बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 384, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३६५ तथा वर्षात्रयोदश्यां मघासु च विशेषतः । कन्यां कन्यावेदिनश्च पशून्वै सत्सुतानपि ॥१४५॥ द्यूतं कृषिं च वाणिज्यं द्विशकैकशफांस्तथा । ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रांत्स्वर्णरूप्ये सकुप्यके ॥१४६॥ ज्ञातिश्रैष्ठ्यं सर्वकामानाप्नोति श्राद्धदः सदा । प्रतिपत्प्रभृतिष्वेकां वर्जयित्वा चतुर्दशीम् ॥१४७॥ शस्त्रेण तु हता ये वै तेभ्यस्तत्र प्रदीयते । स्वर्ग ह्यपत्यमोजश्च शौर्यं क्षेत्रं बलं तथा ॥१४८॥ पुत्रान् श्रेष्ठांश्च सौभाग्यं समृद्धिं मुख्यतां शुभम् । प्रवृत्तं चक्रतां चैव वाणिज्यप्रभृतीनि च ॥१४९॥ अरोगित्वं यशो वीतशोकतां परमां गतिम् । धनं विद्यां भिषक्सिद्धिं कुप्यगा अप्यजाविकम् ॥१५०॥ अश्वानायुश्च विधिवद्यः श्राद्धं संप्रयच्छति । कृत्तिकादिभरण्यांतं सकामानाप्नुयादिमान् ॥१५१॥ आस्तिकः श्रद्दधानश्च व्यपेतमदमत्सरः । वसुरुद्रादितिसुताः पितरः श्राद्धदेवताः ॥१५२॥ प्रीणयंति मनुष्याणां पितॄन् श्राद्धेन तर्पिताः । आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च ॥१५३॥ प्रयच्छंति तथा राज्यं नृणां प्रीताः पितामहाः । इत्येवं कथितं किंचित्कल्पाध्याये विशेषतः ॥१५४॥ ज्ञातव्यं वैदिके तंत्रे पुराणांतरकेऽपि च । य इमं चिंतयेद्विद्वान्कल्पाध्यायं मुनीश्वर ॥१५५॥ स भवेत्कर्मकुशल इहान्यत्र गतिं शुभाम् । यः शृणोति नरो भक्त्या दैवे पित्र्ये च कर्मणि ॥१५६॥ कल्पाध्यायं स लभते दैवपित्र्यक्रियाफलम् । धनं विद्यां यशः पुत्रान्परत्र च गतिं पराम् ॥१५७॥ अतः परं व्याकरणं तुभ्यं वेदमुखाभिधम् । कथयिष्ये समासेन शृणुष्व सुसमाहितः ॥१५८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे एकपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥५१॥ पितरों को देते हैं वे अनन्त काल तक अपने इष्ट पदार्थ को पाते हैं ॥१४२-१४४॥ एक चतुर्दशी को छोड़कर प्रतिपदा से अमावस्या तक की चौदह तिथियों में श्राद्ध करने वाला व्यक्ति क्रमशः सदा रूप शीलयुक्त कन्या, बुद्धिमान् व रूपवान् दामाद, पशु, सत्पुत्र, द्यूत, कृषि, व्यापार में लाभ, दो खुर वाले पशु (गाय, बकरी), एक खुर वाले (घोड़ा आदि), ब्रह्मवर्चस्वी पुत्र, सोना, चांदी, कुप्यक (त्रपु सीसा आदि) कुल में श्रेष्ठता तथा सब इच्छानुकूल पदार्थों को प्राप्त करता है ॥१४५-१४७॥ गया में चतुर्दशी तिथि को केवल शस्त्र से मारे गए पितर के निमित्त पिण्ड दिया जाता है। जो विधिपूर्वक श्राद्ध करता है वह स्वर्ग, संतान, ओज, शौर्य, क्षेत्र, बल, श्रेष्ठ पुत्र, सौभाग्य, समृद्धि, समाज में सम्मानित पद, शुभ स्वभाव, चक्रवर्तित्व, व्यापार में लाभ, स्वास्थ्य, यश, शोकहीनता, परसगति (मुक्ति), धन, विद्या, ओषधि, प्रयोग में निपुणता, कुप्य (त्रपु-सीसा आदि) गौ, बकरी, भेड़, अश्व और दीर्घायु प्राप्त करता है। जो आस्तिक, श्रद्धालु, विनम्र और संयमी व्यक्ति कृत्तिका से भरणी नक्षत्र के अन्त तक श्राद्ध करता है वह क्रमशः उपर्युक्त पदार्थों को प्राप्त करता है। श्राद्ध से तृप्त होकर वसु, रुद्र, आदित्य, ये श्राद्ध देवता पितर मनुष्यों के पितरों को प्रसन्न करते हैं। और ऐसे मनुष्य पर पितामह प्रसन्न होकर उसको आयु, धन, प्रजा, विद्या, स्वर्ग, राज्य, मोक्ष और सुख प्रदान करते हैं ॥१४८-१५३३॥ इस प्रकार संक्षेप में मैंने इस कल्पाध्याय में कुछ कहा है। इस विषय का विशेष ज्ञान, वैदिक तन्त्रों तथा अन्य पुराणों द्वारा विशेष ज्ञान प्राप्त करना चाहिए ॥१५४ ॥ मुनीश्वर ! जो विद्वान् व्यक्ति इस कल्पाध्याय का चिन्तन करता है वह कार्य कुशल हो जाता और लोक-परलोक दोनों में शुभ गति प्राप्त करता है ॥१५५३॥ जो दैव और पितृ कर्म के समय इस कल्पाध्याय को सुनता है वह दैव और पितृ क्रिया का अशेष फल पाता है। साथ ही वह धन, विद्या, यश, पुत्र, आदि लौकिक सुखों को और मृत्यु के बाद परा गति को प्राप्त करता है ॥१५६-१५७॥ अब इसके अनन्तर तुमको वेद मुख का कहे जाने वाले व्याकरण शास्त्र का सूक्ष्म रूप में वर्णन करूँगा उसको सावधान होकर सुनना ॥१५८॥ श्रीनारदीयमहापुराण के पूर्वभाग के द्वितीय पाद में इक्यानवेवां अध्याय समाप्त ॥१५१॥