भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 371

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३५२ नारदीयपुराणम् तेनास्य करणे सौक्ष्म्यं माधुर्यं चोपजायते । वर्णांश्च कुरुते सम्यक्प्राचीनोदवतिर्यथा ॥१२१०॥ त्रिफलां लवणाख्येन भक्षयेच्छिष्यकः सदा । अग्निमेधाजनन्येषा स्वरवर्णकरी तथा ॥१२११॥ कृत्वा चावश्यकान्धर्मान्माञ्जाठरं पर्युपास्य च । पीत्वा मधु घृतं चैव शुचिर्भूत्वा ततो वदेत् ॥१२१४॥ मन्द्रेणोपक्रमेत्पूर्वं सर्वशाखास्वयं विधिः । सप्तमंत्रानतिक्रम्य यथेष्टां वाचमुत्सृजेत् ॥१२१५॥ न तां समीरयेद्वाचं न प्राणमुपरोधयेत् । प्राणानामुपरोधेन वैस्वर्यं चोपजायते । स्वरव्यंजनमाधुर्यं लुप्यते नात्र संशयः ॥१२१६॥ कुतीर्थादागतं दग्धमपवर्णैश्च भक्षितम् । न तस्य परमोक्षोऽस्ति पपाहिरिव किल्बिषात् ॥१२१७॥ सुतीर्थादागतं जग्धं स्वाम्नातं सुप्रतिष्ठितम् । सुस्वरेण स्ववक्त्रेण प्रयुक्तं ब्रह्म राजति ॥१२१८॥ न करालो न लंबोष्ठो न च सर्वानुनासिकः ॥१२१९॥ गद्गदो बद्धजिह्वश्च प्रयोगान्वक्तुमर्हति एकचित्तो निरुद्धांतः स्नातो गानविवर्जितः । स तु वर्णान्प्रयुंजीत दंतोष्ठं यस्य शोभनम् ॥१२२०॥ पञ्च विद्यां न गृह्णंति चंडा स्तब्धाश्च ये नराः । अलसाश्च सरोगश्च येषां च विसृतं मनः ॥१२२१॥ शनैर्विद्यां शनैरर्थानारोहेत्पर्वतं शनैः । शनैरध्वसु वर्तेत योजनानां परं व्रजेत् ॥१२२२॥ योजनानां सहस्रं तु शनैर्याति पिपीलिका । अगच्छन्वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति ॥१२२३॥ दतुअन यश देने वाली होती है। दतोन करने से वाणी में सूक्ष्मता और स्वर में मधुरता उत्पन्न होती है। वह वर्णों का स्पष्ट उच्चारण कर लेता है। जैसो कि प्राचीनोदवति आचार्य की मान्यता है ॥१२१०-१२११॥ सदा कुशल शिष्य नमक से त्रिफला को खाये। इसके सेवन से जठराग्नि और मेधा-शक्ति उद्दीप्त होती है; स्वर और वर्णोच्चारण में मृदुता आती है ॥१२१३॥ आवश्यक कार्यों को करके और भोजन से निवृत्त होकर मधु पान करना चाहिए। तदनन्तर घी पीकर पवित्र होकर वेदाध्ययन या गाना प्रारम्भ करना चाहिए ॥१२१४॥ पहले मन्द्र स्वर से प्रारम्भ करना चाहिए, यहो विधि प्रत्येक शाखाओं में कही गई है। सात मन्त्रों के पाठ के बाद इच्छानुकूल वाणी उच्चारण करना चाहिए ॥१२१५॥ उस समय वाणी पर किसी प्रकार की बाधा अथवा श्वासरोध नहीं करना चाहिए, ऐसा करने से स्वर भंग हो जाता है और स्वर-व्यंजन का जो माधुर्य है वह नष्ट हो जाता है ॥१२१६॥ कुतीर्थ से प्राप्त हुई दग्ध (अपवित्र) वस्तु को जो दुर्जन पुरुष खा लेते हैं, उनका उसके दोष से उद्धार नहीं होता--ठीक उसी तरह, जैसे पाप रूप सर्प के विष से जीवन की रक्षा नहीं हो पाती । इसी प्रकार कुतीर्थ (बुरे अध्यापक) से प्राप्त हुआ जो दग्ध (निष्फल) अध्ययन है, उसे लोग अशुद्ध वर्णों के उच्चारणपूर्वक भक्षण (ग्रहण) करते हैं, उनका पाप रूपी सर्प की भाँति पापी उपाध्याय से मिले हुए उस कुत्सित अध्ययन के दोष से छुटकारा नहीं होता ॥१२१७॥ उत्तम आचार्य से प्राप्त अध्ययन को ग्रहण करके अच्छी तरह अभ्यास में लाया जाय तो वह शिष्य में सु-प्रतिष्ठित होता है और उसके द्वारा सुन्दर मुख एवं शोभन स्वर से उच्चारित वेद की बड़ी शोभा होती है ॥१२१८॥ विकराल मुखवाला, लम्बोष्ठ, नाक से बोलने वाला, हकलाने वाला और रुँधे गले वाला व्यक्ति शब्दों का भली भाँति उच्चारण नहीं कर सकता ॥१२१९॥ एकाग्र होने वाला, नियमपूर्वक स्नान करने वाला, जिसका अन्तःकरण वश में हो, जो गाता नहीं और जिसके दांत और ओठ सुन्दर हों वे ही वर्णों का भली भाँति उच्चारण कर सकते हैं ॥१२२०॥ क्रोधी डरपोक, आलसी, रोगी और जिनका मन इधर-उधर लगा है, ये पाँच प्रकार के मनुष्य विद्या प्राप्त करने के योग्य नहीं हैं ॥१२२१॥ विद्या अध्ययन, धनोपार्जन और पर्वतारोहण धीरे-धीरे करना चाहिए। मार्ग में भी धीरे-धीरे चलना चाहिए। एक योजन से अधिक नहीं चलना चाहिए ॥१२२२॥ चींटी धीरे-धीरे चलकर सैकड़ों योजन चली जाती है परन्तु द्रुतगामी गरुड़ न चलने से एक पग भी आगे नहीं जा

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