भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 368

पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३४६ हृद्यादुत्तिष्ठते रंगः कांस्येन तु समन्वितः । मृदुश्चैव द्विमात्रश्च दधन्वांइति निदर्शनम् ॥१७६॥ यथा सौराष्ट्रिका नारी अरां इत्यभिभाषते । एवं रंगः प्रयोक्तव्यो नारदैतन्मतं मम ॥१७७॥ स्वरा गडदबाश्चैव ङणनमाः सहोष्मभिः । चतुर्णां पदजातीनां पदांता दश कीर्तिताः ॥१७८॥ स्वरः उच्चः स्वरो नीचः स्वरः स्वरित एव च । व्यंजना न तु वर्तन्ते यत्र तिष्ठति स स्वरः ॥१७६॥ स्वरप्रवादं त्रैस्वर्यमाचार्याः प्रतिजानते । मणिवद्व्यंजनं विद्यात्सूत्रवच्च स्वरं विदुः ॥१८०॥ दुर्बलस्य यथा राष्ट्रं हरते बलवान्नृपः । दुर्बलं व्यंजनं तद्वद्धरेत बलवान्स्वरः ॥१८१॥ ओभावश्च विवृत्तिश्च शषसा रेफ एव च । जिह्वामूलमुपध्मा च गतिरष्टविधोष्मणः ॥१८२॥ स्वरप्रत्यया विवृत्तिः संहितायां तु या भवेत् । विसर्गस्तत्र मंतव्यस्तालव्यश्चात्र जायते ॥१८३॥ संध्यक्षरे परे संधौ प्राप्तलुप्तौ यवौ यदि । व्यञ्जनाख्या विवृत्तिस्तु स्वराख्या प्रतिसंहिता ॥१८४॥ ऊष्मांतं विरते यत्र संभावी भवति क्वचित् । विवृत्तिर्या भवेत्तत्र स्वराख्यां तां विनिर्दिशेत् ॥१८५॥ यत्रोभावप्रसंधानमृकारादिवरं पदम् । स्वरांतं तादृशं विद्यादन्यद्व्यक्तमूष्मणः ॥१८६॥ प्रथमा उत्तमाश्चैव पदांतेषु यदि स्थिताः । द्वितीयं स्थानमापन्नाः शवसप्रत्यया यदि ॥१८७॥ प्रथमानूष्मसंयुक्तान् द्वितीयानिव दर्शयेत् । न चैतानप्रतिजानीयाद्यथा मत्स्यः क्षुरोप्सराः ॥१८८॥ छंदोमानं च वृत्तं च पादस्थानं त्रिकारणम् । ऋचः स्वच्छंदवृत्तास्तु पादास्त्वक्षरमानतः ॥१८९॥ है, कांस्य के वाद्य की भांति उसकी ध्वनि होती है। वह मृदु तथा दो मात्रा का (दीर्घ) होता है। दधन्वां २ यह उदाहरण है। नारद ! जैसे सौराष्ट्र देश की नारी 'अरां' बोलती है उसी प्रकार 'रंग' का प्रयोग करना चाहिए- यह मेरा मत है ॥१७६-१७७॥ नाम, आख्यात, उपसर्ग तथा निपात--इन चार प्रकार के अन्त पदों में स्वरपूर्वक ग ड द ब ङ ण न म ष स-ये दस अक्षर 'पदान्त' कहे गए हैं ॥१७८॥ उदात्त स्वर, अनुदात्त स्वर और स्वरित स्वर जहाँ भी स्थित हों, व्यञ्जन उनका अनुसरण करते हैं। आचार्य लोग तीनों स्वरों की ही प्रधानता बताते हैं। व्यञ्जनों को तो मणियों के समान समझे और स्वर को सूत्र के समान ॥१७६-१८०॥ जैसे बलवान् राजा दुर्बल के राज्य को हड़प लेता है, उसी प्रकार बलवान् स्वर दुर्बल व्यञ्जन को हर लेता है ॥१८१॥ ओभाव, विवृत्ति श ष स र, जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय-ये ऊष्मा की आठ गतियां हैं। ऊष्मा (सकार) इन आठ भावों में परिणत होता है ॥१८२॥ संहिता में जो स्वर-प्रत्यया विवृत्ति होती है, वहां विसर्ग समझे अथवा उसका तालव्य होता है। जिसकी उपधा में संध्यक्षर (ए, ओ, ऐ, औ) हों ऐसी सन्धि में यदि य और व लोप को प्राप्त हुए हों तो वहां व्यञ्जन नामक विवृत्ति और स्वर नामक प्रतिसंहिता होती है ॥१८३-१८४॥ जहां ऊष्मान्त विरत हो और सन्धि में 'व' होता हो, वहाँ जो विवृत्ति होती है, उसे 'स्वरविवृत्ति' नाम से कहना चाहिए ॥१८५॥ यदि 'ओ' भाव का प्रसंधान हो तो उत्तरपद ऋकारादि होता है, वैसे प्रसंधान को स्वरान्त जानना चाहिए। इससे भिन्न ऊष्मा का प्रसंधान होता है 'यथा 'वायो ऋ' इति । यहाँ ओ भाव का प्रसंधान है। 'क इ ह' यहाँ ऊष्मा का प्रसंधान है ॥१८६॥ जब श ष स आदि परे हों उस समय यदि प्रथम (वर्ग के पहले अक्षर) और उत्तम (वर्ग के अन्तिम अक्षर) पदान्त में स्थित हों तो वे द्वितीय स्थान को प्राप्त होते हैं ॥१८७॥ ऊष्मसंयुक्त होने पर अर्थात् सकारादि परे होने पर प्रथम जो तकार आदि अक्षर हैं, उनको द्वितीय (थकार आदि) की भांति दिखाये- थकार आदि की भाँति उच्चारण करे, उन्हें स्पष्टतः थकार आदि के रूप में ही न समझ ले। उदाहरण के लिए-'मत्स्यः' 'क्षुरः' और 'अप्सराः' आदि उदाहरण हैं ॥१८८॥ लौकिक श्लोक आदि में छन्द का ज्ञान कराने के लिए तीन हेतु हैं-छन्दोमान, वृत्त और पादस्थान (पदान्त) परन्तु ऋचाएं स्वभावतः गायत्री आदि छन्दों से आवृत हैं । उनकी पाद-गणना या गुरु, लघु एवं अक्षरों की गणना तो छन्दोविभाग को समझने के लिए ही