भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 392

द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३७३ फलव्यापारयोर्द्धातुराश्रये तु तिङ् स्मृताः । फले प्रधानं व्यापारस्तिङर्थस्तु विशेषणम् ॥८८॥ एधितव्यमेधनीयमिति कृत्यै निदर्शनम् । भावे कर्मणि कृत्याः स्युः कृतः कर्तरि कीर्तिताः ॥८६॥ कर्ता कारक इत्याद्या भूते भूतादि कीर्तितम् । गम्यादिगम्ये निर्दिष्टं शेषमद्यतने मतम् ॥६०॥ अधिस्त्रीत्यव्ययीभावे यथाशक्ति च कीर्तितम् । रामाश्रितस्तत्पुरुषे धान्यार्थो यूपदारु च ॥६१॥ व्याघ्रभी राजपुरुषोऽक्षशौंडो द्विगुरुच्यते । पंचगवं दशग्रामी त्रिफलेति तु रूढितः ॥६२॥ नीलोत्पलं महाषष्ठी तुल्यार्थे कर्मधारयः । अब्राह्मणो नञि प्रोक्तः कुंभकारादिकः कृता ॥६३॥ अन्यर्थे तु बहुव्रीहौ ग्रामः प्राप्तोदको द्विजः । पंचगू रूपवद्भार्यो मध्याह्नः ससुतादिकः ॥६४॥ समुच्चये गुरुं चेशं भजस्वान्वाचये त्वट । भिक्षामानय गां चापि वाक्यमेवानयोर्भवेत् ॥६५॥ इतरेतरयोगे तु रामकृष्णौ समाहृतौ । रामकृष्णं द्विज द्वे द्वे ब्रह्म चैकमुपास्यते ॥६६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे व्याकरणनिरूपणं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५२॥

प्रत्यय होते हैं। धातु का अर्थ फल और व्यापार हैं, आश्रय तिङ् का अर्थ है। फल और व्यापार दोनों में व्यापार ही प्रधान होता है, तिङर्थ सदा विशेषण होता है ॥८९-८८॥ [अब कृदन्त प्रकरण प्रारंभ करते हैं] एधितव्यम् और एधनीयम् ये कृत्य प्रत्यय के उदाहरण हैं। कृत्य प्रत्यय भाव और कर्म में होते हैं और कृत् प्रत्यय कर्ता में होते हैं। कर्ता, कारक इत्यादि कृत् के उदाहरण हैं। भूत में भूत आदि उदाहरण कहे गए हैं। गम्य आदि शब्द भविष्यत् अर्थ में निर्दिष्ट हुए हैं। शेष शब्द वर्तमानकाल में प्रयुक्त होने योग्य माने गये हैं। [अब समास का प्रकरण आरंभ करते हैं--] अधिस्त्रि, यथाशक्ति अव्ययीभाव है। रामाश्रितः, धान्यार्थः, यूपदारु, व्याघ्रभीः, राजपुरुषः, अक्ष शौण्डः तत्पुरुष समास हैं। पंचगवम्, दशग्रामी, त्रिफला द्विगु के उदाहरण हैं। नीलोत्पलम् और महाषष्ठी में तुल्यार्थ में कर्मधारय है। अब्राह्मणः में नञ् समास है। कुम्भकारादि में कृदुपपद के साथ समास होता है। अन्यर्थ में बहुव्रीहि समास होता है, जिसके उदाहरण प्राप्तोदको ग्रामः, पंचगुः रूपवद्भार्यः हैं। मध्याह्नः और ससुतः आदि भी समास के उदाहरण हैं। (द्वन्द्वसमास में) समुच्चय में 'गुरुं चेशं भजस्व' इत्यादि में और 'अट भिक्षां गां चानय' इस अन्वाचय में वाक्य ही रहेगा, समास नहीं होगा। इतरेतरयोग द्वन्द्व का 'रामकृष्णौ उदाहरण है। समाहार द्वन्द्व में नपुंसकलिंग होता है, विप्रवर ! इतरेतरयोग में राम और कृष्ण दोनों दो हैं और समाहार में उनकी एकता है, इसलिए ब्रह्मरूप से उन्हें एक मानकर उनकी उपासना की जाती है ॥८९-९६॥ श्रीनारदीयमहापुराण में बावनवाँ अध्याय समाप्त ॥५२॥