भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 385

अथ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सनन्दन उवाच अथ व्याकरणं वक्ष्ये संक्षेपात्तव नारद । सिद्धरूपप्रबंधेन मुखं वेदस्य सांप्रतम् ॥१॥ सुप्तिङंतं पदं विप्र सुपां सप्त विभक्तयः । स्वौजसः प्रथमा प्रोक्ता सा प्रातिपदिकात्मिका ॥२॥ संबोधने च लिंगादावुक्ते कर्मणि कर्तरि । अर्थवत्प्रातिपदिकं धातुप shape/प्रत्ययवर्जितम् ॥३॥ अमौशशो द्वितीया स्यात्तत्कर्म क्रियते च यत् । द्वितीया कर्मणि प्रोक्तान्तरांतरेण संयुते ॥४॥ टाभ्यांभिस्तृतीया स्यात्करणे कर्तरीरिता । येन क्रियते तत्करणं स कर्ता स्यात्करोति यः ॥५॥ ङेभ्यांभ्यसश्चतुर्थी स्यात्सम्प्रदाने च कारके । यस्मै दित्सा धारयेद्वै रोचते संप्रदानकम् ॥६॥ पंचमी स्याङसिभ्यांभ्यो ह्यपादाने च कारके । यतोऽपैति समादत्ते अपदत्ते च यं यतः ॥७॥ ङसोसामश्च षष्ठी स्यात्स्वामिसंबंधमुख्यके । ङ्योस्सुपः सप्तमी तु स्यात्सा चाधिकरणे भवेत् ॥८॥ आधारे चापि विप्रेन्द्र रक्षार्थानां प्रयोगतः । ईप्सितं चानीप्सितं यत्तदपादानकं स्मृतम् ॥६॥ पंचमी पयुपाङ्‌योगे इतरर्तेंऽन्यदिङ्मुखे । एतैर्योगे द्वितीया स्यात्कर्मप्रवचनीयकैः ॥१०॥

अध्याय ५२ व्याकरण शास्त्र का वर्णन सनन्दन बोले—नारद ! अब तुमको संक्षेप में व्याकरण की शिक्षा दे रहा हूँ जो कि सिद्ध शब्दों के प्रबन्ध क्रम पूर्वक व्याख्या करने के कारण व्याकरण वेद का मुख कहा जाता है ॥१॥ विप्र ! सुबन्त और तिङन्त को पद कहते हैं। सुप् प्रत्याहार में सात विभक्तियाँ होती हैं। सु, औ, जस् प्रथमा है जो प्रातिपदिक स्वरूप मानी गयी है। यह प्रथमा विभक्ति संबोधन, लिङ्ग, वचन आदि में प्रधान कर्म और कर्त्ता में होती है। धातु और प्रत्यय से रहित अर्थवान् शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा है ॥२॥ अम्, औ, शस् द्वितीया है, और जो किया जाता है उसको कर्म कहते हैं। कर्म में और अन्तरा अन्तरेण के संयोग में द्वितीया होती है ॥३॥ टा, भ्याम्, भिस् तृतीया कहलाती है। अप्रधान कर्त्ता और करण में तृतीया होती है ॥४॥ जिससे काम किया जाता है उसको करण और जो करता है उसको कर्त्ता कहते हैं ॥५॥ ङे, भ्याम्, भ्यस् चतुर्थी है जो संप्रदान कहलाता है ॥५-६॥ ङस्-भ्याम्, भ्यस् पंचमी की विभक्तियाँ हैं जो अपादान कारक में होती हैं। जहाँ से कोई जाता है जिससे कोई वस्तु पृथक् होती है। जिससे कोई वस्तु प्राप्त होती है, उसको अपादान कहते हैं ॥७॥ ङस्, ओस्, आम् षष्ठी है जो सेवक-स्वामि-आदि संबन्ध में होती है। ङि, ओस्, सुप् सप्तमी है जो अधिकरण में होती है ॥८॥ विप्रेन्द्र ! रक्षार्थ धातुओं के प्रयोग में, ईप्सित और अनीप्सित को अपादान कहते हैं ॥६॥ परि, अप और आङ् के योग में पञ्चमी होती है। इतर, ऋत, अन्य और दिग्वाचक शब्दों के योग में पञ्चमी होती