बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 370, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३५१ अन्तोदात्तमाद्युदात्तमुदात्तमनुदात्तं नीचस्वरितम् । मध्योदात्तं स्वरितं द्विरुदात्तमित्येता अष्टौ पदसंज्ञाः ॥१२०३॥ अग्निः सोमः प्रवो वीर्यं हविषा स्वर्वंनस्पतिः । अंतर्मध्यमयोताम्युदमनुनिपात्य आद्यात्स्वरितमुपसर्गे द्विनौ च- माख्यात इति स्वरितात्पराणि यानि स्युर्धार्याक्षराणि तु । सर्वाणि प्रचयस्थान्युपोदात्तं निहन्यते ॥१२०४॥ प्रचयो यत्र दृश्येत तत्र हन्यात्स्वरं बुधः । स्वरितः केवलॊ यत्र मृदुस्तत्र निपातयेत् ॥१२०५॥ पंचविधमाचार्यकं नाम मुखं न्यासः करणं प्रतिज्ञोच्चारणा । अत्रोच्यते श्रेयः खलु वैश्याः- प्रतिज्ञातोच्चारणा यस्य कस्यचिद्वर्णस्य करणं नोपलभ्यते प्रतिज्ञा तत्र वोढव्याकरणं हि तदात्मकम् ॥१२०६॥ तुंबुरुर्भवद्विशिष्टविश्वावस्वादयश्च गंधर्वाः । सामसु निभृतं करणं स्वरसौक्ष्म्यान्नैव जानीयुः ॥१२०७॥ कौक्षेयाग्निं सदा रक्षेत्पथ्याशनं हेतुम् । जीर्णे हारः बुद्धः खलुषसिन्ब्रह्म चिंतयेत् ॥१२०८॥ शरदद्विषुवतोतीतादुषस्युत्थानमिष्यते । यावद्वासंतिकी रात्रिर्मध्यमा पयुपस्थिता ॥१२०६॥ आम्रपलाशबिल्वानांमपामार्गशिरीषयोः । वाग्यतः प्रातरुत्थाय भक्षयेद्दंतधावनम् ॥१२१०॥ खादिरश्च कदम्बश्च करवीरकरंजयॊः । सर्वे कंटकिनः पुण्याः क्षीरिणश्च यशस्विनः ॥१२११॥
अन्तोदात्त, आद्युदात्त, उदात्त, अनुदात्त, नीच स्वरित, मध्योदात्त, स्वरित तथा द्विरुदात्त—ये आठ पद संज्ञायें हैं ॥१२०१-२०३॥ 'अग्निर्वृत्राणि' इसमें 'अग्निः' अन्तोदात्त है । 'सोमः पवते' इसमें 'सोमः' आद्युदात्त है । 'प्र वो ह॒वम्' इसमें 'प्र' उदात्त और 'व' अनुदात्त है, 'हविषा विधेम' इसमें 'हविषा' मध्योदात्त है। 'भूर्भुवः स्वः' इसमें 'स्वः' स्वरित है । 'वनस्पतिः' में 'व' कार और 'स्प' दो उदात्त होने से यह द्विरुदात्त का उदाहरण है । नाम में अन्तर एवं मध्य में उदात्त होता है । निपात में अनुदात्त होता है । उपसर्ग में आद्य स्वर से परे स्वरित होता है तथा आख्यात में दो अनुदात्त होते हैं । स्वरित से परे जो धार्य अक्षर हैं (यथा 'निहोता सत्सि' इसमें 'ता' स्वरित है, उससे परे 'सत्सि' ये धार्य अक्षर हैं ), वे सब प्रचयस्थान हैं; क्योंकि 'स्वरित' प्रचित होता है । वहां आदिस्ररित का निघात स्वर होता है ॥१२०४॥ जहां प्रचय देखा जाय, वहां विद्वान् पुरुष स्वर का निघात करे । जहां केवल मृदु स्वरित हो, वहां निघात न करे ॥१२०५॥ आचार्य-कर्म पांच प्रकार का होता है—मुख, न्यास, करण, प्रतिज्ञा तथा उच्चारण । इस विषय में कहते हैं, सप्रतिज्ञ उच्चारण ही श्रेय है । जिस किसी भी वर्ण का करण (शिक्षादि शास्त्र ) नहीं उपलब्ध होता हो, वहाँ प्रतिज्ञा (गुरु परम्परागत निश्चय) का निर्वाह करना चाहिए । क्योंकि करण प्रतिज्ञा रूप ही है ॥१२०६॥ नारद ! तुम, तुम्बुरु, वसिष्ठजी तथा विश्वावसु आदि गन्धर्व भी साम के विषय में शिक्षा शास्त्रोक्त सम्पूर्ण लक्षणों को स्वर की सूक्ष्मता के कारण नहीं जान पाते ॥१२०७॥ जठराग्नि की सदा रक्षा करे । हितकर (पथ्य) भोजन करे । भोजन पच जाने पर उषाकाल में नींद से उठ जाय और ब्रह्म का चिन्तन करे । शरत्काल में जो विषुवद्योग (जिस समय दिन-रात बराबर होते हैं) आता है, उसके बीतने के बाद जब तक वसन्त ऋतु की मध्यम रात्रि उपस्थित न हो जाय तब तक वेदों के स्वाध्याय के लिए उषाकाल में उठना चाहिए ॥१२०८-२०६॥ आम, पलाश, अपामार्ग (चिचिड़ा) और शिरीष की दतौन को प्रातः काल उठकर मौन हो करना चाहिए । खैर, कदम्ब, करवीर, करंज सब कांटेदार वृक्षों की दतौन पुण्य देने वाली और दूध वाले वृक्षों की