बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४८ नारदीयपुराणम् ऋक्स्वरा तुल्ययोगा वा कैश्चिदेवमुदीर्यते ॥१६६॥ समासेऽवग्रहं कुर्यात्पदं चात्रानुसंहितम् । यतोऽक्षरादिकरणं पदांतस्येति तं विदुः ॥१६७॥ (सर्वत्रमित्रपुत्रसखिशब्दा अहिशतक्रतोरवग्राह्याः । आदित्यविप्रजातवेदश्च सत्पतिगोपतिवृत्रहासमुद्राश्च । स्वरयुपुवोदेवयुवश्चाऽरतिं देवतात्तये) चिकितिश्चक्रुधं चैव नावगृह्णंति पंडिताः । ॥१६८॥ विवृतयश्चतस्रो वै विज्ञेया इति मे मतम् अक्षराणां नियोगेन तासां नामानि मे शृणु । ह्रस्वाद्दिवत्सानुसृता वत्सानुसारिणी चाग्रे ॥१६६॥ पाकवत्युभयोर्ह्रस्वा दीर्घा वृद्धा पिपीलिकाः । चतसृणां विवृतीनामंतरं मात्रिकं भवेत् ॥१७०॥ अद्धंमात्रिकमन्येषामन्येषामणुमात्रिकम् ॥१७१॥ आपद्यते मकारो रेफोष्मसु प्रत्ययेऽप्यनुस्वारम् । पवेषु परसवर्णं स्पर्शेषु चोत्तमार्पितम् ॥१७२॥ नकारांते पदे पूर्वे स्वरे च परतः स्थिते । अकारं रक्तमित्याहुस्तकारेण तु रज्यते ॥१७३॥ नकारांते पदे पूर्वे व्यंजनैश्च यवोहिषु । अर्द्धमात्रा तु पूर्वस्य रज्यते त्वणुमात्रया ॥१७४॥ नकारस्वरसंयुक्तश्चतुर्युक्तो विधीयते । रेफो रंगश्च लोपश्च सानुस्वारोऽपि वा क्वचित् ॥१७५॥ मत है। कि ऋ, छ, अथवा श के उच्चारण में जितना समय लगता है, उतने काल की एक मात्रा होती है ॥१६६॥ समास में यदि अवग्रह (विग्रह या पद-विच्छेद) करे तो उसमें समासपद को संहितायुक्त ही रखे। क्योंकि वहाँ जिससे अक्षरादिकरण होता है, उसी स्वर को उस समास-पद का अन्त मानते हैं ॥१६७॥ सर्वत्र पुत्र, मित्र, सखि, मद्रि, शतक्रतु, आदित्य, प्रजातवेद, सत्पति, गोपति, वृत्रहा, समुद्र--ये सभी शब्द अवग्राह्य (अवग्रह के योग्य) हैं। 'स्वर्युवः, 'देवयुवः' अरतिम्' 'देवतातये' 'चिकितिः' 'चुकृधम्'--इन सब में एक पद होने के कारण पण्डित लोग अवग्रह नहीं करते। अक्षरों के नियोग से चार प्रकार की विवृत्तियां जाननी चाहिए, ऐसा मेरा मत है ॥१६८॥ अब तुम मुझसे उनके नाम सुनो - वत्सानुसृता, वत्सानुसारिणी, पाकवती और पिपीलिका। जिसके पूर्वपद में ह्रस्व और उत्तरपद में दीर्घ है, वह ह्रस्वादि रूप बछड़ों से अनुगत होने के कारण 'वत्सानुसृता' विवृत्ति कही गई है। जिसमें पहले ही पद में दीर्घ और उत्तरपद में ह्रस्व हो, वह 'वत्सानुसारिणी' विवृत्ति है। जहाँ दोनों पदों में ह्रस्व हो, वह 'पाकवती' कहलाती है तथा जिसके दोनों पदों में दीर्घ है, वह 'पिपीलिका' कही गई है। इन चारों विवृत्तियों में एक मात्रा का अन्तर होता है। दूसरों के मत में यह अन्तर आधा मात्रा है और किन्हीं के मत में अणु मात्रा है ॥१६९-१७१॥ रेफ तथा श ष स--ये जिनके आदि में हों, ऐसे प्रत्यय परे होने पर 'मकार' अनुस्वार भाव को प्राप्त होता है। य व ल परे हों तो वह परसवर्ण होता है और स्पर्शवर्ण परे हों तो उन- उन वर्गों के पञ्चम वर्ण को प्राप्त होता है ॥१७२॥ नकारान्त पद पूर्व में हो और स्वर परे हो तो नकार के द्वारा पूर्ववर्ती आकार अनुरंजित होता है, अतः उसे 'रक्त' कहते हैं (यथा 'महाँ ३ असि' इत्यादि) ॥१७३॥ यदि नकारान्त पद पूर्व में हो और य व हि आदि व्यञ्जन परे हों तो पूर्व की आधी मात्रा--अणु मात्रा अनुरंजित होती है ॥१७४॥ पूर्व में स्वर से संयुक्त हलन्त नकार यदि पदान्त में स्थित हो और उसके परे भी पद हो तो वह चार रूपों से युक्त होता है। कहीं वह रेफ होता है, कहीं रंग (या रक्त) बनता है कहीं उसका लोप और कहीं उसका अनुस्वार हो जाता है। (यथा 'भवाँश्चिनोति' में रेफ होता है। 'महाँ ३ असि' में रंग है। 'महाँ इन्द्र' में न का लोप हुआ है। पूर्व का अनुनासिक या अनुस्वार हुआ है ॥१७५॥ 'रंग' हृदय से उठता