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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

३७६ नारदीयपुराणम् स्वरितेद्राज्संप्रोक्तस्तनाहिश्रृञ्जितस्त्रयः । अनुदात्तेत आख्याता आद्युदात्ता इतः स्यभात् ॥२८॥ सहोऽनुदात्तेदेकस्तु रमेकोऽप्यात्मनेपदी । सदस्त्रय उदात्तेतः कुचाद्वेदा उदात्त इत् ॥२९॥ स्वरितेतः पञ्चत्रिंशद्धिक्काद्याश्च ततः परम् । स्वरितेच्छिञ्भूञाद्याश्चत्वार स्वरितेत्ततः ॥३०॥ घेटः परस्मैपदिनः षट्चत्वारिशदुदीरिताः । अष्टादश स्मिङाद्यास्तु आमनेपदिनो मताः ॥३१॥ ततस्त्रयोऽनुदात्तेतः पूङाद्याः परिकीर्तिताः । हूपरस्मैपदी चात्मनेभाबास्तु गुपास्त्रयः ॥३२॥ रमश्चद्ध्यनुदात्तेतो जिक्ष्विदोदात्त इन्मतः । परस्मैपदिनः पंचदश स्कम्भिवादयस्तथा ॥३३॥ कित्धातु रुदात्तेच्च दान्शानोभयात्मकौ । स्वरितेतः पचाद्यंकाः परस्मैपदिनो मताः ॥३४॥ स्वरितेतस्त्रयश्चैतौ वदवची परिभाविणौ । भ्वाद्या एते षडधिकं सहस्रं धातवो मताः ॥३५॥ परस्मैपदिनः प्रोक्ता वदाश्चाप हनेति च । स्वरितेतो द्विषाद्यास्तु चत्वारो धातवो मताः ॥३६॥ चक्षिङेकः समाख्यातो धातुरात्मनेपदी । इरादयोऽनुदात्तेतो धातवस्तु त्रयोदश ॥३७॥ आत्मनेपदिनौ प्रोक्तौ षूङ्शीङ्द्वौ शाब्दिकैर्मुने । परस्मैपदिनः प्रोक्ता षुमुखाः सप्त धातवः ॥३८॥ स्वरितेदूर्णुञाख्यातो धातुरेको मुनीश्वर । घुमुखास्त्वय उद्दिष्टाः परस्मैपदिनस्तथा ॥३९॥ ष्टुजेकस्तु समाख्यातः स्मृतो नारद शाब्दिकैः ॥४०॥ अष्टादश राप्रभृतयः परस्मैपदिनः स्मृताः । इङ्ङात्मनेपदी प्रोक्तो धातुर्नारद केवलः ॥४१॥ विदादयस्तु चत्वारः परस्मैपदिनो मताः । जिक्ष्वप्स्ये समुद्दिष्टः परस्मैपदिकस्तथा ॥४२॥ परस्मैपदिनश्चैव ते मयोक्ताः श्वसादयः । दीधीङ्‌वेवीङ् स्मृतौ धातू आत्मनेपदिनौ मुने ॥४३॥ षसादयस्त्रयश्चापि उदात्तेतः प्रकीर्तिताः । चर्करीतं च हुङ्प्रोक्तोऽनुदात्तेन्मुनिसत्तम ॥४४॥ त्रिसप्तति समाख्याता धातवोऽदादिके गणे । दादयो धातवो वेदाः परस्मैपदिनो मताः ॥४५॥ स्तन अह्नि ये स्वरितेत् है। स्यम् से आगे के धातु भा आदि उदात्त हैं ॥२८॥ सह अनुदात्तेत् है, केवल एक रम् आत्मनेपदी है, सद् आदि तीन उदात्तेत्, कुच् आदि चार उदात्तेत् हैं ॥२९॥ इसके अनन्तर हिक्क् आदि पैंतीस धातु स्वरितेत् हैं। श्रिञ् और भूञ् आदि चार स्वरितेत् हैं ॥३०॥ घेट् आदि छत्तीस परस्मैपदी हैं। स्मिङ् आदि अठारह धातु आत्मनेपदी हैं ॥३१॥ पूङ् आदि तीन अनुदात्तेत् हैं। हूङ् धातु परस्मैपदी है। गुप् से लेकर तीन धातु आत्मनेपदी हैं ॥३२॥ रभ् आदि धातु अनुदात्तेत् हैं। जिक्ष्विदा उदात्तेत् हैं। स्कम्भु आदि पन्द्रह परस्मैपदी हैं ॥३३॥ कित् धातु उदात्तेत् है। दान् शान् स्वरितेत् उभयपदी हैं। पच् आदि नव परस्मैपदी हैं ॥३४॥ परिभाषार्थक वद् और वच् आदि तीन स्वरितेत् हैं। ये एक हजार छः भ्वादि धातु हैं ॥३५॥ वद् और हन् परस्मैपदी हैं। द्विष् आदि चार धातु स्वरितेत् हैं ॥३६॥ यहाँ एक चक्षिङ् धातु आत्मने- पदी है। इर आदि तेरह अनुदात्तेत् हैं ॥३७॥ मुने ! वैयाकरणों ने षूङ् और शीङ् दोनों धातुओं को आत्मने- पदी कहा है। षु आदि सात परस्मैपदी हैं ॥३८॥ मुनिवर ! ऊर्णु धातु स्वरितेत् कहा गया है। घु आदि तीन परस्मैपदी हैं ॥३९॥ नारद ! ष्टुं को भी शाब्दिकों ने परस्मैपदी माना है ॥४०॥ रा प्रभृति अठारह परस्मै- पदी हैं। नारद ! केवल इङ् धातु आत्मनेपदी है ॥४१॥ विद् आदि चार धातु परस्मैपदी हैं। जिक्ष्वप् श्ये परस्मै- पदी धातु है ॥४२॥ श्वस् आदि धातु उदात्तेत् हैं। मुनिश्रेष्ठ ! 'चर्करीतं च' यह यङ्लुगन्त का प्रतीक है। यह अदादि माना गया है। हुङ् अनुदात्तेत् हैं अदादि गण में तिहत्तर धातु परिगणित हैं। दा आदि चार धातु परस्मैपदी हैं ॥४३-४५॥ भूञ् धातु स्वरितेत् और ओहाक् उदात्तेत् है। माङ्, हाङ् दो

त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३७७ स्वरितेद्धै भृञाख्यात उदात्तेद्वाक् प्रकीर्तितः । माङ्-हाङ्द्धावनुदात्तेतौ स्वरितेद्धानधातुषु ॥४६॥ वाणिजिराग्यास्त्रयश्चापि स्वरितेत उदाहृताः । घुमुखा द्वादश तथा परस्मैपदिनो मताः ॥४७॥ द्वाविंशतिरिहोद्दिष्टा धातवो ह्वादिके गणे । परस्मैपदिनः प्रोक्ता दिवाद्याः पंचविंशतिः ॥४८॥ आत्मनेपदिनौ धातू पूङ्-डूङ्द्धावपि नारद । ओदितः पूङ्मुखाः सप्त आत्मनेपदिनो मताः ॥४६॥ आत्मनेपदिनो विप्र दीङ्मुखास्त्विह कीर्तिताः । स्यतिप्रभृतयो वेदाः परस्मैपदिनो मताः ॥५०॥ जन्यादयः पंचदश आत्मनेपदिनो मुने । मृषाद्याः स्वरितेतस्तु धातवः पंच कीर्तिताः ॥५१॥ एकादश पदाद्यास्तु ह्यात्मनेपदिनो मताः । राधोः कर्मक एवात्र वृद्धौ स्वादिचुरादिके ॥५२॥ उदात्तेतस्तुदाद्यास्तु त्रयोदश समीरिताः । परस्मैपदिनोऽष्टात्र रधाद्याःपरिकीर्तिताः ॥५३॥ समाद्याश्चाप्युदात्तेतः षट्चत्वारिंशदुदीरिताः । चत्वारिंशच्छतं चापि दिवाद्यौ धातवो मताः ॥५४॥ स्वाद्यः स्वरितेत्तोका धातवः परिकीर्तिताः । सप्ताख्यातो दुनोतिस्तु परस्मैपदिनो मुने ॥५५॥ अष्टिधावनुदात्तेतौ धातू द्वौ परिकीर्तितौ । परस्मैपदिनस्त्वत्र तिकाद्यास्तु चतुर्दश ॥५६॥ द्वाविंशद्वातवः प्रोक्ता विप्रेन्द्र स्वादिके गणे । स्वरितेतः षडाख्यातास्तुदाद्या मुनिसत्तम ॥५७॥ ऋष्युदात्तेञ्जुषीपूर्वा आत्मनेपदिनोर्णवाः । व्रश्चादय उदात्तेतः प्रोक्ताः पंचाधिकं शतम् ॥५८॥ गूर्युदात्तेदिहोद्दिष्टो धातुरेको मुनीश्वर । णूमूखाश्चैव चत्वारः परस्मैपदिनो मताः ॥५६॥ कुडाख्यातोऽनुदात्तेच्च कुटाद्याः पूतिमागताः । पृङ् मृङ् चात्मनेभावौ षट् परस्मैपदे रिषेः ॥६०॥ आत्मनेपदिनौ धातू दृङ्घूङ्द्धौ चाप्युदाहृतौ । प्रच्छादिषोडशाख्याताः परस्मैपदिनो मुने ॥६१॥ स्वरितेतः षट् ततश्च प्रोक्ता मिलमुखा मुने । कृतीप्रभृतयश्चापि परस्मैपदिनस्त्रयः ॥६२॥ धातुयें अनुदात्तेत् हैं स्वरितेत् धातुओं से आनच् प्रत्यय होता है ॥४६॥ णिजिर् आदि तीनों धातु स्वरितेत् हैं । घू आदि बारह धातु परस्मैपदी है ॥४७॥ जुहोत्यादि गण में बाईस धातुयें हैं । दिव् आदि पचीस धातु परस्मैपदी हैं ॥४८॥ नारद ! पूङ् और डूङ् दोनों आत्मनेपदी धातु धातु हैं । पूङ् आदि सात ओदित धातु आत्मपदी हैं ॥४६॥ विप्र ! दीङ् प्रभृति धातु आत्मनेपदी हैं । षो आदि चार धातु परस्मैपदी हैं ॥५०॥ मुने ! जनी आदि पन्द्रह धातु आत्मनेपदी हैं । मृष् आदि पांच धातु स्वरितेत् हैं ॥५१॥ पद् आदि ग्यारह धातु आत्मनेपदी हैं । अकर्मक राध् धातु से वृद्धि अर्थ में श्यन् प्रत्यय होता है । यह स्वादि और चुरादि भी है ॥५२॥ तुद् आदि तेरह धातु उदात्तेत् हैं । रध् आदि आठ धातु परस्मैपदी हैं ॥५३॥ सम् आदि छियालीस धातु उदात्तेत् हैं । दिवादि गण में एक सौ चालीस धातु हैं ॥५४॥ सु आदि नव धातु स्वरितेत् हैं । मुने ! दु आदि सात धातु परस्मैपदी हैं ॥५५॥ अश् और टिघ् धातु अनुदात्तेत् हैं । तिक् आदि चौदह धातु परस्मैपदी हैं ॥५६॥ विप्रेन्द्र ! स्वादि गण में बत्तीस धातु हैं । मुनिवर्य ! तुद् आदि छः धातु स्वरितेत् हैं ॥५७॥ ऋषि धातु उदात्तेत् है और जुष् आदि चार धातु आत्मनेपदी हैं । व्रश्च् आदि एक सौ पाँच धातु उदात्तेत् हैं ॥५८॥ मुनीश्वर ! केवल गुरी धातु उदात्तेत् है । णू आदि चार धातु परस्मैपदी हैं ॥५६॥ कुङ् अनुदात्तेत् है कुट् भी अनुदात्तेत् ही है । पृङ् मृङ् आत्मनेपदी तथा रि और पि आदि छः परस्मैपदी हैं ॥६०॥ हङ् और घूङ् दो धातु आत्मनेपदी हैं । मुने ! प्रच्छ आदि सोलह धातु परस्मैपदी हैं ॥६१॥ मुने ! इसके अनन्तर मिल् आदि सोलह धातु स्वरितेत् हैं । कृत् आदि तीन धातु परस्मैपदी हैं । तुदादि गण में एक सौ सत्तावन धातु हैं ॥६२॥ ४८ ना० पु०

यहाँ पृष्ठ की सम्पूर्ण पाठ्य-सामग्री का पंक्ति-वार (line-by-line) लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

३७८ नारदीयपुराणम् सप्त पंचाशदधिकास्तुदादौ धातवः शतम् । स्वरितेतो रुधोनंदा परस्मैभाषितः कृती ॥६३॥ जिइंधीतोऽनुदात्तेतस्त्रयो धातव ईरिताः । उदात्तेतः शिषविषरुधाद्याः पंचविंशतिः ॥६४॥ स्वरितेतस्तनोः सप्त धातवः परिकीर्तिताः । मनुन्व्वात्मनेभाषौ स्वरितेत्कृञुदाहृतः ॥६५॥ ततो द्वौ कीर्तितौ विप्र धातवौ दश शाब्दिकैः । क्रूयाद्याः सप्तोभयभाषाः सौत्राः स्तंभ्वादिकास्तथा ॥६६॥ परस्मैपदिनः प्रोक्ताश्चत्वारोऽपि मुनीश्वर । द्वाविंशतिरुदात्तेतः क्रुधाद्या धातवो मताः ॥६७॥ वृङ्ङात्मनेपदी धातुः श्रैयाद्याश्चैकविंशतिः । परस्मैपदिनश्चाय स्वरितेद्ग्रह एव च ॥६८॥ क्रयादिकेषु द्विपंचाशद्धातवः कीर्तिता बुधैः । चुराद्या धातवो ण्यन्ता षड्विंशदधिकं शतम् ॥६९॥ चित्याद्यष्टादशाख्याता आत्मनेपदिनो मुने । चर्चाय आवृणीयास्तु ण्यंता वा परिकीर्तिताः ॥७०॥ अदंता धातवश्चैव चत्वारिंशत्तथाष्ट च । पदाद्यास्तु दश प्रोक्ता धातवो ह्यात्मनेपदे ॥७१॥ सूत्राद्या अष्ट चाप्यत्र ण्यन्ता प्रोक्ता मनीषिभिः । धात्वर्थे प्रातिपदिकाद्बहुल चेष्ठवन्मतम् ॥७२॥ तत्करोति तदाचष्टे हेतुमत्यदि णिर्मतः । धात्वर्थे कर्तृकरणाच्चित्राद्याश्चापि धातवः ॥७३॥ अष्ट संग्राम आख्यातोऽनुदात्तेच्छाब्दिकेर्बुधैः । स्तोभाद्याः षोडश तथा अदन्तस्य निदर्शनम् ॥७४॥ तथा बाहुलकादन्ये सौत्रलौकिकवैदिकाः । सर्वे सर्वगणीयाश्च तथानैकार्थवाचिनः ॥७५॥ सनाद्येता धातवश्च तथा वै नामधातवः । एवमानंत्यमुद्भाव्यं धातूनामिह नारद । संक्षेपोऽयं समुद्दिष्टो विस्तरस्तव तत्र च ॥७६॥

रुध् और नंद धातु स्वरितेत् हैं। कृती धातु परस्मैपदी है। विन्धी आदि तीन धातु अनुदात्तेत् हैं । शिष्, पिष्, रुध् आदि पचीस धातु उदात्तेत् हैं ॥६३-६४॥ तनु आदि सात धातु स्वरितेत् हैं। वनु और मनु धातु आत्मनेपदी हैंकृञ् को स्वरितेत् कहा गया है । विप्र ! इसके अनन्तर वैयाकरणों ने तनादिगण में दस धातुओं की गणना की है ॥६५ १/२॥ क्री आदि सात उभयपदी हैं। सूत्र में पढ़े गए स्तंभु आदि चार धातु भी परस्मैपदी हैं। मुनीश्वर ! क्रुध् आदि बाईस धातु उदात्तेत् हैं ॥६६-६७॥ वृङ् धातु आत्मनेपदी है और श्रंथ् आदि इक्कीस धातु परस्मैपदी हैं । ग्रह् धातु स्वरितेत् है। विद्वानों ने क्र्यादिगण में बावन धातु पढ़े हैं ॥६८ १/२॥ चुरादि गण में वित् धातु तक एक सौ छत्तीस धातु हैं। मुने ! चिती आदि अठारह धातु आत्मनेपदी हैं। चर्च से लेकर धृषी धातु तक धातु णिन्त कहे गए हैं ॥६९-७०॥ अदन्त अडतालीस धातु भी उभयपदी हैं तथा पद् आदि दश धातु आत्मनेपदी हैं ॥७१॥ मनीषियों ने सूत्र आदि आठ धातुओं को णित् कहा है। धात्वर्थ में प्राति पदिक से णिच् और इष्ठवद्भाव विकल्प से होता है ॥७२॥ तत्करोति, (उसको करता है) और तदाचष्टे (करने की इच्छा रखता है) अर्थ में, प्रेरणार्थक क्रियाओं से णिच् प्रत्यय होता है। धात्वर्थ की विवक्षा में कर्त्ता और करण से भी णिच् प्रत्यय होता है। चित्र आदि आठ धातु उदात्तेत् है। इनसे णिच् प्रत्यय होता है। विद्वान् वैयाकरणों ने संग्राम आदि आठ धातुओं को अनुदात्तेत् कहा है। स्तोम आदि सोलह और अदन्त धातुओं से जो णिच् कहा गया है यह निदर्शन केवल बाहुलक है ॥७३-७४॥ इसके अतिरिक्त और भी धातु हैं, जिनसे णिच् प्रत्यय होता है। इसी प्रकार बाहुलक के बल से अन्य सूत्र में पढ़े गए और लोक वेद प्रसिद्ध धातुओं से भी णिच् प्रत्यय होता है। अथवा यों कहा जाय कि बाहुलक से सब धातु सब गणों में कहे गए हैं और सभी अनेकार्थ वाची हैं ॥७५॥ नारद ! इन धातुओं के अतिरिक्त सन्, क्यच्, काम्यच् आदि प्रत्यय जिनके अन्त में हों, उनकी भी धातु संज्ञा होती है। नाम धातु भी धातु ही हैं। नारद ! इस प्रकार अनन्त धातुओं की उद्भावना हो सकती है। यहाँ संक्षेप से सब कुछ बताया गया है। इसका विस्तार तत्सम्बन्धी ग्रन्थों में है ॥७६॥

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (मूल श्लोक, पदच्छेद/अर्थ एवं हिन्दी अनुवाद) दिया गया है:

त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [पृष्ठ ३७६]


ऊदृदंतैयौंति रुक्ष्णुशीङ्स्नुक्षुश्विडीङ्श्विभिः। वृङ्वृञ्भ्यां च विनैकाचोऽजंतेषु निहताः स्मृताः ॥७७॥ शक्लप्च्मुच् रिच्वच् विच् सिच्प्रच्छित्यज् निजिर्भजः। भञ्जभुञ्ज्रस्ज्मस्जियज्युरुज्रजञ्- विजिर्स्वजिसञ्जसृजः ॥७८॥ अद्क्षुद्खिद्छिद्तुद्नुदः पद्यभिद्विद्यतिविन्द। शद्सदी स्विद्यतिस्कन्दिर्ह्रदी क्रुधक्षुधि- बुध्वती ॥७९॥ बंधिर्युधिरथोराधिर्व्यधशुधः साधिसिध्यतौ। मन्यहन्नाप्क्षिपूक्षुपिप्तप्तिप्तृप्यतिदृप्यतौ ॥८०॥ लिब्लुब्वप्शप्स्वप्स्पियरभरभलभगम्नम् यमो रमिः। कुशिर्दशिदिशि दृश्मृश्रिश्रूशलिश- विश्सृशः कृषिः ॥८१॥ त्विष्तुष्दुष्पुष्विष्विशूशिष्शुष्श्लिष्यतयो घसिः। वसतिर्दह् दिहिद्रुहो नह्मिह् रुह्लिह्- वहिस्तथा ॥८२॥ अनुदात्ता हलंतेषु धातवो द्व्यधिकं शतम्। चाद्या निपाता गतयः प्राद्याः दिग्देशकालजाः ॥८३॥ शब्दाः प्रोक्ता ह्यनेकार्थाः सर्वलिंगा अपि द्विज। गणपाठः सूत्रपाठो धातुपाठस्तथैव च ॥८४॥ पाठोऽनुनासिकानां च परायणमिहोच्यते। शब्दाः सिद्धा वैदिकास्तु लौकिकाश्चापि नारद ॥८५॥ शब्दपरायणं तस्मात्कारणं शब्दसंग्रहे। लघुमार्गेण शब्दानां साधूनां संनिरूपणम् ॥८६॥ प्रकृतिप्रत्ययादेशलोपागममुखैः कृतम्। इत्थमेतत्सम्आख्यातं निरुक्तं किंचिदेव ते कार्त्स्न्येन वक्तुमानंत्यात्कोऽपि शक्तो न नारद ॥८७॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे निरुक्तलक्षणनिरूपणं नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५३॥


हिन्दी अनुवाद

अजन्त धातुओं में जकारान्त, ऋकारान्त, यु, रु क्ष्ण, शीङ्, स्नु, नु, क्षु, श्वि, डीङ्, श्वि, वृङ्, वृञ् इनको छोड़कर शेष धातु, अनुदात्तेत् हैं ॥७७॥ ककारान्तों में शक्, चकारान्तों में पच्, मुच्, रिच, वच्, विच्, सिच्, छान्त में केवल प्रच्छ, जान्तों में त्यज्, निज्, भज्, भञ्ज्, भुज्, भ्रस्ज्, मस्ज्, यज्, युज्, रुज्, रञ्ज, विजिर्, स्वञ्जि, सञ्ज और सृज्, ॥७८॥ दान्तों में अद्, क्षुद्, खिद्, छिद्, तुद्, नुद्, पद्, भिद्, विद् (सत्ता) विद्, (विचारणी) शद्, सद्, स्विद्, स्कन्दिर्, ह्दी; धान्तों में क्रुध्, क्षुध्, बुध् ॥७९॥ बन्ध्, युध्, रुध्, राध् व्यध्, शुध्, साधि, सिध्; नान्तों में मन्, हन्; पान्तधातुओं में आप्, क्षुप्, क्षिप्, तप्, तिप्, तृप्, दृप्, ॥८०॥ लिप्, लुप्, वप्, शप्, स्वप्, सृपि; भान्तों में यभ्, लभ्; मान्तों में गम्, नम्, यम्; शान्तधातुओं में, कृशि, दंश्, दिश्, मृश्, रिश्, रुश्, लिश, विश्, स्पृश; षान्तों में कृष्, त्विष्, तुष्, द्विष्, दुष्, पुष, विष, विष्, शिष्, श्लिष्, सान्तों में घस्, वस्; हान्तों में ह, दिह्, ह, दुह्, नह्, मिह्, रुह्, लिह, तथा वह् ॥८१-८२॥ हलन्तों में इतने एक सौ दो धातु अनुदात्त हैं। 'च' आदि की निपात संज्ञा होती है। 'प्र' आदि उपसर्ग 'गति' कहलाते हैं। भिन्न-भिन्न दिशा, देश और काल में प्रकट हुए शब्द अनेक अर्थों के बोधक होते हैं। विप्रवर ! वे देश कालों के भेद से सब स्त्री- लिंगों में प्रयुक्त होते हैं। गणपाठ, सूत्रपाठ, धातुपाठ और अनुनासिकों का पाठ यहाँ आवृत्ति-रूप में कहा गया हैं ॥८३-८४॥ नारद ! वैदिक और लौकिक सभी शब्द नित्य सिद्ध हैं। इसलिए ऐसे सिद्ध (बने बनाये) शब्दों के ज्ञान के लिए पारायण पाठ आवश्यक है ॥८५॥ सिद्ध शब्दों का ही प्रकृति, प्रत्यय, आदेश और आगम आदि के द्वारा लघुमार्ग से सम्यक् निरूपण किया जाता है। नारद ! इस प्रकार यहाँ सूक्ष्म रूप में शब्दों की निरुक्ति कही गई है। इसका पूर्ण रूप से वर्णन तो कोई नहीं कर सकता; क्योंकि शब्द अनन्त हैं ॥८६-८८॥

श्रीनारदीयमहापुराण में तिरपनवां अध्याय समाप्त ॥५३॥

अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सनंदन उवाच ज्योतिषांगं प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ब्रह्मणा पुरा । यस्य विज्ञान मात्रेण धर्मसिद्धिर्भवेन्नृणाम् ॥१॥ त्रिस्कंधं ज्योतिषं शास्त्रं चतुर्लक्षमुदाहृतम् । गणितं जातकं विप्र संहितास्कंधसंज्ञिताः ॥२॥ गणिते परिकर्मादि खगमध्यस्फुटक्रिये । अनुयोगश्चंद्रसूर्यग्रहणं चोदयास्तकम् ॥३॥ छाया शृङ्गोन्नतिद्युती पातसाधनमीरितम् । जातके राशिभेदाश्च ग्रहयोनिश्च योनिजम् ॥४॥ निषेकजन्मारिष्टानि ह्यायुर्दायो दशाक्रमः । कर्माजीवं चाष्टवर्गो राजयोगाश्च नाभसाः ॥५॥ चन्द्रयोगाः प्रव्रज्याख्या राशिशीलं च दृक्फलम् । ग्रहभावफलं चैवाश्रययोगप्रकीर्णके ॥६॥ अनिष्टयोगाः स्त्रीजन्मफलं निर्याणमेव च । नष्टजन्मविधानां च तथा द्रेष्काणलक्षणम् ॥७॥ संहिताशास्त्ररूपं च ग्रहचारोऽब्दलक्षणम् । तिथिवारसनक्षत्रयोगतिथ्यर्द्धसंज्ञकाः ॥८॥

अध्याय ५४ ज्योतिष वर्णन

सनन्दन बोले—अब मैं ज्योतिष शास्त्र का वर्णन कर रहा हूँ जिसका वर्णन पहले ब्रह्मा ने स्वयं किया है। और जिसके ज्ञानमात्र से मनुष्यों को धर्मसिद्धि प्राप्त हो जाती है। ज्योतिष शास्त्र तीन स्कन्धोंवाला है और चार लाख श्लोकों में वर्णित है। गणित, जातक (होरा) और संहिता इसके तीन स्कन्ध हैं। गणित में परिकर्म¹ ग्रहों की चाल और स्फुट क्रिया का वर्णन है। अनुयोग (देश, दिशा और काल ज्ञान) चन्द्र और सूर्य ग्रहण, उदय, अस्त, छायाधिकार, चन्द्रशृङ्गोन्नति,² ग्रहयुति (ग्रहों का योग) तथा पात (महापात-सूर्यचन्द्रमा के क्रान्तिसाम्य) का साधन-प्रकार कहा गया है ॥१-३॥ जातकस्कन्ध में राशि भेद, ग्रहयोनि (ग्रहों की जाति, रूप और गुण आदि) वियोनिज (मानवेतर जन्म-फल), गर्भाधान, जन्म, अरिष्ट, आयुर्दाय, दशाक्रम, कर्माजीव (आजीविका), अष्टकवर्ग, राजयोग, नाभसयोग, चन्द्रयोग, प्रव्रज्यायोग, राशिशील, ग्रहदृष्टिफल, ग्रहों के भाव- फल, आश्रययोग, प्रकीर्ण, अनिष्टयोग, स्त्रीजातकफल, निर्याण (मृत्युविषयक विचार), नष्ट-जन्म-विधान (अज्ञात जन्म-काल को जानने का प्रकार) तथा द्रेष्काणों के (राशि के तृतीय भाग (१० अंश) को 'द्रेष्काण' संज्ञा है) स्वरूप—इन सब विषयों का बयान है ॥४-७॥ अब संहितास्कन्ध के स्वरूप का परिचय दिया जाता है। उसमें ग्रहचार (ग्रहों की गति), वर्षलक्षण, तिथि, दिन, नक्षत्र, योग, करण, मुहूर्त, उपग्रह, सूर्य-संक्रान्ति, ग्रहगोचर, चन्द्रमा और तारा

१. योग, अन्तर; गुणन, भजन, वर्ग, वर्गमूल, घन और घनमूल—ये परिकर्म कहे गये हैं। २. द्वितीया को चन्द्रोदय होता है, उसमें कभी चन्द्रमा का दक्षिण सींग और कभी उत्तर सींग (नोक) ऊपर को उठा रहता है, उसी को 'चन्द्रशृङ्गोन्नति' कहा गया है। ज्योतिष में उसके परिणाम का विचार किया गया है।

चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३८१ मुहूर्तोपग्रहाः सूर्यसंक्रांतिर्गोचरःक्रमात् । चंद्रताराबलं चैव सर्वलग्नार्तवाह्वयः ॥१८॥ आधानपुंससीमंतजातनामन्नभुक्तयः । चौलङ्कर्णव्यणं मौंजी क्षुरिकाबंधनं तथा ॥१०॥ समावर्तनवैवाहप्रतिष्ठासद्मलक्षणम् । वात्राप्रवेशनं सद्योवृष्टिः कर्मविलक्षणम् ॥११॥ उत्पत्तिलक्षणं चैव सर्वं संक्षेपतो ब्रुवे। एकं दश शतं चैव सहस्रायुतलक्ष कम् ॥१२॥ प्रयुतं कोटिसंज्ञां चार्वुदमब्जं च खर्वकम् । निखवं च महापद्मं शंकुर्जलंघिरेव च ॥१३॥ अन्त्यं मध्यं परार्द्धं च संज्ञा दशगुणोत्तराः । क्रमाद्व्युत्क्रमतो वापि योगः कार्योत्तरं तथा ॥१४॥ हन्याद्गुणेन गुण्यं स्यात्तेनैवोपांतिमादिकान् । शुद्धेद्वरोद्यदुगुणश्च भाज्यांत्यात्तफलं मुने ॥१५॥ समांकतोऽथो वर्गःस्यात्तमेवाहुः कृतिं बुधः । अंत्यात्तु विषमात्त्यक्त्वा कृतिं मूलं न्यसेत्पृथक् ॥१६॥ द्विगुणोनामुना भक्ते फलं मूले न्यसेत्क्रमात् । तत्कृतिं च त्यजेद्विप्रे मूलेन विभजेत्पुनः ॥१७॥ का बल, सम्पूर्ण लग्नों तथा ऋतुदर्शन का विचार, गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्न- प्राशन, चूडाकरण, कर्णवेध, उपनयन, मौञ्जीबन्धन (वेदारम्भ), क्षुरिकाबन्धन, समावर्तन, विवाह, प्रतिष्ठा, गृहलक्षण, यात्रा, गृहप्रवेश, तत्काल वृष्टिज्ञान, कर्मवैलक्षण्य तथा उत्पत्ति का लक्षण—इन सब विषयों का संक्षेप से वर्णन करूंगा ॥८-११३॥ [अब गणित का प्रकरण प्रारंभ किया जाता है-] एक (इकाई), दस (दहाई), शत (सैकड़ा), सहस्र (हजार), अयुत (दस हजार), लक्ष (लाख), प्रयुत (दस लाख), कोटि करोड़, अर्बुद (दस करोड़), अब्ज (अरब), खवं (दस अरब), निखवं, (खर्व), महापद्म (दस खर्व), शंकु (नील), जलधि (दस नील), अन्त्य (पद्म), मध्य (दस पद्म), परार्ध (शंख) इत्यादि संख्याबोधक संज्ञाओं को उत्तरोत्तर दस गुना माना गया है। यथास्थानीय अंकों का योग या अन्तर क्रम या व्युत्क्रम से करें ॥१२-१४॥ गुण्य के अन्तिम अंक को गुणक से गुणा करें। फिर उसके पार्श्ववर्ती अंक को भी उसी गुणक से गुणा कर दें। इस तरह आदि अंक तक गुणा करने पर गुणनफल प्राप्त हो जाता है। मुने ! इसी प्रकार भागफल जानने के लिए भी यत्न करना चाहिए जितने अंक से भाजक के साथ गुणा करने पर भाज्य में से घट जाय, वही अंक लब्धि अथवा भागफल होता है ॥१५॥ दो समान अंकों के गुणनफल को वर्ग कहा गया है। विद्वान् पुरुष उसी को कृति कहते हैं। (जैसे ४ वर्ग का ४ × ४ = १६ और ९ का वर्ग ९ × ९ = ८१ होता है) [वर्गमूल जानने के लिए दाहिने अंक से लेकर बायें अंक तक अर्थात् आदि से अन्त तक विषम और सम का चिह्न कर देना चाहिए। खड़ी लकीर को विषम का ओर पड़ी को सम का चिह्न माना गया है]। अन्तिम विषम में जितने वर्ग घट सकें उतने घटा देना चाहिए। उस वर्ग का मूल लेकर उसे पृथक् रख देना चाहिए ॥१६॥ फिर द्विगुणित मूल से सम अंक में भाग दे और जो लब्धि आये उसका वर्ग विषम में घटा दे। फिर उसे दूना करके पंक्ति में रख दे। मुनीश्वर ! इस प्रकार बार-बार करने से पंक्ति का आधा वर्गमूल होता है ॥१७३॥ समान तीन अंकों के गुणनफल को घन कहा गया है। अब घनमूत्न निकालने की विधि बतायी जाती है-दाहिने के प्रथम अंक पर घन या विषम का चिह्न (खड़ी लकीर के रूप में) तथा उसके वामभाग में पार्श्ववर्ती दो अंकों पर (पड़ी लकीर के रूप में) अघन या सम का चिह्न लगावे । इसी प्रकार अन्तिम अंक तक एक घन (विषम) और दो अघन (सम) के चिह्न लगाने चाहिए। अन्तिम या विषम घन में जितने घन घट सकें उतने घटा ले। उस घन को अलग रखे । उसका घनमूल ले और उस घनमूत्र का वर्ग मरे, फिर उसमें तीन से गुणा करे। उससे आदि अंक में भाग दे, लब्धि को अलग लिख

३८२ नारदीयपुराणम् एवं मुहुर्वर्गमूलं जायते च मुनीश्वर । समत्यङ्ककृतिः प्रोक्तो घनस्तंत्रविधिः पदे ॥११८॥ प्रोच्यते विषमं त्वाद्यं समे द्वे च ततः परम् । विशोध्यं विषमादंत्याद्घनं तन्मूलमुच्यते ॥११६॥ विघ्नाद्भजेन्मूलकृत्या समं मूले न्यसेत्फलम् । तत्कृतिस्त्रेन निहतान्निघ्नीं चापि विशोधयेत् ॥१२०॥ घनं च विषमादेवं घनमूलं मुहुर्भवेत् । अन्योन्यहारनिहतौ हरांशौ तु समुच्छिदा ॥१२१॥ लवा लवघ्नाश्च हरा हरघ्ना हि सवर्णनम् । भागप्रभागे विज्ञेयं मुने शास्त्रार्थचित्तकैः ॥१२२॥ अनुबंधेऽपवाहे चैकस्य चेदधिकोनकः । भागातस्तस्थहारेण हरं स्वांशाधिकेन तान् ॥१२३॥ ऊनेन चापि गुणयेद्धनं चिंतयेत्तथा । कार्यस्तुल्यहरांशानां योगश्चाप्यंततो मुने ॥१२४॥ अहारराशी रूढ्यं तु कल्पयेद्धरमप्यथा । अंशाहतिश्छेदधातहृद्भिन्नगुणने फलम् ॥१२५॥ छेदं चापि लवं विद्वन्परिवर्त्य हरस्य च । शेषः कार्यो भागहारे कर्तव्यो गुणनाविधिः ॥१२६॥ हारांशयोः कृती वर्गे घनो घनविधौ मुने । पदसिद्धये पदे कुर्यादथो स्वं सर्वतश्स्वस्वम् ॥१२७॥ छेदं गुणं गुणं छेदं वर्गं मूलं पदं कृतिम् । ऋणं स्वं स्वमृणं कुर्याद्दृश्ये राशिप्रसिद्धये ॥१२८॥ ले, उस लब्धि का वर्ग करे और और उसमें अन्त्य (प्रथम मूलाङ्क) एवं तीन से गुणा करे, फिर उसके बाद के अंक में उसे घटा दे तथा अलग रखी हुई लब्धि के घन को अगले घन अंक में घटा दे । इस प्रकार बार-बार करने से घनमूल सिद्ध होता है ॥११८-२०॥ भिन्न अंकों के परस्पर हर से हर (भाजक) और अंश (भाज्य) दोनों को गुणा कर देने से सबके नीचे बराबर हर हो जाता है । भागप्रभाग में अंश को अंश से और हर से गुणा करना चाहिए । भागानुबन्ध एवं भागापवाह में यदि एक अंक अपने अंश से अधिक या ऊन हो तो तलस्थ हर ऊपर वाले हर को गुणा कर देना चाहिए। उसके बाद अपने अंश से अधिक ऊन किये हुए हर से (अर्थात् भागानुबन्ध में हर अंश का योग करके और भागापवाह में हर अंश का अन्तर करके) अंश को गुणा कर देना चाहिए । ऐसा करने से भागानुबन्ध और भागापवाह का फल सिद्ध होगा । जिसके नीचे हर न हो उसके नीचे एक हर मान लेना चाहिए। भिन्न गुणन-साधन में अंश-अंश का गुणन करना और हर-हर के गुणन से भाग देना चाहिए । इससे भिन्न का गुणन-फल प्राप्त होगा । (यथा $\frac{२}{७} \times \frac{३}{\ell}$ यहाँ २ और ३ अंश हैं और ७, ८ हर हैं, इनमें अंश-अंश से गुणा करने पर २ $\times$ ३ = ६ हुआ और हर-हर के गुणन से ७ $\times$ ८ = ५६ हुआ । फिर ६ $\div$ ५६ करने से $\frac{\xi}{\chi\xi}$ जिसे दो से काटने पर $\frac{३}{\ell}$ उत्तर हुआ) ॥१२१-२५॥ विद्वन् ! भिन्न-संख्या के भाग में भाजक के हर और अंश को परिवर्तित कर (हर को अंश और अंश को हर बनाकर) फिर भाज्य के हर-अंश के साथ गुणन-क्रिया करना चाहिए, इससे भागफल सिद्ध होता है । (यथा $\frac{२}{७} \div \frac{\chi}{\xi}$ में हर और अंश के परिवर्तन से $\frac{२}{७} \times \frac{\xi}{\chi} = \frac{१२}{३५}$ यही भागफल हुआ) ॥ भिन्नांक के वर्गादि-साधन में यदि वर्ग करना हो तो हर और अंश दोनों का वर्ग करे तथा घन करना हो तो दोनों का घन करे। इसी प्रकार वर्गमूल निकालना हो तो दोनों का वर्गमूल और घनमूल निकालना हो तो भी दोनों का घनमूल निकालना चाहिए। (यथा—$\frac{३}{७}$ का वर्ग $\frac{\rho}{\gamma\rho}$ और मूल होगा $\frac{३}{७}$, इसी प्रकार $\frac{३}{७}$ का घन और $\frac{२७}{३४३}$ मूल $\frac{३}{७}$ होगा) ॥१२६-२७॥ विलोमविधि से राशि जानने के लिए दृश्य में हर को गुणक, गुणक को हर, वर्ग को मूल, मूल को वर्ग, ऋण को धन और धन को ऋण बनाकर अन्त में उलटी क्रिया करने से राशि (इष्ट संख्या) प्राप्त होती है।

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चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३८३ अथ स्वांशाधिकोने तु लवाढ्योनो हरो हरः । अंशस्त्वविकृतस्तत्र विलोमे शेषमुक्तवत् ॥२८॥ उद्दिष्टराशिः संक्षिप्सौ हृतोऽशै रहिता युतः । इष्टघ्नदृष्टेनैतेन भक्तंराशिरनीशितः ॥३०॥ योगोन्तरेणोनयुतोद्वितोराशीतसंक्रमे । राश्यंतरहृतं वर्गोत्तरं योगसुतश्च तौ ॥३१॥ गजघ्नीष्टकृतिकृतिध्येका दलिता चेष्टभाजिता । एकोऽस्य वर्गो दलितः सैको राशिः परो मतः ॥३२॥ द्विगुणेष्टहृतं रूपं श्रेष्ठं प्राग्रूपकं परम् । वर्गयोगांतरे व्येके राश्योर्वर्गोस्त एतयोः ॥३३॥ इष्टवर्गकृतिश्चेष्टघ्नोष्टघ्नो च सैककी । एषीस्यानामुखे व्यक्ते गणित व्यक्तमेव च ॥३४॥ गुणघ्नमूलोनयुतः सगुणार्द्धं कृतं पदम् । दृष्टस्य च गुणार्द्धो न युतं वर्गीकृतं गुणः ॥३५॥ यदा लघोनपुत्राशिदृश्यं भागोनयुग्भुवा । भक्तं तथा मूलगुणं ताभ्यां साध्योथ व्यक्तवत् ॥३६॥ विशेषका यह है कि जहाँ अपना अंश जोड़ा गया हो, वहाँ हर में अंश को घटाकर हर कल्पना करे और अंश ज्यों का त्यों रहे । फिर दृश्य राशि में विलोम क्रिया उक्त रीति से करे तो अभीष्ट राशि होती है ॥२८-२९॥ अभीष्ट संख्या जानने के लिए इष्ट राशि की कल्पना करनी चाहिए । फिर प्रश्नकर्ताके कथनानुसार उस राशि को गुणा या भाग करना चाहिए । कोई अंश घटाने को कहा गया हो तो जोड़ दे अर्थात् प्रश्न में जो-जो क्रियायें कही गई हों, वे इष्ट राशि में करके फिर जो निष्पन्न हो, उससे कल्पित इष्ट-गुणित इष्ट में भाग दे, उससे जो लब्धि प्राप्त हो, वही इष्ट राशि है ॥३०॥ संक्रमण-गणित में (यदि दो संख्याओं का योग और अन्तर ज्ञात हो तो) योग को दो जगह लिखकर एक जगह अन्तर को जोड़कर आधा करे तो एक संख्या प्राप्त होगी और दूसरी जगह अन्तर को घटाकर आधा करे तो दूसरी संख्या प्राप्त होगी—इस प्रकार दोनों राशियां (संख्यायें) ज्ञात हो जातीं वर्गसंक्रमण में (यदि दो संख्याओं का वर्गान्तर तथा अन्तर ज्ञात हो तो) वर्गान्तर में अन्तर से भाग देने पर जो लब्धि आती है, वही उनका योग है; योग का ज्ञान हो जाने पर फिर पूर्वोक्त प्रकार से दोनों संख्याओं का ज्ञान करना चाहिए ॥३१॥ वर्गकर्मगणित में इष्ट का वर्ग करके उसमें आठ से गुणा करे, फिर एक घटा दे, उसका आधा करे । तत्पश्चात्—उसमें इष्ट से भाग देने से एक राशि प्राप्त होगी । फिर उसका वर्ग करके आधा करे और उसमें एक जोड़ दे तो दूसरी संख्या प्राप्त होगी । अथवा कोई इष्ट कल्पना करके उस द्विगुणित इष्ट से १ में भाग देकर लब्धि में इष्ट को जोड़े तो प्रथम संख्या होगी और दूसरी संख्या १ होगी । ये दोनों संख्यायें वे ही होंगी, जिनके वर्गों के योग और अन्तर में एक घटाने पर भी वर्गाङ्क ही शेष रहता है । किसी इष्ट के वर्ग का वर्ग तथा पृथक् उसी का घन करके दोनों को पृथक्-पृथक् आठ से गुणा करे । फिर पहले में एक जोड़े तो दोनों संख्यायें ज्ञात होंगी । यह विधि व्यक्त और अव्यक्त दोनों गणितों में उपयुक्त है ॥३२-३४॥ गुणकर्म में अपने इष्टाङ्कगुणित मूल से ऊन या युक्त होकर यदि कोई संख्या दृश्य हुई तो मूल गुणक के आधे का वर्ग दृश्य-संख्या में जोड़कर मूल लेना चाहिए । उसमें क्रम से मूल गुणक का आधा जोड़ना और घटाना चाहिए । (अर्थात् जहाँ इष्टगुणित मूल से ऊन होकर दृश्य हो वहाँ गुणार्ध को जोड़ना तथा यदि इष्टगुणित मूल युक्त होकर दृश्य हो तो उक्त मूल में गुणकार्ध घटाना चाहिए ।) फिर उसका वर्ग कर लेने से प्रश्नकर्ता की को अभीष्ट राशि (संख्या) सिद्ध होती है । यदि राशि मूलोन या मूलयुक्त होकर पुनः अपने किसी भाग से भी ऊन या युत होकर दृश्य हो तो उस भाग को १ में ऊन या युत कर (यदि भाग ऊन हुआ हो तो घटा करके और यदि युत हुआ हो तो जोड़ करके) उसके द्वारा पृथक्-पृथक् दृश्य और मूल गुणक में भाग दे; फिर इस नूतन दृश्य और मूल गुणक से पूर्ववत् राशि का साधन करना चाहिए ॥३५-३६॥

३८४ नारदीयपुराणम् प्रमाणेच्छे सजातीये आद्यन्ते मध्यगं फलम् । इच्छान्नमाद्यहृत्तदिष्टं फलं व्यस्ते विपर्ययात् ॥३७॥ पंचराश्यादिकेऽन्योन्यपक्षं कृत्वा फलच्छिदाम् । बहुराशिवधे भक्त फलं स्वल्पवधेन च ॥३८॥ इष्टकर्मवधेमूलं च्युतं मिश्रात्कलांतरे । मानधनकालश्वातीताकालाद्यनफलसंहताः ॥३९॥ स्वयोगभक्तानिधनाः स्युः संप्रयुक्तदलानि च । बहुराशिकलात्स्वल्पराशिमासफलं बहु ॥४०॥ चेद्राशिविवरं मासफलांतरहृतं च यः । क्षेपा मिश्रहताः क्षेपयोगभक्ताः फलानि च ॥४१॥ भजेच्छिदोंशैस्तैर्मिश्रै रूपं कालश्च पूतिकृत् । पूर्णो गच्छेत्समैषद्रव्येसमैवर्गाद्वितेत्यतः ॥४२॥ (त्रैराशिक में) प्रमाण और इच्छा ये समान जाति के होते हैं। इन्हें आदि और अन्त में रखना चाहिए। फल भिन्न जाति का है, अतः उसे मध्य में रखना चाहिए। फल को इच्छा से गुणा करके प्रमाण के द्वारा भाग देने से लब्धि इष्टफल होती है। (यह क्रम त्रैराशिक में बताया गया है)। व्यस्त त्रैराशिक में इससे विपरीत क्रिया करनी चाहिए। अर्थात् प्रमाण फल को प्रमाण से गुणा करके इच्छा से भाग देने पर लब्धि इष्टफल होती है। (प्रमाण, प्रमाण-फल और इच्छा-इन तीन राशियों को जानकर इच्छाफल जानने की क्रिया को त्रैराशिक कहते हैं) ॥३७॥ पञ्चराशिक, सप्तराशिक (नवराशिक, एकादशराशिक) आदि में फल और हरों को परस्पर पक्ष में परिवर्त्तन करके (प्रमाण पक्ष वाले को इच्छा-पक्ष में और इच्छा पक्ष वाले को प्रमाण-पक्ष में रखकर) अधिक राशियों के घात में अल्पराशि के घात से भाग देने पर जो लब्धि आये, वही इच्छाफल है ॥३८॥ मिश्रधन को इष्ट मानकर इष्टकर्म से मूल-धन का ज्ञान करे, उसको मिश्रधन में घटाने से कालान्तर (सूद) प्राप्त होता है। अपने-अपने प्रमाण धन से अपने-अपने काल को गुणा करना, उसमें अपने-अपने व्यतीत काल और फल के घात (गुणा) से भाग देना, लब्धि को पृथक् रहने देना, उन सब में उन्हीं के योग का पृथक्-पृथक् भाग देना तथा सबको मिश्रधन से गुणा कर देना चाहिए, फिर क्रम से प्रयुक्त व्यापार में लगाये हुए धन खण्ड के प्रमाण ज्ञात होते हैं ॥३९३॥ पञ्चराशिकादि में फल और हर को अन्योन्यपक्षनयन करने से इच्छा-पक्ष में फल के चले जाने से इच्छा- पक्ष बहुराशि और प्रमाणपक्ष स्वल्पराशि माना गया है। इसी गणित के उदाहरण में जब इच्छाफल जानकर मूलधन प्राप्त करना हो तो फलों को परस्पर पक्ष में परिवर्तन करने प्रमाणपक्ष (स्वल्पराशि) का फल ही बहुराशि (इच्छाफल) से अधिक होगा। यहाँ राशिजफल को इष्टमास और प्रमाण-फल के गुणन से भाग देने पर मूलधन होता है ४०३॥ प्रक्षेप (पूंजी के अंशों) को पृथक्-पृथक् मिश्रधन से गुणाकर देना और उसमें प्रक्षेप के योग से भाग देना चाहिए। इससे पृथक्-पृथक् फल प्राप्त होते हैं। वापो आदि पूरण के प्रश्न में--अपने-अपने अंशों से हर में भाग देना, फिर उन सबके योग से १ में भाग देने पर वापी के भरने के समय का ज्ञान होता है ॥४१३॥ (द्विगुणचयादि-वृद्धि में फल का साधन)-(जहाँ द्विगुण-त्रिगुण आदि चय हो वहाँ) पद यदि विषम संख्या (३, ५, ७ आदि) हो तो उसमें १ घटाकर गुणक लिखना चाहिए। यदि पद सम हो तो आधा करके वर्ग- चिह्न लिखना चाहिए। इस प्रकार एक घटाने और आधा करने में भी जब विषमांक हो तब गुणकचिह्न, जब समांक हो तब वर्ग-चिह्न करना एवं जब तक पद की कुल संख्या समाप्त न हो जाय तब तक करते रहना

चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३८५ व्यस्तं गच्छतं फलं यद्गुणवर्ग भजहि तत् । व्येकं व्येकगुणाप्तं च प्राघ्नं मानं गुणोत्तरे ॥४३॥ भुजकोटिकृतियोगमूलं कर्णश्च दोर्भवेत् । श्रुतिकृत्यंतरपदं कोटिर्दोः कर्णवर्गयोः ॥४४॥ विवरात्तत्कर्णपदं क्षेत्रे त्रिचतुरस्रके । राश्योरंतरवर्गे च द्विघ्ने घाते युते तयोः ॥४५॥ वर्गयोगोथ योगांतहतिर्वर्गांतरं भवेत् । व्यास आकृतिसंक्षण्णोव्यासात्यात्परिधिर्मुने ॥४६॥ ज्याव्यासयोगविवराहतमूलोनितोऽद्धितः । व्यासः शरः शरोनाच्च व्यासाच्छरगुणात्पदम् ॥४७॥ द्विघ्नं जीवाथ जीवाद्धेवर्गे शरहृते युते । व्यासोष्टतेभवेदेवं प्रोक्तं गणितकोविदैः ॥४८॥ चापोननिघ्नतः परिधिः प्रागाङ्कः परिधेः कृते । तुर्यांशेन शरध्नेनाघे निनाधं चतुर्गुणम् ॥४६॥ व्यासघ्नं प्रभजेद्विप्र ज्या काशं जायते स्फुटा । ज्यांघ्रीबुघ्नोवृत्तवर्गोद्विघ्नतव्यासाम्चमविहृत् ॥५०॥ चाहिए। फिर अन्त्य चिह्न से उलटा गुणज और वर्गफल साधन करके आद्य चिह्न तक जो फल हो, उसमें १ घटाकर शेष में एकोन गुणक से भाग देना चाहिए । लब्धि को आदि अंक से गुणा करने पर सर्वधन होता है ॥४२-४३॥ (क्षेत्रव्यवहार--रेखागणित-प्रकरण)--भुज (लम्ब) और कोटि (आधार) के वर्गों के योग का मूल कर्ण होता है, भुज और कर्ण के वर्गान्तर का मूल कोटि होता है तथा कोटि एवं कर्ण के वर्गान्तर का मूल भुज होता है । यह बात त्रिभुज अथवा चतुर्भुज क्षेत्र के लिए कही गई है । अथवा भुज और कोटि की राशियों के अन्तरवर्ग में उन्हीं दोनों राशियों के गुणनफल का दूना जोड़ दे तो उन राशियों के वर्गों का योग होता है अथवा उन्हीं दोनों राशियों के योग और अन्तर का गुणनफल उनके वर्गों का अन्तर होता है ॥४४-४५½॥ (अब वृत्त के विषय में बताते हैं ।) मुने ! व्यास को २२ से गुणा करना और ७ से भाग देना चाहिए । इससे स्थूल परिधि का ज्ञान होता है ॥४६॥ वृत्त की ज्या (जीवा) और व्यास का योग एक जगह रखना और अन्तर को दूसरी जगह रखना चाहिए । फिर इन दोनों का (गुणा) करना चाहिए । उस गुणनफल का वर्ग मूल लेकर उसको व्यास में घटा देना चाहिए । फिर उसका आधा करे, वही 'शर' होगा । व्यास में शर को घटाना, अन्तर को शर से गुणा करना, उसका मूल लेकर उसका दूना करना चाहिए, तो 'जीवा' हो जायगो । जीवा का आधा करें उसका वर्ग करें, शर से भाग देना ओर लब्धि में शर को जोड़ दें तो व्यास का मान होगा ॥४७-४८॥ परिधि और चाप की नाप ज्ञात होने पर जीवा की लम्बाई निकालना । परिधि से चाप को घटाकर शेष में चाप से ही गुणा करने पर गुणनफल 'प्रथमाङ्क' कहलाता है । परिधि का वर्ग करें, उसका चौथा भाग लें, उसे पांच से गुणा करें और उसमें 'प्रथम' को घटा दें; यह भाजक होगा । चतुर्गुणित व्यास को प्रथम से गुणा करने पर भाज्य प्राप्त हुआ । भाज्य में भाजक से भाग देने पर जीवा सात हो जायगी ॥४९½॥ व्यास को चार से गुणा करके उसमें जीवा को जोड़ दें, यह भाजक हुआ । परिधि के वर्ग को जीवा की चौथाई और पांच से गुणा करें, यह भाज्य हुआ । भाजक से भाज्य में भाग दें, जो लब्धि आवे, उसे परिधि के वर्ग के चतुर्थांश में घटा दें और शेष का मूल लें, उसे वृत्त (परिधि) के आधे में घटा देने पर धनु (चाप) प्राप्त होगा ॥५०½॥ ४६ ना० पु०

३८६ नारदीयपुराणम् लब्धोनवृत्तवर्गाद्रिपदेर्घातपतिते धनुः । स्थूलमध्यापृवन्नवेधो वृत्तांकाशेषभागिकः ॥५१॥ वृत्तांगांशकृतिर्वेधनिघ्नीयनकरामिताभ् । वारिव्यासहृतं दैर्घ्यंवेधांगुलहतं पुनः ॥५२॥ खखेंदुरामविहृतं मानं द्रोणादिवारिणः । विस्तारायामवेधानांगुल्योन्योन्यनाडिहताः ॥५३॥ रसांकाभ्राब्धिभिर्भक्ता धान्ये द्रोणादिकामितिः । उत्सेधव्यासदैर्घ्याणामंगुल्यान्यस्य नो द्विज ॥५४॥ मिथोघ्नाति भजेत्खाभ्रेशैर्द्रोणादिमितिर्भवेत् । विस्तारांगुलान्येवं मिथोघ्नान्यपसां भवेत् ॥५५॥ वाणेभमार्गणेर्लब्धं द्रोणाद्यं मानमादिशेत् । दीपशंकुतलच्छिद्रघ्नः शंकुर्भवेत्तवेन्मुने ॥५६॥ नरो न दीपकशिखौच्यभक्तो ह्यथ भोद्रने । शंकौन्दीपोधपादशच्छिद्रघ्नैर्र्दीपौच्चयं नरान्विते ॥५७॥ विशंकुदीपौच्च्यगुणाच्छाया शंकुहृता भवेत् । दीपशंकवंतंरं चाथ च्छायाग्राविवरघ्नमा ॥५८॥ मानांतरहृदूभूमिः स्यादथोनूनराहितः । प्रभाप्ता जायते दीपशिखौच्च्यं स्यात्त्रिराशिकात् ॥५६॥ एतत्संक्षेपतः प्रोक्तं गणिते परिकर्मकम् । ग्रहमध्यादिकं वक्ष्ये गणिते नातिविस्तरन् ॥६०॥ युगमानं स्मृतं विप्र खचतुष्करदार्णवाः । तद्दशांशास्तु चत्वारः कृताख्यं पादमुच्यते ॥६१॥ त्रयस्त्रेता द्वापरः द्वौ कलिरेकः प्रकीर्तितः । मनु कृताब्दसहिता युगानामेकसप्ततिः ॥६२॥ विधेर्दिने स्युर्विप्रेंद्र मनवस्तु चतुर्दश । तावत्येव निशा तस्य विप्रेंद्र परिकीर्तिता ॥६३॥ (अन्नादि राशि-व्यवहार) राशि-व्यवहार में स्थूल, मध्यम, सूक्ष्म, अन्नराशियों में क्रमशः उनकी परिधि का नवमांश, दशमांश और एकादशांश वेध होता है । परिधि का षष्ठांश लेकर उसका वर्ग करना चाहिए और उसे वेध से गुणा कर देना चाहिए । उसका नाम 'घनहस्त' होगा । जल के व्यास (चौड़ाई) से लम्बाई को गुणा कर देना फिर उसी को गहराई के अंगुल मान से गुणा कर देना तथा ३१०० से भाग देना चाहिए । इससे जल का द्रोणात्मक मान ज्ञात होगा ॥५१-५२॥ चौड़ाई, गहराई और लम्बाई के अंगुलात्मक मान को परस्पर गुणा कर उसमें ४०९६ से भाग दें तो अन्न का द्रोणादि मान प्राप्त होगा । ऊँचाई, व्यास (चौड़ाई) और लम्बाई के अंगुलात्मक मान को परस्पर गुणा करके ११५० से भाग देना चाहिए; वह पत्थर का द्रोणात्मक मान होगा । विस्तार आदि के अंगुलात्मक मान को परस्पर गुणा करके ५८५ से भाग देना चाहिए, तो लब्धि लोहे के द्रोणात्मक मान का सूचक होती है ॥५३-५५॥ छाया-साधन में प्रदीप और शंकुतल का जो अन्तर हो, उससे शंकु को गुणा कर देना और दीपक की ऊंचाई में शंकु को घटाकर उससे उस गुणित शंकु में भाग देने से छाया का मान प्राप्त होगा । शंकु और दीपतल के अन्तर से शंकु को गुणा कर दें और छाया से भाग दें; फिर लब्धि में शंकु को जोड़ दें तो दीपक की ऊँचाई ज्ञात हो जायगी । शंकुरहित दीपक की ऊँचाई से छाया को गुणा करें और शंकु से भाग दें तो शंकु तथा दीपक का अन्तर ज्ञात होगा । छायाग्र के अन्तर से छाया को गुणा करें और छाया के प्रमाणान्तर से भाग दें तो 'भू' होगी । 'भू' और शंकु का घात (गुणा) करें और छाया से भाग दें तो दीपक की ऊँचाई ज्ञात होगी । उपर्युक्त सब बातों का ज्ञान त्रैराशिक से हो होता है । यह परिकर्मगणित मैंने संक्षेप से कहा । अब ग्रह का मध्यादिक गणित बताता हूँ, वह भी अधिक विस्तार से नहीं ॥५६-६०॥ विप्र ! चारों युगों का सम्मिलित मान तैंतालीस लाख बीस हजार वर्ष बतलाया गया है । उसके दशांश में चार का गुणा करने पर सत्ययुग नामक पाद होगा । (उसका मान १७ लाख २८ हजार वर्ष है) । दशांश में तीन का गुणा करने पर (१२९६००० वर्ष) त्रेता नामक पाद होता है । दशांश में दो का गुणा करने पर (८६४००० वर्ष) द्वापर नामक पाद होता है और उक्त दशांश को एक-गुना ही रखने पर (४३२००० वर्ष) कलियुग नामक पाद कहा गया है । कृताब्दसहित (एक सत्ययुग अधिक) इकहत्तर चतुर्युग का एक मन्वन्तर होता है ॥६१-६२॥ ब्रह्मन् ! ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु होते हैं और उतने ही समय की ब्रह्मा की एक रात्रि होती

चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३८७ स्वयंभुवा शरगतानब्दान्संपिण्ड्य नारद। खचरानयनं कार्यमथ वेष्टयुगादितः ॥६४॥ युगे सूर्यज्ञशुक्राणां खचतुष्करदार्णवाः । कुजांगिगुरुशुक्राणां भगणाः पूर्वयायिनाम् ॥६५॥ इंदोरसाग्निवित्रीजु सप्त भूधरमार्गणाः । दस्रत्यष्टरसांकाशिवलोचनानि कुजस्य तु ॥६६॥ बुधशोघ्रस्य शून्येतु'खाद्रित्यंकनगेंदवः । बहस्पतेः खदस्त्राक्षिवेदषड्वह्वयस्तथा ॥६७॥ सितशीघ्रस्य षट्सप्तत्रियमाशिखभूधराः । शनेभु'जगषट्पञ्चरसवेद निशाकराः ॥६८॥ चंद्रोच्चस्याग्निशून्याक्षिवसुसर्पार्णवा युगे। वामं पातस्य वस्वग्नियमाशिखभूधराःशर ॥६६॥ उदयादुदयं भानोर्भूमैः सावनवासराः । वसद्व्य ष्टाद्रिरूपांकसप्ताद्रितिथयो युगे ॥७०॥ षड्वह्वित्रिहुताशांकतिथयश्चाधिमासकाः । तिथिक्षयायमार्थीक्षिवचष्टव्योमशराश्विनः ॥७१॥ खचतुष्का समुद्राष्टकुपञ्चरविमासकाः । षट्द्व्यग्नित्तयग्निवेदामिपंचशुश्रांशुमासकाः ॥७२॥ प्राग्गतेः सूर्यमंदस्य कल्पेसप्ताष्टवह्वयः। कौजस्य वेदखयमा बौधस्याष्टतु वह्वयः ॥७३॥ खखरंध्राणि जैवस्य शौक्रस्यार्थगुणेबवः । गौरनयः शनिमंदस्य पातानामथ वामतः ॥७४॥ मनुदस्रास्तु कौजस्य बौधस्याष्टाष्टसागराः। कृताद्रिचन्द्रा जैवस्य शौक्रस्याग्निखनंदकाः ॥७५॥ शनिपातस्य भगणाः कल्पे यमरसर्तवः । वर्तमानयुगे यातावत्सरभगणाभिधाः ॥७६॥ मासीकृतायुता मासैर्मधुशुक्लादिभिर्गंतैः । पृथक्स्थासिधिमासप्तासुर्यमासविभाजिताः ॥७७॥

हे ॥६३॥ नारद ! ब्रह्मा के वर्तमान कल्प में जितने वर्ष बीत गये हैं, उन्हें एकत्र करके ग्रहानयन (ग्रहसाधन) करना चाहिए। अथवा इष्ट युगादि से ग्रह-साधन करना चाहिए ॥६४॥ एक युग में अपनी कक्षा में पूर्व दिशा को ओर चलते हुए सूर्य बुध और शुक्र के ४३२०००० 'भगण' होते हैं । तथा मंगल, शनि और बृहस्पति के शीघ्रोच्च गण भी उतने हो होते हैं ॥६५॥ एक युग में चन्द्रमा के भगण ५७७५३३३६ होते हैं। भौम के २२९६८३२ बुध के शीघ्रोच्च के १७६३७०६०, बृहस्पति के ३६४२२०, शुक्र के शीघ्रोच्च के ७०२२३७६, शनि के १४६५६८ तथा चन्द्रमा के उच्च के भगण ४८८२०३ होने हैं। चन्द्रमा के पात की वामगतिसम्बन्धी भगणों की संख्या २३२२३८ है ॥६६-६९॥ सूर्य के एक उदय से दूसरे उदय पर्यन्त जो दिन का मान होता है, उसे भौमवासर या सावनवासर कहते हैं। एक महायुग (चतुर्युग) में १५७७९१७८२८ सावनदिन होते हैं। (चान्द्र दिवस १६०३००००८०) होते हैं। अधिमास १५९३३३६ होते हैं तथा तिथिक्षय २५०८२२५२ होते हैं ॥७०-७१॥ एक युग में रविमासों को संख्या ५१८४०००० है तथा चान्द्र मासों की संख्या ५३४३३३३६ होती हैं ॥७२॥ पूर्वाभिमुख गति के क्रम से एक कल्प में सूर्य के मन्दोच्च भगण ३८७, मंगल के मन्दोच्च भगण २०४, बुध के मन्दोच्च ३६८, गुरु के मन्दोच्च ९००, शुक्र के मन्दोच्च ५३५ तथा शनि के मन्दोच्च भगण ३९ होते हैं। अब मंगल आदि ग्रहों के पातों को विलोम गति (पश्चिम गमन) के अनुसार एक कल्प में होने वाले भगण बताये जाते हैं ॥७३-७४॥ भौमपात के भगण २१४, बुधपात के भगण ४८८, गुरुपात के भगण १७४, शुक्रपात के भगण ९०३ तथा शनिपात के भगण ६६२ होते हैं ॥७५३॥ वर्तमान युग (जिस युग में, जिस समय के अहर्गण या ग्रहादि का ज्ञान करना हो उस समय) में सृष्ट्यादि काल या युगादि काल से अब तक जितने वर्ष बीत चुके हों, वे सूर्य के भगण होते हैं। भगण को बारह से गुणा करके मास बनाना चाहिए। उसमें 'वर्तमान वर्ष' के चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से लेकर वर्तमान मास तक जितने मास बीते हों, उनकी संख्या जोड़कर योगफल को दो स्थानों में रखना चाहिए। द्वितीय स्थान में रखे हुए मासगण को

३८८ नारदीयपुराणम् अथाधिमासकैर्युक्ता दिनीकृत्य दिनान्विताः । द्विस्थास्तिथिक्षयाभ्यस्ताश्चांद्रवासरभाजिताः ॥७८॥ लब्धोनरात्रिरहितालंकायामर्द्धरात्रिकः । सावनोद्युगणोऽर्कादिदिनमासाब्दपास्ततः ॥७९॥ सप्तभिःक्षयितः शेषः सूर्याद्योवास्रेश्वरः । मासाब्ददिनसंख्याप्तंद्विद्विघ्नं रूपसंयुक्तम् ॥८०॥ सप्तोद्धृतावशेषौ तौ विज्ञेयौ मासवर्षपौ । खेशस्य भगणाभ्यस्तो दिन राशिः कुवासरैः ॥८१॥ विभाजितो मध्यगत्या भगणादिर्ग्रहो भवेत् । एवं स्वशीघ्रमंदोच्चाये प्रोक्ताः पूर्वयायिनः ॥८२॥ विलोमगतयः पातास्तद्वच्चक्राद्विशोधिताः । योजनानि शतान्यष्टौ भूकर्णौ द्विगुणः स्मृतः ॥८३॥ तद्वर्गतो दशगुणात्पदं भूपरिधिर्भवेत् । लंबज्याघ्नस्त्रिजीवाप्तः स्फुटो भूपरिधिः स्वकः ॥८४॥ युग के उपर्युक्त अधिमासों की संख्या से गुणा करके गुणनफल में युग के सूर्यमासों की संख्या से भाग देना चाहिए । फिर जो लब्धि हो, उसे अधिमास की संख्या मानना चाहिए । अब उसको प्रथम स्थानस्थित मासगण में जोड़ देना चाहिए । (योगफल बीते हुए चान्द्रमासों की संख्या होती है) । उस संख्या को तीस से गुणा करे (तो गुणन- फल तिथि-संख्या होगी), उसमें वर्तमान मास की शुक्ल-प्रतिपदा से इष्टतिथि की संख्या जोड़े, (जोड़ने से चान्द्र दिनों की संख्या ज्ञात होती है) । इसको भी दो स्थानों में रखकर दूसरे स्थान में स्थित संख्या को युग के लिए कथित तिथिक्षय-संख्या से गुणा करे । गुणनफल में युग को चान्द्रदिनों (तिथियों की संख्या से भाग दे तो अभीष्ट दिन का लंकाधंरात्रिकालिक सावन दिनगण (अहर्गण) होता है । इससे दिनपति, मासपति और वर्षपति का ज्ञान करना चाहिए ॥७६-७९॥ यथा—दिनगण में ७ से भाग देने पर शेष बचे हुए १ आदि संख्या के अनुसार सूर्य आदि वारेश समझने चाहिए । तथा दिनगणमें ३० से भाग देकर लब्धि को २ से गुणा करके गुणनफल में १ जोड़ दे । फिर उसमें ७ से भाग देकर १ आदि शेष होने पर सूर्य आदि मासेश समझने चाहिए । इसी प्रकार दिनगण में ३६० से भाग देकर लब्धि को ३ से गुणा करके गुणनफल में १ जोड़े, फिर उसमें ७ से भाग देने पर १ आदि शेष संख्या के अनुसार सूर्य आदि 'वर्तमान' वर्षेश होते हैं ॥८०-१॥ मध्यमग्रहज्ञान—युग के लिए कथित भगण की संख्या से दिनगण को गुणा करे । गुणनफल में युग की कुदिन (सावनदिन)—संख्या से भाग देने पर भगणादिन ग्रह लंकाधंरात्रिकालिक होता है । इसी प्रकार पूर्वाभिमुख गति वाले जो शीघ्रोच्च और मन्दोच्च कहे गये हैं, उनके भगण में द्वारा उनका भी साधन होता है ॥८१-८२॥ विलोम (पश्चिमाभिमुख) गति वाले जो ग्रहों के पातभगण कहे गये हैं, उनके द्वारा इसी प्रकार जो पात सिद्ध हों, १२ राशि में घटाने से शेष मेषादि क्रम से राश्यादिपात होते हैं ॥८२ १/२॥ (भूपरिधिप्रमाण)—पृथ्वी का व्यास १६०० योजन है । इस (१६००) के वर्ग को १० से गुणा करके गुणनफल का वर्ग मूल भूमध्यपरिधि होता है; अर्थात् वर्गमूल की जो संख्या हो, उतने योजन पृथ्वी की परिधि समझनी चाहिए । इस भूमध्यपरिधि की संख्या को अपने-अपने लम्बांशज्या से गुणा करके उसमें त्रिज्या (३४३८) से भाग देकर जो लब्धि हो, वह स्पष्ट भूपरिधि का मान होता है ॥८३-८४॥ (ग्रहों में देशान्तर-संस्कार)—ग्रह की कलादि मध्यम गति को देशान्तर-योजन (रेखा-देश से जितने योजन पूर्व या पश्चिम इष्ट स्थान हो उस) से गुणा करके गुणन-फल में 'स्पष्टभूपरिधि-योजन' के द्वारा भाग देने पर जो लब्धि हो, वह कला आदि है । उस लब्धि को रेखा से पूर्व देश में पूर्वसाधित ग्रह में घटाने से और पश्चिम देश में जोड़ने से स्वस्थानीय अर्धरात्रिकालिक ग्रह होता है ॥८५ १/२॥

चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३८३ तेन देशांतराभ्यस्ता ग्रहभुक्तिर्विभाजिता । कलादितत्फलं प्राच्यां ग्रहेभ्यः परिशोधयेत् ॥८५॥ रेखाप्रतीचि संस्थाने प्रक्षिपेत्स्युः स्वदेशतः । राक्षसातपदेवौकःशैलयोर्मध्यसूत्रगाः ॥८६॥ अवन्तिकारोहितकं तथा सन्निहितं सरः । वारप्रवृत्तिःप्राग्देशे क्षपार्द्धेभ्यधिको भवेत् ॥८७॥ तद्देशांतरनाडीभिः पश्चादूने विनिर्दिशेत् । इष्टनाडीगुणा भुक्तिः षष्ट्या भक्ता कलादिकम् ॥८८॥ गते शोध्यं तथा योज्ये गम्ये तात्कालिको ग्रहः । भचक्र लिप्ताशीत्यंशः परमं दक्षिणोत्तरम् ॥८९॥ विक्षिप्यते स्वपातेन स्वक्रांत्यंतादनुष्णगुः । तत्र वासं द्विगुणितं जीवस्त्रिगुणितं कुजः ॥६०॥ बुधशुक्रार्कजाः पातैर्विक्षिप्यंते चतुर्गुणम् । राशिलिप्ताष्टमो भागः प्रथमं ज्यार्द्धमुच्यते ॥६१॥ ततो द्विभक्तलब्धोनमिश्रितं तद्वितीयकम् । आद्येनैव क्रमात्पिण्डान्मक्तालब्धोनितैय तान् ॥६२॥ खंडकाः स्युश्चतुर्विंशा ज्यार्द्धपिंडाःक्रमादमी । परमापक्रमज्या तु सप्तरंध्रमुणेदवः ॥६३॥ तद्गणज्या त्रिजोवाप्ता तच्चापं क्रांतिरुच्यते । ग्रहं संशोध्य मंदोच्चत्तथा शीघ्राद्विशोध्य च ॥६४॥ शेषं केंद्रपदं तस्माद्भुजज्या कोटिरेव च । गताद्भूजज्याविषमे गम्यात्कोटिः पदे भवेत् ॥६५॥ (रेखा-देश) भूमध्यरेखा से पूर्वदेश में रेखा-देशीय मध्यरात्रि से, देशान्तर घटोतुल्य पूर्व ही वारप्रवृत्ति (रवि-आदि वारों का आरंभ) होती है ॥८७॥ (इष्टकाल में मध्यम ग्रह जानने की विधि)--मध्यरात्रि से जितनी घड़ी बाद ग्रह बनाना हो, उस संख्या से ग्रह की कलादि गति को गुणा करके गुणनफल में ६० से भाग देकर लब्धितुल्य कलादि फल को पूर्व- साधित ग्रह में जोड़ने से; तथा जितनी घड़ी मध्यरात्रि से पूर्व ग्रह बनाना हो, उतनी संख्या से गति को गुणा करके गुणनफल में ६० से भाग देकर कलादि फल को पूर्वसाधित ग्रह में घटाने से इष्टकालिक ग्रह होता है ॥८८॥ (चन्द्रादि ग्रहों के परम विक्षेप) - भचक्रकला (२१६००) के ८०वां भाग अर्थात् २७० कलापर्यन्त क्रान्तिवृत्त (सूर्य के मार्ग) से परम दक्षिण और उत्तर चन्द्रमा विक्षिप्त होता (हटता) है। एवं गुरु ६० कला, मंगल ९० कला, बुध, शुक्र और शनि - ये तोनों १२० कला पर्यन्त क्रान्तिवृत्त से दक्षिण और उत्तर हटते रहते हैं ॥८९-९०३॥ (अभीष्ट जीवासाधन के लिए उपयोगी २४ जीवासाधन) -१ राशि-कला १८०० का आठवां भाग (२२५ कला) प्रथम जीवाधं कहा जाता है। उस (प्रथम जीवाधं) से प्रथम जीवाधं में भाग देकर लब्धि को प्रथम जीवाधं में ही घटाकर शेष (प्रथमखण्ड) को प्रथम जीवाधं में ही जोड़ने से द्वितीय जीवाधं होता है। इसी प्रकार प्रथम जीवा से ही द्वितीय जीवा में भाग देकर लब्धि को द्वितीय खंड में घटाकर शेष को द्वितीय जीवाधं में जोड़ने से तृतीय जीवाधं होता है। इसी तरह आगे भी क्रिया करने से क्रमशः २४ जीवाधं सिद्ध होते हैं ॥९१-९२३॥ इस प्रकार सूर्य की परमक्रान्तिज्या १३९७ होती है। इस (परमक्रान्तिज्या) से ग्रह को ज्या (भुजज्या) को गुणा करके त्रिज्या के द्वारा भाग देने से 'इष्टक्रान्ति-ज्या' प्राप्त होतो है। उसका चाप बनाने से 'इष्टक्रान्ति' (मध्यमा) कहलाती है ॥९३३॥ ('भुजज्या' और 'कोटिज्या' बनाने की रीति) ग्रहों को अपने-अपने मन्दोच्च में घटाने से शेष उस ग्रह का 'मन्द केन्द्र' तथा शीघ्रोच्च में घटाने से शेष उस ग्रह का 'शीघ्र केन्द्र' कहलाता है। उस राश्यादि केन्द्र की 'भुजज्या' और 'कोटिज्या' बनानी चाहिए। विषय (१,३) पद में 'गत' चाप की जीवा भुजज्या और 'गम्य' चाप की जीवा कोटिज्या कहलाती है। सम (२,४) पद में 'गम्य' चाप की जीवा 'भुजज्या' और गत' चाप की जीवा 'कोटिज्या' होती है ॥९४-६५३॥

३८० नारदीयपुराणम् समेति गम्याद्बाहुज्या कोटिज्यानुगता भवेत् । लिप्तास्तत्त्वयमैर्भक्ता लब्धज्या पिण्डकं गतम् ॥६६॥ गतगम्यान्तराभ्यस्तं विभजेत्तत्त्वलोचनैः । तदवाप्तफलं योज्यं ज्यापिण्डे गतसंज्ञके ॥६७॥ स्यात्क्रमज्याविधिश्चैवं मुक्तक्रमज्यास्य विस्तृतः । ज्यां प्रोह्य शेषं तत्त्वश्विविहतं तद्विवरोद्धृतम् ॥६८॥ संख्यातत्वाश्विसंवर्ग्य संयोज्यं धनुरुच्यते । स्तैर्मन्दपरिध्यंशा मनवः शीतगोरदाः ॥६९॥ युष्मांते विषमांते तु नखलिप्तोनितास्तयोः । युग्मांतेर्थाद्रियः स्वाग्निसुराः सूर्या नवाणँवाः ॥१००॥ ओजेद्वचगा वसुयमारदाह्रदगजाब्धयः । कुजादीनामतः शोध्यायुग्मांतेर्थाग्निसखाः ॥१०१॥ गुणाग्निचंद्राः खनगाद्विरसाक्षौणि गोऽग्नयः । ओजांते द्वित्रियमलाद्विविश्वेयमपर्वताः ॥१०२॥ खर्तुदलावियद्वेदाः शैघ्रकर्मणि कीर्तिताः । ओजयुग्मांतरगुणाभुजज्यात्रिज्ययोद्धृताः ॥१०३॥ युग्मवृत्तेधनर्णश्यादोजादूनेऽधिके स्फुटम् । तद्गुणे भुजकोटिज्येभगणांशविभाजिते ॥१०४॥ (इष्टज्यासाधनविधि)--जितने राश्यादि चाप को जीवा बनानी हो, उसको कला बनाकर उसमें २२५ से भाग दें जो लब्धि हों, उसे (सिद्ध २४ ज्या-पिण्ड में) गत ज्यापिण्ड की संख्या समझें । शेष कला को 'गतज्या' और 'गम्यज्या' के अन्तर से गुणा करें, उसमें २२५ से भाग देकर लब्ध कलादि को 'गतज्या'-पिण्ड में जोड़ने 'अभीष्ट ज्या' प्राप्त होती है। 'उत्क्रमज्या' भी इसी विधि से ज्ञात की जाती है ॥६६-६७१/२॥ (जीवा से चाप बनाने की विधि)--इष्ट जीवा की कला में सिद्ध जीवापिण्डों में से जितनी संख्या वाली जीवा घटे, उसको घटाना चाहिए। शेष कला को २२५ से गुणा करके गुणनफल में गत और गम्य जीवा के अन्तर से भाग देकर जो लब्धि कलादि प्राप्त हो, उसको घटायी हुई सिद्ध-जीवा-संख्या से गुणित २२५ में जोड़ने से से इष्टज्या का चाप होता है ॥६८१/२॥ (रवि और चन्द्रमा के मन्दपरिध्यंश)--समपद के अन्त में सूर्य के १४ अंश और चन्द्रमा के ३२ अंश मन्दपरिधि मान होते हैं। और विषम पद के अन्त में २० कला कम अर्थात् सूर्य के १३।४० अंशादि और चन्द्रमा के ३१।४० अंशादि मन्दपरिध्यंश के मान होते हैं ॥९९१/२॥ (मङ्गलादि ग्रहों की मन्द और शीघ्र परिधि)--समपदान्त में मंगल के ७५, बुध के ३०, गुरु के ३३, शुक्र के १२ और शनि के ४९ तथा विषमपदान्त में मंगल के ७२, बुध के २८, गुरु के ३२, शुक्र के ११ और शनि के ४८ मन्द परिध्यंश हैं। इसी प्रकार समपद के अन्त में मंगल के २३५, बुध के १३३, गुरु के ७०, शुक्र के २६२ और शनि के ३६ तथा विषमपदान्त में मंगल के २३२, बुध के १३२, गुरु के ७२, शुक्र के २६० और शनि के ४० शीघ्र परिध्यंश होते हैं ॥१२०-१०२१/२॥ (अभीष्ट स्थान में परिधिसाधन)--अभीष्ट स्थान में मन्द या शीघ्र परिधि बनानी हो तो उस ग्रह की भुजज्या को विषम पदान्त और समापदान्त-परिधि के अन्तर से गुणा करके गुणा करके गुणनफल में त्रिज्या (३४३८) से भाग देकर जो अंशादि लब्धि हो, उसको समपदान्त-परिधि में जोड़ने या घटाने से इष्टस्थान में क्रमशः स्पष्ट मन्द परिध्यंश या शीघ्र-परिध्यंश होते हैं ॥१०३१/२॥ (भुजफल-कोटिफल-साधन)--इस प्रकार से सिद्ध की गयी स्पष्ट परिधि से ग्रह की 'भुजज्या' और 'कोटिज्या' को पृथक्-पृथक् गुणा करके भगणांश (३६०) से भाग देकर लब्ध (भुजज्या से निकालने पर) भुजफल और (कोटिज्या) से निकालने पर) कोटिफल होते हैं। इसी प्रकार मन्द परिधि द्वारा मन्दफल और शीघ्र परिधि द्वारा शीघ्र फल का मान ज्ञात करना चाहिए । यहाँ मन्द परिधिवश भुजज्या द्वारा जो भुजफल आये, उसका चाप बनाने से मन्द कलाहि पद प्राप्त होता है ॥१०४१/२॥

चतुःपञ्चशत्तमोऽध्यायः ३६१ तद्भूजयफलधनुर्मादं लिप्तादिकं फलम् । शैघ् यकोटिफलं केंद्रे मकरादौ धनं स्मृतम् ॥१०५॥ संशोध्यं तु त्रिजोवायां कर्कादौ कोटिजं फलम् । तद्बाहुफलवर्गेव्यानमूलकर्णश्चलाभिधः ॥१०६॥ त्रिज्याभ्यस्तं भुजफलं चलकर्णविभाजितम् । लब्धस्य चापं लिप्तादि फलं शैघ् यमिदं स्मृतम् ॥१०७॥ एतदादौ कुजादीनां चतुर्थे चैव कर्मणि । मांद्यं कर्मैककेंद्वोभौ मादीनामथोच्यते ॥१०८॥ शैघ् यं माद्यं पुनर्माद्यं शैघ् यं चत्वार्यनुक्रमात् । अजादिकेंद्रे सर्वेषां मांद्ये शैघ् ये च कर्मणि ॥१०६॥ धनं ग्रहाणां लिप्तादि तुलादावृणमेव तत् । अर्कबाहुफलाभ्यस्ता ग्रहभुक्तिविभाजिताः ॥११०॥ भचक्रकलिकाभिस्तु लिप्ताः कार्या ग्रहेऽर्कवत् । स्वमन्दभुक्तिसंशुद्धा मध्यभुक्तिर्निशापतेः ॥१११॥ दोर्ज्यान्तरादिकं कृत्वा भुक्तावृणधनं भवेत् । ग्रहभुक्तेः फलं कार्यं ग्रहवन्मंदकर्मणि ॥११२॥ कर्कादौ तद्धनं तत्र मकरादावृणं स्मृतम् । दोर्ज्यान्तरगुणामुक्तिस्तत्तत्वेनावोद्धता पुनः ॥११३॥ स्वमंदपरिधिक्षुण्णा भगणांशोद्धताःकलाः । मंदस्फुटकृता भुक्तिः प्रोह्या शीघ्रोच्चभुविततः ॥११४॥ (शीघ्र कर्णसाधन) —पूर्व विधि से शीघ्र परिधि द्वारा जो कोटिफल प्राप्त हो, उसको मकरादि केन्द्र होने पर त्रिज्या (३४३८) में जोड़े तथा कर्कादि केन्द्र होने पर घटाये । जोड़ने या घटाने पर जो फल प्राप्त हो, उसके वर्ग में शीघ्र भुजफल के वर्ग को जोड़ दे । फिर उसका मूल लेने से शीघ्र कर्ण प्राप्त होता है ॥१०५-१०६॥ शीघ्र फलसाधन -- पूर्वविधि से साधित शीघ्र भुजफल को त्रिज्या से गुणा करके शीघ्र कर्ण के द्वारा भाग देने पर जो कलादि लब्धि हो, उसके चाप बनाने से शीघ्र 'भुजफल' प्राप्त होता है । यह शीघ्रफल मंगलादि ५ ग्रहों में प्रथम और चतुर्थ कर्म में संस्कृत (धन या ऋण) किया जाता है ॥१०७३॥ रवि और चन्द्रमा में केवल एक ही मन्दफल का संस्कार (धन या ऋण) किया जाता है। मुने ! अब मंगलादि ५ ग्रहों के संस्कार का वर्णन करता हूँ। उनमें प्रथम शीघ्रफल का, द्वितीय मन्दफल का, तृतीय भी मन्दफल का और चतुर्थ शीघ्रफल का संस्कार किया जाता हैं ॥१०८३॥ संस्कारविधि--शीघ्र या मन्द्र केन्द्र मेषादि (६ राशि के भीतर) हो तो शीघ्रफल और मन्दफल जोड़ना चाहिए । यदि तुलादि केन्द्र (६ राशि से ऊपर) हो तो घटाना चाहिए । रविभुजफल-संस्कार-प्रत्येक ग्रह की गतिकला को पृथक्-पृथक् सूर्य के मन्द भुजफल-कला से गुणा करके उसमें २१६०० के द्वारा भाग देने से जो कलादि लब्धि हो, उसको पूर्वसाधित उदयकालिक ग्रहों में रविमन्दफलवत् संस्कार (मन्दफल धन हो तो धन, ऋण हो तो ऋण) करने से स्पष्ट सूर्योदयकालिक ग्रह होते हैं ॥११०३॥ स्पष्टग्रहगतिसाधनार्थं गतिफल--चन्द्रमध्यगति में चन्द्रमन्दोच्च गति को घटाकर उससे (अर्थात् चन्द्रकेन्द्रगति से) तथा अन्य ग्रहों की स्वल्पान्तर से अपनी-अपनी गति से हो मन्दस्पष्टगतिसाधन में फल साधन करना चाहिए । यथा--उक्त गति (चन्द्र की केन्द्रगति और अन्य ग्रहों की गति) को दोर्ज्यान्तर (गम्यज्या और गतज्या के अन्तर) से गुणा करके उसको २२५ के द्वारा भाग देकर लब्धि को अपनी-अपनी मन्दपरिधि से गुणा करके भगणांश (३६०) के द्वारा भाग देने से जो कलादि फल लब्धि हो, उसको यदि कर्कादि (३ से ऊपर ६ राशि के भीतर) केन्द्र हो तो मध्यगति में धन कर दें (जोड़ दें) तथा मकरादि (९ राशि से ऊपर ३ राशि तक) केन्द्र हो तो घटा दें, यह मन्दस्पष्ट गति होती है ॥११३३॥ पुनः इस मन्दस्पष्ट गति को अपनी शीघ्रोच्च गति में घटाकर शेष को त्रिज्या तथा अन्तिम शीघ्रकर्ण के अन्तर से गुणा करके पूर्वसाधित शीघ्रकर्ण के द्वारा भाग देने से जो लब्धि (कलादि) हो, उसको, यदि कर्ण त्रिज्या से अधिक हो तो मन्दस्पष्ट गति में धन करें (जोड़ने)

३६२ नारदीयपुराणम् तच्छेषं विवरेणाथ हन्यात्त्रिज्यांत्यकर्णयोः । चलकर्णहृतं भुक्तौ कर्णे त्रिज्याधिके धनम् ॥११५॥ ऋणमनेऽधिके प्रोह्य शेषं वक्रगतिर्भवेत् । कृतर्तुचंद्रैर्वेदैर्द्रैः शून्यद्वयेकैर्गुणाष्टभिः ॥११६॥ शररुद्रैश्चतुर्थां शुक्रेंद्रांशैर्भुसुतादयः । वक्रिणश्चक्रशुद्धैस्तैरंशैरुज्जह्नितवक्रताम् ॥११७॥ क्रमज्या विषुवद्भाघ्नी क्षितिज्या द्वादशोद्धृता । त्रिज्यागुणा दिनव्यासभक्ता चापं च रासवः ॥११८॥ तत्कार्मुकमृदक्रांतौ धनहीनो पृथक्स्थिते । स्वाहोरात्रचतुर्भागे दिनरात्रिवले स्मृते ॥११९॥ याम्यक्रांतौ विपर्यस्ते द्विगुणैते दिनक्षये । भभोगोऽष्टशतीलिप्ताः खाशिवशैलास्तथातिथेः ॥१२०॥ ग्रहलिप्ता भभोगाप्तामानि भुक्त्यादिनादिकम् । रवींदुयोगलिप्तास्तु योगाभभोगभाजिताः ॥१२१॥ गतगद्याश्च षष्ठिघ्ना भुक्तियोगाप्तनाडिकाः । अर्कोनचंद्रलिप्तास्तु तिथयो भोगभाजिताः ॥१२२॥ और अल्प हो तो घटा दें; यह स्पष्ट गति होती है यदि साधित ऋणगतिफल मन्दस्पष्ट गति से अधिक हो तो उसी (ऋणगतिफल) में मन्दस्पष्ट गति को घटाना चाहिए; जो शेष आवे, वह वक्रगति होती है । इस स्थिति में वह ग्रह वक्रगति रहता है । ११४-११५ १/२॥ ग्रहों की वक्र केंद्रांश-संख्या—मंगल अपने चतुर्थ शीघ्र केंद्रांश १६४ में, बुध १४४ केंद्रांश में, गुरु १३० केंद्रांश में, शुक्र १६२ केंद्रांश में और शनि ११५ शीघ्र केंद्रांश में वक्रगति होता है। अपने-अपने वक्रकेंद्रांश को ३६० में घटाने से शेष के तुल्य केंद्रांश होने पर पुनः वह ग्रह मार्ग-गति-वाला होता है ॥११७॥ कालज्ञान--रवि-क्रान्तिज्या को पलभा (३० घड़ी का दिन हो तो उस दिन के दोपहर में १२ अंगुल शंकु की छाया को 'पलभा कहा जाता है) से गुणा करके गुणनफल में १२ से भाग देने पर लब्धि क्षितिज्या या कुज्या' होती है । उस (कुज्या) को त्रिज्या से गुणा करके अहोरात्रार्धरूप कर्ण (द्युज्या कान्ति की कोटिज्या) से भाग देने से लब्धि चरज्या होतो है । उसके चाप बनाने से चरासु होते हैं । उस चर-चाप को यदि उत्तर क्रान्ति हो तो १५ घटी में जोड़ने से दिनार्ध और १५ घटी में घटाने से रात्र्यर्ध होता है। दक्षिणक्रान्ति हो तो विपरीत (याने १५ घटी में घटाने से दिनार्ध और जोड़ने से रात्र्यर्ध) होता है। दिनार्ध को दुगना करने से दिनमान और रात्र्यर्ध को दूना करने से रात्रिमान प्राप्त होता है ॥११८-११९ १/२॥ पञ्चाङ्ग साधन—८०० कला एक-एक नक्षत्र का और ७२० कला एक-एक तिथि को भोगमान होता है। (अतः ग्रह किस नक्षत्र में है, यह जानने के लिये) राश्यादि ग्रह को कलात्मक बनाकर उसमें भभोग (८००) के द्वारा भाग देने से जो लब्धि आये; उसके अनुसार अश्विनी आदि गतनक्षत्र समझने चाहिए । शेष कलादि से ग्रह की गति के द्वारा उसकी गत और गम्यघटी जानना चाहिए ॥१२० १/२॥ उदयकालिक स्पष्टरवि और चन्द्र का योग करके उसकी कला में भभोग (८००) के द्वारा भाग देकर लब्धितुल्य विष्कम्भ आदि योग होते हैं। शेष वर्तमान योग की गत-कला है। उसको ८०० में घटा देने से गम्य- कला होती है। उस गत और गम्यकला को ६० से गुणा करके उससे रवि और चन्द्र की गतिकला के योग से भाग देने पर गत और गम्यघटी होती है ॥१२१॥ स्पष्ट चन्द्र में स्पष्ट सूर्य को घटाकर शेष राश्यादि को कला बनाकर उसमें तिथिभोग (७२०) से भाग देने पर लब्धि गततिथि-संख्या होती है। शेष वर्तमान तिथि की गतकला है। उसको ७२० में घटाने से गम्यकला होती है । गत और गम्यकला को पृथक् ६० से गुणाकर चन्द्र और रवि के स्पष्ट गत्यन्तर से भाग देकर लब्धि- क्रम से भुक्त (गत) और गम्य घटो होतो हैं। (पञ्चांग में वर्तमान तिथि के आगे गम्यघटी लिखी जाती है) ॥१२२ १/२॥

चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३६३ गतगम्याश्च षष्ठिघ्ना नाड्यो भुक्तन्तरोद्धताः । तिथयः शुक्लप्रतिपदो द्विघ्नाः सैका न गाहताः ॥१२३॥ शेषं बवो बालवश्च कौलवस्तैतिलो गरः । वणिजोऽभ्रं भवेद्विष्टिः कृष्णभूतापरार्द्धतः ॥१२४॥ शकुनिर्नागश्च चतुष्पदं किस्तुघ्नमेव च । शिलातलेव संशुद्धे वज्रलेपेतिवासमे ॥१२५॥ तत्र शंकांगुलैरिष्टैः सममंडलमालिखेत् । तन्मध्ये स्थापयेच्छंकुं कल्पनाद्द्वादशांगुलम् ॥१२६॥ तच्छायाग्रं स्पृशेद्यत्र दत्तं पूर्वापराह्नयोः । तत्र बिंदुं विधायोभौ वृत्ते पूर्वापराभिधौ ॥१२७॥ तन्मध्ये तिमिना रेखा कर्तव्या दक्षिणोत्तरा । याम्योत्तरदिशोर्मध्ये तिमिना पूर्वपश्चिमा ॥१२८॥ दिङ्मध्यमत्स्यैः संसाध्या विदिशस्तद्वदेव हि । चतुरस्रं बहिः कुर्यात्सूत्रैर्मध्याद्विनिःसृतैः ॥१२६॥ भुजसूत्रांगुलैस्तत्र दत्तैरिष्टप्रभा मता । प्राक्पश्चिमांश्रिता रेखा प्रोच्यते सममंडलम् ॥१३०॥ भूमंडले च विषुवन्मंडलं परिकीर्तितम् । रेखा प्राच्यपरा साध्या विषवद्भाप्रया तथा ॥१३१॥

तिथि में करण ज्ञात करने की विधि-शुक्ल पक्ष की प्रतिपदादि गततिथि संख्या को दूना करके ७ के द्वारा भाग देने से १ आदि शेष प्राप्त होने पर क्रम से १ बव, २ बालव, ३ कौलव, ४ तैतिल, ५ गर, ६ वणिज, ७ विष्टि (भद्रा) — ये करण वर्तमान तिथि के पूर्वार्ध में होते हैं। (ये ७ करण शुक्ल प्रतिपदा के उत्तरार्ध से कृष्ण १४ के पूर्वार्ध तक (२८) तिथियों ८ आवृत्ति कर आते हैं। इसलिए ये ७ चर करण कहलाते हैं।) कृष्णपक्ष १४ के उत्तरार्ध से शुक्ल प्रतिपदा के पूर्वार्ध तक, क्रम से १ शकुनि, २ नाग, ३ चतुष्पद और ४ किस्तुघ्न- ये चार स्थिर करण होते हैं ॥१२३-१२४३॥ दिक्साधन-जल से संशोधित (परीक्षित) शिलातल या वज्रलेप (सिमेंट) से सम बनाये हुए भूतल में जिस अंगुलमान से शंकु बनाया गया हो, उसी अंगुलमान से अभीष्ट (मध्याह्न कालिक छाया से अधिक) त्रिज्यां- गुल से वृत्त बनाकर उसके मध्य (केन्द्र) में बने हुए शंकु की स्थापना करे। उस शंकु की छाया का अग्रभाग दिन के पूर्वार्ध में जहां वृत्त-परिधि में स्पर्श करे, वहाँ पश्चिम बिन्दु समझना चाहिए और दिन के उत्तरार्ध में फिर उसी शंकु की छाया का अग्रभाग जहां वृत्त की परिधि का स्पर्श करे, वहाँ पूर्व बिन्दु समझना चाहिए। इस प्रकार पूर्व और पश्चिम बिन्दु का ज्ञान करे। अर्थात् उन दोनों बिन्दुओं में एक सरल रेखा खींचकर दोनों अग्रों को केन्द्र मानकर दो वृत्तार्ध बनाने से मत्स्याकार होगा। उसके मुख एवं पुच्छ में रेखा करने से दक्षिणोत्तर-रेखा होगी। यह दक्षिणोत्तर रेखा केन्द्रबिन्दु में होकर जाती है। यह रेखा जहाँ वृत्त में स्पर्श करे, वहाँ दक्षिण तथा उत्तर दिशा के बिन्दु समझो। फिर इस दक्षिणोत्तर रेखा पर पूर्वोक्त प्रकार से मत्स्योत्पादन द्वारा पूर्वापर रेखा बनाये तो यह रेखा केन्द्रबिन्दु में होकर ठीक पूर्व और पश्चिम-बिन्दु का वृत्त में स्पर्श करेगी। इस प्रकार चार दिशाओं को जानकर पुनः दो-दो दिशाओं के मध्यबिन्दु से मत्स्योत्पादन द्वारा विदिशाओं (कोणों) का ज्ञान करना चाहिए ॥१२५-१२८३॥ (इस प्रकार वृत्त में दिशाओं का ज्ञान होने पर) वृत्त के बाहर चारों दिशाओं के बिन्दुओं से स्पर्श रेखा द्वारा चतुरस्र (चतुर्भुज) बनाये। वृत्त के मध्यकेन्द्र से भुजांगुलतुल्य (भुज की दिशा में उत्तर या दक्षिण बिन्दु पर छायारेखा होती है। उस छायारेखा को पूर्वापर-रेखा के समानान्तर बनाये। पूर्वापर-रेखा पूर्वापर-वृत्त, उन्मण्डल और नाडी वृत्त के धरातल में होती है। इसलिए क्षितिज धरातलगत वृत्त के केन्द्र से पूर्वापर रेखा खींचकर फिर पलभाग्र बिन्दुगत पूर्वापर के समानान्तर रेखा बनाये। इस प्रकार इष्ट-छायाप्रगत तथा पलभा रेखा के बीच (अन्तर) को 'अग्रा' कहते हैं ॥१२६-१३१३॥ ५० ना० पु०

३६४ नारदीयपुराणम् इष्टच्छायाविषुवतोर्मध्येह्यग्राभिधीयते । शंकुच्छायाकृतियुतेर्मूलं कर्णोऽथ वर्गंतः ॥१३२॥ प्रोह्य शंकुकृते मूलं छाया शंकुविपर्ययात् । त्रिशत्कृत्वोयुगे भानां चक्रं प्राक्परिलंबते ॥१३३॥ तद्गुणाद्भदिनैर्भक्त्या द्युगणाद्यदवाप्यते । तद्दोस्त्रिघ्नादशाप्तांशा विज्ञेया अयनाभिधाः ॥१३४॥ तत्सम्वकृताद्ग्रहात्क्रांतिश्छायाचरदलादिकम् । शंकुच्छायाहते त्रिज्ये विषुवत्कर्णभाजिते ॥१३५॥ लंबाक्षज्ये तयोश्छापे लंबाक्षौ दक्षिणौ सदा । साक्षार्कापक्रमयुतिर्दिक्साम्येंतरमन्यथा ॥१३६॥ शेषह्वान्नांशाः सूर्यस्य तद्बाहुज्याथ कोटिजाः । शंकुमानांगुलाभ्यस्ते भुजत्रिज्ये यथाक्रमम् ॥१३७॥ कोटिज्ययाविभज्याप्ते छाया कर्णाबहिर्दले । स्वाक्षार्कनतभागानां दिक्साम्येंऽतरमन्यथा ॥१३८॥ दिग्भेदोपक्रमः शेषस्तस्य ज्या त्रिज्यया हृता । परमोपशमज्याप्त चापमेजादिगो रविः ॥१३६॥ कर्कादौ प्रोह्यचक्रार्द्धात्तुलादौ भार्द्धसंयुतात् । मृगादौ प्रोह्यचक्रात् मध्याह्नेऽर्कः स्फुटो भवेत् ॥१४०॥ शंकु (१२) के वर्ग में छाया के वर्ग को जोड़कर मूल लेने से छायाकर्ण होता है और छायाकर्ण के वर्ग में शंकु के वर्ग को घटाने से मूल छाया होती है तथा छाया के वर्ग घटाने से मूल शंकु होता है ।।१३२३॥ अयनांश-साधन—एक युग में राशिचक्र सृष्ट्यादि स्थान से पूर्व और पश्चिम को ६०० बार चलित होता है। जो उसके भगण कहलाते हैं। इसलिए अहर्गण को ६०० से गुणा करके युग के सावनदिन संख्या से भाग देने से लब्ध राश्यादि फल से भुज बनाये। उस भुज को ३ से गुणा करके १० के द्वारा भाग देने से लब्धि तुल्य अयनांश जानना चाहिए। इस अयनांश को अहर्गण द्वारा साधित ग्रह में जोड़कर क्रान्ति, छाया और चर खण्ड आदि ज्ञात करना चाहिए ॥१३३-१३४३॥ लंबांश और अक्षांश-साधन-शंकु (१२) और पलभा को पृथक्-पृथक् त्रिज्या से गुणा करके उसमें पल-कर्ण से भाग देने पर लब्धि क्रमशः 'लम्बज्या' और 'अक्षज्या' होती है। दोनों के चाप बनाने से 'लंबांश' और 'अक्षांश' होते हैं। इनकी दिशा सर्वदा दक्षिण होती है ॥१३५३॥ सूर्य-ज्ञान से मध्याह्न-छाया-साधन—अपने अक्षांश और सूर्य के क्रान्त्यंश दोनों एक दिशा की ओर हों तो योग करने से और यदि भिन्न दिशा के हों तो दोनों को अन्तर करने से शेष मध्याह्न में सूर्य का 'नतांश' होता है। उस 'नतांश' की 'भुजज्या' और 'कोटिज्या' बनाये। नतांश की भुजज्या और त्रिज्या को पृथक्-पृथक् शंकुमान (१२) से गुणा करके उसमें कोटिज्या से भाग देने पर लब्धि क्रमशः मध्याह्नकाल में छाया और छाया- कर्ण होती है ॥१३६-१३७३॥ मध्याह्न-छाया से सूर्यसाधन--अपने 'अक्षांश' और मध्याह्नकालिक सूर्य के 'नतांश' दोनों एक दिशा के हों तो अन्तर करने से और यदि भिन्न दिशा के हों तो योग करने से जो फल प्राप्त हो, वह सूर्य की क्रान्ति होती है। 'क्रान्तिज्या' को 'त्रिज्या' से गुणा करके उसमें 'परमक्रान्तिज्या' (१३९७) से भाग देने पर लब्धि स्पष्ट हों तो वही स्पष्ट सूर्य की 'भुजज्या' होती है। उसके चाप बनाकर मेषादि ३ राशि में सूर्य हों तो वही स्पष्ट सूर्य होता है। कर्कादि ३ राशि में हों तो उस चाप को ६ राशि में घटाने से, तुलादि ३ राशि में हों तो ६ राशि में जोड़ने से और मकरादि ३ राशि में हों तो १२ राशि में घटाने से जो योग या अन्तर हो, वह मध्याह्न में स्पष्ट सूर्य होता है। उस स्पष्ट सूर्य से विपरीत क्रिया द्वारा मन्दफलसाधन कर बार-बार संस्कार करने से मध्यम सूर्य का ज्ञान होता है ॥१३८-१४०३॥

चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३६५ तन्मन्दमसकृद्रामं फलं मध्यो दिवाकरः । ग्रहोदयाः प्राणहताः खखाष्टैकोद्धता गतिः ॥१४१॥ चक्रासवो लब्धयुतो स्वाहोरात्रासवः स्मृताः । विमध्यु कर्णार्द्धगुणा स्वाहोयत्राद्धंभाजिताः ॥१४२॥ क्रमादेकद्वित्रिभाज्या तच्चापानि पृथक्पृथक् । स्वाधोधः प्रविशोध्यथ मेषाल्लंकोदयासवः ॥१४३॥ स्वागाष्टषोधधौगैकाः शसयेकं हिमांशवः । स्वदेशचरखंडोना भवंतीष्टोदयासवः ॥१४४॥ व्यस्ताव्स्यैस्तैर्यु तास्तैस्तैः कर्कटाद्यास्ततस्तु यः । उत्क्रमेण षडेवैते भवंतीष्टास्तुलादयः ॥१४५॥ गतभोग्यासवः कार्याः सायनास्स्वेष्टभास्कराः । स्वोदयात्सुहता भक्ता भक्तभोग्याः स्वमानतः ॥१४६॥ अभीष्टघटिकासुभ्यो भोग्यातुन्प्रविशोधयेत् । तद्वदेवेष्यलग्नासूनेवं व्याप्तास्तथा क्रमात् ॥१४७॥ शेषं त्रिशत्क्रमाद्व्यस्तमशुद्धेन विभाजितम् । भागयुक्तं च हीनं च व्ययनांशं तनुः कुजे ॥१४८॥ प्राक्पश्चान्नतनाडीभ्यस्तद्वल्लंकोदयासुभिः । भानौ क्षयधने कृत्वा मध्यलग्नं तदा भवेत् ॥१४६॥ ग्रहों के अहोरात्र-मान--जिस राशि में तत्काल ग्रह हो, उस राशि के उदयमान से उस ग्रह की गति को गुणा करके उसमें १८०० से भाग देने पर लब्ध असु को 'अहोरात्रासु' (२१६००) में जोड़ने पर उस ग्रह का अहोरात्रमान होता है । (असु से पल और घड़ी बना लेनी चाहिए ॥१४१½॥ राशियों के उदयमान - १ राशि, २ राशि, ३ को ज्या को पृथक्-पृथक् 'परमाल्पद्युज्या' (परमक्रान्ति की कोटिज्या) से गुणा करके उसमें अपनी-अपनी द्युज्या (क्रान्तिकोटिज्या) से भाग देकर लब्धियों के चाप बनाये । उनमें प्रथम चाप मेष का उदय (लङ्कोदय)-मान होता है । प्रथम चाप को द्वितीय चाप में घटाने पर शेष वृष का उदयमान होता है एवं द्वितीय चाप को तृतीय चाप में घटाकर जो शेष रहे, वह मिथुन का लंकोदयमान होता है । यथा - १६७० असु मेष का, १७६५ वृष का तथा १९३५ मिथुन का सिद्ध लंकोदयमान है । इन तोनों में क्रम से अपने देशीय तीनों चरखंडों को घटाने पर क्रमशः तीनों अपने देश के मेष आदि तीन राशियों के उदयमान प्राप्त होते हैं । पुनः उन्हों तोनों लंकोदयमानों को उत्क्रम से रखकर - इन तोनों में अपने देश के तोनों चरखंडों को उत्क्रम से जोड़ने पर कर्क आदि ३ राशियों के स्वदेशोदयमान होते हैं एवं मेषादि कन्यापर्यन्त ६ राशियों के उदयमान सिद्ध होते हैं । पुनः ये ही उत्क्रम से तुलादि ६ राशियों के मान होते हैं ॥१४२-१४५॥ लग्नसाधन --इष्टकालिक सायन सूर्य के भुक्तांश ओर भोग्यांश द्वारा भुक्तपल और भोग्यपल का साधन करना चाहिए । जैसे--भुक्तांश को सायन सूर्य के स्वदेशीय उदयमान से गुणा करके उसमें ३० के द्वारा भाग देने पर लब्ध 'भोग्यपल' होते हैं । इष्ट घटो के 'पल' बनाकर उसमें 'भोग्यपल' को घटाये, घटाने पर जो शेष बचे, उसमें अग्रिम राशियों में से जितने के स्वदेशोदयमान घटें, उतने घटाये । (अथवा) इसी प्रकार 'इष्टपल' में 'भुक्तपल' घटाकर शेष में, गत राशियों के उत्क्रम से उनके जितने स्वदेशोदयमान घट सकें उतने घटाये । जिस राशि तक का मान घट जाय, वहाँ तक 'शुद्ध' और जिसका मान नहीं घटे, वह 'अशुद्ध' कहो जाती है । बचे हुए 'इष्टपल' को ३० से गुणा करके अशुद्धराशि के उदयमान से भाग देकर लब्ध अंशादि को (भोग्य-क्रम- विधि हो तो) शुद्ध राशि-संख्या में जोड़ने और (भुक्त-उत्क्रम-विधि हो तो) अशुद्ध राशि की संख्या में घटाने से फलादेश के लिये उपयुक्त उदयलग्न का मान होता है ॥१४६--१४८॥ मध्य-दशम लग्न-साधन - इसी प्रकार पूर्व 'नतकाल के पल' से लंकोदय द्वारा अंशादि साधन करके उसको सूर्य में घटाने से तथा पश्चिम 'नतकाल के पल' और लंकोदय द्वारा (त्रैराशिक से) अंशादि साधन करके सूर्य में जोड़ने से मध्य (दशम = आकाशमध्य) लग्न प्राप्त होता है ॥१४९॥