बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३५० नारदीयपुराणम् ऋग्वर्ण्यान् स्वरभक्तिं च छन्दोमानेन निर्दिशेत् । प्रत्ययेत सहारेफमिमीते स्वरभक्तया ॥१९०॥ ऋवर्णे तु पृथग्रेफः प्रत्ययस्तु वृथा भवेत् । विद्याल्लघुमृकारं तु यदि तूष्माणसंयुतः ॥१९१॥ ऊष्मणेव हि संयुक्त ऋकारो यत्र पीड्यते । गुरुवर्णः स विज्ञेयस्तृचं चात्र निदर्शनम् ॥१९२॥ ऋषभं च गृहीतं च बृहस्पतिं पृथिव्यां च । निर्ऋतिंपंचमा ह्यत्र ऋकारा नात्र संशयः ॥१९३॥ शषसहरादौ रेफः स्वरभक्तिर्जायते द्विपदसंधौ । इउवर्णाभ्यां हीना क्वचिदेकपदाक्रमवियुक्ता ॥१९४॥ स्वरभक्तिद्विधा प्रोक्ता ऋकारे रेफ एव च । स्वरोदा व्यञ्जनोदा च विहिताक्षरचिंतकैः ॥१९५॥ शषसेषु स्वरोदयां हकारे व्यञ्जनोदयाम् । शषसेषु विवृत्तां तु हकारे संवृतां विदुः ॥१९६॥ स्वरभक्तिं प्रयुञ्जानस्त्रीन्दोषान्विरिवर्जयेत् । इकारं चाप्युकारं च ग्रस्तदोषं तथैव च ॥१९७॥ संयोगपरं छपरं विसर्जनीयं द्विमात्रकं चैव । अथ सान्तिकं च नङ्भसानुस्वारं घुटतं च ॥१९८॥ यस्याः पादः प्रथमो द्वादशमात्रस्तथा तृतीयोऽपि । अष्टादशो द्वितीयः समापन्नः पञ्चदशमात्रः । यस्या लक्षणमुक्तं या त्वन्या सा स्मृता विपुला ॥१९६६॥ अक्षराणां लघुह्रस्वमसंयोगपरं यदि । तत्संयोगोत्तरं विद्याद् गुरुदीर्घाक्षराणि तु ॥२००॥ विवृत्तिर्यत्र दृश्येत स्वारस्यैवाग्रतः स्थितः । ॥२०१॥ गुरुस्वारः सविज्ञेयः क्षैप्रस्तत्र न विद्यते । अष्टप्रकारं विज्ञेयं पदानां स्वरलक्षणम् ॥२०२॥ हैं; उन लक्षणों के अनुसार ही ऋचायें हों, यह नियम नहीं है। लौकिक छन्द ही पाद और अक्षर-गणना के अनुसार होते हैं ॥१९८॥ ऋवर्ण और स्वरभक्ति में जो रेफ है, उसे अक्षरन्तर मानकर छन्द की अक्षर-गणना या मात्रागणना में सम्मिलित करे। किन्तु स्वरभक्तियों में प्रत्यय के साथ रेफसहित अक्षर की गणना करे ॥१९०॥ ऋवर्ण में रेफरूप व्यञ्जन की प्रतीति पृथक् होती है और स्वरूप अक्षर की प्रतीति अलग होती है। यदि 'ऋ' से ऊष्मा का संयोग न हो तो उस ऋकार को लघु अक्षर जाने ॥१९१॥ जहाँ ऊष्मा (शकार आदि) से संयुक्त होकर ऋकारपीडित होता है, उस ऋवर्ण को ही स्वर होने पर भी गुरु समझना चाहिए। यहाँ 'तृचम् उदाहरण है। (यहाँ ऋकार लघु है) ॥१९२॥ ऋषभ, गृहीत, बृहस्पति, तथा निर्ऋति--इन पाँच शब्दों में ऋकार स्वर ही है, इसमें संशय नहीं है ॥१९३॥ श, ष, स, ह, र-ये जिसके आदि में हो, ऐसे पद में द्विपद सन्धि होने पर कहीं 'इ' और 'उ' से रहित एकपदा स्वरभक्ति होती है, वह क्रमवियुक्त होती है ॥१९४॥ स्वरभक्ति दो प्रकार की कही गई है--ऋकार तथा रेफ। उसे अक्षर-चिन्तकों ने क्रमशः 'स्वरोदा' और 'व्यञ्जनोदा' नाम दिया है ॥१९५॥ श, ष, स के विषय में स्वरोदया एवं विवृता स्वरभक्ति मानी गई है और हकार के विषय में विद्वान् लोग व्यञ्जनोदया एवं संवृता स्वरभक्ति निश्चित करते हैं। (दोनों के क्रमशः उदाहरण हैं-- 'ऊर्षांत, अर्हति) ॥१९६॥ स्वरभक्ति का प्रयोग करने वाला पुरुष तीन दोषों को त्याग दे--इकार, उकार तथा ग्रस्त दोष। जिससे परे संयोग हो और जिससे परे छ हों, जो विसर्ग से युक्त हो, द्विमात्रिक (दीर्घ) हो अवसान में हो, अनुस्वार हो तथा घुङन्त हो--ये सब लघु नहीं माने जाते ॥१९७-१९८॥ पथ्या (आर्या) छन्द के प्रथम और तृतीय पाद बारह मात्रा के होते हैं। द्वितीय पाद अठारह मात्रा का होता है। यह पथ्या का लक्षण बताया गया है; जो इससे भिन्न है, उसका नाम विपुला है ॥१९९॥ अक्षर में जो ह्रस्व है, उससे परे यदि संयोग न हो तो उसको 'लघु' संज्ञा होती है। यदि ह्रस्व से परे संयोग हो तो उसे गुरु समझे तथा दीर्घ अक्षरों को भी गुरु जाने ॥२००॥ जहाँ स्वर के आते ही विवृत्ति देखी जाती हो, वहाँ गुरु स्वर जानना चाहिए; वहाँ लघु की सत्ता नहीं है। पदों के जो स्वर हैं, उनके आठ प्रकार जानने चाहिए--