भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 382

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एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३६३ यवार्थास्तु तिलैः कार्याः कुर्यादर्घादि पूर्ववत् । दत्त्वार्घं सयवांस्तेषां पात्रे कृत्वा विधानतः ॥११७॥ पितृभ्यः स्थानमसीति न्युब्जं पात्रं करोत्यधः । अग्नौ करिष्यन्नादाय पृच्छत्यन्नं घृतप्लुतम् ॥११८॥ कुरुष्वेत्यभ्यनुज्ञातो दत्त्वाग्नौ पितृयज्ञवत् । हुतशेषं प्रदद्यात्तु भाजनेषु समाहितः ॥१२०॥ यथालाभोपपन्नेषु रौप्येषु च विशेषतः । दत्त्वान्नं पृथिवीपात्रमिति पात्राभिमंत्रणम् ॥१२१॥ कृत्वेदं विष्णुरित्यन्ते द्विजांगुष्ठं निवेशयेत् । सव्याहृतिकां गायत्रीं मधुवाता इति तृचम् ॥१२२॥ जप्त्वा यथासुखं वाच्यं भुञ्जीरंस्तेऽपि वाग्यताः । अन्नमिष्टं हविष्यं च दद्यादक्रोधनोऽत्वरः ॥१२३॥ आतृप्तेस्तु पवित्राणि जप्त्वा पूर्वजपं तथा । अन्नमादाय तृप्ताःस्थ शेषं चैवानुमान्य च ॥१२४॥ तदन्नं विकिरेद् भूमौ दद्याच्चापः सकृत्सकृत् । सर्वमन्नमुपादाय सतिलं दक्षिणामुखः ॥१२५॥ उच्छिष्टसन्निधौ पिण्डान्दद्याद्वै पितृयज्ञवत् । मातामहानामप्येवं दद्यादाचमनं ततः ॥१२६॥ स्वस्तिवाचं ततः कुर्यादक्षय्योदकमेव हि । दत्त्वा च दक्षिणां शक्त्या स्वधाकारमुदाहरेत् ॥१२७॥ वाच्यतामित्यनुज्ञातः प्रकृतेभ्यः स्वधोच्यताम् । ब्रूयुरस्तु स्वधेत्युक्ते भूमौ सिञ्चेत्ततो जलम् ॥१२८॥ विश्वेदेवाश्च प्रीयंतां विप्रैश्चोक्त इदं जपेत् । दातारो नोऽभिवर्द्धन्तां वेदाः संततिरेव च ॥१२६॥ श्रद्धा च नो मा व्यगमद्बहु देयं चनोऽस्त्विति । इत्युक्तोक्ताः प्रिया वाचः प्रणिपत्य विसर्जयेत् ॥१३०॥ वाजेवाजे इति प्रीतः पितॄन्पूर्वं विसर्जनम् । यस्मिंस्ते संश्रवाः पूर्वमर्घ्यपात्रे निवेशिताः ॥१३१॥

विधान के अनुसार पात्र में यव आदि रखकर अर्घ्य देने के अनन्तर 'पितृभ्यः स्थानमसि' इस मन्त्र से न्युब्ज पात्र को नीचे उलट दे ॥११६-११८॥ अग्नि में पृथक् अन्न को हवन करने के लिये 'अग्नौ करिष्ये' ऐसा ब्राह्मण से पूछे। 'करो' ऐसी आज्ञा पाकर पितृ यज्ञ की भाँति उस अग्नि में हवन करके, हवन से बची सामग्री को उस पात्र में एकाग्र होकर रखे और उस समय वह पात्र यथाशक्ति किसी उत्तम धातु का होना चाहिए। यदि चाँदी का हो तो उत्तम है। अन्न देकर 'पृथ्वी ते पात्रम्' इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करे ॥११९-१२१॥ ऐसा करने के बाद 'इदं विष्णुः' यह कह कर उस अन्न में ब्राह्मण के अंगूठों का स्पर्श कराये। 'व्याहृति सहित गायत्री और 'मधुव्वाता....' इस ऋचा को जपकर आदरपूर्वक उनको भोजन करने के लिए कहे। वे ब्राह्मण भी मौन होकर भोजन प्रारम्भ करें। उस समय यजमान (श्राद्धकर्ता) क्रोध और जल्दबाजी को त्यागकर शान्तिपूर्वक ब्राह्मण को प्रिय अन्न और हविष्यभोजन विधिपूर्वक परसे जब तक ब्राह्मण भोजन से तृप्त न हों तब तक 'पवित्राणि....' मंत्र को अथवा पूर्व के मन्त्रों का जप करता रहे। उन ब्राह्मणों के तृप्त हो जाने पर अथवा उनको तृप्त जानकर शेष अन्न को पृथ्वी पर बिखेर दे। और एक-एक बार जल दे। पुनः शेष बचे हुए सब अन्न को जूठो भूमि में समीप पितृ यज्ञ की भाँति पिण्ड दे ॥१२२-१२५॥ इसी प्रकार मातामहों के श्राद्ध में भी करे। तदन्तर आचमन कर स्वस्ति वाचन करे और अक्षय्योदक दे। यथाशक्ति उन ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर स्वधाकार कहे ॥१२६-१२७॥ "वाच्यताम्" ऐसी आज्ञा पाने पर "प्रकृतेभ्यः स्वधा" ऐसा कहे। 'वपूरस्तु स्वधा' यह कहने पर पृथ्वी पर जल छिड़के ॥१२८॥ जब विप्र 'विश्वेदेवाश्च प्रीयन्ताम्' कहें तो वह यजमान 'दातारो नोऽभिवर्द्धन्ताम् वेदाः सन्ततिरेव च, श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहुदेयं च नोऽस्त्विति' अर्थात् मेरे वंश में दाता, वेद के अध्ययन करने वाले, वंश को बढ़ाने वाले हों, श्रद्धा से कभी दूर न हों, हम सर्वदा श्रद्धालु रहें, हमें दान देने के लिए पर्याप्त धन हो, ऐसा कह कर प्रिय वाणी से सत्कार कर प्रणाम करके विसर्जन करे। पहले प्रसन्नतापूर्वक 'वाजे वाजे' इस मन्त्र से पितरों का विसर्जन करे। पहले जिस अर्घ्य पात्र में संश्रव का जल डाला गया था उस पात्र का उत्थापन कर विप्रों को विसर्जित करे। पुनः विप्रों की प्रदक्षिणा