बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३६३ यवार्थास्तु तिलैः कार्याः कुर्यादर्घादि पूर्ववत् । दत्त्वार्घं सयवांस्तेषां पात्रे कृत्वा विधानतः ॥११७॥ पितृभ्यः स्थानमसीति न्युब्जं पात्रं करोत्यधः । अग्नौ करिष्यन्नादाय पृच्छत्यन्नं घृतप्लुतम् ॥११८॥ कुरुष्वेत्यभ्यनुज्ञातो दत्त्वाग्नौ पितृयज्ञवत् । हुतशेषं प्रदद्यात्तु भाजनेषु समाहितः ॥१२०॥ यथालाभोपपन्नेषु रौप्येषु च विशेषतः । दत्त्वान्नं पृथिवीपात्रमिति पात्राभिमंत्रणम् ॥१२१॥ कृत्वेदं विष्णुरित्यन्ते द्विजांगुष्ठं निवेशयेत् । सव्याहृतिकां गायत्रीं मधुवाता इति तृचम् ॥१२२॥ जप्त्वा यथासुखं वाच्यं भुञ्जीरंस्तेऽपि वाग्यताः । अन्नमिष्टं हविष्यं च दद्यादक्रोधनोऽत्वरः ॥१२३॥ आतृप्तेस्तु पवित्राणि जप्त्वा पूर्वजपं तथा । अन्नमादाय तृप्ताःस्थ शेषं चैवानुमान्य च ॥१२४॥ तदन्नं विकिरेद् भूमौ दद्याच्चापः सकृत्सकृत् । सर्वमन्नमुपादाय सतिलं दक्षिणामुखः ॥१२५॥ उच्छिष्टसन्निधौ पिण्डान्दद्याद्वै पितृयज्ञवत् । मातामहानामप्येवं दद्यादाचमनं ततः ॥१२६॥ स्वस्तिवाचं ततः कुर्यादक्षय्योदकमेव हि । दत्त्वा च दक्षिणां शक्त्या स्वधाकारमुदाहरेत् ॥१२७॥ वाच्यतामित्यनुज्ञातः प्रकृतेभ्यः स्वधोच्यताम् । ब्रूयुरस्तु स्वधेत्युक्ते भूमौ सिञ्चेत्ततो जलम् ॥१२८॥ विश्वेदेवाश्च प्रीयंतां विप्रैश्चोक्त इदं जपेत् । दातारो नोऽभिवर्द्धन्तां वेदाः संततिरेव च ॥१२६॥ श्रद्धा च नो मा व्यगमद्बहु देयं चनोऽस्त्विति । इत्युक्तोक्ताः प्रिया वाचः प्रणिपत्य विसर्जयेत् ॥१३०॥ वाजेवाजे इति प्रीतः पितॄन्पूर्वं विसर्जनम् । यस्मिंस्ते संश्रवाः पूर्वमर्घ्यपात्रे निवेशिताः ॥१३१॥
विधान के अनुसार पात्र में यव आदि रखकर अर्घ्य देने के अनन्तर 'पितृभ्यः स्थानमसि' इस मन्त्र से न्युब्ज पात्र को नीचे उलट दे ॥११६-११८॥ अग्नि में पृथक् अन्न को हवन करने के लिये 'अग्नौ करिष्ये' ऐसा ब्राह्मण से पूछे। 'करो' ऐसी आज्ञा पाकर पितृ यज्ञ की भाँति उस अग्नि में हवन करके, हवन से बची सामग्री को उस पात्र में एकाग्र होकर रखे और उस समय वह पात्र यथाशक्ति किसी उत्तम धातु का होना चाहिए। यदि चाँदी का हो तो उत्तम है। अन्न देकर 'पृथ्वी ते पात्रम्' इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करे ॥११९-१२१॥ ऐसा करने के बाद 'इदं विष्णुः' यह कह कर उस अन्न में ब्राह्मण के अंगूठों का स्पर्श कराये। 'व्याहृति सहित गायत्री और 'मधुव्वाता....' इस ऋचा को जपकर आदरपूर्वक उनको भोजन करने के लिए कहे। वे ब्राह्मण भी मौन होकर भोजन प्रारम्भ करें। उस समय यजमान (श्राद्धकर्ता) क्रोध और जल्दबाजी को त्यागकर शान्तिपूर्वक ब्राह्मण को प्रिय अन्न और हविष्यभोजन विधिपूर्वक परसे जब तक ब्राह्मण भोजन से तृप्त न हों तब तक 'पवित्राणि....' मंत्र को अथवा पूर्व के मन्त्रों का जप करता रहे। उन ब्राह्मणों के तृप्त हो जाने पर अथवा उनको तृप्त जानकर शेष अन्न को पृथ्वी पर बिखेर दे। और एक-एक बार जल दे। पुनः शेष बचे हुए सब अन्न को जूठो भूमि में समीप पितृ यज्ञ की भाँति पिण्ड दे ॥१२२-१२५॥ इसी प्रकार मातामहों के श्राद्ध में भी करे। तदन्तर आचमन कर स्वस्ति वाचन करे और अक्षय्योदक दे। यथाशक्ति उन ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर स्वधाकार कहे ॥१२६-१२७॥ "वाच्यताम्" ऐसी आज्ञा पाने पर "प्रकृतेभ्यः स्वधा" ऐसा कहे। 'वपूरस्तु स्वधा' यह कहने पर पृथ्वी पर जल छिड़के ॥१२८॥ जब विप्र 'विश्वेदेवाश्च प्रीयन्ताम्' कहें तो वह यजमान 'दातारो नोऽभिवर्द्धन्ताम् वेदाः सन्ततिरेव च, श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहुदेयं च नोऽस्त्विति' अर्थात् मेरे वंश में दाता, वेद के अध्ययन करने वाले, वंश को बढ़ाने वाले हों, श्रद्धा से कभी दूर न हों, हम सर्वदा श्रद्धालु रहें, हमें दान देने के लिए पर्याप्त धन हो, ऐसा कह कर प्रिय वाणी से सत्कार कर प्रणाम करके विसर्जन करे। पहले प्रसन्नतापूर्वक 'वाजे वाजे' इस मन्त्र से पितरों का विसर्जन करे। पहले जिस अर्घ्य पात्र में संश्रव का जल डाला गया था उस पात्र का उत्थापन कर विप्रों को विसर्जित करे। पुनः विप्रों की प्रदक्षिणा
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३६४ \hspace{150pt} नारदीयपुराणम्
पितृपात्रं तदुत्थानं कृत्वा विप्रान्विसर्जयेत् । प्रदक्षिणमनुव्रज्य भुंजीत पितृसेवितम् ॥१३२॥ ब्रह्मचारी भवेत्तां तु रजनीं ब्राह्मणैः सह । एवं प्रदक्षिणावृत्त्या वृद्धौ नांदीमुखान्वितॄन् ॥१३३॥ यजेत दधिकर्कन्धुमिश्रान्पिण्डान्यवैः कृतान् । एकोद्दिष्टं देवहीनमेवार्घ्यकपवित्रकम् ॥१३४॥ आवाहनाग्नौकरणरहितं ह्यपसव्यवतू । उपतिष्ठतामक्षय्यस्थाने विप्रविसर्जने ॥१३५॥ अभिरम्यतामिति वदेद् ब्रूयुस्तेऽभिरताः स्म ह । गंधोदकं तिलैर्युक्तं कुर्यात्पात्रचतुष्टयम् ॥१३६॥ अर्घ्यार्थं पितृपात्रेषु प्रेतपात्रं प्रसेचयेत् । ये समाना इति द्वाभ्यां शेषं पूर्ववदाचरेत् ॥१३७॥ एतत्पिण्डीकरणमेकोद्दिष्ट स्त्रिया अपि । अर्वाक्सपिण्डीकरणं यस्य संवत्सराद्भवेत् ॥१३८॥ तस्याप्यन्नं सोदकुंभं दद्यात्संवत्सरं द्विजे । मृतेऽहनि तु कर्तव्यं प्रतिमासं तु वत्सरम् ॥१३९॥ प्रतिसंवत्सरं चैव मासमेकादशेऽहनि । पिंडांश्चगोऽजविप्रेभ्यो दद्यादग्नौ जलेऽपि वा ॥१४०॥ प्रक्षिपेत्सत्सु विप्रेषुद्विजोच्छिष्टं न मार्जयेत् । हविष्यान्नेन वै मासं पायसेन तु वत्सरम् ॥१४१॥ मात्स्यहारिणकौरभ्रशाकुनच्छागपार्षतैः । ऐणरौरववाराहशशैर्मास्तैर्येनथाश्रमम् ॥१४२॥ मासवृद्ध्याभितृप्यंति दत्तैरिह पितामहाः । खड्गामिषं महाकल्पं मधु मुन्यन्नमेव च ॥१४३॥ लोहामिषं महाशाकं मांसं वार्ध्रीणसस्य च । यो ददाति गयास्थश्च सर्वमानंत्यमश्नुते ॥१४४॥
कर उनको थोड़ी दूर तक पहुँचा दे। इतनी क्रिया समाप्त कर पितृ यज्ञ निमित्त सामग्री में से स्वयं भोजन करे ॥१२६-१३२॥ उस दिन श्राद्धकर्ता और ब्राह्मण भी रात में ब्रह्मचारी रहे । इस प्रकार पुत्र-जन्म और विवाहादि के अवसर पर प्रदक्षिणावृत्ति से नान्दीमुख पितरों का यजन करे । दही और बेर मिले हुए अन्न का पिण्ड दे और सारी क्रियायें यव से करे । एकोद्दिष्ट श्राद्ध में किसी देवता की पूजा नहीं होती। केवल एक पिंड पवित्रक (कुशा) के साथ दिया जाता है ॥१३३-१३४॥ इस श्राद्ध में अपसव्य होकर आवाहन और अग्नि स्थापन नहीं किया जाता। विप्र विसर्जन के समय अक्षय्यमस्तु के स्थान में 'उप- तिष्ठताम्' ऐसा कहा जाता है । पहले विप्रों से 'अभिरम्यताम्' ऐसा कहे, यह सुनकर वे कहें कि "अभिरताः स्म" ॥१३५-३॥ पहले गंधोदक और तिल से युक्त चार पात्र रखे । अर्घ्य के लिए पितृ पात्रों में जल छोड़े और प्रेत पात्र को केवल जल से सींच दे । 'ये समाना...' इस मन्त्र से दो पात्रों में पिण्ड दे और शेष क्रिया पूर्व की भाँति करे ॥१३६-१३७॥ यह सपिण्डीकरण और एकोद्दिष्ट स्त्रियों का भी होना चाहिए । जिसका सपिण्डीकरण श्राद्ध वर्ष पूर्ण होने से पहले हुआ हो उसके लिए संवत्सर पर्यन्त जल कलश के सहित अन्न देना चाहिए । मृत्यु वाले दिन को प्रतिमास श्राद्ध करना चाहिए । यह क्रिया एक वर्ष तक होती रहे ॥१३८-१३९॥ प्रति वर्ष मृत्यु के ग्यारहवें दिन श्राद्ध करके गो या बकरी या इच्छुक विप्र को पिण्ड दे दे । अर्थात् दत्त श्राद्धपिण्ड उनको खिला दे, या अग्नि अथवा जल में फेंक दे ॥१४०॥ जब तक ब्राह्मण लोग भोजन करके वहाँ से उठ न जायें तब तक उच्छिष्ट स्थान पर झाडू न लगाये । पितर हविष्य का पिण्ड देने से एक महीने तक और पायस से एक वर्ष तक तृप्त रहते हैं ॥१४१॥ मछली, मृग, भेड़, पक्षी, बकरी, चितकवरा हरिण, सामान्य हरिण, कृष्ण मृग, वाराह, शशक इनके मांस का पिण्ड देने से पितर क्रमशः एक-एक माह की वृद्धि से अधिक काल तक तृप्त रहते हैं। जो गैंडे का मांस श्राद्ध में पितरों को देता है, उसके पितर महाकल्प पर्यन्त तृप्त रहते हैं। जो गया में पितरों को मधु, लाल बकरे के मांस, महाशाक, वार्ध्रीणस (गैंडे) का मांस का विशेषकर भाद्रपद कृष्ण को मघा का योग होने पर
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३६५ तथा वर्षात्रयोदश्यां मघासु च विशेषतः । कन्यां कन्यावेदिनश्च पशून्वै सत्सुतानपि ॥१४५॥ द्यूतं कृषिं च वाणिज्यं द्विशकैकशफांस्तथा । ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रांत्स्वर्णरूप्ये सकुप्यके ॥१४६॥ ज्ञातिश्रैष्ठ्यं सर्वकामानाप्नोति श्राद्धदः सदा । प्रतिपत्प्रभृतिष्वेकां वर्जयित्वा चतुर्दशीम् ॥१४७॥ शस्त्रेण तु हता ये वै तेभ्यस्तत्र प्रदीयते । स्वर्ग ह्यपत्यमोजश्च शौर्यं क्षेत्रं बलं तथा ॥१४८॥ पुत्रान् श्रेष्ठांश्च सौभाग्यं समृद्धिं मुख्यतां शुभम् । प्रवृत्तं चक्रतां चैव वाणिज्यप्रभृतीनि च ॥१४९॥ अरोगित्वं यशो वीतशोकतां परमां गतिम् । धनं विद्यां भिषक्सिद्धिं कुप्यगा अप्यजाविकम् ॥१५०॥ अश्वानायुश्च विधिवद्यः श्राद्धं संप्रयच्छति । कृत्तिकादिभरण्यांतं सकामानाप्नुयादिमान् ॥१५१॥ आस्तिकः श्रद्दधानश्च व्यपेतमदमत्सरः । वसुरुद्रादितिसुताः पितरः श्राद्धदेवताः ॥१५२॥ प्रीणयंति मनुष्याणां पितॄन् श्राद्धेन तर्पिताः । आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च ॥१५३॥ प्रयच्छंति तथा राज्यं नृणां प्रीताः पितामहाः । इत्येवं कथितं किंचित्कल्पाध्याये विशेषतः ॥१५४॥ ज्ञातव्यं वैदिके तंत्रे पुराणांतरकेऽपि च । य इमं चिंतयेद्विद्वान्कल्पाध्यायं मुनीश्वर ॥१५५॥ स भवेत्कर्मकुशल इहान्यत्र गतिं शुभाम् । यः शृणोति नरो भक्त्या दैवे पित्र्ये च कर्मणि ॥१५६॥ कल्पाध्यायं स लभते दैवपित्र्यक्रियाफलम् । धनं विद्यां यशः पुत्रान्परत्र च गतिं पराम् ॥१५७॥ अतः परं व्याकरणं तुभ्यं वेदमुखाभिधम् । कथयिष्ये समासेन शृणुष्व सुसमाहितः ॥१५८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे एकपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥५१॥ पितरों को देते हैं वे अनन्त काल तक अपने इष्ट पदार्थ को पाते हैं ॥१४२-१४४॥ एक चतुर्दशी को छोड़कर प्रतिपदा से अमावस्या तक की चौदह तिथियों में श्राद्ध करने वाला व्यक्ति क्रमशः सदा रूप शीलयुक्त कन्या, बुद्धिमान् व रूपवान् दामाद, पशु, सत्पुत्र, द्यूत, कृषि, व्यापार में लाभ, दो खुर वाले पशु (गाय, बकरी), एक खुर वाले (घोड़ा आदि), ब्रह्मवर्चस्वी पुत्र, सोना, चांदी, कुप्यक (त्रपु सीसा आदि) कुल में श्रेष्ठता तथा सब इच्छानुकूल पदार्थों को प्राप्त करता है ॥१४५-१४७॥ गया में चतुर्दशी तिथि को केवल शस्त्र से मारे गए पितर के निमित्त पिण्ड दिया जाता है। जो विधिपूर्वक श्राद्ध करता है वह स्वर्ग, संतान, ओज, शौर्य, क्षेत्र, बल, श्रेष्ठ पुत्र, सौभाग्य, समृद्धि, समाज में सम्मानित पद, शुभ स्वभाव, चक्रवर्तित्व, व्यापार में लाभ, स्वास्थ्य, यश, शोकहीनता, परसगति (मुक्ति), धन, विद्या, ओषधि, प्रयोग में निपुणता, कुप्य (त्रपु-सीसा आदि) गौ, बकरी, भेड़, अश्व और दीर्घायु प्राप्त करता है। जो आस्तिक, श्रद्धालु, विनम्र और संयमी व्यक्ति कृत्तिका से भरणी नक्षत्र के अन्त तक श्राद्ध करता है वह क्रमशः उपर्युक्त पदार्थों को प्राप्त करता है। श्राद्ध से तृप्त होकर वसु, रुद्र, आदित्य, ये श्राद्ध देवता पितर मनुष्यों के पितरों को प्रसन्न करते हैं। और ऐसे मनुष्य पर पितामह प्रसन्न होकर उसको आयु, धन, प्रजा, विद्या, स्वर्ग, राज्य, मोक्ष और सुख प्रदान करते हैं ॥१४८-१५३३॥ इस प्रकार संक्षेप में मैंने इस कल्पाध्याय में कुछ कहा है। इस विषय का विशेष ज्ञान, वैदिक तन्त्रों तथा अन्य पुराणों द्वारा विशेष ज्ञान प्राप्त करना चाहिए ॥१५४ ॥ मुनीश्वर ! जो विद्वान् व्यक्ति इस कल्पाध्याय का चिन्तन करता है वह कार्य कुशल हो जाता और लोक-परलोक दोनों में शुभ गति प्राप्त करता है ॥१५५३॥ जो दैव और पितृ कर्म के समय इस कल्पाध्याय को सुनता है वह दैव और पितृ क्रिया का अशेष फल पाता है। साथ ही वह धन, विद्या, यश, पुत्र, आदि लौकिक सुखों को और मृत्यु के बाद परा गति को प्राप्त करता है ॥१५६-१५७॥ अब इसके अनन्तर तुमको वेद मुख का कहे जाने वाले व्याकरण शास्त्र का सूक्ष्म रूप में वर्णन करूँगा उसको सावधान होकर सुनना ॥१५८॥ श्रीनारदीयमहापुराण के पूर्वभाग के द्वितीय पाद में इक्यानवेवां अध्याय समाप्त ॥१५१॥
अथ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सनन्दन उवाच अथ व्याकरणं वक्ष्ये संक्षेपात्तव नारद । सिद्धरूपप्रबंधेन मुखं वेदस्य सांप्रतम् ॥१॥ सुप्तिङंतं पदं विप्र सुपां सप्त विभक्तयः । स्वौजसः प्रथमा प्रोक्ता सा प्रातिपदिकात्मिका ॥२॥ संबोधने च लिंगादावुक्ते कर्मणि कर्तरि । अर्थवत्प्रातिपदिकं धातुप shape/प्रत्ययवर्जितम् ॥३॥ अमौशशो द्वितीया स्यात्तत्कर्म क्रियते च यत् । द्वितीया कर्मणि प्रोक्तान्तरांतरेण संयुते ॥४॥ टाभ्यांभिस्तृतीया स्यात्करणे कर्तरीरिता । येन क्रियते तत्करणं स कर्ता स्यात्करोति यः ॥५॥ ङेभ्यांभ्यसश्चतुर्थी स्यात्सम्प्रदाने च कारके । यस्मै दित्सा धारयेद्वै रोचते संप्रदानकम् ॥६॥ पंचमी स्याङसिभ्यांभ्यो ह्यपादाने च कारके । यतोऽपैति समादत्ते अपदत्ते च यं यतः ॥७॥ ङसोसामश्च षष्ठी स्यात्स्वामिसंबंधमुख्यके । ङ्योस्सुपः सप्तमी तु स्यात्सा चाधिकरणे भवेत् ॥८॥ आधारे चापि विप्रेन्द्र रक्षार्थानां प्रयोगतः । ईप्सितं चानीप्सितं यत्तदपादानकं स्मृतम् ॥६॥ पंचमी पयुपाङ्योगे इतरर्तेंऽन्यदिङ्मुखे । एतैर्योगे द्वितीया स्यात्कर्मप्रवचनीयकैः ॥१०॥
अध्याय ५२ व्याकरण शास्त्र का वर्णन सनन्दन बोले—नारद ! अब तुमको संक्षेप में व्याकरण की शिक्षा दे रहा हूँ जो कि सिद्ध शब्दों के प्रबन्ध क्रम पूर्वक व्याख्या करने के कारण व्याकरण वेद का मुख कहा जाता है ॥१॥ विप्र ! सुबन्त और तिङन्त को पद कहते हैं। सुप् प्रत्याहार में सात विभक्तियाँ होती हैं। सु, औ, जस् प्रथमा है जो प्रातिपदिक स्वरूप मानी गयी है। यह प्रथमा विभक्ति संबोधन, लिङ्ग, वचन आदि में प्रधान कर्म और कर्त्ता में होती है। धातु और प्रत्यय से रहित अर्थवान् शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा है ॥२॥ अम्, औ, शस् द्वितीया है, और जो किया जाता है उसको कर्म कहते हैं। कर्म में और अन्तरा अन्तरेण के संयोग में द्वितीया होती है ॥३॥ टा, भ्याम्, भिस् तृतीया कहलाती है। अप्रधान कर्त्ता और करण में तृतीया होती है ॥४॥ जिससे काम किया जाता है उसको करण और जो करता है उसको कर्त्ता कहते हैं ॥५॥ ङे, भ्याम्, भ्यस् चतुर्थी है जो संप्रदान कहलाता है ॥५-६॥ ङस्-भ्याम्, भ्यस् पंचमी की विभक्तियाँ हैं जो अपादान कारक में होती हैं। जहाँ से कोई जाता है जिससे कोई वस्तु पृथक् होती है। जिससे कोई वस्तु प्राप्त होती है, उसको अपादान कहते हैं ॥७॥ ङस्, ओस्, आम् षष्ठी है जो सेवक-स्वामि-आदि संबन्ध में होती है। ङि, ओस्, सुप् सप्तमी है जो अधिकरण में होती है ॥८॥ विप्रेन्द्र ! रक्षार्थ धातुओं के प्रयोग में, ईप्सित और अनीप्सित को अपादान कहते हैं ॥६॥ परि, अप और आङ् के योग में पञ्चमी होती है। इतर, ऋत, अन्य और दिग्वाचक शब्दों के योग में पञ्चमी होती
द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३६७ लक्षणेत्थंभूतोऽभिर्भागे चानुपर्प्रति । अंतरेषु सहार्थे च हीने ह्युपश्व कथ्यते ॥११॥ द्वितीया च चतुर्थी स्याच्चेष्टायां गतिकर्मणि । अप्राणिषु विभक्ती द्वे मन्यकर्मण्यनादरे ॥१२॥ नमःस्वस्तिस्वधास्वाहाल्वषड्योग ईरिता । चतुर्थी चैव तादर्थ्ये तुमर्थाद्भाववाचिनः ॥१३॥ तृतीयासहयोगे स्यात्कुत्सितऽङ्गे विशेषणे । काले भावे सप्तमी स्यादेतद्योगे च षष्ठ्यपि ॥१४॥ स्वामीश्वराधिपतिभिः साक्षिदायादसुतकैः । निर्धारणे द्वे विभक्ती षष्ठी हेतुप्रयोगके ॥१५॥ स्मृत्यर्थकर्मणि तथा करोतेः प्रतियानके । हिंसार्थानां प्रयोगे च कृतिकर्मणि कर्तरि ॥१६॥ न कर्तृकर्मणोः षष्ठी निष्ठादिप्रतिपादिका । गता वै द्विविधा ज्ञेयाः सुबादिषु विभक्तिषु भूवादिष तिङन्तेषु लकारा दश वै स्मृताः ॥१७॥ तिप्तसंतोति प्रथमो मध्यमः सिप्यस्थोत्तमः । मिब्बस्मसः परस्मै तु पादानां चा मपनेदम् ॥१८॥ त आतांऽते प्रथमो मध्यः से आथे ध्वे तथोत्तमः । ए वहे मह आदेशा ज्ञेया ह्यान्ये लिङादिषु ॥१९॥ नाम्नि प्रयुज्यमाने तु प्रथमः पुरुषो भवेत् । मध्यमो युष्मदि प्रोक्त उत्तमः पुरुषोऽस्मदि ॥२०॥ भूवादया धातवः प्रोक्ताः सनाद्यन्तास्तथा ततः । लडीरितो वर्तमाने भूतेऽनद्यतने तथा ॥२१॥ मास्मयोगे च लङ् वाच्यो लोडाशिषि च धातुतः । विध्यादौ स्या दाशिषि च लिङितो द्विविधो मुने ॥२२॥
है। कर्मप्रवचनीय में लक्षण, इत्थंभूताख्यान, भाग, वीप्सा अर्थों में प्रति, परि, अनु को कर्म प्रवचनीय संज्ञा - द्वितीया होती है। इसी तरह सहायक, अन्तर, हीन अर्थों में उप की कर्म प्रवचनीय संज्ञा होती है ॥१०-११॥ चेष्टा और गति कर्म में द्वितीया और चतुर्थी दोनों होती हैं। अनादर सूचित होने पर मन् धातु अप्राणिबोधक कर्म में द्वितीया और चतुर्थी दोनों होती हैं ॥१२॥ नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलं और वषट् योग में तादर्थ्य, तुमर्थं भाववाचक में चतुर्थी होती है ॥१३॥ सह के योग में, कुत्सित अंग में और विशेषण में तृतीया होती है। काल में और भाव में सप्तमी होती है। स्वामी, ईश्वर, अधिपति, साक्षी, दायाद्, सूतक (प्रसूत) इनके योग में सप्तमी षष्ठी दोनों होती हैं। निर्धा- रण में भी दोनों विभक्तियाँ होती हैं। हेतु शब्द के प्रयोग में षष्ठी होती है। स्मृति अर्थ को बताने वाले शब्दों के योग में कर्ता और कर्म से षष्ठी होती है। निष्ठा, लकारादेश, अव्यय, खलर्थ और तृन् प्रत्याहार के योग में षष्ठी नहीं होती है। सुप् आदि विभक्तियों में कही गयी उपर्युक्त प्रथमा आदि विभक्तियाँ दो प्रकार की हैं अर्थात् कथित अर्थों की अपेक्षा अन्य अर्थों में भी विविक्षा द्वारा वे हो सकती हैं। भू आदि धातुओं से तिङन्त में दश लकार होते हैं ॥१४-१७॥ तिङन्त प्रत्यय में आगे कही हुई विभक्तियाँ होती हैं। तिप्, तस् (अन्ति) को प्रथम पुरुष कहते हैं। सिप्, थस्, थ को मध्यम और मिप्, वस्, मस् को उत्तम पुरुष कहते हैं। ये सब परस्मैपद हैं। आत्मनेपद में त आताम् अन्त प्रथम पुरुष है, से आथाम्, ध्वम् मध्यम पुरुष और इ, वहि, महि उत्तम पुरुष। इनके अतिरिक्त लिङ आदि में और भी आदेश होते हैं, युस्मद्, अस्मद् से अस्मद् से अति- रिक्त संज्ञा शब्दों के प्रयोग में प्रथम पुरुष, युष्मद् के प्रयोग में मध्यम पुरुष और अस्मद् के प्रयोग में उत्तम पुरुष होता है ॥१८-२०॥ भू आदि को, सनाद्यन्त को धातु कहते हैं। उन धातुओं से वर्तमान काल में लट् होता है। अनद्यतन भूत और स्म, मा के योग में लङ् होता है। मुने ! आशीर्वाद में धातु से लोट् लकार होता है। विध्यादि अर्थ में और
३६८ नारदोयपुराणम् लिङतीते परोक्षे स्यात् श्वस्तने लुट् भविष्यति । स्यादनद्यतने लृट् च भविष्यति तु धातुतः ॥२३॥ भूते लुङ् तिप्स्यपौ च क्रियायां लृङ् प्रकीर्तितः । सिद्धोदाहरणं विद्धि संहिताविपुरःसरम् ॥२४॥ दण्डाग्रं च दधोदं च मधूदकं पित्रर्थमः । होतृकारस्तथा सेयं लांगलीषा मनीषया ॥२५॥ गंगोदकं तवल्कार ऋणार्ण च मुनीश्वर । शीतातंश्च मुनिश्रेष्ठ सेंद्रः सौकार इत्यपि ॥२६॥ वध्वासनं पित्रर्थो नायको लवणस्तथा । त आद्या विष्णवे ह्यत्र तस्मा अर्घो गुरा वधः ॥२७॥ हरेऽव विष्णोऽवेत्येषादसोमादप्यमी अघाः । गौरी एतौ विष्णु इमौ दुर्गे अमू नो अर्जुनः ॥२८॥ आ एवं च प्रकृत्यैते तिष्ठंति मुनिसत्तम । षडत्र षण्मातरश्च वाक्छुरो वाग्घस्तिथा ॥२९॥ हरिशेते विभश्चित्यस्तच्छेषो यच्चरस्तथा । प्रश्नस्त्वथ हरिष्षष्ठः कृष्णष्टीकत इत्यपि ॥३०॥ भवान्षष्ठश्च षट् सन्तः षट्टे तल्लेप एव च । चक्रिंश्छिन्धि भवाञ्छौरिर्भवाञ्शौरिरित्यपि ॥३१॥ सम्यङ्डनंतोगंच्छाया कृष्णं वंदे मुनीश्वर । तेजांसि मंस्यते गङ्गा हरिश्चेत्ता मरशिशवः ॥३२॥ राम काम्यः कृप पूज्यो हरिः पूज्योऽर्च्य एव हि । रामो दृष्टोऽबला अत्र सुप्ता इष्टा इमा यतः ॥३३॥ विष्णुर्नम्योरविर्यं गी )( फलं प्रातरच्युतः । भक्तैर्वन्द्योऽप्यंतरात्मा भो भो एष हरिस्तथा । एष शार्ङ्ग सैष रामः संहितैवं प्रकीर्तिता ॥३४॥ रामेणाभिहितं करोमि सततं रामं भजे सादरम् । रामेणापहृतं समस्तदुरितं रामाय तुभ्यं नमः ॥३५॥
आशीर्वाद में लिङ् लकार होता है । इस प्रकार लिङ् लकार के विधि लिङ् और आशीर्लिङ् दो भेद होते हैं। परोक्ष भूत में लिट् लकार होता है। कल होने वाले अर्थात् अनद्यतन भविष्यत् में लुट् लकार होता है । धातु से भविष्यत् काल में लृट लकार का प्रयोग होता है। भूतार्थ में लुङ् और क्रिया की अनिष्पत्ति में लृङ् लकार होता है । २१-२३॥ अब संहिताओं (सन्धियों) को सिद्ध शब्दों के उदाहरण द्वारा समझा रहा हूँ, सुनो। मुनिश्रेष्ठ ! दण्डाग्रम्, दधोदम्, मधूदकम्, पित्रर्थमः, वध्वासनम्, पित्रर्थः, होतृकार और लांगलीषा, मनीषा, गंगोदकम्, तवल्कारः, ऋणार्णम् । शीतार्तः सेंद्रः, सोकारः ये सन्धियों के उदाहरण हैं । वध्वासनम्, पित्रर्थः, नायकः, लवणः, ते आद्या, विष्णवे, ह्यत्र, तस्मा अर्धः, गुरावध, हरेऽव, विष्णोऽव, इत्येव ये भी सन्धि के उदाहरण हैं। अदसो मात् इस सूत्र से अमी अघाः, गौरी एतौ, विष्णूइमौ, दुर्गे अमू, नो अर्जुनः, आ एवम् यहाँ पर प्रकृति भाव ही होता है, कोई सन्धि नहीं होती । षडत्र, षण्मातरः, वाक्छुरः, वाग्घरिः, हरिशेते विभुश्चिन्त्यः तन्छेषः, यच्चरः, प्रश्नः, हरिष्षष्ठः, कृष्णष्टीकते ये भी उदाहरण हैं। भवान्षष्ठश्च, षट्सन्तः, षट्टे, तल्लेपः, चक्रिंश्छिन्धि, भवाञ्छौरिः, भवाञ्छौरिः ये भी सन्धियों के उदाहरण हैं । मुनीश्वर ! सम्यङ्डनन्तः, गञ्च्छाया, कृष्णं वन्दे, तेजांसि, मंस्यते, गङ्गा, हरिश्चेत्ता, अमरशिशवः, रामः काम्यः, कूपः पूज्यः, हरिः पूज्योऽर्च्य एव, रामो दृष्टः, अबला अत्र सुप्ताः, दृष्टाः, इमाः विष्णुर्नम्यः, रविरयम्, गीः फलम्, प्रातरच्युतः, भक्तैर्वन्द्योऽप्य अन्तरात्मा और भो भो एष हरिः, एष शार्ङ्ग, सैषरामः इन उदाहरणों से संहिताओं का वर्णन किया गया है ॥२४- ३४॥ "रामो राजमणिः सदा विजयते रामं भजे सादरम्, रामेणापहृतं समस्तदुरितं रामाय तुभ्यं नमः । रामान्मुक्ति- मभीप्सिता मम सदा रामस्य दासोऽस्म्यहम्, रामे रंजतु मे मनः सुविशदं हे राम ! तुभ्यं नमः । इस श्लोक में प्रथमा से लेकर सप्तमी तक का उदाहरण है ।
१. एष चिन्त्यः पाठः । २. यहपाठरामरक्षास्तोत्र में पाया जाता है ।
द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३६६ सर्व इत्यादिका गोपाः सखा चैव पतिर्हरिः ॥३६॥ सुश्रीर्भानुः स्वयंभूश्च कर्ता रौ गौस्तु नौरिति । अनड्वाङ्गोघुग्लिट् च द्वौ त्रयश्चत्वार एव च ॥३७॥ राजा पंथास्तथा दंडी ब्रह्महा पंच चाष्ट च । अष्टौ अयं मुने सम्राट् सविश्रद्वपुष्मान्ः ॥३८॥ प्रत्यङ् पुमान्महान् धीमान् विद्वान्षट् पिपठीश्च दोः । उशनासाविमे पुंसि स्युरक्षतबलविरामकाः ॥३६॥ राधा सर्वा गतिर्गोपी स्त्री श्रीर्धेनुर्वधूः स्वसा । गोर्नौरुपान दुह्र्गोः क्षुत् ककुप्संवित्तु वा क्वचित् ॥४०॥ रुग्विदुदृक्षाः स्त्रियास्तपः कुलं सोमपमक्षि च । ग्रामण्यंबुखलप्वेवं कर्तृ चातिरि वातिनु ॥४१॥ स्वनडुच्च विमलद्यु वाश्चत्वारीदमेव च । एतद्ब्रह्माहश्च दंडी असृक्किंचित्त्यदार्धि च ॥४२॥ एतद्भेद्गवाक्गवाङ् गोअक् गोङ्गोक् गोङ् । तिर्यग्यकृच्छकृच्चैव ददद्भवत्पचत्तुदत् ॥४३॥ वीव्यद्वनुश्च पिपठीः पयोऽदःसुपुमांसि च । गुणद्रव्यक्रियायोगांस्त्रिलिंगांश्च कति ब्रुवे ॥४४॥ शुक्लः कीलालपाश्चैव शुचिश्च ग्रामणीः सुधीः । पटुः स्वयंभूः कर्ता च माता चैव व पिता च ना ॥४५॥ सत्यानायुस्तथा पुंसो मतभ्रमरदीर्घपात् । धनाढ्यसोमौ चागहंस्तादृग्योस्वर्णवहू ॥४६॥ रिमषन्विष्वद्वङ्जातानहो तथा सर्वं विश्वोभये चोभौ अन्यांतरेतराणि च ॥४७॥ उत्तरश्चोत्तमो नेमस्त्वसमोऽथ समा इषः । पूर्वोत्तोत्तराश्चैव दक्षिणश्चोत्तराधरौ ॥४८॥
अब सुबन्त शब्दों का उदाहरण दिया जाता है। सर्वः आदि, गोपाः, सखा, पतिः, हरिः, सुश्रीः, भानुः, स्वयम्भूः, कर्ता, राः, गौः, नौः, अनड्वान्, गोधुक्, लिट् द्वे, त्रयः, चत्वारः, राजा, पन्थाः, दण्डी, ब्रह्महा, पंच, अष्ट, अष्टौ, अयम्, सम्राट्, सुराट्, वपुष्मान्, प्रत्यङ, पुमान्, महान्, धीमान्, विद्वान्, षट्, पिपठीः, दोः और उशना—ये अजन्त (स्वरान्त) और हलन्त पुलिंग शब्द कहे गए हैं ॥३६-३९॥ राधा, सर्वा, गतिः, गोपी, स्त्री, श्रीः, धेनुः, वधूः, स्वसा, गौः, नौः, उपानत्, द्योः, क्षुत्, ककुप्, संवित्, रुक्, विद्, उदृक्षाः—ये स्त्रीलिंग शब्द हैं। तपः, कुलम्, सोमपम्, अक्षि, ग्रामणि, अम्बु, खलपु (खलिहान साफ करने वाला), कर्तृ, अतिरि (धन की सीमा को लांघने वाला कुल), अतिनु (जिसे नाव से पार करना असंभव हो), स्वनडुत् (जिसके कुल या गृह में गाड़ी खींचने वाले अच्छे बैल हों), विमलद्यु (निर्मल आकाश वाला दिन), वाः (जल), चत्वारि, इदम्, एतत्, ब्रह्म, अहः, दण्डि, असृक् (रक्त), किम्, चित्, त्यत्, एतत्, बेभित्, गवाक्—गवाग्—गोअक्—गोअग्—गोक्—गोग्— गवाङ्—गोअङ्—गोङ् (गाय के पास जाने वाला, पूजा पक्ष में अर्थ गोपूजक), तिर्यक् (पशु-पक्षी), यकृत् (कलेजा तथा उससे सम्बद्ध रोग), शकृत् (विष्ठा), ददतु भवत्, पचत्, तुदत्, दीव्यत्, धनुः, पिपठीः, पय, अदः, सुपुम्— ये नपुंसकलिंग शब्द हैं। अब ऐसे शब्दों का वर्णन किया जा रहा है जो गुण, द्रव्य और क्रिया के सम्बन्ध से तीनों लिंगों में प्रयुक्त होते हैं। शुक्लः, कीलालपाः, शुचिः, ग्रामणीः, सुधीः, पटुः, स्वयम्भूः, कर्ता, माता, पिता, न्रा, सत्यः, अनायुः, अपुमान्, मतः, भ्रमरः, दीर्घपात्, धनाढ्यः, सोमः, अगहंः, तादृक्, स्वर्णः, वहूः—ये शब्द तीनों लिंगों में प्रयुक्त होते हैं ॥४०-४६॥ अब सर्वनाम शब्दों को सूचित करते हैं—सर्व, विश्व, उभय, उभ, अन्य, अन्यतर, इतर, उत्तर, उत्तम, नेम, स्व, स्वत्, सम, सिम्, पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अधर, अपर, स्व, अन्तर, त्यद्, तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदस्, किम्, एक, द्वि, युष्मद्, अस्मद्, भवत् । ये सर्वनाम हैं और इनके रूप प्रायः सर्व शब्द ४७ ना० पु०
३७० नारदीयपुराणम् अपरश्चतुरोऽप्येतद्यावत्ताक्तिकमसौ द्वयम् । युष्मदस्मच्च प्रथमश्चरमोऽल्पस्तथार्धकः ॥४८॥ नोरः कतिपयो द्वे च त्रयो शुद्ध्रादयस्तथा । स्वेकाभुविरोधपरि विपर्ययश्चाव्ययास्तथा ॥५०॥ तद्धिताश्चाप्यपत्यार्थं पांडवाः श्रैधरस्तथा । गार्ग्यो नाडायनात्रेयौ गांगेयः पैतृष्वसीयः ॥५१॥ देवतार्थे चेदमर्थे ह्येन्द्र ब्राह्मो हविर्बली । क्रियायुजोः कर्मकत्र्तोर्धौरेयः कौङ्कुमं तथा ॥५२॥ भवाद्यर्थे तु कानीनः क्षत्रियो वैदिकः स्वकः । स्वार्थे चौरस्तु तुल्यार्थे चंद्रवन्मुखमीक्षते ॥५३॥ ब्राह्मणत्वं ब्राह्मणता भावे ब्राह्मण्यमेव च । गोमान्धनी च धनवानस्त्यर्थे प्रमितौ कियान् ॥५४॥ जातार्थे तुंदिलः श्रद्धालु रौन्नत्ये तु दंतुरः । स्रग्वी तपस्वी मेधावी मायाव्यस्त्यर्थ एव च ॥५५॥ वाचाटो वाचालश्चैव बहुकुत्सितभाषिणि । ईषदपरिसमाप्तौ कल्पब्देशीय एव च ॥५६॥ कविकल्पः कविदेश्यः प्रकारवचने तथा । पटुजातीयः कुत्सायां वैद्यपाशः प्रशंसने ॥५७॥ वैद्यरूपो भूतपूर्वे मतो दृष्टचरो मुने । प्राचुर्यादिष्वन्नमयो मृण्मयः स्त्रीमयस्तथा ॥५८॥ जातार्थे लज्जितोऽत्यर्थं श्रेयाञ्श्रेष्ठश्च नारद । कृष्णतरः शुक्लमः किम् आख्यानतोऽव्ययान् ॥५९॥ किंतरां चैवातितरामभिद्युच्चैस्तरामपि । परिमाणे जानुदघ्नं जानुद्वयसमित्यपि ॥६०॥ जानुमात्रं च निर्धार बहुनां व द्वयोः क्रमात् । कतमः कतरः संख्येयविशेषावधारणे ॥६१॥ द्वितीयश्च तृतीयश्च चतुर्थः षष्ठपंचमौ । एकादशः कतिपयः कतिथः कति नारद ॥६२॥ के समान हो हैं। प्रथम, चरम, तय, अल्प, अर्ध, कतिपय और नेम--इन शब्दों के प्रथमा के बहुवचन में दो रूप होते हैं। स्वरादि और निपात तथा उपसर्ग, विभक्ति एवं स्वर के प्रतिरूपक शब्द अव्ययसंज्ञक होते हैं ॥४७-५०॥ तद्धित के उदाहरण ये हैं-पांडवाः श्रैधरः, गार्ग्यः, नाडायनः, आत्रेयः, गांगेयः, पैतृष्वस्त्रीयः। देवता अर्थ में, इदम् अर्थ में ऐन्द्र और ब्राह्म शब्द बनते हैं। क्रिया से युक्त रहने वाले कर्म और कर्त्ता में तद्धित प्रत्यय होते हैं, जैसे धौरेय और कौङ्कुम । भवादि अर्थ में कानीन, क्षत्रिय, और वैदिक निष्पन्न होते हैं। स्वकः में स्वार्थ में कन् प्रत्यय हुआ है। चौर में भी स्वार्थ में ही अ प्रत्यय हुआ है। तुल्यार्थ में चन्द्रवन् मुखमीक्षते में वत् प्रत्यय है। ब्राह्मणत्व, ब्राह्मणता, ब्राह्मण्य यहीं भाव में प्रत्यय हैं। गोमान्, धनी और धनवान् में अस्त्यर्थ में प्रत्यय हुआ है। प्रमिति अर्थ में कियान् शब्द बनता है। जातार्थ में ही तुन्दिलः, श्रद्धालुः बनते हैं। औन्नत्यार्थ में दन्तुर होता है। स्रग्वी, तपस्वी, मेधावी और मायावी अस्त्यर्थ में ही होते हैं। अधिक और अनापशनाप बकने वाले के अर्थ में वाचाल और वाचाट बनते हैं। अल्प और असमाप्ति के अर्थ में कल्पप्, देश्य तथा देशीय प्रत्यय होते हैं। कविकल्पः, कविदेश्यः इसके उदाहरण हैं। प्रकार वचन में पटुजातीयः, कुत्सा में वैद्यपाशः, प्रशंसा अर्थ में वैद्यरूपः प्रयोग बनता है। मुने ! भूतपूर्वे इस अर्थ में दृष्टचर होता है। प्राचुर्य आदि अर्थ में अन्नमय, मृण्मय और स्त्रीमय होता है। नारद ! जातार्थ में लज्जित, अत्यर्थ में श्रेयान् ओर श्रेष्ठ बनता है। इसी प्रकार अपेक्षाकृत अधिक अर्थ में कृष्णतर तथा शुक्लम प्रयोग होते हैं। किम्, क्रियावाचक शब्द (तिङन्त) और अव्यय से परे जो तर और तम प्रत्यय हैं, उनके अन्त में आम् लग जाता है। उदाहरण के लिए किन्तराम्, अतितराम् तथा उच्चैस्तराम् आदि प्रयोग हैं ॥५१-५६३॥ प्रमाण में जानुदघ्नम्, जानुद्वयसम् और जानुमात्रम् बनता है। बहुतों में से एक का निर्धारण करने और दो में से एक का निर्धारण करने में कतमः कतरः बनता है। नारद ! संख्येय विशेष के निश्चय में द्वितीयः तृतीयः, चतुर्थः, षष्ठः, पंचम, एकादशः, कतिपयः, कतिथः, कति, विंशः, विंशतितमः और शततमः बनते हैं।
द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३७१ विंशश्च विंशतितमस्तथा शततमादयः । द्वेधा द्वैधा द्विधा संख्या प्रकारेऽथ मुनीश्वर ॥६३॥ क्रियावृत्तौ पंचकृत्वो द्विखिर्बहुश इत्यपि । द्वितयं त्रितयं चापि संख्यायां हि द्वयं त्रयम् ॥६४॥ कुटीरश्च समीरश्च शुंडारोऽल्पार्थके मतः । स्त्रैणः पौंस्नस्तुंडिभश्च वृन्दारककृषीवलौ ॥६५॥ मलिनो विकटो गोमी मौरिकीविधमुत्कटम् । अवटीटोवनाटे च निबिडं चेश शाकिनम् ॥६६॥ निबिरीसमेषुकरी वित्तोविद्याचणस्तथा । विद्याचुंचुर्बहुतिथं पर्वतः शृंगिणस्तथा ॥६७॥ स्वामी विषम रूप्यं चोपत्यकाधित्यका तथा । चिल्लश्च चिपिटं चिक्कवं वातूलः कुतपस्तथा ॥६८॥ वल्लश्च हिमेलुश्च कहोडश्चोपडस्ततः । ऊर्णायुश्च मरुत्तश्चैकाकी चर्मण्वती तथा ॥६९॥ ज्योत्स्ना तमिस्रा ष्ठीवश्च कक्षोवच्चमंण्वती । आसंदीवच्च चक्रीवत्तूष्णीकां जल्पत्क्यपि ॥७०॥ कंभश्च कंयुः कंक्श्व नारदकेतिः कंतुः कंतकंपौ शंवस्तथैव च । शंतः शंतिः शंयशंतौ शंयोर्हंयुः शुंभयुवत् ॥७१॥ भवति बभूव भविता भविष्यति भवत्वभवद्भवेच्चापि ॥७२॥ भूयादभूदभविष्यल्लादावेतानि रूपाणि । अत्ति जघासात्तात्स्यत्यत्त्वाद्दद्यादघसदात्स्यत् ॥७३॥ जुहोति जुहाव जुहवांचकार होता होष्यति जुहोतु । अजुहोज्जुहुयाद्धूयादहौसोदहोष्यदात्येति ॥७४॥ दिदेव देविता देविष्यति च अदीव्यद्दीव्येद्दीप्याद्वै । अदेवीददेविष्यत्सुनोति सुषाव सोता सोष्यति वै ॥७५॥ सुनोत्वसुनोत्सुनुयात्सूयादसावीदसोष्यत्तुदति च । तुतोद तोत्ता तोत्स्यति तुदत्वतुदत्तुदेत्तुद्याद्वि ॥७६॥ अतौत्सीदतोत्स्यदिति च रणद्धि ररोध रोद्धा रोत्स्यति वै
मुनीश्वर ! संख्यावाची शब्दों से प्रकार अर्थ में द्वेधा, द्वैधा, द्विधा बनते हैं। क्रिया आवृत्ति के पंचकृत्वः, द्विः, त्रिः और बहुशः उदाहरण हैं। द्वितय त्रितय और द्वयम्, त्रयम् संख्या में होते हैं। कुटीर, समीर और शुण्डार अल्पार्थक हैं। स्त्रैणः, पौंस्नः, तुंडिभः, वृन्दारकः, कृषीवलः, मलिनः, विकटः, गोमी, मौरिकी विधम्, उत्कटम्, अवटीटः, अवनाटः, निविडम्, इक्षुशाकिनम्, निविएीसम्, ऐषूकारिभक्तम्, विद्याचणः, विद्या चुञ्चुः, बहुतिथम्, पर्वतः, शृङ्गिणः, स्वामी, विषमरूप्यम्, उपत्यका, अधित्यका, चिल्लः, चिपिटम्, चिक्कम्, वातूलः, कुलुपः, बलूलः, हिमेलुः, कहिकः, उपडः, ऊर्णायुः, मरुत्तः, एकाकी, चर्मण्वती, ज्योत्स्ना, तमिस्रा, अष्ठीवत्, कक्षोवत्, चमण्वती, आसन्दीवत्, चक्रीवत्, तूष्णीकाम्, जल्पतकि, कंवः, कंभः, कंयुः,, कन्तिः, कन्तुः, कन्त:, कंयः, शंवः, शम्भः, शन्तिः, शन्तुः, शंतः, अह्रंयुः, शुंभंयुः ॥६०-७१॥
अब तिङन्त के रूप कहे जाते हैं, सुनो--भवति, बभूव, भविता, भविष्यति, भवतु, अभवत्, भवेत्, भूयात, अभूत्, अभविष्यत्—भू धातु के नौ लकार में इतने रूप होते हैं। अत्ति, जघास, अत्ता, अत्स्यति, अत्तू, आदत्, अद्यात्, अघसत, आत्स्यत्-ये अद् के रूप हैं। जुहोति, जुहाव, जुहवांचकार, होता, होष्यति, जुहोतु, अजुहोत, जुहुयात, हूयात, अहौसीत्, अहोष्यत्-ये हु धातु के रूप हैं। दीव्यति, दिदेव, देविता, देविष्यति, अदीव्यत, दीव्येत, दीव्यात, अदेवीत्, अदेविष्यत्-ये दिव् धातु के रूप हैं। सुनोति, सुषाव, सोता, सोष्यति, सुनोतु, असुनोत, सुनुयात, सूयात, असावीत, असोष्यत्-ये सु के रूप हैं। तुदति, तुतोद, तोत्ता, तोत्स्यति, तुदतु, अतुदत, तुदेत, तुद्यात्, अतौत्सीत्, अतोत्स्यत्-ये तुद् के नव लकारों के रूप हैं। रणद्धि, ररोध, रोद्धा, रोत्स्यति, रणद्ध, अरुणत्, रुन्ध्यात्, रुच्यात, अरोत्सीत् अरोत्स्यत्--ये रुध धातु के रूप हैं।
३७२ नारदीयपुराणम् रुणद्धु अरुणद्धूध्यादरौत्सीदरोत्स्यच्च । तनोति ततान तनिता तनिष्यति तनोत्वतनोत्तनुयाद्धि ॥७७॥ अतनीच्चातानीदतनिष्यत्क्रीणाति चिक्राय क्रेता क्रेष्यति क्रीणात्विति च । अक्रीणात्क्रीणीयात्क्रीयादक्रेषीदक्रेष्यच्चोरयति चोरयामास चोरयिता चोरयिष्यति चोरयतु ॥७८॥ अचोरयच्चोरयेच्चोर्यात् अचूचुरदचोरिष्यदित्येवं दश वगणाः । प्रयोजके भावयति सनीच्छायां बुभूषति ॥७९॥ क्रियासमभिहारे तु पंडितो बोभूयते मुने । तथा यङ्लुकि बोभवीति च पठ्यते । पुत्रीयतीत्यात्मनीच्छायां तथाचारेऽपि नारद ॥८०॥ अनुदात्तजितो धातोः क्रियाविनिमये तथा । निविशादेस्तथा विप्र विजानीह्यात्मनेपदम् । परस्मैपदमाख्यातं शेवात्कर्तरि शाब्दिकैः ॥८१॥ जित्स्वरितेतश्च उभे यक्च स्याद्भावकर्मणोः । सौकर्यातिशयं चैव यदा द्योतयितुं मुने ॥८२॥ विवक्ष्यते न व्यापारो लक्ष्ये कर्तुस्तदापरे । लभंते कर्तृतां पश्य पच्यते ह्योदनः स्वयम् ॥८३॥ साधु वासिश्छिनत्त्येवं स्थाली पचंति वै मुने । धातोः सकर्मकाद्भावे कर्मण्यपि लप्रत्ययाः ॥८४॥ तस्मै वाकर्मकाद्विप्र भावे कर्तरि कीर्तितः । फलव्यापारयोरेकनिष्ठतायामकर्मकः ॥८५॥ धातुस्तयोर्धर्मिभेदे सकर्मक उदाहृतः । गौणे कर्मणि दुह्यादेः प्रधाने नीहृकृष्वहाम् ॥८६॥ बुद्धिभक्षार्थयोः शब्दकर्मकाणां निजेच्छया । प्रयोज्य कर्मण्यन्येषामण्यंतानां लादयो मताः ॥८७॥
तनोति, ततान, तनिता, तनिष्यति, तनोतु, अतनोत्, तनुयात्, तन्यात्, अतानीत् अतनिष्यत्-ये तनु के रूप हैं। क्रीणाति, चिक्राय, क्रेता, क्रेष्यति; क्रीणातु, अक्रीणात्, क्रीणीयात्, क्रीयात्, अक्रेषीत्, अक्रेष्यत्-ये क्री के रूप हैं। चोरयति, चोरयामास, चोरयिता, चोरयिष्यति, चोरयतु, अचोरयत, चोरयेत्, चोर्यात्, अचूचुरत्, अचोरयिष्यत्-ये चुर् धातु के रूप हैं। इस प्रकार ये धातुओं के दस गण माने गये हैं ॥७९-८८॥ मुने ! प्रयोजक (प्रेरणा) में भावयति, सनोच्छा में बुभूषति, क्रियासमभिव्याहार में बोभूयते और यङ्लुक् में बोभवीति होता है। नारद ! आचार अर्थ और इच्छा अर्थ में पुत्रीयति होता है। हे विप्र ! अनुदात्तेत् धातु तथा ङकार इत्संज्ञक धातु से आत्मनेपद होता है। जहाँ क्रिया का विनिमय होता हो वहाँ भी आत्मनेपद होता है। निपूर्वक विश् धातु से आत्मनेपद होता है। आत्मनेपद के जितने निमित्त हैं, उन्हें छोड़कर शेष धातुओं से कर्ता में परस्मैपद होता है, ऐसा वैयाकरणों का कथन है। ङित् तथा स्वरितेत् धातु से उभयपद होता है। भाव और कर्म में यक् प्रत्यय होता है। मुने ! अत्यन्त सौकर्य व्यक्त करने के लिए जब कर्ता के व्यापार की विवक्षा नहीं की जाती तब कर्ता से अतिरिक्त भी कर्ता के समान हो जाते हैं। जैसे औदनः स्वयमेव पच्यते। असिः साधु छिनत्ति (खङ्गस्वयं काटता है)। स्थाली पचंति (बटलोई पकाती है)। सकर्मक धातुओं से कर्म और भाव में लप्रत्यय होते हैं, अकर्मक से भाव और कर्ता में। जब फल और व्यापार एकनिष्ठ होते हैं तब धातु अकर्मक होता है और जब ये दोनों धर्मिभेद में अर्थात् दो में रहते हैं तब वह धातु सकर्मक होता है। द्विकर्मक दुह् आदि के गौण कर्म में और नी, हृ, कृष्, वह् के प्रधान कर्म में, बुद्धि भक्षणार्थक एवं शब्द कर्माक धातुओं के दोनों कर्मों में इच्छानुसार प्रत्यय होते हैं अन्य ण्यन्त धातुओं के प्रयोज्य कर्म में लकारादि
द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३७३ फलव्यापारयोर्द्धातुराश्रये तु तिङ् स्मृताः । फले प्रधानं व्यापारस्तिङर्थस्तु विशेषणम् ॥८८॥ एधितव्यमेधनीयमिति कृत्यै निदर्शनम् । भावे कर्मणि कृत्याः स्युः कृतः कर्तरि कीर्तिताः ॥८६॥ कर्ता कारक इत्याद्या भूते भूतादि कीर्तितम् । गम्यादिगम्ये निर्दिष्टं शेषमद्यतने मतम् ॥६०॥ अधिस्त्रीत्यव्ययीभावे यथाशक्ति च कीर्तितम् । रामाश्रितस्तत्पुरुषे धान्यार्थो यूपदारु च ॥६१॥ व्याघ्रभी राजपुरुषोऽक्षशौंडो द्विगुरुच्यते । पंचगवं दशग्रामी त्रिफलेति तु रूढितः ॥६२॥ नीलोत्पलं महाषष्ठी तुल्यार्थे कर्मधारयः । अब्राह्मणो नञि प्रोक्तः कुंभकारादिकः कृता ॥६३॥ अन्यर्थे तु बहुव्रीहौ ग्रामः प्राप्तोदको द्विजः । पंचगू रूपवद्भार्यो मध्याह्नः ससुतादिकः ॥६४॥ समुच्चये गुरुं चेशं भजस्वान्वाचये त्वट । भिक्षामानय गां चापि वाक्यमेवानयोर्भवेत् ॥६५॥ इतरेतरयोगे तु रामकृष्णौ समाहृतौ । रामकृष्णं द्विज द्वे द्वे ब्रह्म चैकमुपास्यते ॥६६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे व्याकरणनिरूपणं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५२॥
प्रत्यय होते हैं। धातु का अर्थ फल और व्यापार हैं, आश्रय तिङ् का अर्थ है। फल और व्यापार दोनों में व्यापार ही प्रधान होता है, तिङर्थ सदा विशेषण होता है ॥८९-८८॥ [अब कृदन्त प्रकरण प्रारंभ करते हैं] एधितव्यम् और एधनीयम् ये कृत्य प्रत्यय के उदाहरण हैं। कृत्य प्रत्यय भाव और कर्म में होते हैं और कृत् प्रत्यय कर्ता में होते हैं। कर्ता, कारक इत्यादि कृत् के उदाहरण हैं। भूत में भूत आदि उदाहरण कहे गए हैं। गम्य आदि शब्द भविष्यत् अर्थ में निर्दिष्ट हुए हैं। शेष शब्द वर्तमानकाल में प्रयुक्त होने योग्य माने गये हैं। [अब समास का प्रकरण आरंभ करते हैं--] अधिस्त्रि, यथाशक्ति अव्ययीभाव है। रामाश्रितः, धान्यार्थः, यूपदारु, व्याघ्रभीः, राजपुरुषः, अक्ष शौण्डः तत्पुरुष समास हैं। पंचगवम्, दशग्रामी, त्रिफला द्विगु के उदाहरण हैं। नीलोत्पलम् और महाषष्ठी में तुल्यार्थ में कर्मधारय है। अब्राह्मणः में नञ् समास है। कुम्भकारादि में कृदुपपद के साथ समास होता है। अन्यर्थ में बहुव्रीहि समास होता है, जिसके उदाहरण प्राप्तोदको ग्रामः, पंचगुः रूपवद्भार्यः हैं। मध्याह्नः और ससुतः आदि भी समास के उदाहरण हैं। (द्वन्द्वसमास में) समुच्चय में 'गुरुं चेशं भजस्व' इत्यादि में और 'अट भिक्षां गां चानय' इस अन्वाचय में वाक्य ही रहेगा, समास नहीं होगा। इतरेतरयोग द्वन्द्व का 'रामकृष्णौ उदाहरण है। समाहार द्वन्द्व में नपुंसकलिंग होता है, विप्रवर ! इतरेतरयोग में राम और कृष्ण दोनों दो हैं और समाहार में उनकी एकता है, इसलिए ब्रह्मरूप से उन्हें एक मानकर उनकी उपासना की जाती है ॥८९-९६॥ श्रीनारदीयमहापुराण में बावनवाँ अध्याय समाप्त ॥५२॥
अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सनंदन उवाच निरुक्तं ते प्रवक्ष्यामि वेदं श्रोत्रांगमुत्तमम् । तत्पंचविधमाख्यातं वैदिकं धातुरूपकम् ॥१॥ क्वचिद्वर्णागमस्तत्र क्वचिद्वर्णविपर्ययः । विकारः क्वापि वर्णानां वर्णनाशः क्वचिन्मतः ॥२॥ तथा विकारनाशाभ्यां वर्णानां यत्र नारद । धातोर्योगातिशायी च संयोगः परिकीर्तितः ॥३॥ सिद्धेद्वर्णागमाद्धंसः सिंहो वर्णविपर्ययात् । गूढोत्मा वर्णविकृतेर्वर्णनाशात्पृषोदरः ॥४॥ भ्रमरादिषु शब्देषु ज्ञेयो योगो हि पञ्चमः । बहुलं छन्दसीत्युक्तमत्र वाच्यं पुनर्वसु ॥५॥ नभस्वद्वृषणश्वश्चापरस्मैपदि चापि हि । परं व्यवहिताश्चापि गतिसंज्ञास्तु याङि आ ॥६॥ विभक्तीनां विपर्यासो यथा दघ्ना जुहोति हि । अभ्युत्साद्यामकेतुर्ध्वनयीत्प्रमुखास्तथा । निष्टभ्यास्तथोक्ताश्च गृभायेत्यादिकास्तथा ॥७॥ सुप्तिङुपग्रहलिंगनराणां कालहलच्स्वरकर्तृ यङां च । व्यत्ययमिच्छति शास्त्रकृदेषां सोऽपि च सिद्ध्यति बाहुलकेन ॥८॥ रात्री विम्वी च कद्रूश्चाविष्ट्वो वाजसनेयिनः अध्याय ५३ निरुक्त-निरूपण सनन्दन बोले--अब मैं वेद के श्रोत्राङ्ग रूप निरुक्त का वर्णन कर रहा हूँ। वैदिक धातु रूप की निरुक्ति पाँच प्रकार से की गई है उसमें कहीं तो वर्णागम होता, कहीं वर्षों में विपर्यय (उलटफेर), कहीं वर्ण-विकार और कहीं वर्ण-विनाश ॥१-२॥ नारद ! जहाँ वर्णनाश और वर्णविकार दोनों की आवश्यकता पड़ती है वहाँ वैसा भी किया जाता । कहीं धातु का योगातिशायो संयोग भी कहा गया है ॥३॥ वर्णागम से हंस की सिद्धि होती है वर्ण विपर्यय से सिंह की (अर्थात् हिंस में स के विपर्यय से सिंह शब्द बनता है)। गूढोत्मा में वर्णविकृति और पृषोदर में वर्ण नाश से सिद्धि हुई है ॥४॥ भ्रमर आदि शब्दों में पाँचवां योग है। वेद में लौकिक नियमों का विकल्प या विपर्यय कहा गया है। इसका उदाहरण 'पुनर्वसु' है जो नित्य द्विवचनान्त होने पर वेद में एकवचनान्त होकर प्रयुक्त हुआ है ॥५॥ कहीं आत्मनेपद के स्थान पर परस्मैदी प्रयोग वेद में होते हैं। नभस्वत, वृषणश्व, भी इसके उदाहरण है। प्रआदि उपसर्ग वेद में धातु के बाद या व्यवधान से आने पर भी उपसर्ग एवं गति संज्ञक होते हैं जैसे गाहि आ ॥५-६॥ विभक्ति विपर्यय 'दध्ना जुहोति' में है। अभ्युत्साद्यामकः, 'ध्वनयोत्' 'निष्टम्व्यं' और 'गृभाय' आदि वैदिक उदाहरण है ॥७॥ शास्त्रकार सुप्, तिङ्, उपग्रह (परस्मैपद, आत्मनेपद) लिङ्ग, पुरुष, काल, हल्, अच्, स्वर, कर्ता और यङ् इनमें व्यत्यय करना चाहते हैं परन्तु यह सब कुछ बाहुलक के द्वारा सिद्ध हो जाता है ॥८॥ रात्री, विम्बी, कद्रूः, आविष्ट्यः, वाजसनेयिनः, कर्णेभिः, यशोभाग्यः चतुरक्षरम्, देवासः, सर्वदेवताति, त्वावतः,
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३७५ कर्णेभिश्च यशोभाग्य इत्याद्याश्चतुरक्षरम् । देवासोऽथो सर्वदेवतास्तित्त्वावत इत्यपि ॥१७०॥ उभयाविनमाद्याश्च प्रत्ययाद्याश्च स्तृचं तथा । अपस्पृधेथां नो अव्यादापो अस्मान्मुखास्तथा ॥१७१॥ सगर्भ्योऽष्टापदी ऋत्व्योरजिष्ठं त्रिपंचकम् । हिरण्ययेन नरं च परमे व्योमनित्यपि ॥१७२॥ उर्विया स्वप्रया वारव्श्वाददुह्लवैवधौ । यजश्वैनमेमसि च स्नात्वी गत्वायचास्थभिः ॥१७३॥ गोनांचापरिवृवृत्ताश्चातुरिर्ग्रसितादिका । पश्वेदधद्वभूथापि प्रमिणांतीत्यवीवृधत् ॥१७४॥ मित्रयुश्च दुरस्युर्वा हीत्वा सुधितमित्यपि । दाधर्त्याद्या स्ववद्भिम्श्च ससुवेति च धिष्व च ॥१७५॥ प्रप्राये च हरिवतेक्षणवन्तः सुपथिन्तरः । स्थीतरी निष्षताद्या अग्नर्मुवरथो इति ॥१७६॥ ब्रूह्याद्यादेः परस्याप्यो श्रावयेत्यादिके प्लुतः । दाश्वांश्र्च स्वतवान्पापौरिभिष्वं च नृम्भिष्रुतः ॥१७७॥ अभीषण ऋतावाहं न्यषीदन्नृमणा अपि । चतुर्विधाद्वाहुलकात्प्रवृत्तेरप्रवृत्तिः ॥१७८॥ विभाषान्यथाभावत्सर्वं सिद्धयेच्च वैदिकम् । भूवाद्या धातवो ज्ञेयाः परस्मैपदिनः स्मृताः ॥११८॥ एधाद्या आत्मनेभाषा उदात्ताः षट्त्रिंशसंख्यकाः । अतादयोऽष्टत्रिंशच्च परस्मैपदिनो मुने ॥१२०॥ शोकृपूर्वा द्विचत्वारिंशदुक्ता च ह्यात्मने पदे । उदात्तेतस्तु पंचाशतफवक्काद्याः परिकीर्तिताः ॥१२१॥ वर्चीद्या अनुदात्तेत एकविंशतिरीरिताः । गुपादयो द्विचत्वारिंशदुदात्तेता समीरिताः ॥१२२॥ घिष्यादयोऽनुदात्तेतो दश प्रोक्ता हि शाब्दिकैः । अणादयोप्युदात्तेतः सप्तविंशतिधातवः ॥१२३॥ अमादयःसमुद्दिष्टाश्चतुस्त्रिंशद्विशान्विकैः । द्विसप्ततिमितामम्यमुखाश्चोदात्तबंधनाः ॥१२४॥ स्वरितेद्धावधातुस्तु एक एव प्रकीर्तितः । क्षुधादयोऽनुदात्तेतो द्विपंचाशदुदाहृताः ॥१२५॥ घुषिराद्या उदात्तेतोऽष्टाशीतिर्धातवो मताः । द्युताद्या अनुदात्तेतो द्वविंशतिरतो मताः ॥१२६॥ षितस्त्रयोदश घटादिष्वनुदात्तेत ईरितः । ततो ज्वलदुदात्तेतो द्विपंचाशन्मितास्तथा ॥१२७॥ रञ्जिष्ठम्, उभयाविनम्, प्रतनथा, तृचम्, अपस्पृधेथाम्, नो अव्यात्, आपो अस्मान्, सगर्भ्यः, अष्टापदी, ऋत्व्व्यम्, त्रिपञ्च्चम्, हिरण्ययेन, इतरम्, परमे व्योमन्, उर्विया, स्वप्नया, वारव्श्वात्, आडुह, वैवधो, पश्य, इदधद्, बमूथाः, प्रमिणोति, वधीं, वृत्रम्, यजश्वैनम्, एमसि, स्नात्वी, गत्वाय, अस्थभिः, गोनाम्, अपरिवृवृत्ताः, ततुरिः, जगुरिः, ग्रसि- ताम्, पश्वे, दधत, बमूथ, प्रमिणन्ति, अबीवृधत्, मित्रयुः, दुरस्युः, द्रविणस्युः, हित्वा, हीत्वा, सुधितम्, दाधति, दर्धति, दर्धर्षि, सव्वद्धिः, ससूव, धिस्व, प्रप्रायमग्निः, हरिवतं, अक्षण्वन्तः, सुपथिन्तरः, रथोतरः, निष्षत्तः, अम्बः, भुवरथो, अग्नयेऽनुब्रूहि, ओ ३ श्रा ३ वयं, दाश्वान्, स्वतवाँः पायुरग्ने, त्रिभिष्वं देव सवितः, अभीषुणः, न्यषीदत्, नृमणाः--ये प्रयोग भी वैदिक प्रक्रिया से सिद्ध होते हैं ॥१७-१८३॥ भू वा आदि परस्मैपदी धातु हैं। एध् आदि उदात्त और आत्मनेपदी धातु हैं जो कि संख्या में छत्तीस हैं । मुने ! अत् आदि अड़तीस धातु परस्मैपदी हैं १९-२१॥ शोकृ (लोक) आदि बयालीस धातु आत्मनेपदी है। फक्क आदि पचास धातु उदात्तेत् हैं ॥१२०॥ वर्च आदि इक्कीस धातु अनुदात्तेत् हैं। गुप् आदि बयालीस धातु उदात्तेत् कहे गए हैं ॥१२१॥ वैयाकरणों ने घिणि आदि दश धातुओं को अनुदात्तेत् कहा है। अण् आदि सत्ताइस धातु उदात्तेत् हैं ॥१२३॥ शाब्दिकों ने अम् आदि चौंतीस धातुओं को तथा मव्य आदि बहत्तर को उदात्तेत् कहा है ॥१२४॥ केवल एक धाव् धातु स्वरितेत् है । क्षुध् आदि बावन धातु अनुदात्तेत् हैं ॥१२५॥ घुषिर् आदि अस्सी धातु उदात्तेत् हैं। द्यूत् आदि बाईस धातु अनुदात्तेत् हैं ॥१२६॥ घटादि में तेरह षित् और अनुदात्तेत् हैं। ज्वल् आदि बावन धातु उदात्तेत् हैं ॥१२७॥ राज् धातु स्वरितेत् है। आभ्रू और भ्लाभ्र
३७६ नारदीयपुराणम् स्वरितेद्राज्संप्रोक्तस्तनाहिश्रृञ्जितस्त्रयः । अनुदात्तेत आख्याता आद्युदात्ता इतः स्यभात् ॥२८॥ सहोऽनुदात्तेदेकस्तु रमेकोऽप्यात्मनेपदी । सदस्त्रय उदात्तेतः कुचाद्वेदा उदात्त इत् ॥२९॥ स्वरितेतः पञ्चत्रिंशद्धिक्काद्याश्च ततः परम् । स्वरितेच्छिञ्भूञाद्याश्चत्वार स्वरितेत्ततः ॥३०॥ घेटः परस्मैपदिनः षट्चत्वारिशदुदीरिताः । अष्टादश स्मिङाद्यास्तु आमनेपदिनो मताः ॥३१॥ ततस्त्रयोऽनुदात्तेतः पूङाद्याः परिकीर्तिताः । हूपरस्मैपदी चात्मनेभाबास्तु गुपास्त्रयः ॥३२॥ रमश्चद्ध्यनुदात्तेतो जिक्ष्विदोदात्त इन्मतः । परस्मैपदिनः पंचदश स्कम्भिवादयस्तथा ॥३३॥ कित्धातु रुदात्तेच्च दान्शानोभयात्मकौ । स्वरितेतः पचाद्यंकाः परस्मैपदिनो मताः ॥३४॥ स्वरितेतस्त्रयश्चैतौ वदवची परिभाविणौ । भ्वाद्या एते षडधिकं सहस्रं धातवो मताः ॥३५॥ परस्मैपदिनः प्रोक्ता वदाश्चाप हनेति च । स्वरितेतो द्विषाद्यास्तु चत्वारो धातवो मताः ॥३६॥ चक्षिङेकः समाख्यातो धातुरात्मनेपदी । इरादयोऽनुदात्तेतो धातवस्तु त्रयोदश ॥३७॥ आत्मनेपदिनौ प्रोक्तौ षूङ्शीङ्द्वौ शाब्दिकैर्मुने । परस्मैपदिनः प्रोक्ता षुमुखाः सप्त धातवः ॥३८॥ स्वरितेदूर्णुञाख्यातो धातुरेको मुनीश्वर । घुमुखास्त्वय उद्दिष्टाः परस्मैपदिनस्तथा ॥३९॥ ष्टुजेकस्तु समाख्यातः स्मृतो नारद शाब्दिकैः ॥४०॥ अष्टादश राप्रभृतयः परस्मैपदिनः स्मृताः । इङ्ङात्मनेपदी प्रोक्तो धातुर्नारद केवलः ॥४१॥ विदादयस्तु चत्वारः परस्मैपदिनो मताः । जिक्ष्वप्स्ये समुद्दिष्टः परस्मैपदिकस्तथा ॥४२॥ परस्मैपदिनश्चैव ते मयोक्ताः श्वसादयः । दीधीङ्वेवीङ् स्मृतौ धातू आत्मनेपदिनौ मुने ॥४३॥ षसादयस्त्रयश्चापि उदात्तेतः प्रकीर्तिताः । चर्करीतं च हुङ्प्रोक्तोऽनुदात्तेन्मुनिसत्तम ॥४४॥ त्रिसप्तति समाख्याता धातवोऽदादिके गणे । दादयो धातवो वेदाः परस्मैपदिनो मताः ॥४५॥ स्तन अह्नि ये स्वरितेत् है। स्यम् से आगे के धातु भा आदि उदात्त हैं ॥२८॥ सह अनुदात्तेत् है, केवल एक रम् आत्मनेपदी है, सद् आदि तीन उदात्तेत्, कुच् आदि चार उदात्तेत् हैं ॥२९॥ इसके अनन्तर हिक्क् आदि पैंतीस धातु स्वरितेत् हैं। श्रिञ् और भूञ् आदि चार स्वरितेत् हैं ॥३०॥ घेट् आदि छत्तीस परस्मैपदी हैं। स्मिङ् आदि अठारह धातु आत्मनेपदी हैं ॥३१॥ पूङ् आदि तीन अनुदात्तेत् हैं। हूङ् धातु परस्मैपदी है। गुप् से लेकर तीन धातु आत्मनेपदी हैं ॥३२॥ रभ् आदि धातु अनुदात्तेत् हैं। जिक्ष्विदा उदात्तेत् हैं। स्कम्भु आदि पन्द्रह परस्मैपदी हैं ॥३३॥ कित् धातु उदात्तेत् है। दान् शान् स्वरितेत् उभयपदी हैं। पच् आदि नव परस्मैपदी हैं ॥३४॥ परिभाषार्थक वद् और वच् आदि तीन स्वरितेत् हैं। ये एक हजार छः भ्वादि धातु हैं ॥३५॥ वद् और हन् परस्मैपदी हैं। द्विष् आदि चार धातु स्वरितेत् हैं ॥३६॥ यहाँ एक चक्षिङ् धातु आत्मने- पदी है। इर आदि तेरह अनुदात्तेत् हैं ॥३७॥ मुने ! वैयाकरणों ने षूङ् और शीङ् दोनों धातुओं को आत्मने- पदी कहा है। षु आदि सात परस्मैपदी हैं ॥३८॥ मुनिवर ! ऊर्णु धातु स्वरितेत् कहा गया है। घु आदि तीन परस्मैपदी हैं ॥३९॥ नारद ! ष्टुं को भी शाब्दिकों ने परस्मैपदी माना है ॥४०॥ रा प्रभृति अठारह परस्मै- पदी हैं। नारद ! केवल इङ् धातु आत्मनेपदी है ॥४१॥ विद् आदि चार धातु परस्मैपदी हैं। जिक्ष्वप् श्ये परस्मै- पदी धातु है ॥४२॥ श्वस् आदि धातु उदात्तेत् हैं। मुनिश्रेष्ठ ! 'चर्करीतं च' यह यङ्लुगन्त का प्रतीक है। यह अदादि माना गया है। हुङ् अनुदात्तेत् हैं अदादि गण में तिहत्तर धातु परिगणित हैं। दा आदि चार धातु परस्मैपदी हैं ॥४३-४५॥ भूञ् धातु स्वरितेत् और ओहाक् उदात्तेत् है। माङ्, हाङ् दो
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३७७ स्वरितेद्धै भृञाख्यात उदात्तेद्वाक् प्रकीर्तितः । माङ्-हाङ्द्धावनुदात्तेतौ स्वरितेद्धानधातुषु ॥४६॥ वाणिजिराग्यास्त्रयश्चापि स्वरितेत उदाहृताः । घुमुखा द्वादश तथा परस्मैपदिनो मताः ॥४७॥ द्वाविंशतिरिहोद्दिष्टा धातवो ह्वादिके गणे । परस्मैपदिनः प्रोक्ता दिवाद्याः पंचविंशतिः ॥४८॥ आत्मनेपदिनौ धातू पूङ्-डूङ्द्धावपि नारद । ओदितः पूङ्मुखाः सप्त आत्मनेपदिनो मताः ॥४६॥ आत्मनेपदिनो विप्र दीङ्मुखास्त्विह कीर्तिताः । स्यतिप्रभृतयो वेदाः परस्मैपदिनो मताः ॥५०॥ जन्यादयः पंचदश आत्मनेपदिनो मुने । मृषाद्याः स्वरितेतस्तु धातवः पंच कीर्तिताः ॥५१॥ एकादश पदाद्यास्तु ह्यात्मनेपदिनो मताः । राधोः कर्मक एवात्र वृद्धौ स्वादिचुरादिके ॥५२॥ उदात्तेतस्तुदाद्यास्तु त्रयोदश समीरिताः । परस्मैपदिनोऽष्टात्र रधाद्याःपरिकीर्तिताः ॥५३॥ समाद्याश्चाप्युदात्तेतः षट्चत्वारिंशदुदीरिताः । चत्वारिंशच्छतं चापि दिवाद्यौ धातवो मताः ॥५४॥ स्वाद्यः स्वरितेत्तोका धातवः परिकीर्तिताः । सप्ताख्यातो दुनोतिस्तु परस्मैपदिनो मुने ॥५५॥ अष्टिधावनुदात्तेतौ धातू द्वौ परिकीर्तितौ । परस्मैपदिनस्त्वत्र तिकाद्यास्तु चतुर्दश ॥५६॥ द्वाविंशद्वातवः प्रोक्ता विप्रेन्द्र स्वादिके गणे । स्वरितेतः षडाख्यातास्तुदाद्या मुनिसत्तम ॥५७॥ ऋष्युदात्तेञ्जुषीपूर्वा आत्मनेपदिनोर्णवाः । व्रश्चादय उदात्तेतः प्रोक्ताः पंचाधिकं शतम् ॥५८॥ गूर्युदात्तेदिहोद्दिष्टो धातुरेको मुनीश्वर । णूमूखाश्चैव चत्वारः परस्मैपदिनो मताः ॥५६॥ कुडाख्यातोऽनुदात्तेच्च कुटाद्याः पूतिमागताः । पृङ् मृङ् चात्मनेभावौ षट् परस्मैपदे रिषेः ॥६०॥ आत्मनेपदिनौ धातू दृङ्घूङ्द्धौ चाप्युदाहृतौ । प्रच्छादिषोडशाख्याताः परस्मैपदिनो मुने ॥६१॥ स्वरितेतः षट् ततश्च प्रोक्ता मिलमुखा मुने । कृतीप्रभृतयश्चापि परस्मैपदिनस्त्रयः ॥६२॥ धातुयें अनुदात्तेत् हैं स्वरितेत् धातुओं से आनच् प्रत्यय होता है ॥४६॥ णिजिर् आदि तीनों धातु स्वरितेत् हैं । घू आदि बारह धातु परस्मैपदी है ॥४७॥ जुहोत्यादि गण में बाईस धातुयें हैं । दिव् आदि पचीस धातु परस्मैपदी हैं ॥४८॥ नारद ! पूङ् और डूङ् दोनों आत्मनेपदी धातु धातु हैं । पूङ् आदि सात ओदित धातु आत्मपदी हैं ॥४६॥ विप्र ! दीङ् प्रभृति धातु आत्मनेपदी हैं । षो आदि चार धातु परस्मैपदी हैं ॥५०॥ मुने ! जनी आदि पन्द्रह धातु आत्मनेपदी हैं । मृष् आदि पांच धातु स्वरितेत् हैं ॥५१॥ पद् आदि ग्यारह धातु आत्मनेपदी हैं । अकर्मक राध् धातु से वृद्धि अर्थ में श्यन् प्रत्यय होता है । यह स्वादि और चुरादि भी है ॥५२॥ तुद् आदि तेरह धातु उदात्तेत् हैं । रध् आदि आठ धातु परस्मैपदी हैं ॥५३॥ सम् आदि छियालीस धातु उदात्तेत् हैं । दिवादि गण में एक सौ चालीस धातु हैं ॥५४॥ सु आदि नव धातु स्वरितेत् हैं । मुने ! दु आदि सात धातु परस्मैपदी हैं ॥५५॥ अश् और टिघ् धातु अनुदात्तेत् हैं । तिक् आदि चौदह धातु परस्मैपदी हैं ॥५६॥ विप्रेन्द्र ! स्वादि गण में बत्तीस धातु हैं । मुनिवर्य ! तुद् आदि छः धातु स्वरितेत् हैं ॥५७॥ ऋषि धातु उदात्तेत् है और जुष् आदि चार धातु आत्मनेपदी हैं । व्रश्च् आदि एक सौ पाँच धातु उदात्तेत् हैं ॥५८॥ मुनीश्वर ! केवल गुरी धातु उदात्तेत् है । णू आदि चार धातु परस्मैपदी हैं ॥५६॥ कुङ् अनुदात्तेत् है कुट् भी अनुदात्तेत् ही है । पृङ् मृङ् आत्मनेपदी तथा रि और पि आदि छः परस्मैपदी हैं ॥६०॥ हङ् और घूङ् दो धातु आत्मनेपदी हैं । मुने ! प्रच्छ आदि सोलह धातु परस्मैपदी हैं ॥६१॥ मुने ! इसके अनन्तर मिल् आदि सोलह धातु स्वरितेत् हैं । कृत् आदि तीन धातु परस्मैपदी हैं । तुदादि गण में एक सौ सत्तावन धातु हैं ॥६२॥ ४८ ना० पु०
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३७८ नारदीयपुराणम् सप्त पंचाशदधिकास्तुदादौ धातवः शतम् । स्वरितेतो रुधोनंदा परस्मैभाषितः कृती ॥६३॥ जिइंधीतोऽनुदात्तेतस्त्रयो धातव ईरिताः । उदात्तेतः शिषविषरुधाद्याः पंचविंशतिः ॥६४॥ स्वरितेतस्तनोः सप्त धातवः परिकीर्तिताः । मनुन्व्वात्मनेभाषौ स्वरितेत्कृञुदाहृतः ॥६५॥ ततो द्वौ कीर्तितौ विप्र धातवौ दश शाब्दिकैः । क्रूयाद्याः सप्तोभयभाषाः सौत्राः स्तंभ्वादिकास्तथा ॥६६॥ परस्मैपदिनः प्रोक्ताश्चत्वारोऽपि मुनीश्वर । द्वाविंशतिरुदात्तेतः क्रुधाद्या धातवो मताः ॥६७॥ वृङ्ङात्मनेपदी धातुः श्रैयाद्याश्चैकविंशतिः । परस्मैपदिनश्चाय स्वरितेद्ग्रह एव च ॥६८॥ क्रयादिकेषु द्विपंचाशद्धातवः कीर्तिता बुधैः । चुराद्या धातवो ण्यन्ता षड्विंशदधिकं शतम् ॥६९॥ चित्याद्यष्टादशाख्याता आत्मनेपदिनो मुने । चर्चाय आवृणीयास्तु ण्यंता वा परिकीर्तिताः ॥७०॥ अदंता धातवश्चैव चत्वारिंशत्तथाष्ट च । पदाद्यास्तु दश प्रोक्ता धातवो ह्यात्मनेपदे ॥७१॥ सूत्राद्या अष्ट चाप्यत्र ण्यन्ता प्रोक्ता मनीषिभिः । धात्वर्थे प्रातिपदिकाद्बहुल चेष्ठवन्मतम् ॥७२॥ तत्करोति तदाचष्टे हेतुमत्यदि णिर्मतः । धात्वर्थे कर्तृकरणाच्चित्राद्याश्चापि धातवः ॥७३॥ अष्ट संग्राम आख्यातोऽनुदात्तेच्छाब्दिकेर्बुधैः । स्तोभाद्याः षोडश तथा अदन्तस्य निदर्शनम् ॥७४॥ तथा बाहुलकादन्ये सौत्रलौकिकवैदिकाः । सर्वे सर्वगणीयाश्च तथानैकार्थवाचिनः ॥७५॥ सनाद्येता धातवश्च तथा वै नामधातवः । एवमानंत्यमुद्भाव्यं धातूनामिह नारद । संक्षेपोऽयं समुद्दिष्टो विस्तरस्तव तत्र च ॥७६॥
रुध् और नंद धातु स्वरितेत् हैं। कृती धातु परस्मैपदी है। विन्धी आदि तीन धातु अनुदात्तेत् हैं । शिष्, पिष्, रुध् आदि पचीस धातु उदात्तेत् हैं ॥६३-६४॥ तनु आदि सात धातु स्वरितेत् हैं। वनु और मनु धातु आत्मनेपदी हैंकृञ् को स्वरितेत् कहा गया है । विप्र ! इसके अनन्तर वैयाकरणों ने तनादिगण में दस धातुओं की गणना की है ॥६५ १/२॥ क्री आदि सात उभयपदी हैं। सूत्र में पढ़े गए स्तंभु आदि चार धातु भी परस्मैपदी हैं। मुनीश्वर ! क्रुध् आदि बाईस धातु उदात्तेत् हैं ॥६६-६७॥ वृङ् धातु आत्मनेपदी है और श्रंथ् आदि इक्कीस धातु परस्मैपदी हैं । ग्रह् धातु स्वरितेत् है। विद्वानों ने क्र्यादिगण में बावन धातु पढ़े हैं ॥६८ १/२॥ चुरादि गण में वित् धातु तक एक सौ छत्तीस धातु हैं। मुने ! चिती आदि अठारह धातु आत्मनेपदी हैं। चर्च से लेकर धृषी धातु तक धातु णिन्त कहे गए हैं ॥६९-७०॥ अदन्त अडतालीस धातु भी उभयपदी हैं तथा पद् आदि दश धातु आत्मनेपदी हैं ॥७१॥ मनीषियों ने सूत्र आदि आठ धातुओं को णित् कहा है। धात्वर्थ में प्राति पदिक से णिच् और इष्ठवद्भाव विकल्प से होता है ॥७२॥ तत्करोति, (उसको करता है) और तदाचष्टे (करने की इच्छा रखता है) अर्थ में, प्रेरणार्थक क्रियाओं से णिच् प्रत्यय होता है। धात्वर्थ की विवक्षा में कर्त्ता और करण से भी णिच् प्रत्यय होता है। चित्र आदि आठ धातु उदात्तेत् है। इनसे णिच् प्रत्यय होता है। विद्वान् वैयाकरणों ने संग्राम आदि आठ धातुओं को अनुदात्तेत् कहा है। स्तोम आदि सोलह और अदन्त धातुओं से जो णिच् कहा गया है यह निदर्शन केवल बाहुलक है ॥७३-७४॥ इसके अतिरिक्त और भी धातु हैं, जिनसे णिच् प्रत्यय होता है। इसी प्रकार बाहुलक के बल से अन्य सूत्र में पढ़े गए और लोक वेद प्रसिद्ध धातुओं से भी णिच् प्रत्यय होता है। अथवा यों कहा जाय कि बाहुलक से सब धातु सब गणों में कहे गए हैं और सभी अनेकार्थ वाची हैं ॥७५॥ नारद ! इन धातुओं के अतिरिक्त सन्, क्यच्, काम्यच् आदि प्रत्यय जिनके अन्त में हों, उनकी भी धातु संज्ञा होती है। नाम धातु भी धातु ही हैं। नारद ! इस प्रकार अनन्त धातुओं की उद्भावना हो सकती है। यहाँ संक्षेप से सब कुछ बताया गया है। इसका विस्तार तत्सम्बन्धी ग्रन्थों में है ॥७६॥
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त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [पृष्ठ ३७६]
ऊदृदंतैयौंति रुक्ष्णुशीङ्स्नुक्षुश्विडीङ्श्विभिः। वृङ्वृञ्भ्यां च विनैकाचोऽजंतेषु निहताः स्मृताः ॥७७॥ शक्लप्च्मुच् रिच्वच् विच् सिच्प्रच्छित्यज् निजिर्भजः। भञ्जभुञ्ज्रस्ज्मस्जियज्युरुज्रजञ्- विजिर्स्वजिसञ्जसृजः ॥७८॥ अद्क्षुद्खिद्छिद्तुद्नुदः पद्यभिद्विद्यतिविन्द। शद्सदी स्विद्यतिस्कन्दिर्ह्रदी क्रुधक्षुधि- बुध्वती ॥७९॥ बंधिर्युधिरथोराधिर्व्यधशुधः साधिसिध्यतौ। मन्यहन्नाप्क्षिपूक्षुपिप्तप्तिप्तृप्यतिदृप्यतौ ॥८०॥ लिब्लुब्वप्शप्स्वप्स्पियरभरभलभगम्नम् यमो रमिः। कुशिर्दशिदिशि दृश्मृश्रिश्रूशलिश- विश्सृशः कृषिः ॥८१॥ त्विष्तुष्दुष्पुष्विष्विशूशिष्शुष्श्लिष्यतयो घसिः। वसतिर्दह् दिहिद्रुहो नह्मिह् रुह्लिह्- वहिस्तथा ॥८२॥ अनुदात्ता हलंतेषु धातवो द्व्यधिकं शतम्। चाद्या निपाता गतयः प्राद्याः दिग्देशकालजाः ॥८३॥ शब्दाः प्रोक्ता ह्यनेकार्थाः सर्वलिंगा अपि द्विज। गणपाठः सूत्रपाठो धातुपाठस्तथैव च ॥८४॥ पाठोऽनुनासिकानां च परायणमिहोच्यते। शब्दाः सिद्धा वैदिकास्तु लौकिकाश्चापि नारद ॥८५॥ शब्दपरायणं तस्मात्कारणं शब्दसंग्रहे। लघुमार्गेण शब्दानां साधूनां संनिरूपणम् ॥८६॥ प्रकृतिप्रत्ययादेशलोपागममुखैः कृतम्। इत्थमेतत्सम्आख्यातं निरुक्तं किंचिदेव ते कार्त्स्न्येन वक्तुमानंत्यात्कोऽपि शक्तो न नारद ॥८७॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे निरुक्तलक्षणनिरूपणं नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५३॥
हिन्दी अनुवाद
अजन्त धातुओं में जकारान्त, ऋकारान्त, यु, रु क्ष्ण, शीङ्, स्नु, नु, क्षु, श्वि, डीङ्, श्वि, वृङ्, वृञ् इनको छोड़कर शेष धातु, अनुदात्तेत् हैं ॥७७॥ ककारान्तों में शक्, चकारान्तों में पच्, मुच्, रिच, वच्, विच्, सिच्, छान्त में केवल प्रच्छ, जान्तों में त्यज्, निज्, भज्, भञ्ज्, भुज्, भ्रस्ज्, मस्ज्, यज्, युज्, रुज्, रञ्ज, विजिर्, स्वञ्जि, सञ्ज और सृज्, ॥७८॥ दान्तों में अद्, क्षुद्, खिद्, छिद्, तुद्, नुद्, पद्, भिद्, विद् (सत्ता) विद्, (विचारणी) शद्, सद्, स्विद्, स्कन्दिर्, ह्दी; धान्तों में क्रुध्, क्षुध्, बुध् ॥७९॥ बन्ध्, युध्, रुध्, राध् व्यध्, शुध्, साधि, सिध्; नान्तों में मन्, हन्; पान्तधातुओं में आप्, क्षुप्, क्षिप्, तप्, तिप्, तृप्, दृप्, ॥८०॥ लिप्, लुप्, वप्, शप्, स्वप्, सृपि; भान्तों में यभ्, लभ्; मान्तों में गम्, नम्, यम्; शान्तधातुओं में, कृशि, दंश्, दिश्, मृश्, रिश्, रुश्, लिश, विश्, स्पृश; षान्तों में कृष्, त्विष्, तुष्, द्विष्, दुष्, पुष, विष, विष्, शिष्, श्लिष्, सान्तों में घस्, वस्; हान्तों में ह, दिह्, ह, दुह्, नह्, मिह्, रुह्, लिह, तथा वह् ॥८१-८२॥ हलन्तों में इतने एक सौ दो धातु अनुदात्त हैं। 'च' आदि की निपात संज्ञा होती है। 'प्र' आदि उपसर्ग 'गति' कहलाते हैं। भिन्न-भिन्न दिशा, देश और काल में प्रकट हुए शब्द अनेक अर्थों के बोधक होते हैं। विप्रवर ! वे देश कालों के भेद से सब स्त्री- लिंगों में प्रयुक्त होते हैं। गणपाठ, सूत्रपाठ, धातुपाठ और अनुनासिकों का पाठ यहाँ आवृत्ति-रूप में कहा गया हैं ॥८३-८४॥ नारद ! वैदिक और लौकिक सभी शब्द नित्य सिद्ध हैं। इसलिए ऐसे सिद्ध (बने बनाये) शब्दों के ज्ञान के लिए पारायण पाठ आवश्यक है ॥८५॥ सिद्ध शब्दों का ही प्रकृति, प्रत्यय, आदेश और आगम आदि के द्वारा लघुमार्ग से सम्यक् निरूपण किया जाता है। नारद ! इस प्रकार यहाँ सूक्ष्म रूप में शब्दों की निरुक्ति कही गई है। इसका पूर्ण रूप से वर्णन तो कोई नहीं कर सकता; क्योंकि शब्द अनन्त हैं ॥८६-८८॥
श्रीनारदीयमहापुराण में तिरपनवां अध्याय समाप्त ॥५३॥
अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सनंदन उवाच ज्योतिषांगं प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ब्रह्मणा पुरा । यस्य विज्ञान मात्रेण धर्मसिद्धिर्भवेन्नृणाम् ॥१॥ त्रिस्कंधं ज्योतिषं शास्त्रं चतुर्लक्षमुदाहृतम् । गणितं जातकं विप्र संहितास्कंधसंज्ञिताः ॥२॥ गणिते परिकर्मादि खगमध्यस्फुटक्रिये । अनुयोगश्चंद्रसूर्यग्रहणं चोदयास्तकम् ॥३॥ छाया शृङ्गोन्नतिद्युती पातसाधनमीरितम् । जातके राशिभेदाश्च ग्रहयोनिश्च योनिजम् ॥४॥ निषेकजन्मारिष्टानि ह्यायुर्दायो दशाक्रमः । कर्माजीवं चाष्टवर्गो राजयोगाश्च नाभसाः ॥५॥ चन्द्रयोगाः प्रव्रज्याख्या राशिशीलं च दृक्फलम् । ग्रहभावफलं चैवाश्रययोगप्रकीर्णके ॥६॥ अनिष्टयोगाः स्त्रीजन्मफलं निर्याणमेव च । नष्टजन्मविधानां च तथा द्रेष्काणलक्षणम् ॥७॥ संहिताशास्त्ररूपं च ग्रहचारोऽब्दलक्षणम् । तिथिवारसनक्षत्रयोगतिथ्यर्द्धसंज्ञकाः ॥८॥
अध्याय ५४ ज्योतिष वर्णन
सनन्दन बोले—अब मैं ज्योतिष शास्त्र का वर्णन कर रहा हूँ जिसका वर्णन पहले ब्रह्मा ने स्वयं किया है। और जिसके ज्ञानमात्र से मनुष्यों को धर्मसिद्धि प्राप्त हो जाती है। ज्योतिष शास्त्र तीन स्कन्धोंवाला है और चार लाख श्लोकों में वर्णित है। गणित, जातक (होरा) और संहिता इसके तीन स्कन्ध हैं। गणित में परिकर्म¹ ग्रहों की चाल और स्फुट क्रिया का वर्णन है। अनुयोग (देश, दिशा और काल ज्ञान) चन्द्र और सूर्य ग्रहण, उदय, अस्त, छायाधिकार, चन्द्रशृङ्गोन्नति,² ग्रहयुति (ग्रहों का योग) तथा पात (महापात-सूर्यचन्द्रमा के क्रान्तिसाम्य) का साधन-प्रकार कहा गया है ॥१-३॥ जातकस्कन्ध में राशि भेद, ग्रहयोनि (ग्रहों की जाति, रूप और गुण आदि) वियोनिज (मानवेतर जन्म-फल), गर्भाधान, जन्म, अरिष्ट, आयुर्दाय, दशाक्रम, कर्माजीव (आजीविका), अष्टकवर्ग, राजयोग, नाभसयोग, चन्द्रयोग, प्रव्रज्यायोग, राशिशील, ग्रहदृष्टिफल, ग्रहों के भाव- फल, आश्रययोग, प्रकीर्ण, अनिष्टयोग, स्त्रीजातकफल, निर्याण (मृत्युविषयक विचार), नष्ट-जन्म-विधान (अज्ञात जन्म-काल को जानने का प्रकार) तथा द्रेष्काणों के (राशि के तृतीय भाग (१० अंश) को 'द्रेष्काण' संज्ञा है) स्वरूप—इन सब विषयों का बयान है ॥४-७॥ अब संहितास्कन्ध के स्वरूप का परिचय दिया जाता है। उसमें ग्रहचार (ग्रहों की गति), वर्षलक्षण, तिथि, दिन, नक्षत्र, योग, करण, मुहूर्त, उपग्रह, सूर्य-संक्रान्ति, ग्रहगोचर, चन्द्रमा और तारा
१. योग, अन्तर; गुणन, भजन, वर्ग, वर्गमूल, घन और घनमूल—ये परिकर्म कहे गये हैं। २. द्वितीया को चन्द्रोदय होता है, उसमें कभी चन्द्रमा का दक्षिण सींग और कभी उत्तर सींग (नोक) ऊपर को उठा रहता है, उसी को 'चन्द्रशृङ्गोन्नति' कहा गया है। ज्योतिष में उसके परिणाम का विचार किया गया है।
चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३८१ मुहूर्तोपग्रहाः सूर्यसंक्रांतिर्गोचरःक्रमात् । चंद्रताराबलं चैव सर्वलग्नार्तवाह्वयः ॥१८॥ आधानपुंससीमंतजातनामन्नभुक्तयः । चौलङ्कर्णव्यणं मौंजी क्षुरिकाबंधनं तथा ॥१०॥ समावर्तनवैवाहप्रतिष्ठासद्मलक्षणम् । वात्राप्रवेशनं सद्योवृष्टिः कर्मविलक्षणम् ॥११॥ उत्पत्तिलक्षणं चैव सर्वं संक्षेपतो ब्रुवे। एकं दश शतं चैव सहस्रायुतलक्ष कम् ॥१२॥ प्रयुतं कोटिसंज्ञां चार्वुदमब्जं च खर्वकम् । निखवं च महापद्मं शंकुर्जलंघिरेव च ॥१३॥ अन्त्यं मध्यं परार्द्धं च संज्ञा दशगुणोत्तराः । क्रमाद्व्युत्क्रमतो वापि योगः कार्योत्तरं तथा ॥१४॥ हन्याद्गुणेन गुण्यं स्यात्तेनैवोपांतिमादिकान् । शुद्धेद्वरोद्यदुगुणश्च भाज्यांत्यात्तफलं मुने ॥१५॥ समांकतोऽथो वर्गःस्यात्तमेवाहुः कृतिं बुधः । अंत्यात्तु विषमात्त्यक्त्वा कृतिं मूलं न्यसेत्पृथक् ॥१६॥ द्विगुणोनामुना भक्ते फलं मूले न्यसेत्क्रमात् । तत्कृतिं च त्यजेद्विप्रे मूलेन विभजेत्पुनः ॥१७॥ का बल, सम्पूर्ण लग्नों तथा ऋतुदर्शन का विचार, गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्न- प्राशन, चूडाकरण, कर्णवेध, उपनयन, मौञ्जीबन्धन (वेदारम्भ), क्षुरिकाबन्धन, समावर्तन, विवाह, प्रतिष्ठा, गृहलक्षण, यात्रा, गृहप्रवेश, तत्काल वृष्टिज्ञान, कर्मवैलक्षण्य तथा उत्पत्ति का लक्षण—इन सब विषयों का संक्षेप से वर्णन करूंगा ॥८-११३॥ [अब गणित का प्रकरण प्रारंभ किया जाता है-] एक (इकाई), दस (दहाई), शत (सैकड़ा), सहस्र (हजार), अयुत (दस हजार), लक्ष (लाख), प्रयुत (दस लाख), कोटि करोड़, अर्बुद (दस करोड़), अब्ज (अरब), खवं (दस अरब), निखवं, (खर्व), महापद्म (दस खर्व), शंकु (नील), जलधि (दस नील), अन्त्य (पद्म), मध्य (दस पद्म), परार्ध (शंख) इत्यादि संख्याबोधक संज्ञाओं को उत्तरोत्तर दस गुना माना गया है। यथास्थानीय अंकों का योग या अन्तर क्रम या व्युत्क्रम से करें ॥१२-१४॥ गुण्य के अन्तिम अंक को गुणक से गुणा करें। फिर उसके पार्श्ववर्ती अंक को भी उसी गुणक से गुणा कर दें। इस तरह आदि अंक तक गुणा करने पर गुणनफल प्राप्त हो जाता है। मुने ! इसी प्रकार भागफल जानने के लिए भी यत्न करना चाहिए जितने अंक से भाजक के साथ गुणा करने पर भाज्य में से घट जाय, वही अंक लब्धि अथवा भागफल होता है ॥१५॥ दो समान अंकों के गुणनफल को वर्ग कहा गया है। विद्वान् पुरुष उसी को कृति कहते हैं। (जैसे ४ वर्ग का ४ × ४ = १६ और ९ का वर्ग ९ × ९ = ८१ होता है) [वर्गमूल जानने के लिए दाहिने अंक से लेकर बायें अंक तक अर्थात् आदि से अन्त तक विषम और सम का चिह्न कर देना चाहिए। खड़ी लकीर को विषम का ओर पड़ी को सम का चिह्न माना गया है]। अन्तिम विषम में जितने वर्ग घट सकें उतने घटा देना चाहिए। उस वर्ग का मूल लेकर उसे पृथक् रख देना चाहिए ॥१६॥ फिर द्विगुणित मूल से सम अंक में भाग दे और जो लब्धि आये उसका वर्ग विषम में घटा दे। फिर उसे दूना करके पंक्ति में रख दे। मुनीश्वर ! इस प्रकार बार-बार करने से पंक्ति का आधा वर्गमूल होता है ॥१७३॥ समान तीन अंकों के गुणनफल को घन कहा गया है। अब घनमूत्न निकालने की विधि बतायी जाती है-दाहिने के प्रथम अंक पर घन या विषम का चिह्न (खड़ी लकीर के रूप में) तथा उसके वामभाग में पार्श्ववर्ती दो अंकों पर (पड़ी लकीर के रूप में) अघन या सम का चिह्न लगावे । इसी प्रकार अन्तिम अंक तक एक घन (विषम) और दो अघन (सम) के चिह्न लगाने चाहिए। अन्तिम या विषम घन में जितने घन घट सकें उतने घटा ले। उस घन को अलग रखे । उसका घनमूल ले और उस घनमूत्र का वर्ग मरे, फिर उसमें तीन से गुणा करे। उससे आदि अंक में भाग दे, लब्धि को अलग लिख
३८२ नारदीयपुराणम् एवं मुहुर्वर्गमूलं जायते च मुनीश्वर । समत्यङ्ककृतिः प्रोक्तो घनस्तंत्रविधिः पदे ॥११८॥ प्रोच्यते विषमं त्वाद्यं समे द्वे च ततः परम् । विशोध्यं विषमादंत्याद्घनं तन्मूलमुच्यते ॥११६॥ विघ्नाद्भजेन्मूलकृत्या समं मूले न्यसेत्फलम् । तत्कृतिस्त्रेन निहतान्निघ्नीं चापि विशोधयेत् ॥१२०॥ घनं च विषमादेवं घनमूलं मुहुर्भवेत् । अन्योन्यहारनिहतौ हरांशौ तु समुच्छिदा ॥१२१॥ लवा लवघ्नाश्च हरा हरघ्ना हि सवर्णनम् । भागप्रभागे विज्ञेयं मुने शास्त्रार्थचित्तकैः ॥१२२॥ अनुबंधेऽपवाहे चैकस्य चेदधिकोनकः । भागातस्तस्थहारेण हरं स्वांशाधिकेन तान् ॥१२३॥ ऊनेन चापि गुणयेद्धनं चिंतयेत्तथा । कार्यस्तुल्यहरांशानां योगश्चाप्यंततो मुने ॥१२४॥ अहारराशी रूढ्यं तु कल्पयेद्धरमप्यथा । अंशाहतिश्छेदधातहृद्भिन्नगुणने फलम् ॥१२५॥ छेदं चापि लवं विद्वन्परिवर्त्य हरस्य च । शेषः कार्यो भागहारे कर्तव्यो गुणनाविधिः ॥१२६॥ हारांशयोः कृती वर्गे घनो घनविधौ मुने । पदसिद्धये पदे कुर्यादथो स्वं सर्वतश्स्वस्वम् ॥१२७॥ छेदं गुणं गुणं छेदं वर्गं मूलं पदं कृतिम् । ऋणं स्वं स्वमृणं कुर्याद्दृश्ये राशिप्रसिद्धये ॥१२८॥ ले, उस लब्धि का वर्ग करे और और उसमें अन्त्य (प्रथम मूलाङ्क) एवं तीन से गुणा करे, फिर उसके बाद के अंक में उसे घटा दे तथा अलग रखी हुई लब्धि के घन को अगले घन अंक में घटा दे । इस प्रकार बार-बार करने से घनमूल सिद्ध होता है ॥११८-२०॥ भिन्न अंकों के परस्पर हर से हर (भाजक) और अंश (भाज्य) दोनों को गुणा कर देने से सबके नीचे बराबर हर हो जाता है । भागप्रभाग में अंश को अंश से और हर से गुणा करना चाहिए । भागानुबन्ध एवं भागापवाह में यदि एक अंक अपने अंश से अधिक या ऊन हो तो तलस्थ हर ऊपर वाले हर को गुणा कर देना चाहिए। उसके बाद अपने अंश से अधिक ऊन किये हुए हर से (अर्थात् भागानुबन्ध में हर अंश का योग करके और भागापवाह में हर अंश का अन्तर करके) अंश को गुणा कर देना चाहिए । ऐसा करने से भागानुबन्ध और भागापवाह का फल सिद्ध होगा । जिसके नीचे हर न हो उसके नीचे एक हर मान लेना चाहिए। भिन्न गुणन-साधन में अंश-अंश का गुणन करना और हर-हर के गुणन से भाग देना चाहिए । इससे भिन्न का गुणन-फल प्राप्त होगा । (यथा $\frac{२}{७} \times \frac{३}{\ell}$ यहाँ २ और ३ अंश हैं और ७, ८ हर हैं, इनमें अंश-अंश से गुणा करने पर २ $\times$ ३ = ६ हुआ और हर-हर के गुणन से ७ $\times$ ८ = ५६ हुआ । फिर ६ $\div$ ५६ करने से $\frac{\xi}{\chi\xi}$ जिसे दो से काटने पर $\frac{३}{\ell}$ उत्तर हुआ) ॥१२१-२५॥ विद्वन् ! भिन्न-संख्या के भाग में भाजक के हर और अंश को परिवर्तित कर (हर को अंश और अंश को हर बनाकर) फिर भाज्य के हर-अंश के साथ गुणन-क्रिया करना चाहिए, इससे भागफल सिद्ध होता है । (यथा $\frac{२}{७} \div \frac{\chi}{\xi}$ में हर और अंश के परिवर्तन से $\frac{२}{७} \times \frac{\xi}{\chi} = \frac{१२}{३५}$ यही भागफल हुआ) ॥ भिन्नांक के वर्गादि-साधन में यदि वर्ग करना हो तो हर और अंश दोनों का वर्ग करे तथा घन करना हो तो दोनों का घन करे। इसी प्रकार वर्गमूल निकालना हो तो दोनों का वर्गमूल और घनमूल निकालना हो तो भी दोनों का घनमूल निकालना चाहिए। (यथा—$\frac{३}{७}$ का वर्ग $\frac{\rho}{\gamma\rho}$ और मूल होगा $\frac{३}{७}$, इसी प्रकार $\frac{३}{७}$ का घन और $\frac{२७}{३४३}$ मूल $\frac{३}{७}$ होगा) ॥१२६-२७॥ विलोमविधि से राशि जानने के लिए दृश्य में हर को गुणक, गुणक को हर, वर्ग को मूल, मूल को वर्ग, ऋण को धन और धन को ऋण बनाकर अन्त में उलटी क्रिया करने से राशि (इष्ट संख्या) प्राप्त होती है।