भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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३७२ नारदीयपुराणम् रुणद्धु अरुणद्धूध्यादरौत्सीदरोत्स्यच्च । तनोति ततान तनिता तनिष्यति तनोत्वतनोत्तनुयाद्धि ॥७७॥ अतनीच्चातानीदतनिष्यत्क्रीणाति चिक्राय क्रेता क्रेष्यति क्रीणात्विति च । अक्रीणात्क्रीणीयात्क्रीयादक्रेषीदक्रेष्यच्चोरयति चोरयामास चोरयिता चोरयिष्यति चोरयतु ॥७८॥ अचोरयच्चोरयेच्चोर्यात् अचूचुरदचोरिष्यदित्येवं दश वगणाः । प्रयोजके भावयति सनीच्छायां बुभूषति ॥७९॥ क्रियासमभिहारे तु पंडितो बोभूयते मुने । तथा यङ्लुकि बोभवीति च पठ्यते । पुत्रीयतीत्यात्मनीच्छायां तथाचारेऽपि नारद ॥८०॥ अनुदात्तजितो धातोः क्रियाविनिमये तथा । निविशादेस्तथा विप्र विजानीह्यात्मनेपदम् । परस्मैपदमाख्यातं शेवात्कर्तरि शाब्दिकैः ॥८१॥ जित्स्वरितेतश्च उभे यक्च स्याद्भावकर्मणोः । सौकर्यातिशयं चैव यदा द्योतयितुं मुने ॥८२॥ विवक्ष्यते न व्यापारो लक्ष्ये कर्तुस्तदापरे । लभंते कर्तृतां पश्य पच्यते ह्योदनः स्वयम् ॥८३॥ साधु वासिश्छिनत्त्येवं स्थाली पचंति वै मुने । धातोः सकर्मकाद्भावे कर्मण्यपि लप्रत्ययाः ॥८४॥ तस्मै वाकर्मकाद्विप्र भावे कर्तरि कीर्तितः । फलव्यापारयोरेकनिष्ठतायामकर्मकः ॥८५॥ धातुस्तयोर्धर्मिभेदे सकर्मक उदाहृतः । गौणे कर्मणि दुह्यादेः प्रधाने नीहृकृष्वहाम् ॥८६॥ बुद्धिभक्षार्थयोः शब्दकर्मकाणां निजेच्छया । प्रयोज्य कर्मण्यन्येषामण्यंतानां लादयो मताः ॥८७॥

तनोति, ततान, तनिता, तनिष्यति, तनोतु, अतनोत्, तनुयात्, तन्यात्, अतानीत् अतनिष्यत्-ये तनु के रूप हैं। क्रीणाति, चिक्राय, क्रेता, क्रेष्यति; क्रीणातु, अक्रीणात्, क्रीणीयात्, क्रीयात्, अक्रेषीत्, अक्रेष्यत्-ये क्री के रूप हैं। चोरयति, चोरयामास, चोरयिता, चोरयिष्यति, चोरयतु, अचोरयत, चोरयेत्, चोर्यात्, अचूचुरत्, अचोरयिष्यत्-ये चुर् धातु के रूप हैं। इस प्रकार ये धातुओं के दस गण माने गये हैं ॥७९-८८॥ मुने ! प्रयोजक (प्रेरणा) में भावयति, सनोच्छा में बुभूषति, क्रियासमभिव्याहार में बोभूयते और यङ्लुक् में बोभवीति होता है। नारद ! आचार अर्थ और इच्छा अर्थ में पुत्रीयति होता है। हे विप्र ! अनुदात्तेत् धातु तथा ङकार इत्संज्ञक धातु से आत्मनेपद होता है। जहाँ क्रिया का विनिमय होता हो वहाँ भी आत्मनेपद होता है। निपूर्वक विश् धातु से आत्मनेपद होता है। आत्मनेपद के जितने निमित्त हैं, उन्हें छोड़कर शेष धातुओं से कर्ता में परस्मैपद होता है, ऐसा वैयाकरणों का कथन है। ङित् तथा स्वरितेत् धातु से उभयपद होता है। भाव और कर्म में यक् प्रत्यय होता है। मुने ! अत्यन्त सौकर्य व्यक्त करने के लिए जब कर्ता के व्यापार की विवक्षा नहीं की जाती तब कर्ता से अतिरिक्त भी कर्ता के समान हो जाते हैं। जैसे औदनः स्वयमेव पच्यते। असिः साधु छिनत्ति (खङ्गस्वयं काटता है)। स्थाली पचंति (बटलोई पकाती है)। सकर्मक धातुओं से कर्म और भाव में लप्रत्यय होते हैं, अकर्मक से भाव और कर्ता में। जब फल और व्यापार एकनिष्ठ होते हैं तब धातु अकर्मक होता है और जब ये दोनों धर्मिभेद में अर्थात् दो में रहते हैं तब वह धातु सकर्मक होता है। द्विकर्मक दुह् आदि के गौण कर्म में और नी, हृ, कृष्, वह् के प्रधान कर्म में, बुद्धि भक्षणार्थक एवं शब्द कर्माक धातुओं के दोनों कर्मों में इच्छानुसार प्रत्यय होते हैं अन्य ण्यन्त धातुओं के प्रयोज्य कर्म में लकारादि