतस्य च ॥१२॥ कृमिकीटपतंगाद्या भ्रमंति वसुधातले । तेषां संरक्षणार्थाय प्रोक्तं परिसमूहनम् ॥१३॥ रेखाः प्रोक्ताश्च यास्तिस्रः कर्तव्यास्ताः समा द्विज । न्यूनाधिका न कर्त्तव्या इत्येव परिभाषितम् ॥१४॥ मेदिनी मेदसा व्याप्ता मधुकैटभदैत्ययोः । गोमयेनोपलेप्येयं तदर्थमिति नारद ॥१५॥ वंध्या दुष्टा च दीनांगी मृतवत्सा च या भवेत् । यज्ञार्थं गोमयं तस्या नाहरेदिति भाषितम् ॥१६॥ ये भ्रमंति सदाऽऽकाशे पतंगाद्या भयंकाराः । तेषां प्रहरणार्थाय मतं प्रोद्धरणं द्विज ॥१७॥ स्रुवेण च कुशेनापि कुर्यादुल्लेखनं भुवः । अस्थिकंटकसिद्धयर्थं ब्रह्मणा परिभाषितम् ॥१८॥ आपो देवगणाः सर्व तथा पितृगणा द्विज । तेनाद्भिरक्षणं प्रोक्तं मुनिभिर्विधिकोविदैः ॥१९॥ अग्नेरानयनं प्रोक्तं सौभाग्यस्त्रीभिरेव च । शुभदे मृण्मये पात्रे प्रोक्ष्याद्भिमस्तं निधापयेत् ॥२०॥

मुनिवर्य ! शान्ति कल्प में दिव्य, भौम और अन्तरिक्ष सम्बन्धी उत्पात की शान्ति के विधान हैं ॥७॥ संक्षेप में मैंने कल्प और उनके लक्षणों को कहा है। इनके सम्बन्ध में विशेष ज्ञान की बातें अन्य शाखाओं में कही गई हैं ॥८॥ द्विजश्रेष्ठ ! सबके उपकार और उपयोग की दृष्टि से गृह्यकल्प की उपयोगी बातों को कह रहा हूँ, उसको सावधान होकर सुनो ॥९॥ सृष्टि के आदि में ब्रह्मा के कण्ठ से ओंकार और अथ ये दो शब्द निकले। इसलिये दोनों ही मांगलिक शब्द माने जाते हैं ॥१०॥ जो अपने कल्प-प्रोक्त कर्मों को समाप्त कर पुनः आगे भी कर्म करना चाहता है वह अवश्य अथ-शब्द का प्रयोग करे। ऐसा करने से वह अनन्त फल को प्राप्त करता है ॥११॥ परिसमूहन के लिए परिगणितकुशों की शाखा बनानी चाहिए। इसमें न्यूनता या अधिकता करने से अभीष्ट कर्म निष्फल हो जाते हैं ॥१२॥ कीड़े-मकोड़े और पतङ्ग आदि पृथिवी पर घूमते रहते हैं। उनकी रक्षा के लिए परि- समूहन कर्म करना चाहिए ॥१३॥ द्विज, जिन तीन रेखाओं को खींचने को कहा है, उनको बराबर बनाना चाहिए। वे न्यून या अधिक न हों, ऐसी ही शास्त्रों की आज्ञा है ॥१४॥ नारद ! यह पृथ्वो दैत्य मधु कैटभ को चर्बी से लिप्त है, अतः उसको गोबर से लीपकर शुद्ध कर लेना चाहिए ॥१५॥ परन्तु बन्ध्या, दुष्ट, दुबली और मृतवत्सा गाय का गोबर यज्ञ के कामों में नहीं लाना चाहिए ॥१६॥ द्विज ! सर्वदा आकाश में जो भयंकर कीट-पतंग उड़ा करते हैं उनको दूर करने लिए प्रोद्धरण किया जाता है ॥१७॥ ब्रह्मा ने बतलाया है कि हड्डी और कांटों का शोधन करने के लिए स्रुव अथवा कुश के मूल से पृथ्वो पर रेखा खींचनी चाहिए ॥१८॥ द्विज ! सब देवता और पितर जल- रूप हैं इसलिए विधिज्ञ मुनियों ने जल सिंचन करने के लिए कहा है ॥१९॥ सौभाग्यशाली स्त्रियों के द्वारा ही अग्नि का आनयन शुभदायक मिट्टी के पात्र में होना चाहिए । सबसे पहले उस आनीत पात्र अग्नि का जल से प्रोक्षण कर तदुपरान्त यज्ञ कुण्ड में रखना चाहिए ॥२०॥ ब्रह्माआदि सब देवताओं ने अमृत का क्षय

३५६ नारदीयपुराणम् अमृतस्य क्षयं दृष्ट्वा ब्रह्माद्यैः सर्वदैवतैः । वेद्यां निधापितस्तस्मात्समिद्गर्भो हुताशनः ॥२१॥ दक्षिणस्यां दानवाद्याः स्थिता यज्ञस्य नारद । तेभ्यः संरक्षणार्थाय ब्रह्माणं तद्दिशि न्यसेत् ॥२२॥ उत्तरे सर्वपात्राणि प्रणीताद्यानि पश्चिमे । यजमानः पुर्वतः स्युर्द्विजाः सर्वेऽपि नारद ॥२३॥ द्यूते च व्यवहारे च यज्ञकर्मणि चेद्भवेत् । कर्तोदासीनचित्तस्तत्कर्म नश्येदिति स्थितिः ॥२४॥ ब्रह्माचार्यौ स्वशाखौ हि कर्त्तव्यौ यज्ञकर्मणि । ऋत्विजां नियमो नास्ति यथालाभं समर्च्चयेत् ॥२५॥ द्वे पवित्रे द्व्यंगुले स्तः प्रोक्षिणी चतुरंगुला । आज्यस्थाली त्र्यंगुलाथ चरुस्थाली षडंगुला ॥२६॥ द्वद्यंगुलं तूपयमनमेकं संमार्जनांगुलम् । स्रुवं षडंगुलं प्रोक्तं स्रुचं सार्द्धत्रयांगुलम् ॥२७॥ प्रादेशमात्राः समिधः पूर्णपात्रं षडंगुलम् । प्रोक्षिण्या उत्तरे भागे प्रणीतापात्रमष्टभिः ॥२८॥ यानि कानि च तीर्थानि समुद्राः सरितस्तथा । प्रणीतायां समासन्नास्तस्मात्तां पूरयेज्जलैः ॥२९॥ वेदिका वस्त्रहीना च नग्ना संप्रोच्यते द्विज । परिस्तीर्य ततो दर्भैः परिदध्यादिमां बुधः ॥३०॥ इंद्रवज्रं विष्णुचक्रं वामदेवत्रिशूलकम् । दर्भरूपतया त्रीणि पवित्रच्छेदनानि च ॥३१॥ प्रोक्षणी च प्रकर्तव्या प्रणीतोदकसंयुता । तेनातिपुण्यदं कर्म पवित्रमिति कीर्तितम् ॥३२॥ आज्यस्थाली प्रकर्तव्या पलमात्रप्रमाणिका । कुलालचक्रघटितं आसुरं मृन्मयं स्मृतम् ॥३३॥ तदेव हस्तघटितं स्थाल्यादि दैविकं भवेत् । स्रुवे च सर्वकर्माणि शुभान्यप्यशुभानि च ॥३४॥ तस्य चैव पवित्रार्थं वह्नौ तापनमीरितम् । अग्रे धृतेन वैधव्ये मध्ये चैव प्रजाक्षयः ॥३५॥ देखकर समिद्गर्भ (समिधायुक्त) अग्नि को वेदी के मध्य में रखा ॥२१॥ नारद ! यज्ञ के दक्षिण भाग में राक्षस, दानव आदि रहते हैं। उनसे रक्षा के लिए उस दिशा में ब्रह्मा को स्थापित करना चाहिए ॥२२॥ नारद ! उत्तर दिशा में प्रणीता आदि सब पात्रों को रखना चाहिए। वेदी के पश्चिम ओर यजमान और पूर्व की ओर सब ब्राह्मण बैठें ॥२३॥ जुआ खेलने, व्यापार या परस्पर व्यवहार में और यज्ञ में जो कर्ता उदासीन रहता है उसका वह कर्म अवश्य नष्ट हो जाता है ॥२४॥ यज्ञ कर्म में ब्रह्मा और आचार्य को अपनी शाखा का ही होना चाहिए, ऋत्विजों के लिए कोई नियम नहीं है। यथालाभ उनकी पूजा कर यज्ञ करना चाहिए ॥२५॥ पवित्रो (कुश की बनी हुई) दो अंगुल को, प्रोक्षणी चार अंगुल की, आज्यस्थाली तीन अंगुल की और चरुस्थाली छह अंगुल की होनी चाहिए ॥२६॥ उपयमन कुशा दो अंगुल का और संमार्जन कुशा एक अंगुल का होना चाहिए। स्रुवा छह अंगुल का और किसी के मतसे साढ़े तीन अंगुल का होना चाहिए ॥२७॥ समिधा प्रादेश मात्र की और पूर्णपात्र छह अंगुल का होना श्रेयस्कर है। प्रोक्षणी के उत्तर भाग में आठ अंगुल की प्रणीता रखना चाहिए ॥२८॥ जितने तीर्थ, समुद्र और नदियां हैं वे प्रणीता में स्थित रहती हैं, अतः उसको जल से भर देना चाहिए ॥२९॥ द्विज ! वस्त्रहीन वेदी नग्न कही जाती है। इसलिए विद्वान् व्यक्ति उस वेदी को कुशों को फैलाकर ढक दे ॥३०॥ कुश के ही इन्द्रवज्र, विष्णु चक्र और शिव त्रिशूल ओर ये तीनों कुश रूप से पवित्र छेदन होते हैं ॥३१॥ प्रोक्षणी को प्रणीता के जल से संयुक्त कर देना चाहिए। इस विधि से किया हुआ कर्म अति पवित्र और पुण्यप्रद कहा गया है ॥३२॥ आज्यस्थाली एक पल की होनी चाहिए। कुम्हार के चक्के का बना मिट्टी का पात्र आसुर कहा जाता है। वही पात्र यदि हाथ का बना हो तो दैविक होता है ॥३३॥ स्रुवा में शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के कर्म रहते हैं। इसीलिए उसको पवित्र करने के लिए तपाना चाहिए, ऐसा कहा गया है ॥३४॥ स्रुवा का अगला भाग पकड़ने से स्वामी का नाश, बीच में पकड़ने से पुत्र का नाश और मूल पकड़ने से होता की मृत्यु होती है। अतएव भली भाँति विचारपूर्वक उसको पकड़ना

मूले च म्रियते होता तस्माद्ग्राह्यं विचार्य तत् । अग्निः सूर्य्यश्च सोमश्च विरिंचिरनिलो यमः ॥३६॥ स्रुवे षडेते देवास्तु प्रत्यंगुलमुपाश्रिताः । अग्निर्भोगार्थनाशाय सूर्यो व्याधिकरो भवेत् ॥३७॥ निष्फलस्तु स्मृतः सोमो विरिंचिः सर्वकामदः । अनिलो वृद्धदः प्रोक्तो यमो मृत्युप्रदो मतः ॥३८॥ संमार्जनोपयमनं कर्त्तव्यं च कुशद्वयम् । पूर्वं तु सप्तशाखं स्यात्पंचशाखं तथापरम् ॥३६॥ श्रीपर्णी च शमी तद्वत्खदिरश्च विकंकतः । पलाशश्चैव विज्ञेयाः स्रुवे चैव तथा स्रुचि ॥४०॥ हस्तोन्मितं स्रुवं शस्तं त्रिंशांगुलिकं स्रुचम् । विप्राणां चैतदाख्यातं ह्यन्येषामंगुलोनकम् ॥४१॥ शूद्राणां पतितानां च खरादीनां च नारद । दृष्टिदोषविनाशार्थं पात्राणां प्रोक्षणं स्मृतम् ॥४२॥ अकृते पूर्णपात्रे तु यज्ञच्छिद्रं समुद्भवेत् । तस्मिन्पूर्णे कृते विप्र यज्ञसंपूर्णता भवेत् ॥४३॥ अष्टमुष्टिर्भवेत्किंचित्पुष्कलं तच्चतुष्टयम् । पुष्कलानि तु चत्वारि पूर्णपात्रं विदुर्बुधाः ॥४४॥ होमकाले तु संप्राप्ते न दद्यादासनं क्वचित् । दत्तेऽतृप्तो भवेद्वह्निः शापं दद्याच्च दारुणम् ॥४५॥ आधारौ नासिके प्राक्तौ आज्यभागौ च चक्षुषी । प्राजापत्यं मुखं प्रोक्तं कटिव्र्व्याहृतिभिः स्मृता ॥४६॥ शीर्षहस्तौ च पादौ च पंचवारुणमीरितम् । तथा स्विष्टकृतं विप्र श्रोत्रे पूर्णाहूतिस्तथा ॥४७॥ द्विमुखं चैकहृदयं चतुःश्रोत्रं द्विनासिकम् । द्विशीर्षकं च षण्णेत्रं पिंगलं सप्तजिह्वकम् ॥४८॥ सव्यभागे त्रिहस्तं च चतुर्हस्तञ्च दक्षिणे । स्रुकुस्रुवौ चाक्षमाला च या शक्तिर्दक्षिणे करे ॥४६॥ त्रिमेखलं त्रिपादं च घृतपात्रं द्विचामरम् । मेषारूढं चतुःशृंगं बालादित्यसमप्रभम् ॥५०॥

चाहिए ॥३५॥ स्रुवा में एक-एक अंगुल पर अग्नि, सूर्य, सोम, ब्रह्मा, वायु और यम—ये छह देवता रहते हैं। अग्नि भोगार्थ के नाश के लिए, सूर्य रोग उत्पन्न करने के लिए, चन्द्र निष्फल कहा गया है। ब्रह्मा सब कामनाओं को सिद्ध करने के लिए स्थित रहते हैं। इसी प्रकार वायु श्रीवृद्धि करने वाले और यम मृत्युदाता हैं ॥३६-३८॥ (अतः स्रुवा को मूल भाग की ओर तीन अंगुल छोड़कर चौथे-पाँचवें अंगुल पर पकड़ना चाहिए।) संमार्जन और उपयमन नामक दो कुश बनाने चाहिए। पहला सात शाखाओं सहित रहे, परन्तु दूसरा केवल पाँच पत्तियों से ही युक्त हो ॥३९॥ स्रुव और स्रुक् श्रीपर्णी (गंभारी) शमी, खैर, विकंकत (कंटाई) और पलाश का होना चाहिए ॥४०॥ एक हाथ स्रुव और तीस अंगुल लम्बा स्रुक् प्रशस्त माने गए हैं। विप्र यजमान के लिए ऐसी विधि है अन्यों के लिए एक अंगुल का ही प्रमाण माना गया है ॥४१॥ शूद्र, पतित और गदहे आदि के दृष्टिदोष को दूर करने के लिए पात्रों का प्रोक्षण करना चाहिए ॥४२॥ पूर्णपात्र को न रखने पर यज्ञ फल में त्रुटि हो जाती है, विप्र! उसको पूर्ण कर देने पर यज्ञ पूर्ण फलदायक होता है ॥४३॥ आठ मुट्ठो का 'किञ्चित्' कहा जाता है। चार 'किञ्चित्' का 'पुष्कल' और उसके चौगुने को पूर्ण पात्र कहते हैं ॥४४॥ होमकाल आ जाने पर कहीं पर आसन नहीं देना चाहिए अर्थात् खाट आदि नहीं बिछाना चाहिए। ऐसा करने पर अग्नि अतृप्त होते और होता को दारुण शाप देते हैं। आधार (देवता को घी की आहुति देना) अग्नि देव की नासिका, आज्य भाग नेत्र, प्राजापत्य मुख, व्याहृतियां कटि, पंच वारुणी शिर, हाथ और पैर हैं। विप्र! इसी प्रकार स्विष्टकृत और पूर्णाहुति कान हैं ॥४५-४७॥ अग्नि देव द्विमुख, एक हृदय, चार कान वाले, दो नासिका, दो शिर, छः नेत्र, पिंगलवर्ण और सात जीभ वाले हैं ॥४८॥ बायें भाग की ओर तीन हाथ और दक्षिण की ओर चार हाथ हैं। दक्षिण करों में स्रुव स्रुक्, अक्षमाला और शक्ति रहती है। तीन मेखला, तीन चरणों घृतपात्र दो चँवर और चार सींगों से युक्त अग्नि देव भेड़ पर सवार रहते हैं। बाल सूर्य के समान अरुणवर्ण अग्नि यज्ञोपवीत, जटा और कुण्डल से सुशोभित रहते हैं।

३५८ नारदीयपुराणम् उपवीतसमायुक्तं जटाकुंडलमंडितम् । ज्ञात्वैवमग्निदेहं तु होमकर्मसमाचरेत् ॥५१॥ पयो दधि घृतं चैव स्नेहपक्वं तथैव च । जुहुयाद्यस्तु हस्तेन स विप्रो ब्रह्महा भवेत् ॥५२॥ यदन्नं पुरुषोऽश्नाति तदन्नं तस्य देवताः । सर्वकामसमृद्धयर्थं तिलाधिक्यं हविर्मतम् ॥५३॥ हाये मुद्रात्रयं प्रोक्तं मृगी हंसी च सूकरी । अभिचारे सूकरी स्यान्मृगी हंसी शुभात्मके ॥५४॥ सर्वांगुलोभिः क्रोडी स्याद्धंसी मुक्तकनिष्ठिका । मध्यमानामिकांगुष्ठैर्मृगी मद्रा प्रकीर्तिता ॥५५॥ पूर्वप्रमाणमाहृत्य पंचांगुलिगृहीतया । दधिमध्वाज्यसंयुक्तै ऋत्विग्भिर्जुहुयात्तिलैः ॥५६॥ कुशास्त्वनामिकाासक्ताः कार्याः स्युः पुण्यकर्मणि ॥५७॥ विनायकः कर्मविघ्नसिद्ध्यर्थं विनियोजितः । गणानामाधिपत्ये च रुद्रेण ब्रह्मणा तथा ॥५८॥ तेनोपसृष्टो यस्तस्य लक्षणानि निबोध मे । स्वमेव गाहतेऽत्यर्थं जलं मुंडांश्च पश्यति ॥५६॥ काषायवाससश्चैव क्रव्यादांश्चाधिरोहति । अंत्यजैर्गद्द भैरुष्ट्रैः सह्रैकत्रावतिष्ठते ॥६०॥ व्रजन्नपि तथात्मानं मन्यतेऽनुगतं परैः । विमना विफलांरभः संसीदत्यनिमित्ततः ॥६१॥ तेनोपसृष्टो लभते न राज्यं राजनंदनः । कुमारी न च भर्तारमपत्यं गर्भमंगना । आचार्यत्वं श्रोत्रियश्च न शिष्योऽध्ययनं तथा ॥६२॥ वणिग्लाभं न चाप्नोति कृषि चापि कृषीबलः । स्नपने तस्य कर्तव्यं पुण्येऽह्नि विधिपूर्वकम् । इस प्रकार अग्नि के रूप का परिचय प्राप्त करके ही हवन कर्म करना चाहिए ॥४९-५१॥ दूध, दही, घी और घी या तेल से पकाई हुई वस्तु को जो हाथ से उठाकर हवन करता है वह ब्राह्मण ब्रह्महत्या का भागी होता है ॥५२॥ मनुष्य जो अन्न स्वयं खाता है उसके देवता भी वही अन्न खाते हैं। परन्तु सब कामों की सिद्धि के लिए हवि में तिल की अधिकता ही श्रेयस्कर है ॥५३॥ होम में मृगी, हंसी और सूकरी ये तीन प्रकार की मुद्रायें विहित हैं। अभिचार (मारण मोहन आदि) में सूकरी मुद्रा ओर शुभ कार्यों में शेष दो मुद्रायें प्रशस्त मानी गई हैं ॥५४। सब अंगुलियों को मिला देने से सूकरी मुद्रा और मध्यमा अनामिका तथा अंगूठे को मिला देने से मृगी मुद्रा बनती है ॥५५॥ केवल कनिष्ठिका को छोड़ देने से हंसी मुद्रा बनती है। ऋत्विज पूर्व में कहे गये प्रमाण के अनुसार पाँचों अंगुलियों से निकाल कर मधु, दधि, घी से मिश्रित तिलों से हवन करें ॥५६॥ पुण्य कर्मों में कुश को अनामिका से सटाये रखे ॥५७॥ रुद्र और ब्रह्मा ने विनायक को विघ्नों के विनाश के लिए गणों का आधिपत्य दिया। विनायक से बाधा पहुँचने पर कौन-कौन उपद्रव होते हैं, उनके लक्षण मुझसे सुनो ॥५८½॥ उनके क्रुद्ध होने पर वह व्यक्ति स्वप्न में अपने को जल में डूबता हुआ देखता है। फिर मूंड मुड़ाये मनुष्यों को तथा गेरुआ वस्त्र धारण करने वाले पुरुषों को वह देखता है। कच्चा मांस खाने वाले गृध्रादि पक्षियों तथा व्याघ्र आदि पशुओं पर वह चढ़ता है। एक स्थान पर अन्त्यज, गदहे और ऊंटों के बीच अपने को पाता है ॥५९-६०॥ जब चलता है तो ऐसा जान पड़ता है मानो उसके पीछे और लोग भी आ रहे हैं। स्वयं अन्यमनस्क-सा रहता है। उसके सभी प्रयत्न विफल हो जाते और अकारण उसको असफलतायें प्राप्त हो जाती हैं ॥६१॥ विनायक के प्रकोप से राजपुत्र राज्य नहीं प्राप्त कर सकता। न तो कोई कुमारी कन्या योग्य पति ही प्राप्त कर सकती और न तो कोई गर्भिणी स्त्री पुत्र पा सकती है। इसी प्रकार कोई श्रोत्रिय आचार्य पद को, विद्यार्थी विद्या को, बनिया व्यापार में लाभ तथा कोई किसान अच्छी खेती का फल नहीं पाता है ॥६२½॥

पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३५६ गौरसर्षपकल्केन स्वस्ति वाच्या द्विजैः शुभाः ॥६३॥ अश्वस्थानाद्गजस्थानाद्वल्मीकात्संगमाद्ध्रदात् । मृत्तिकां रोचनां गंधान् गुग्गुलं चाशु निक्षिपेत् ॥६४॥ पाल्याहृता ह्येकवर्णैश्चतुर्भिः कलशैर्हदात् । चर्मण्यानुडुहे रक्ते स्थाप्यं भद्रासनं ततः ॥६५॥ सहस्राक्षं शतधारमृषिभिः पावनं कृतम् । तेन त्वामभिषिञ्चामि पावमान्याः पुनंतु ते ॥६६॥ भगं ते वरुणो राजा भगं सूर्यो बृहस्पतिः । भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो ददुः ॥६७॥ यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमंते यच्च मूर्द्धनि । ललाटे कर्णयोरक्ष्णोरापस्तुदंतु सर्वदा ॥६८॥ स्नानस्य सार्षपं तैलं स्रुवेणौदुम्बरेण तु । जुहुयान्मूर्द्धनि कुशान्सव्येन परिगृह्य च ॥६९॥ मितश्च संमितश्चैव तथा शालकटंकटौ । कूष्माण्डो राजपुत्रश्चेत्यंते स्वाहासमन्वितैः ॥७०॥ नामभिर्बलिमंत्रैश्च नमस्कारसमन्वितैः । दद्याच्चतुष्पथे सूर्ये कुशानास्तीर्य सर्वतः ॥७१॥ कृता कृलांस्तंडुलींश्च पललौदनमेव च । मत्स्यान्पक्वांस्तथैवामांन्मांसमेतावदेव तु ॥७२॥ पुष्पं चित्रं सुगंधं च सुरांच विविधांमपि । मूलकं पूरिकापूपांस्तथैवोल्लण्डजोपि च ॥७३॥ दध्यन्नं पायसं चैव गुडपिष्टं समोदकम् । एतान्सर्वानुपाहृत्य भूमौ कृत्वा ततः शिरः ॥७४॥ विनायकस्य जननीमुपतिष्ठेत्ततोऽम्बिकाम् । दूर्वासर्षपपुष्पाणां दत्त्वाध्यं पूर्णमञ्जलिम् ॥७५॥ रूपं देहि यशो देहि भगं भगवति देहि मे । पुत्रांन्देहि धनं देहि सर्वान्कामांश्च देहि मे ॥७६॥

ऐसे व्यक्ति को, जिसके ऊपर गणेश का कोप हो गया हो, किसी पुण्य तिथि के दिन विधिपूर्वक अभिषेक करना चाहिए। पहले उसके शरीर पर श्वेत सरसों का उबटन लगाना चाहिए। उस समय ब्राह्मण स्वस्ति पाठ करें ॥६३॥ अश्वशाला, गजशाला, वल्मीक (बाँबी), नदीसंगम (अथवा चौराहा) और तालाब की मिट्टी लाकर उसमें रोचन, गंध और गुग्गुल मिलावे ॥६४॥ वे और एक ही प्रकार के चार कलशों में तालाब से जल लाकर उसमें उपर्युक्त मिश्रित पदार्थ को मिला दे। फिर लाल वृषभचर्म पर भद्रासन लगाकर उस पर 'सहस्राक्ष' शतधारं ऋषिभिः पावनं कृतम् । तेन त्वामभिषिञ्चामि पावमान्याः पुनन्तु ते ।' इस मन्त्र से उसके ऊपर कलश में से जल छिड़के ॥६५-६६॥ 'राजा वरुण तुमको ऐश्वर्य दें, सूर्य, बृहस्पति, इन्द्र, वायु और सप्तर्षि तुमको ऐश्वर्य दें इस अर्थ वाले 'भगं ते वरुणो राजा...' इत्यादि मन्त्र को और 'तुम्हारे केशों में जो दुर्भाग्य है, शिर, सीमन्त, मूर्द्धा ललाट, कान और नेत्र में जो दुर्भाग्य है उसको वरुण देवता अथवा यह जल दूर करे' इस अर्थ वाले 'यत्ते के षेषु दौर्भाग्यं...' इत्यादि मंत्र को पढ़ते हुए जल से अभिषेक करने के अनन्तर गूलर के बने स्रुवा को साथ ही दाहिने हाथ में कुश पकड़ कर 'मिताय स्वाहा, संमिताय स्वाहा, शालाय स्वाहा, कटंकटाय स्वाहा, कूष्माण्डाय स्वाहा, राजपुत्राय स्वाहा' इन मन्त्रों से उस अभिषिक्त व्यक्ति के शिर पर सरसों के तेल का हवन करे अर्थात् शिर पर सरसों का तेल छोड़े ॥६७-७०॥ अनन्तर यजमान चौराहे पर और मदार के वृक्ष पर कुश चारों ओर फैला कर नमस्कार करता हुआ, नामोच्चारण और बलि मन्त्र को पढ़ता हुआ (तण्डुल पका चावल), मांस, भात मछली का पका मांस अथवा कच्चा मांस इनकी बलि दे ॥७१-७२॥ चित्र विचित्र फूल, तीन प्रकार की सुरा, मूली, पूड़ी, पूआ, धूप, माला, दही मिला अन्न, पायस, गुड़ पोठी और मिठाई इन सामग्रियों को इकट्ठा कर पृथ्वी पर शिर नवा कर विनायक, जननी-अम्बिका (गौरी) की पूजा करे और दूब, सरसों और फूलों का अञ्जलि पूर्ण अर्घ्य देकर 'हे भगवति मुझे रूप दो, यश दो, पुत्र दो, धन दो और सभी कामनाएं पूर्ण करो।' इस प्रकार भगवती दुर्गा का उपस्थान करके धूप, दीप, नैवेद्य, गन्ध, माल्य और

३६० नारदीयपुराणम् उपस्थाय शिवां दुर्गामुपतिमथार्चयेत् । धूपदीपैश्च नैवेद्यैर्गन्धमाल्यानुलेपनेः ॥७७॥ ततः शुक्लाम्बरधरः शुक्लमाल्यानुलेपनः । ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्वस्त्रयुग्मं गुरोरपि ॥७८॥ एवं विनायकं पूज्य ग्रहाँश्चैव प्रपूजयेत् । श्रीकामः शांतिकामो वा पुष्टिवृद्धयायुवीर्यवान् ॥७६॥ सूर्य्यः सोमो महीपुत्रो बुधो जीवो भृगुः शनिः । राहुकेतू नवायते स्थापनीया ग्रहाः क्रमात् ॥८०॥ ताम्रकाद्रजताद्रक्तचंदनात्स्वर्णकादपि । हेम्नो रजतादयसः सीसात्कार्या शुभाप्तये ॥८१॥ स्ववर्णैर्वा पटे लेख्या गंधेमंडलिकेषु च । यथावर्णं प्रदेयानि वासांसि कुसुमानि च ॥८२॥ गंधाश्च बलयश्चैव धूपो देयश्च गुग्गुलुः । कर्तव्या मंत्रवंतश्च चरवः प्रतिदेवतम् ॥८३॥ आकृष्णेन इमं देवा अग्निमूर्द्धादिवः ककुत् । उद्वुध्यस्वाग्नि यदर्यर्णस्तथैवान्नात्परिस्रुतः ॥८४॥ शन्नोदेवीस्तथा कांडात्केतुं कृण्वन्नकेतवः ॥८५॥ अर्कः पलाशः खदिरस्त्वपामार्गोऽथपिप्पलः । उदुंबरः शमी दूर्वा कुशाश्च समिधः क्रमात् ॥८६॥ एकैकस्मादष्टशत मष्टाविंशतिरेव च । होतव्या मधुसर्पिभ्यां दध्ना क्षीरेण वा पुनः ॥८७॥ गुडौदनं पायसं च हविष्यंक्षीरषाष्टिकम् । दध्योदनं हविश्चूर्णं माषं चित्रान्नमेव च ॥८८॥ दद्याद्ग्रहक्रमादेतद्विद्वेजेभ्यो भोजनं बुधः । शक्तितोऽपि यथा लाभं सत्कृत्य विधिपूर्वकम् ॥८६॥ धेनुः शंखस्तथाऽनडुवान्हिमवासो हयः क्रमात् । कृष्णा गौरायसं छाग एता वै दक्षिणाः स्मृताः ॥६०॥ यस्य यस्य तु यद्द्रव्यं पलेनार्च्यः स तेन च । ब्रह्मणैषां वरो दत्तः पूजिताः पूजयिष्यथ ॥६१॥ अनुलेपन से भगवान् शंकर की पूजा करे। तत्पश्चात् शुक्ल वस्त्र, श्वेतमाल और अनुलेपन धारण करके ब्राह्मणों को भोजन कराकर गुरु को एक जोड़ा वस्त्र दे। इस प्रकार विनायक की पूजा करने के अनन्तर श्री, शान्ति, पुष्टि, वृद्धि तथा आयु चाहने वाला पराक्रमी व्यक्ति नवग्रहों की पूजा करे। सूर्य, सोम, मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु इन नवग्रहों की क्रमशः ताँबा, चाँदी, लाल चन्दन, स्वर्ण, हेम, रजत, लोह और सीसे की मूर्ति बनावे ॥७३-८१॥ अथवा किसी वस्त्रपर सुवर्ण अथवा गंध से मण्डल बनाकर उनमें ग्रहों की आकृति बनावे। प्रत्येक ग्रहों के वर्ण के अनुसार वस्त्र, पुष्प, गन्ध, बलय, धूप और गुग्गुल चढ़ावें और प्रति देव- ताओं के मन्त्र के अनुसार चरु प्रदान करे ॥८२-८३॥ इन ग्रहों के मन्त्र इस प्रकार हैं 'आकृष्णेन रजसा' इत्यादि मन्त्र सूर्य का' 'इमं देवा' इत्यादि मन्त्र सोम का, 'अग्निमूर्द्धा दिवः ककुत्' इत्यादि मन्त्र मंगल का 'उद्बुध्यस्व' इत्यादि मन्त्र बुध का, 'बृहस्पते अतियदर्य' इत्यादि मन्त्र वृहस्पति का 'अन्नात्परि स्रुतः' इत्यादि मन्त्र शुक्र का, शन्नो देवी 'इत्यादि मन्त्र शनि का, कांडात् इत्यादि मन्त्र राहु का, 'केतुं कृण्वन्नकेतवः' इत्यादि मन्त्र केतु का है। अर्क, पलाश, खैर, चिंचिड़ा (अपामार्ग), पीपल, गूलर, शमी, दुर्वा और कुश ये क्रमशः सूर्यादि की समिधायें हैं । ॥८४-८६॥ एक-एक से एक सो आठ बार अथवा अट्ठाईस बार मधु, घी, दही, दूध आदि से हवन करना चाहिए। पुनः क्रमशः नव ग्रहों को गुड़ मिला चावल, पायस, हविष्य, दूध मिला हुआ साठी के चावल का भात, दही भात, घी भात, तिल चूर्ण मिश्रित भात, उड़द युक्त भात, और चित्रान्न (खिचड़ी) ये वस्तुएँ ग्रह के क्रमानुसार विद्वान् व्यक्ति शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन के लिये दे, और अपनी आय के अनुसार विधिपूर्वक उनका सत्कार करके क्रमशः धेनु, शंख, बैल, सोना, वस्त्र, अश्व, काली गाय, लोहा और बकरी की दक्षिणा सूर्यादिग्रह के लिये दे ॥८७-९०॥ जिस ग्रह के लिए जो द्रव्य विहित है उसका एक पल परिमाण लेकर पूजा करनी चाहिए। ब्रह्मा ने इन ग्रहों को वर दिया है कि जो तुम्हारी पूजा करे उनकी तुम भी पूजा (मनोरथपूर्ति) करना ॥६१॥ राजाओं का विभव, वंश-वृद्धि,

एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३६१ ग्रहाधीना नरेन्द्राणां धनजात्युच्छ्रयास्तथा । भावाभावौ च जगतस्तस्मात्पूज्यतमा ग्रहाः ॥९२॥ आदित्यस्य सदा पूजा तिलक स्वामीनस्तथा । महागणपतेश्चैव कुर्वन्सिद्धिमवाप्नुयात् ॥९३॥ कर्मणा सफलत्वं च श्रियं वाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥९४॥ अकृत्वा मातृयागं तु यो ग्रहार्था समारभेत् । कुप्यंति मातरस्तस्य प्रत्यूहं कुर्वते तथा ॥९५॥ वसोः पवित्रमंत्रेण वसोद्धारां प्रकल्प्य च । गोर्याद्या मातरः पूज्या मांगल्पेषु शुभार्थिभिः ॥९६॥ गौरी पद्मा शची मेधा सावित्री विजया जया । देवसेना स्वधा स्वाहा मातृका वैघृतिर्धृतिः ॥९७॥ पुष्टिस्तुष्टिरस्तथा तुष्टिरात्मदेवतया सह । गणेशेनाधिका ह्येता वृद्धौ पूज्यास्तु षोडश ॥९८॥ आवाहनं तथा पाद्यमर्घ्यं स्नानं च चंदनम् । अक्षतांश्चैव पुष्पाणि धूपं दीपं फलानि च ॥९६॥ नैवेद्याचमनीयं च तांबूलं पूगमेव च । नीराजनं दक्षिणां च क्रमाद्दद्याच्च तुष्टये ॥१००॥ पितृकल्पं प्रवक्ष्यामि धनसंततिवर्द्धनम् । अमावश्याष्टका वृद्धिः कृष्णपक्षायनद्वयम् ॥१०१॥ द्रव्यं ब्राह्मणसंपत्तिविषुवत्सूर्यसंक्रमः । व्यतीपातो गजच्छाया ग्रहणं चंद्रसूर्ययोः ॥१०२॥ श्राद्धं प्रतिरुचिश्चैव श्राद्धकालाः प्रकीर्तिताः । अग्र्याः सर्वेषु वेदेषु श्रोत्रियो ब्रह्मविद्युवा ॥१०३॥ वेदार्थविज्ज्येष्ठसामा त्रिमधुस्त्रिसपर्णकः । स्वस्त्रीय ऋत्विग्जामाता याज्यश्वशुरमातुलाः ॥१०४॥ त्रिणाचिकेत दौहित्रशिष्यसंबंधिबांधवाः । कर्मनिष्ठास्तपोनिष्ठाः पंचाग्निब्रह्मचारिणः ॥१०५॥


राज्य की प्राप्ति और नाश यथा जगत् की जन्म-मृत्यु भी सब ग्रहों के ही अधीन है। इसलिए ग्रह सबसे अधिक पूज्य हैं ॥९२॥ सर्वदा सूर्य की पूजा महागणपति और स्वामी (स्कन्ध) की पूजा और तिलक अथवा सेवा करने से सिद्धि, कार्यों में सफलता और उत्तम श्री प्राप्त होती है। जो व्यक्ति मातृयोग के बिना ग्रह पूजा प्रारम्भ करता है उसके ऊपर मातृकाएं कुपित हो जाती हैं और विघ्न बाधायें करती हैं ॥९३-९५॥ इसलिये 'वसो पवित्र' इस मन्त्र से वसुधारा की क्रिया कर शुभाकांक्षी जन शुभ कार्यों में गौरी आदि माताओं की पूजा करें ॥९६॥ जो गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, मातृकाएँ, वैधृति, धृति, पुष्टि, हृष्टि, तुष्टि इन सोलह माताओं की अपनी कुल देवी तथा गणेश के सहित पूजा करता है उसकी श्री वृद्धि होती है। इनका आवाहन करने के अनन्तर पाद्य-अर्घ्य और स्नान के लिए जल देना चाहिए फिर चन्दन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, फल, गुड़ अर्पित कर आचमन, ताम्बूल, पुंगी-फल, नीराजन और दक्षिणा देनी चाहिए ॥९७-१००॥ अब धन और वंश की वृद्धि करने वाले पितृकल्प को कह रहा हूँ। अमावस्या, अष्टका, वृद्धि, कृष्णपक्ष, दोनों अयनों के आरंभ का दिन, श्राद्धीय द्रव्य की उपस्थिति, उत्तम ब्राह्मण की प्राप्ति, विषुवत् योग, सूर्य की संक्रांति, व्यतोपात योग, गजच्छाया, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण तथा श्राद्ध के लिए रुचि का होना—ये सभी श्राद्ध के समय अथवा अवसर कहे गए हैं। सब वेदों में अग्रणी, श्रोत्रीय, ब्रह्मज्ञानी युवक, वेदार्थज्ञ, ज्येष्ठ साम का गायक, त्रिमधु, १ त्रिसुपर्ण २ भानजा, ऋत्विक्, जामाता, यजमान, श्वशुर, मामा, त्रिणाचिकेत ३ कन्या का पुत्र (नाती) ४ शिष्य, संबन्धी, बान्धव, कर्मनिष्ठ, तपोनिष्ठ, पंचाग्नि-सेवी ५ ब्रह्मचारी ओर पिता-माता के भक्त ब्राह्मण श्राद्ध की सम्पत्ति माने गये हैं ॥१०१-१०५॥


१. 'मधुवाता' इत्यादि तीन ऋचाओं का जप और तदनुकूल व्रत का आचरण करने वाला । २. त्रिसौपर्णी ऋचाओं का अध्येता और तत्सम्बन्धी व्रत का पालन करने वाला । ३. त्रिणाचिकेतसंज्ञक त्रिविध अग्निविद्या को जानने वाला और तदनुकूल व्रत का पालक । ४. सभ्य, आवसथ्य तथा त्रिणाचिकेत--इन पांच अग्नियों का उपासक । ४६ ना० पु०

३६२ | नारदीयपुराणम् पितृमातृपराश्चैव ब्राह्मणाः श्राद्धसंपदः । रोगी न्यूनातिरिक्तांगः काणः पौनर्भवस्तथा ॥११०६॥ अवकीर्णी कुंडगोलो कुनखी श्यावदंतकः । भृतकाध्यापकः क्लीबः कन्यादूष्यभिशस्तकः ॥११०७॥ मित्रधुक् पिशुनः सोमविक्रयी परिविन्दकः । मातृपितृगुरुत्यागी कुंडाशी वृषलात्मजः ॥११०८॥ परिपूर्वापतिः स्तेनः कर्मभ्रष्टाश्च निंदिताः । निमंत्रयीत पूर्वेद्युर्ब्राह्मणान्नात्मवान् शुचिः ॥११०८½॥ तैश्चापि संयतैर्भाव्यं मनोवाक्कायकर्मभिः । अपराह्ने समभ्यर्च्य स्वागतेनागतांस्तु तान् ॥१११०॥ पवित्रपाणिराचांतानासने चोपवेशयेत् । विप्रान्दैवे यथाशक्ति पित्र्येऽयुग्मांस्तथैव च ॥११११॥ पराश्रिते शुचौ देशे दक्षिणाप्रवणं तथा । द्वौ दैवे प्राक् त्रयः पित्र्ये उदगैकैकमेव च ॥१११२॥ मातामहानामप्येवं तत्र वा वैश्वदैविकम् । पाणिप्रक्षालनं दत्त्वा विष्टरार्थं कुशानपि ॥१११३॥ आवाहयेदनुज्ञातो विश्वेदेवास इत्यृचा । यवैरन्वावकीर्याथ भाजने सपवित्रके ॥१११४॥ शन्नो देव्या अपः क्षिप्त्वा यवोऽसीति यवांस्तथा । या दिव्या इति मंत्रेण हस्ते पाद्यं विनिक्षिपेत् ॥१११५॥ दत्त्वोदकं गंधमाल्यं प्रदायान्नं सदीपकम् । अपसव्यं ततः कृत्वा पितॄणां सप्रदक्षिणम् ॥१११६॥ द्विगुणांस्तु कुशान्दत्त्वा ह्यु शंतस्त्वेत्यृचा पितॄन् । आवाह्य तदनुज्ञातो जपेदायंतु नस्ततः ॥१११७॥ रोगी, न्यून और अतिरिक्त अंग वाले, काना, पौनर्भव, अवकीर्णी (क्षतव्रत) कुण्ड, गोलक, कुनखी, श्यावदन्तक (काले दाँत वाले), भृतकाध्यापक (घर पर पैसे लेकर पढ़ाने वाले), नपुंसक, कन्या दूषक, अभिशस्तक (जिस पर व्यभिचार का दोषारोप हो), मित्रद्रोही, चुगलखोर, सोमविक्रयी, परिविन्दक (बड़े भाई के अविवाहित रहते हुए विवाह करने वाला छोटा भाई) माता-पिता और गुरु का त्याग करने वाला, कुण्ड¹ का अन्न खाने वाला, वृषल का पुत्र, पूर्व पति को छोड़कर आयी स्त्री से विवाह करने वाला, चोर और कर्मभ्रष्ट ये यज्ञ में निन्दित हैं ॥११०६-१०८½॥ श्राद्ध में एक दिन पहले ही आत्मज्ञ पवित्र श्राद्धकर्ता ब्राह्मणों को निमन्त्रण दे दे । वे निमन्त्रित ब्राह्मण भी मन, वाणी और कर्म से संयमी हों । अपराह्न काल में स्वागतपूर्वक उन आगत ब्राह्मणों को आचमन करने के बाद यजमान, पवित्र पाणि होकर आसन पर बैठावे । देव कार्य में युग्म ब्राह्मणों और पितर कार्य में यथा- शक्ति अयुग्म (विषम संख्या) ब्राह्मणों को निमंत्रित करना चाहिए ॥११०९-११११॥ सब ओर से घिरे हुए पवित्र स्थान में, दक्षिण दिशा की ओर नीची भूमि में श्राद्ध करना चाहिए । वैश्वदेव श्राद्ध में दो ब्राह्मणों को पूर्वाभिमुख और पितृ कार्य में तीन ब्राह्मणों को उत्तराभिमुख अथवा दोनों में एक-एक ब्राह्मण को ही सम्मिलित करे । इसी प्रकार मातामह के श्राद्ध और वैश्वदेव कर्म में करना उचित है । हस्त प्रक्षालन के लिए जल देकर विष्टर के लिए कुश देना चाहिए ॥१११२-११३॥ पुनः आज्ञा लेकर 'विश्वेदेवास...' इस ऋचा से आवाहन करे । पहले यव छोड़कर पवित्रक युक्त पात्र में 'शन्नो देव्या...., इस मन्त्र से जल छोड़े 'यवोऽसि'... इस मन्त्र से यव बिखेरे । 'या दिव्या आपः' इस मन्त्र से हाथ में पाद्य के लिए जल दे ॥१११४-११५॥ जल, गन्ध, माला और अन्न देकर दीपक दिखावे । तत्पश्चात् अपसव्य होकर बिना प्रदक्षिणा किये दो कुश आसन के लिए बिछाकर 'उशन्त...' इस ऋचा से पितरों का आवाहन कर उनसे आवाहित ब्राह्मण से आज्ञा लेकर 'आयन्तु नः पितर...' इस मन्त्र का जप करे । यव के स्थान पर पितृ कर्म में तिल का प्रयोग करना चाहिए, अर्घ्य आदि पूर्व की ही भाँति दे। १. अपने पति के रहते दूसरे पति से उत्पन्न किया हुआ पुत्र ।

यहाँ दिए गए पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति (Line-by-Line) निम्नलिखित है:

एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३६३ यवार्थास्तु तिलैः कार्याः कुर्यादर्घादि पूर्ववत् । दत्त्वार्घं सयवांस्तेषां पात्रे कृत्वा विधानतः ॥११७॥ पितृभ्यः स्थानमसीति न्युब्जं पात्रं करोत्यधः । अग्नौ करिष्यन्नादाय पृच्छत्यन्नं घृतप्लुतम् ॥११८॥ कुरुष्वेत्यभ्यनुज्ञातो दत्त्वाग्नौ पितृयज्ञवत् । हुतशेषं प्रदद्यात्तु भाजनेषु समाहितः ॥१२०॥ यथालाभोपपन्नेषु रौप्येषु च विशेषतः । दत्त्वान्नं पृथिवीपात्रमिति पात्राभिमंत्रणम् ॥१२१॥ कृत्वेदं विष्णुरित्यन्ते द्विजांगुष्ठं निवेशयेत् । सव्याहृतिकां गायत्रीं मधुवाता इति तृचम् ॥१२२॥ जप्त्वा यथासुखं वाच्यं भुञ्जीरंस्तेऽपि वाग्यताः । अन्नमिष्टं हविष्यं च दद्यादक्रोधनोऽत्वरः ॥१२३॥ आतृप्तेस्तु पवित्राणि जप्त्वा पूर्वजपं तथा । अन्नमादाय तृप्ताःस्थ शेषं चैवानुमान्य च ॥१२४॥ तदन्नं विकिरेद् भूमौ दद्याच्चापः सकृत्सकृत् । सर्वमन्नमुपादाय सतिलं दक्षिणामुखः ॥१२५॥ उच्छिष्टसन्निधौ पिण्डान्दद्याद्वै पितृयज्ञवत् । मातामहानामप्येवं दद्यादाचमनं ततः ॥१२६॥ स्वस्तिवाचं ततः कुर्यादक्षय्योदकमेव हि । दत्त्वा च दक्षिणां शक्त्या स्वधाकारमुदाहरेत् ॥१२७॥ वाच्यतामित्यनुज्ञातः प्रकृतेभ्यः स्वधोच्यताम् । ब्रूयुरस्तु स्वधेत्युक्ते भूमौ सिञ्चेत्ततो जलम् ॥१२८॥ विश्वेदेवाश्च प्रीयंतां विप्रैश्चोक्त इदं जपेत् । दातारो नोऽभिवर्द्धन्तां वेदाः संततिरेव च ॥१२६॥ श्रद्धा च नो मा व्यगमद्बहु देयं चनोऽस्त्विति । इत्युक्तोक्ताः प्रिया वाचः प्रणिपत्य विसर्जयेत् ॥१३०॥ वाजेवाजे इति प्रीतः पितॄन्पूर्वं विसर्जनम् । यस्मिंस्ते संश्रवाः पूर्वमर्घ्यपात्रे निवेशिताः ॥१३१॥

विधान के अनुसार पात्र में यव आदि रखकर अर्घ्य देने के अनन्तर 'पितृभ्यः स्थानमसि' इस मन्त्र से न्युब्ज पात्र को नीचे उलट दे ॥११६-११८॥ अग्नि में पृथक् अन्न को हवन करने के लिये 'अग्नौ करिष्ये' ऐसा ब्राह्मण से पूछे। 'करो' ऐसी आज्ञा पाकर पितृ यज्ञ की भाँति उस अग्नि में हवन करके, हवन से बची सामग्री को उस पात्र में एकाग्र होकर रखे और उस समय वह पात्र यथाशक्ति किसी उत्तम धातु का होना चाहिए। यदि चाँदी का हो तो उत्तम है। अन्न देकर 'पृथ्वी ते पात्रम्' इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करे ॥११९-१२१॥ ऐसा करने के बाद 'इदं विष्णुः' यह कह कर उस अन्न में ब्राह्मण के अंगूठों का स्पर्श कराये। 'व्याहृति सहित गायत्री और 'मधुव्वाता....' इस ऋचा को जपकर आदरपूर्वक उनको भोजन करने के लिए कहे। वे ब्राह्मण भी मौन होकर भोजन प्रारम्भ करें। उस समय यजमान (श्राद्धकर्ता) क्रोध और जल्दबाजी को त्यागकर शान्तिपूर्वक ब्राह्मण को प्रिय अन्न और हविष्यभोजन विधिपूर्वक परसे जब तक ब्राह्मण भोजन से तृप्त न हों तब तक 'पवित्राणि....' मंत्र को अथवा पूर्व के मन्त्रों का जप करता रहे। उन ब्राह्मणों के तृप्त हो जाने पर अथवा उनको तृप्त जानकर शेष अन्न को पृथ्वी पर बिखेर दे। और एक-एक बार जल दे। पुनः शेष बचे हुए सब अन्न को जूठो भूमि में समीप पितृ यज्ञ की भाँति पिण्ड दे ॥१२२-१२५॥ इसी प्रकार मातामहों के श्राद्ध में भी करे। तदन्तर आचमन कर स्वस्ति वाचन करे और अक्षय्योदक दे। यथाशक्ति उन ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर स्वधाकार कहे ॥१२६-१२७॥ "वाच्यताम्" ऐसी आज्ञा पाने पर "प्रकृतेभ्यः स्वधा" ऐसा कहे। 'वपूरस्तु स्वधा' यह कहने पर पृथ्वी पर जल छिड़के ॥१२८॥ जब विप्र 'विश्वेदेवाश्च प्रीयन्ताम्' कहें तो वह यजमान 'दातारो नोऽभिवर्द्धन्ताम् वेदाः सन्ततिरेव च, श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहुदेयं च नोऽस्त्विति' अर्थात् मेरे वंश में दाता, वेद के अध्ययन करने वाले, वंश को बढ़ाने वाले हों, श्रद्धा से कभी दूर न हों, हम सर्वदा श्रद्धालु रहें, हमें दान देने के लिए पर्याप्त धन हो, ऐसा कह कर प्रिय वाणी से सत्कार कर प्रणाम करके विसर्जन करे। पहले प्रसन्नतापूर्वक 'वाजे वाजे' इस मन्त्र से पितरों का विसर्जन करे। पहले जिस अर्घ्य पात्र में संश्रव का जल डाला गया था उस पात्र का उत्थापन कर विप्रों को विसर्जित करे। पुनः विप्रों की प्रदक्षिणा

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:

३६४ \hspace{150pt} नारदीयपुराणम्

पितृपात्रं तदुत्थानं कृत्वा विप्रान्विसर्जयेत् । प्रदक्षिणमनुव्रज्य भुंजीत पितृसेवितम् ॥१३२॥ ब्रह्मचारी भवेत्तां तु रजनीं ब्राह्मणैः सह । एवं प्रदक्षिणावृत्त्या वृद्धौ नांदीमुखान्वितॄन् ॥१३३॥ यजेत दधिकर्कन्धुमिश्रान्पिण्डान्यवैः कृतान् । एकोद्दिष्टं देवहीनमेवार्घ्यकपवित्रकम् ॥१३४॥ आवाहनाग्नौकरणरहितं ह्यपसव्यवतू । उपतिष्ठतामक्षय्यस्थाने विप्रविसर्जने ॥१३५॥ अभिरम्यतामिति वदेद् ब्रूयुस्तेऽभिरताः स्म ह । गंधोदकं तिलैर्युक्तं कुर्यात्पात्रचतुष्टयम् ॥१३६॥ अर्घ्यार्थं पितृपात्रेषु प्रेतपात्रं प्रसेचयेत् । ये समाना इति द्वाभ्यां शेषं पूर्ववदाचरेत् ॥१३७॥ एतत्पिण्डीकरणमेकोद्दिष्ट स्त्रिया अपि । अर्वाक्सपिण्डीकरणं यस्य संवत्सराद्भवेत् ॥१३८॥ तस्याप्यन्नं सोदकुंभं दद्यात्संवत्सरं द्विजे । मृतेऽहनि तु कर्तव्यं प्रतिमासं तु वत्सरम् ॥१३९॥ प्रतिसंवत्सरं चैव मासमेकादशेऽहनि । पिंडांश्चगोऽजविप्रेभ्यो दद्यादग्नौ जलेऽपि वा ॥१४०॥ प्रक्षिपेत्सत्सु विप्रेषुद्विजोच्छिष्टं न मार्जयेत् । हविष्यान्नेन वै मासं पायसेन तु वत्सरम् ॥१४१॥ मात्स्यहारिणकौरभ्रशाकुनच्छागपार्षतैः । ऐणरौरववाराहशशैर्मास्तैर्येनथाश्रमम् ॥१४२॥ मासवृद्ध्याभितृप्यंति दत्तैरिह पितामहाः । खड्गामिषं महाकल्पं मधु मुन्यन्नमेव च ॥१४३॥ लोहामिषं महाशाकं मांसं वार्ध्रीणसस्य च । यो ददाति गयास्थश्च सर्वमानंत्यमश्नुते ॥१४४॥


कर उनको थोड़ी दूर तक पहुँचा दे। इतनी क्रिया समाप्त कर पितृ यज्ञ निमित्त सामग्री में से स्वयं भोजन करे ॥१२६-१३२॥ उस दिन श्राद्धकर्ता और ब्राह्मण भी रात में ब्रह्मचारी रहे । इस प्रकार पुत्र-जन्म और विवाहादि के अवसर पर प्रदक्षिणावृत्ति से नान्दीमुख पितरों का यजन करे । दही और बेर मिले हुए अन्न का पिण्ड दे और सारी क्रियायें यव से करे । एकोद्दिष्ट श्राद्ध में किसी देवता की पूजा नहीं होती। केवल एक पिंड पवित्रक (कुशा) के साथ दिया जाता है ॥१३३-१३४॥ इस श्राद्ध में अपसव्य होकर आवाहन और अग्नि स्थापन नहीं किया जाता। विप्र विसर्जन के समय अक्षय्यमस्तु के स्थान में 'उप- तिष्ठताम्' ऐसा कहा जाता है । पहले विप्रों से 'अभिरम्यताम्' ऐसा कहे, यह सुनकर वे कहें कि "अभिरताः स्म" ॥१३५-३॥ पहले गंधोदक और तिल से युक्त चार पात्र रखे । अर्घ्य के लिए पितृ पात्रों में जल छोड़े और प्रेत पात्र को केवल जल से सींच दे । 'ये समाना...' इस मन्त्र से दो पात्रों में पिण्ड दे और शेष क्रिया पूर्व की भाँति करे ॥१३६-१३७॥ यह सपिण्डीकरण और एकोद्दिष्ट स्त्रियों का भी होना चाहिए । जिसका सपिण्डीकरण श्राद्ध वर्ष पूर्ण होने से पहले हुआ हो उसके लिए संवत्सर पर्यन्त जल कलश के सहित अन्न देना चाहिए । मृत्यु वाले दिन को प्रतिमास श्राद्ध करना चाहिए । यह क्रिया एक वर्ष तक होती रहे ॥१३८-१३९॥ प्रति वर्ष मृत्यु के ग्यारहवें दिन श्राद्ध करके गो या बकरी या इच्छुक विप्र को पिण्ड दे दे । अर्थात् दत्त श्राद्धपिण्ड उनको खिला दे, या अग्नि अथवा जल में फेंक दे ॥१४०॥ जब तक ब्राह्मण लोग भोजन करके वहाँ से उठ न जायें तब तक उच्छिष्ट स्थान पर झाडू न लगाये । पितर हविष्य का पिण्ड देने से एक महीने तक और पायस से एक वर्ष तक तृप्त रहते हैं ॥१४१॥ मछली, मृग, भेड़, पक्षी, बकरी, चितकवरा हरिण, सामान्य हरिण, कृष्ण मृग, वाराह, शशक इनके मांस का पिण्ड देने से पितर क्रमशः एक-एक माह की वृद्धि से अधिक काल तक तृप्त रहते हैं। जो गैंडे का मांस श्राद्ध में पितरों को देता है, उसके पितर महाकल्प पर्यन्त तृप्त रहते हैं। जो गया में पितरों को मधु, लाल बकरे के मांस, महाशाक, वार्ध्रीणस (गैंडे) का मांस का विशेषकर भाद्रपद कृष्ण को मघा का योग होने पर

एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३६५ तथा वर्षात्रयोदश्यां मघासु च विशेषतः । कन्यां कन्यावेदिनश्च पशून्वै सत्सुतानपि ॥१४५॥ द्यूतं कृषिं च वाणिज्यं द्विशकैकशफांस्तथा । ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रांत्स्वर्णरूप्ये सकुप्यके ॥१४६॥ ज्ञातिश्रैष्ठ्यं सर्वकामानाप्नोति श्राद्धदः सदा । प्रतिपत्प्रभृतिष्वेकां वर्जयित्वा चतुर्दशीम् ॥१४७॥ शस्त्रेण तु हता ये वै तेभ्यस्तत्र प्रदीयते । स्वर्ग ह्यपत्यमोजश्च शौर्यं क्षेत्रं बलं तथा ॥१४८॥ पुत्रान् श्रेष्ठांश्च सौभाग्यं समृद्धिं मुख्यतां शुभम् । प्रवृत्तं चक्रतां चैव वाणिज्यप्रभृतीनि च ॥१४९॥ अरोगित्वं यशो वीतशोकतां परमां गतिम् । धनं विद्यां भिषक्सिद्धिं कुप्यगा अप्यजाविकम् ॥१५०॥ अश्वानायुश्च विधिवद्यः श्राद्धं संप्रयच्छति । कृत्तिकादिभरण्यांतं सकामानाप्नुयादिमान् ॥१५१॥ आस्तिकः श्रद्दधानश्च व्यपेतमदमत्सरः । वसुरुद्रादितिसुताः पितरः श्राद्धदेवताः ॥१५२॥ प्रीणयंति मनुष्याणां पितॄन् श्राद्धेन तर्पिताः । आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च ॥१५३॥ प्रयच्छंति तथा राज्यं नृणां प्रीताः पितामहाः । इत्येवं कथितं किंचित्कल्पाध्याये विशेषतः ॥१५४॥ ज्ञातव्यं वैदिके तंत्रे पुराणांतरकेऽपि च । य इमं चिंतयेद्विद्वान्कल्पाध्यायं मुनीश्वर ॥१५५॥ स भवेत्कर्मकुशल इहान्यत्र गतिं शुभाम् । यः शृणोति नरो भक्त्या दैवे पित्र्ये च कर्मणि ॥१५६॥ कल्पाध्यायं स लभते दैवपित्र्यक्रियाफलम् । धनं विद्यां यशः पुत्रान्परत्र च गतिं पराम् ॥१५७॥ अतः परं व्याकरणं तुभ्यं वेदमुखाभिधम् । कथयिष्ये समासेन शृणुष्व सुसमाहितः ॥१५८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे एकपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥५१॥ पितरों को देते हैं वे अनन्त काल तक अपने इष्ट पदार्थ को पाते हैं ॥१४२-१४४॥ एक चतुर्दशी को छोड़कर प्रतिपदा से अमावस्या तक की चौदह तिथियों में श्राद्ध करने वाला व्यक्ति क्रमशः सदा रूप शीलयुक्त कन्या, बुद्धिमान् व रूपवान् दामाद, पशु, सत्पुत्र, द्यूत, कृषि, व्यापार में लाभ, दो खुर वाले पशु (गाय, बकरी), एक खुर वाले (घोड़ा आदि), ब्रह्मवर्चस्वी पुत्र, सोना, चांदी, कुप्यक (त्रपु सीसा आदि) कुल में श्रेष्ठता तथा सब इच्छानुकूल पदार्थों को प्राप्त करता है ॥१४५-१४७॥ गया में चतुर्दशी तिथि को केवल शस्त्र से मारे गए पितर के निमित्त पिण्ड दिया जाता है। जो विधिपूर्वक श्राद्ध करता है वह स्वर्ग, संतान, ओज, शौर्य, क्षेत्र, बल, श्रेष्ठ पुत्र, सौभाग्य, समृद्धि, समाज में सम्मानित पद, शुभ स्वभाव, चक्रवर्तित्व, व्यापार में लाभ, स्वास्थ्य, यश, शोकहीनता, परसगति (मुक्ति), धन, विद्या, ओषधि, प्रयोग में निपुणता, कुप्य (त्रपु-सीसा आदि) गौ, बकरी, भेड़, अश्व और दीर्घायु प्राप्त करता है। जो आस्तिक, श्रद्धालु, विनम्र और संयमी व्यक्ति कृत्तिका से भरणी नक्षत्र के अन्त तक श्राद्ध करता है वह क्रमशः उपर्युक्त पदार्थों को प्राप्त करता है। श्राद्ध से तृप्त होकर वसु, रुद्र, आदित्य, ये श्राद्ध देवता पितर मनुष्यों के पितरों को प्रसन्न करते हैं। और ऐसे मनुष्य पर पितामह प्रसन्न होकर उसको आयु, धन, प्रजा, विद्या, स्वर्ग, राज्य, मोक्ष और सुख प्रदान करते हैं ॥१४८-१५३३॥ इस प्रकार संक्षेप में मैंने इस कल्पाध्याय में कुछ कहा है। इस विषय का विशेष ज्ञान, वैदिक तन्त्रों तथा अन्य पुराणों द्वारा विशेष ज्ञान प्राप्त करना चाहिए ॥१५४ ॥ मुनीश्वर ! जो विद्वान् व्यक्ति इस कल्पाध्याय का चिन्तन करता है वह कार्य कुशल हो जाता और लोक-परलोक दोनों में शुभ गति प्राप्त करता है ॥१५५३॥ जो दैव और पितृ कर्म के समय इस कल्पाध्याय को सुनता है वह दैव और पितृ क्रिया का अशेष फल पाता है। साथ ही वह धन, विद्या, यश, पुत्र, आदि लौकिक सुखों को और मृत्यु के बाद परा गति को प्राप्त करता है ॥१५६-१५७॥ अब इसके अनन्तर तुमको वेद मुख का कहे जाने वाले व्याकरण शास्त्र का सूक्ष्म रूप में वर्णन करूँगा उसको सावधान होकर सुनना ॥१५८॥ श्रीनारदीयमहापुराण के पूर्वभाग के द्वितीय पाद में इक्यानवेवां अध्याय समाप्त ॥१५१॥

अथ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सनन्दन उवाच अथ व्याकरणं वक्ष्ये संक्षेपात्तव नारद । सिद्धरूपप्रबंधेन मुखं वेदस्य सांप्रतम् ॥१॥ सुप्तिङंतं पदं विप्र सुपां सप्त विभक्तयः । स्वौजसः प्रथमा प्रोक्ता सा प्रातिपदिकात्मिका ॥२॥ संबोधने च लिंगादावुक्ते कर्मणि कर्तरि । अर्थवत्प्रातिपदिकं धातुप shape/प्रत्ययवर्जितम् ॥३॥ अमौशशो द्वितीया स्यात्तत्कर्म क्रियते च यत् । द्वितीया कर्मणि प्रोक्तान्तरांतरेण संयुते ॥४॥ टाभ्यांभिस्तृतीया स्यात्करणे कर्तरीरिता । येन क्रियते तत्करणं स कर्ता स्यात्करोति यः ॥५॥ ङेभ्यांभ्यसश्चतुर्थी स्यात्सम्प्रदाने च कारके । यस्मै दित्सा धारयेद्वै रोचते संप्रदानकम् ॥६॥ पंचमी स्याङसिभ्यांभ्यो ह्यपादाने च कारके । यतोऽपैति समादत्ते अपदत्ते च यं यतः ॥७॥ ङसोसामश्च षष्ठी स्यात्स्वामिसंबंधमुख्यके । ङ्योस्सुपः सप्तमी तु स्यात्सा चाधिकरणे भवेत् ॥८॥ आधारे चापि विप्रेन्द्र रक्षार्थानां प्रयोगतः । ईप्सितं चानीप्सितं यत्तदपादानकं स्मृतम् ॥६॥ पंचमी पयुपाङ्‌योगे इतरर्तेंऽन्यदिङ्मुखे । एतैर्योगे द्वितीया स्यात्कर्मप्रवचनीयकैः ॥१०॥

अध्याय ५२ व्याकरण शास्त्र का वर्णन सनन्दन बोले—नारद ! अब तुमको संक्षेप में व्याकरण की शिक्षा दे रहा हूँ जो कि सिद्ध शब्दों के प्रबन्ध क्रम पूर्वक व्याख्या करने के कारण व्याकरण वेद का मुख कहा जाता है ॥१॥ विप्र ! सुबन्त और तिङन्त को पद कहते हैं। सुप् प्रत्याहार में सात विभक्तियाँ होती हैं। सु, औ, जस् प्रथमा है जो प्रातिपदिक स्वरूप मानी गयी है। यह प्रथमा विभक्ति संबोधन, लिङ्ग, वचन आदि में प्रधान कर्म और कर्त्ता में होती है। धातु और प्रत्यय से रहित अर्थवान् शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा है ॥२॥ अम्, औ, शस् द्वितीया है, और जो किया जाता है उसको कर्म कहते हैं। कर्म में और अन्तरा अन्तरेण के संयोग में द्वितीया होती है ॥३॥ टा, भ्याम्, भिस् तृतीया कहलाती है। अप्रधान कर्त्ता और करण में तृतीया होती है ॥४॥ जिससे काम किया जाता है उसको करण और जो करता है उसको कर्त्ता कहते हैं ॥५॥ ङे, भ्याम्, भ्यस् चतुर्थी है जो संप्रदान कहलाता है ॥५-६॥ ङस्-भ्याम्, भ्यस् पंचमी की विभक्तियाँ हैं जो अपादान कारक में होती हैं। जहाँ से कोई जाता है जिससे कोई वस्तु पृथक् होती है। जिससे कोई वस्तु प्राप्त होती है, उसको अपादान कहते हैं ॥७॥ ङस्, ओस्, आम् षष्ठी है जो सेवक-स्वामि-आदि संबन्ध में होती है। ङि, ओस्, सुप् सप्तमी है जो अधिकरण में होती है ॥८॥ विप्रेन्द्र ! रक्षार्थ धातुओं के प्रयोग में, ईप्सित और अनीप्सित को अपादान कहते हैं ॥६॥ परि, अप और आङ् के योग में पञ्चमी होती है। इतर, ऋत, अन्य और दिग्वाचक शब्दों के योग में पञ्चमी होती