भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३५३ नहि पापहता वाणी प्रयोगान्वक्तुमर्हति । बधिरस्येव जल्पस्य विदग्धा वामलोचना ॥२२४॥ उपांशुचरितं चैव योऽधीते वित्रसन्निव । अपि रूपसहस्रेण संदेहेष्वेव वर्तते ॥२२५॥ पुस्तकप्रत्ययाद्धातं नाधीतं गुरुसन्निधौ । राजते न सभामध्येजारगर्भेव कामिनी ॥२२६॥ अञ्जनस्य क्षयं दृष्ट्वा वल्मीकस्य तु संचयम् । अवन्ध्यं दिवसं कुर्यान्नाध्ययनकर्मसु ॥२२७॥ यत्कीटैः पांशुभिः श्लक्ष्णैर्वल्मीकः क्रियते महान् । न तत्र बलसामर्थ्यमुद्योगस्तत्र कारणम् ॥२२८॥ सहस्रगुणिता विद्या शतशः परिकीर्तिता । आगमिष्यति जिह्वाग्रे स्थला न्निम्नमिवोदकम् ॥२२९॥ हयानामिव जात्यानामर्द्ध रात्राद्धंशायिनाम् । नहि विद्यार्थिनां निद्रा चिरं नेत्रेषु तिष्ठति ॥२३०॥ न भोजनविलंबी स्यान्न च नारीनिबंधनः । समुद्रमपि विद्यार्थी व्रजेद्गरुडहंसवत् ॥२३१॥ अहिरिव गणाद्भीतः साहित्यान्नरकादिव । राक्षसीभ्य इव स्त्रीभ्यः स विद्यामधिगच्छति ॥२३२॥ न शठाः प्राप्नुवन्त्यर्थान्न क्लीवा न च मानिनः । न च लोकरवा दीना न च श्वःश्वःप्रतीक्षकाः ॥२३३॥ यथा खननखनित्रेण भूतलं वारि विदति । एवं गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥२३४॥ गुरुशुश्रूषया विद्या पुष्कलेन धनेन वा । अथवा विद्यया विद्या ह्यन्यथा नोपपद्यते ॥२३५॥

सकता ॥२२३॥ भली भाँति उच्चारण न करने से वाणी उचित अर्थों का बोध उसी प्रकार नहीं करा सकती है, जिस प्रकार बहिरे पति को वामलोचना का मधुर प्रेमालाप कुछ भी भाव बोध नहीं करा सकता ॥२२४। जो डरा हुआ सा धीरे-धीरे पढ़ता है वह हजार आवृत्ति करने पर भी सन्देह में ही पड़ा रहता है ॥२२५॥ जो गुरु से न पढ़कर केवल अपने मन से पुस्तकों का अध्ययन करता है वह पंडितों की सभा में उसी प्रकार शङ्कित रहता है जिस प्रकार जार पति से गर्भ धारण करने वाली स्त्री ॥२२६॥ प्रतिदिन व्यय किये जाने पर अंजन को पर्वतराशि का भी क्षय हो जाता है ओर दोमकों के द्वारा थोड़ी-थोड़ी मिट्टी के संग्रह से भी बहुत ऊँचा वल्मीक बन जाता है, इस दृष्टान्त को सामने रखते हुए मनुष्य को दिन रात, अध्ययन और कर्त्तव्य में श्रम करना चाहिए । छोटे-छोटे कीड़े इतने बड़े वल्मीक को बना देते हैं तो क्या इसमें उनका बल कारण है ? नहीं, केवल उद्योग हो कारण है ॥२२७-२२८॥ विद्या का सहस्र वार पाठ करने से और सो बार आवृत्ति करने से वह पाठक की जिह्वा पर उसी प्रकार स्वयं चली आती है जिस प्रकार जल ढालू या नीची भूमि पर ॥२२९॥ विद्या प्रेमी को उत्तम जाति के घोड़े के समान आधीरात के आधे भाग तक अर्थात् एक पहर सोना चाहिए । विद्यार्थियों की आँखों पर निद्रा चिर काल तक नहीं रहती है ॥२३०॥ विद्यार्थी को भोजन में विलम्ब नहीं करना चाहिए और न तो नारी में आसक्त होना चाहिए । विद्यार्थी गरुड़ और हंस की भाँति विद्योपार्जन के लिए समुद्र तक चला जाय ॥२३१॥ वह समूह से सर्प को भाँति डरे और शृङ्गार चर्चा (या दोस्ती बढ़ाने) को नरककुण्ड के समान समझे । इसी प्रकार जो स्त्रियों को राक्षसी की भाँति समझकर दूर से ही त्याग देता है वही विद्या प्राप्त करता है ॥२३२॥ दुष्ट व्यक्ति विद्योपार्जन या धनोपार्जन नहीं कर सकता और न तो नपुंसक (कायर) या अभिमानी ही सफल मनोरथ होते हैं । लोकापवाद से डरने वाले या लोक निन्दित और भाग्य के भरोसे रहने वाले, हमेशा कल को प्रतीक्षा करने वाले कभी भी विद्या नहीं प्राप्त कर सकते ॥२३३॥ जिस प्रकार खन्ती से भूतल को खोदता हुआ खनक पानी अवश्य प्राप्त कर लेता है उसी प्रकार गुरु की शुश्रूषा करने वाला शिष्य गुरु से विद्या प्राप्त कर लेता है ॥२३४॥ विद्या गुरुशुश्रूषा, प्रचुर सम्पत्ति और परस्पर विद्या के दान-आदान से ही प्राप्त होती है; इनके अतिरिक्त विद्या ४५ ना० पु०