भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 393

अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सनंदन उवाच निरुक्तं ते प्रवक्ष्यामि वेदं श्रोत्रांगमुत्तमम् । तत्पंचविधमाख्यातं वैदिकं धातुरूपकम् ॥१॥ क्वचिद्वर्णागमस्तत्र क्वचिद्वर्णविपर्ययः । विकारः क्वापि वर्णानां वर्णनाशः क्वचिन्मतः ॥२॥ तथा विकारनाशाभ्यां वर्णानां यत्र नारद । धातोर्योगातिशायी च संयोगः परिकीर्तितः ॥३॥ सिद्धेद्वर्णागमाद्धंसः सिंहो वर्णविपर्ययात् । गूढोत्मा वर्णविकृतेर्वर्णनाशात्पृषोदरः ॥४॥ भ्रमरादिषु शब्देषु ज्ञेयो योगो हि पञ्चमः । बहुलं छन्दसीत्युक्तमत्र वाच्यं पुनर्वसु ॥५॥ नभस्वद्वृषणश्वश्चापरस्मैपदि चापि हि । परं व्यवहिताश्चापि गतिसंज्ञास्तु याङि आ ॥६॥ विभक्तीनां विपर्यासो यथा दघ्ना जुहोति हि । अभ्युत्साद्यामकेतुर्ध्वनयीत्प्रमुखास्तथा । निष्टभ्यास्तथोक्ताश्च गृभायेत्यादिकास्तथा ॥७॥ सुप्तिङुपग्रहलिंगनराणां कालहलच्स्वरकर्तृ यङां च । व्यत्ययमिच्छति शास्त्रकृदेषां सोऽपि च सिद्ध्यति बाहुलकेन ॥८॥ रात्री विम्वी च कद्रूश्चाविष्ट्वो वाजसनेयिनः अध्याय ५३ निरुक्त-निरूपण सनन्दन बोले--अब मैं वेद के श्रोत्राङ्ग रूप निरुक्त का वर्णन कर रहा हूँ। वैदिक धातु रूप की निरुक्ति पाँच प्रकार से की गई है उसमें कहीं तो वर्णागम होता, कहीं वर्षों में विपर्यय (उलटफेर), कहीं वर्ण-विकार और कहीं वर्ण-विनाश ॥१-२॥ नारद ! जहाँ वर्णनाश और वर्णविकार दोनों की आवश्यकता पड़ती है वहाँ वैसा भी किया जाता । कहीं धातु का योगातिशायो संयोग भी कहा गया है ॥३॥ वर्णागम से हंस की सिद्धि होती है वर्ण विपर्यय से सिंह की (अर्थात् हिंस में स के विपर्यय से सिंह शब्द बनता है)। गूढोत्मा में वर्णविकृति और पृषोदर में वर्ण नाश से सिद्धि हुई है ॥४॥ भ्रमर आदि शब्दों में पाँचवां योग है। वेद में लौकिक नियमों का विकल्प या विपर्यय कहा गया है। इसका उदाहरण 'पुनर्वसु' है जो नित्य द्विवचनान्त होने पर वेद में एकवचनान्त होकर प्रयुक्त हुआ है ॥५॥ कहीं आत्मनेपद के स्थान पर परस्मैदी प्रयोग वेद में होते हैं। नभस्वत, वृषणश्व, भी इसके उदाहरण है। प्रआदि उपसर्ग वेद में धातु के बाद या व्यवधान से आने पर भी उपसर्ग एवं गति संज्ञक होते हैं जैसे गाहि आ ॥५-६॥ विभक्ति विपर्यय 'दध्ना जुहोति' में है। अभ्युत्साद्यामकः, 'ध्वनयोत्' 'निष्टम्व्यं' और 'गृभाय' आदि वैदिक उदाहरण है ॥७॥ शास्त्रकार सुप्, तिङ्, उपग्रह (परस्मैपद, आत्मनेपद) लिङ्ग, पुरुष, काल, हल्, अच्, स्वर, कर्ता और यङ् इनमें व्यत्यय करना चाहते हैं परन्तु यह सब कुछ बाहुलक के द्वारा सिद्ध हो जाता है ॥८॥ रात्री, विम्बी, कद्रूः, आविष्ट्यः, वाजसनेयिनः, कर्णेभिः, यशोभाग्यः चतुरक्षरम्, देवासः, सर्वदेवताति, त्वावतः,