भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 386, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 386

द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३६७ लक्षणेत्थंभूतोऽभिर्भागे चानुपर्प्रति । अंतरेषु सहार्थे च हीने ह्युपश्व कथ्यते ॥११॥ द्वितीया च चतुर्थी स्याच्चेष्टायां गतिकर्मणि । अप्राणिषु विभक्ती द्वे मन्यकर्मण्यनादरे ॥१२॥ नमःस्वस्तिस्वधास्वाहाल्वषड्योग ईरिता । चतुर्थी चैव तादर्थ्ये तुमर्थाद्भाववाचिनः ॥१३॥ तृतीयासहयोगे स्यात्कुत्सितऽङ्गे विशेषणे । काले भावे सप्तमी स्यादेतद्योगे च षष्ठ्यपि ॥१४॥ स्वामीश्वराधिपतिभिः साक्षिदायादसुतकैः । निर्धारणे द्वे विभक्ती षष्ठी हेतुप्रयोगके ॥१५॥ स्मृत्यर्थकर्मणि तथा करोतेः प्रतियानके । हिंसार्थानां प्रयोगे च कृतिकर्मणि कर्तरि ॥१६॥ न कर्तृकर्मणोः षष्ठी निष्ठादिप्रतिपादिका । गता वै द्विविधा ज्ञेयाः सुबादिषु विभक्तिषु भूवादिष तिङन्तेषु लकारा दश वै स्मृताः ॥१७॥ तिप्तसंतोति प्रथमो मध्यमः सिप्यस्थोत्तमः । मिब्बस्मसः परस्मै तु पादानां चा मपनेदम् ॥१८॥ त आतांऽते प्रथमो मध्यः से आथे ध्वे तथोत्तमः । ए वहे मह आदेशा ज्ञेया ह्यान्ये लिङादिषु ॥१९॥ नाम्नि प्रयुज्यमाने तु प्रथमः पुरुषो भवेत् । मध्यमो युष्मदि प्रोक्त उत्तमः पुरुषोऽस्मदि ॥२०॥ भूवादया धातवः प्रोक्ताः सनाद्यन्तास्तथा ततः । लडीरितो वर्तमाने भूतेऽनद्यतने तथा ॥२१॥ मास्मयोगे च लङ् वाच्यो लोडाशिषि च धातुतः । विध्यादौ स्या दाशिषि च लिङितो द्विविधो मुने ॥२२॥

है। कर्मप्रवचनीय में लक्षण, इत्थंभूताख्यान, भाग, वीप्सा अर्थों में प्रति, परि, अनु को कर्म प्रवचनीय संज्ञा - द्वितीया होती है। इसी तरह सहायक, अन्तर, हीन अर्थों में उप की कर्म प्रवचनीय संज्ञा होती है ॥१०-११॥ चेष्टा और गति कर्म में द्वितीया और चतुर्थी दोनों होती हैं। अनादर सूचित होने पर मन् धातु अप्राणिबोधक कर्म में द्वितीया और चतुर्थी दोनों होती हैं ॥१२॥ नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलं और वषट् योग में तादर्थ्य, तुमर्थं भाववाचक में चतुर्थी होती है ॥१३॥ सह के योग में, कुत्सित अंग में और विशेषण में तृतीया होती है। काल में और भाव में सप्तमी होती है। स्वामी, ईश्वर, अधिपति, साक्षी, दायाद्, सूतक (प्रसूत) इनके योग में सप्तमी षष्ठी दोनों होती हैं। निर्धा- रण में भी दोनों विभक्तियाँ होती हैं। हेतु शब्द के प्रयोग में षष्ठी होती है। स्मृति अर्थ को बताने वाले शब्दों के योग में कर्ता और कर्म से षष्ठी होती है। निष्ठा, लकारादेश, अव्यय, खलर्थ और तृन् प्रत्याहार के योग में षष्ठी नहीं होती है। सुप् आदि विभक्तियों में कही गयी उपर्युक्त प्रथमा आदि विभक्तियाँ दो प्रकार की हैं अर्थात् कथित अर्थों की अपेक्षा अन्य अर्थों में भी विविक्षा द्वारा वे हो सकती हैं। भू आदि धातुओं से तिङन्त में दश लकार होते हैं ॥१४-१७॥ तिङन्त प्रत्यय में आगे कही हुई विभक्तियाँ होती हैं। तिप्, तस् (अन्ति) को प्रथम पुरुष कहते हैं। सिप्, थस्, थ को मध्यम और मिप्, वस्, मस् को उत्तम पुरुष कहते हैं। ये सब परस्मैपद हैं। आत्मनेपद में त आताम् अन्त प्रथम पुरुष है, से आथाम्, ध्वम् मध्यम पुरुष और इ, वहि, महि उत्तम पुरुष। इनके अतिरिक्त लिङ आदि में और भी आदेश होते हैं, युस्मद्, अस्मद् से अस्मद् से अति- रिक्त संज्ञा शब्दों के प्रयोग में प्रथम पुरुष, युष्मद् के प्रयोग में मध्यम पुरुष और अस्मद् के प्रयोग में उत्तम पुरुष होता है ॥१८-२०॥ भू आदि को, सनाद्यन्त को धातु कहते हैं। उन धातुओं से वर्तमान काल में लट् होता है। अनद्यतन भूत और स्म, मा के योग में लङ् होता है। मुने ! आशीर्वाद में धातु से लोट् लकार होता है। विध्यादि अर्थ में और