भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 383

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:

३६४ \hspace{150pt} नारदीयपुराणम्

पितृपात्रं तदुत्थानं कृत्वा विप्रान्विसर्जयेत् । प्रदक्षिणमनुव्रज्य भुंजीत पितृसेवितम् ॥१३२॥ ब्रह्मचारी भवेत्तां तु रजनीं ब्राह्मणैः सह । एवं प्रदक्षिणावृत्त्या वृद्धौ नांदीमुखान्वितॄन् ॥१३३॥ यजेत दधिकर्कन्धुमिश्रान्पिण्डान्यवैः कृतान् । एकोद्दिष्टं देवहीनमेवार्घ्यकपवित्रकम् ॥१३४॥ आवाहनाग्नौकरणरहितं ह्यपसव्यवतू । उपतिष्ठतामक्षय्यस्थाने विप्रविसर्जने ॥१३५॥ अभिरम्यतामिति वदेद् ब्रूयुस्तेऽभिरताः स्म ह । गंधोदकं तिलैर्युक्तं कुर्यात्पात्रचतुष्टयम् ॥१३६॥ अर्घ्यार्थं पितृपात्रेषु प्रेतपात्रं प्रसेचयेत् । ये समाना इति द्वाभ्यां शेषं पूर्ववदाचरेत् ॥१३७॥ एतत्पिण्डीकरणमेकोद्दिष्ट स्त्रिया अपि । अर्वाक्सपिण्डीकरणं यस्य संवत्सराद्भवेत् ॥१३८॥ तस्याप्यन्नं सोदकुंभं दद्यात्संवत्सरं द्विजे । मृतेऽहनि तु कर्तव्यं प्रतिमासं तु वत्सरम् ॥१३९॥ प्रतिसंवत्सरं चैव मासमेकादशेऽहनि । पिंडांश्चगोऽजविप्रेभ्यो दद्यादग्नौ जलेऽपि वा ॥१४०॥ प्रक्षिपेत्सत्सु विप्रेषुद्विजोच्छिष्टं न मार्जयेत् । हविष्यान्नेन वै मासं पायसेन तु वत्सरम् ॥१४१॥ मात्स्यहारिणकौरभ्रशाकुनच्छागपार्षतैः । ऐणरौरववाराहशशैर्मास्तैर्येनथाश्रमम् ॥१४२॥ मासवृद्ध्याभितृप्यंति दत्तैरिह पितामहाः । खड्गामिषं महाकल्पं मधु मुन्यन्नमेव च ॥१४३॥ लोहामिषं महाशाकं मांसं वार्ध्रीणसस्य च । यो ददाति गयास्थश्च सर्वमानंत्यमश्नुते ॥१४४॥


कर उनको थोड़ी दूर तक पहुँचा दे। इतनी क्रिया समाप्त कर पितृ यज्ञ निमित्त सामग्री में से स्वयं भोजन करे ॥१२६-१३२॥ उस दिन श्राद्धकर्ता और ब्राह्मण भी रात में ब्रह्मचारी रहे । इस प्रकार पुत्र-जन्म और विवाहादि के अवसर पर प्रदक्षिणावृत्ति से नान्दीमुख पितरों का यजन करे । दही और बेर मिले हुए अन्न का पिण्ड दे और सारी क्रियायें यव से करे । एकोद्दिष्ट श्राद्ध में किसी देवता की पूजा नहीं होती। केवल एक पिंड पवित्रक (कुशा) के साथ दिया जाता है ॥१३३-१३४॥ इस श्राद्ध में अपसव्य होकर आवाहन और अग्नि स्थापन नहीं किया जाता। विप्र विसर्जन के समय अक्षय्यमस्तु के स्थान में 'उप- तिष्ठताम्' ऐसा कहा जाता है । पहले विप्रों से 'अभिरम्यताम्' ऐसा कहे, यह सुनकर वे कहें कि "अभिरताः स्म" ॥१३५-३॥ पहले गंधोदक और तिल से युक्त चार पात्र रखे । अर्घ्य के लिए पितृ पात्रों में जल छोड़े और प्रेत पात्र को केवल जल से सींच दे । 'ये समाना...' इस मन्त्र से दो पात्रों में पिण्ड दे और शेष क्रिया पूर्व की भाँति करे ॥१३६-१३७॥ यह सपिण्डीकरण और एकोद्दिष्ट स्त्रियों का भी होना चाहिए । जिसका सपिण्डीकरण श्राद्ध वर्ष पूर्ण होने से पहले हुआ हो उसके लिए संवत्सर पर्यन्त जल कलश के सहित अन्न देना चाहिए । मृत्यु वाले दिन को प्रतिमास श्राद्ध करना चाहिए । यह क्रिया एक वर्ष तक होती रहे ॥१३८-१३९॥ प्रति वर्ष मृत्यु के ग्यारहवें दिन श्राद्ध करके गो या बकरी या इच्छुक विप्र को पिण्ड दे दे । अर्थात् दत्त श्राद्धपिण्ड उनको खिला दे, या अग्नि अथवा जल में फेंक दे ॥१४०॥ जब तक ब्राह्मण लोग भोजन करके वहाँ से उठ न जायें तब तक उच्छिष्ट स्थान पर झाडू न लगाये । पितर हविष्य का पिण्ड देने से एक महीने तक और पायस से एक वर्ष तक तृप्त रहते हैं ॥१४१॥ मछली, मृग, भेड़, पक्षी, बकरी, चितकवरा हरिण, सामान्य हरिण, कृष्ण मृग, वाराह, शशक इनके मांस का पिण्ड देने से पितर क्रमशः एक-एक माह की वृद्धि से अधिक काल तक तृप्त रहते हैं। जो गैंडे का मांस श्राद्ध में पितरों को देता है, उसके पितर महाकल्प पर्यन्त तृप्त रहते हैं। जो गया में पितरों को मधु, लाल बकरे के मांस, महाशाक, वार्ध्रीणस (गैंडे) का मांस का विशेषकर भाद्रपद कृष्ण को मघा का योग होने पर