भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 395

३७६ नारदीयपुराणम् स्वरितेद्राज्संप्रोक्तस्तनाहिश्रृञ्जितस्त्रयः । अनुदात्तेत आख्याता आद्युदात्ता इतः स्यभात् ॥२८॥ सहोऽनुदात्तेदेकस्तु रमेकोऽप्यात्मनेपदी । सदस्त्रय उदात्तेतः कुचाद्वेदा उदात्त इत् ॥२९॥ स्वरितेतः पञ्चत्रिंशद्धिक्काद्याश्च ततः परम् । स्वरितेच्छिञ्भूञाद्याश्चत्वार स्वरितेत्ततः ॥३०॥ घेटः परस्मैपदिनः षट्चत्वारिशदुदीरिताः । अष्टादश स्मिङाद्यास्तु आमनेपदिनो मताः ॥३१॥ ततस्त्रयोऽनुदात्तेतः पूङाद्याः परिकीर्तिताः । हूपरस्मैपदी चात्मनेभाबास्तु गुपास्त्रयः ॥३२॥ रमश्चद्ध्यनुदात्तेतो जिक्ष्विदोदात्त इन्मतः । परस्मैपदिनः पंचदश स्कम्भिवादयस्तथा ॥३३॥ कित्धातु रुदात्तेच्च दान्शानोभयात्मकौ । स्वरितेतः पचाद्यंकाः परस्मैपदिनो मताः ॥३४॥ स्वरितेतस्त्रयश्चैतौ वदवची परिभाविणौ । भ्वाद्या एते षडधिकं सहस्रं धातवो मताः ॥३५॥ परस्मैपदिनः प्रोक्ता वदाश्चाप हनेति च । स्वरितेतो द्विषाद्यास्तु चत्वारो धातवो मताः ॥३६॥ चक्षिङेकः समाख्यातो धातुरात्मनेपदी । इरादयोऽनुदात्तेतो धातवस्तु त्रयोदश ॥३७॥ आत्मनेपदिनौ प्रोक्तौ षूङ्शीङ्द्वौ शाब्दिकैर्मुने । परस्मैपदिनः प्रोक्ता षुमुखाः सप्त धातवः ॥३८॥ स्वरितेदूर्णुञाख्यातो धातुरेको मुनीश्वर । घुमुखास्त्वय उद्दिष्टाः परस्मैपदिनस्तथा ॥३९॥ ष्टुजेकस्तु समाख्यातः स्मृतो नारद शाब्दिकैः ॥४०॥ अष्टादश राप्रभृतयः परस्मैपदिनः स्मृताः । इङ्ङात्मनेपदी प्रोक्तो धातुर्नारद केवलः ॥४१॥ विदादयस्तु चत्वारः परस्मैपदिनो मताः । जिक्ष्वप्स्ये समुद्दिष्टः परस्मैपदिकस्तथा ॥४२॥ परस्मैपदिनश्चैव ते मयोक्ताः श्वसादयः । दीधीङ्‌वेवीङ् स्मृतौ धातू आत्मनेपदिनौ मुने ॥४३॥ षसादयस्त्रयश्चापि उदात्तेतः प्रकीर्तिताः । चर्करीतं च हुङ्प्रोक्तोऽनुदात्तेन्मुनिसत्तम ॥४४॥ त्रिसप्तति समाख्याता धातवोऽदादिके गणे । दादयो धातवो वेदाः परस्मैपदिनो मताः ॥४५॥ स्तन अह्नि ये स्वरितेत् है। स्यम् से आगे के धातु भा आदि उदात्त हैं ॥२८॥ सह अनुदात्तेत् है, केवल एक रम् आत्मनेपदी है, सद् आदि तीन उदात्तेत्, कुच् आदि चार उदात्तेत् हैं ॥२९॥ इसके अनन्तर हिक्क् आदि पैंतीस धातु स्वरितेत् हैं। श्रिञ् और भूञ् आदि चार स्वरितेत् हैं ॥३०॥ घेट् आदि छत्तीस परस्मैपदी हैं। स्मिङ् आदि अठारह धातु आत्मनेपदी हैं ॥३१॥ पूङ् आदि तीन अनुदात्तेत् हैं। हूङ् धातु परस्मैपदी है। गुप् से लेकर तीन धातु आत्मनेपदी हैं ॥३२॥ रभ् आदि धातु अनुदात्तेत् हैं। जिक्ष्विदा उदात्तेत् हैं। स्कम्भु आदि पन्द्रह परस्मैपदी हैं ॥३३॥ कित् धातु उदात्तेत् है। दान् शान् स्वरितेत् उभयपदी हैं। पच् आदि नव परस्मैपदी हैं ॥३४॥ परिभाषार्थक वद् और वच् आदि तीन स्वरितेत् हैं। ये एक हजार छः भ्वादि धातु हैं ॥३५॥ वद् और हन् परस्मैपदी हैं। द्विष् आदि चार धातु स्वरितेत् हैं ॥३६॥ यहाँ एक चक्षिङ् धातु आत्मने- पदी है। इर आदि तेरह अनुदात्तेत् हैं ॥३७॥ मुने ! वैयाकरणों ने षूङ् और शीङ् दोनों धातुओं को आत्मने- पदी कहा है। षु आदि सात परस्मैपदी हैं ॥३८॥ मुनिवर ! ऊर्णु धातु स्वरितेत् कहा गया है। घु आदि तीन परस्मैपदी हैं ॥३९॥ नारद ! ष्टुं को भी शाब्दिकों ने परस्मैपदी माना है ॥४०॥ रा प्रभृति अठारह परस्मै- पदी हैं। नारद ! केवल इङ् धातु आत्मनेपदी है ॥४१॥ विद् आदि चार धातु परस्मैपदी हैं। जिक्ष्वप् श्ये परस्मै- पदी धातु है ॥४२॥ श्वस् आदि धातु उदात्तेत् हैं। मुनिश्रेष्ठ ! 'चर्करीतं च' यह यङ्लुगन्त का प्रतीक है। यह अदादि माना गया है। हुङ् अनुदात्तेत् हैं अदादि गण में तिहत्तर धातु परिगणित हैं। दा आदि चार धातु परस्मैपदी हैं ॥४३-४५॥ भूञ् धातु स्वरितेत् और ओहाक् उदात्तेत् है। माङ्, हाङ् दो