भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 407, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 407

३८८ नारदीयपुराणम् अथाधिमासकैर्युक्ता दिनीकृत्य दिनान्विताः । द्विस्थास्तिथिक्षयाभ्यस्ताश्चांद्रवासरभाजिताः ॥७८॥ लब्धोनरात्रिरहितालंकायामर्द्धरात्रिकः । सावनोद्युगणोऽर्कादिदिनमासाब्दपास्ततः ॥७९॥ सप्तभिःक्षयितः शेषः सूर्याद्योवास्रेश्वरः । मासाब्ददिनसंख्याप्तंद्विद्विघ्नं रूपसंयुक्तम् ॥८०॥ सप्तोद्धृतावशेषौ तौ विज्ञेयौ मासवर्षपौ । खेशस्य भगणाभ्यस्तो दिन राशिः कुवासरैः ॥८१॥ विभाजितो मध्यगत्या भगणादिर्ग्रहो भवेत् । एवं स्वशीघ्रमंदोच्चाये प्रोक्ताः पूर्वयायिनः ॥८२॥ विलोमगतयः पातास्तद्वच्चक्राद्विशोधिताः । योजनानि शतान्यष्टौ भूकर्णौ द्विगुणः स्मृतः ॥८३॥ तद्वर्गतो दशगुणात्पदं भूपरिधिर्भवेत् । लंबज्याघ्नस्त्रिजीवाप्तः स्फुटो भूपरिधिः स्वकः ॥८४॥ युग के उपर्युक्त अधिमासों की संख्या से गुणा करके गुणनफल में युग के सूर्यमासों की संख्या से भाग देना चाहिए । फिर जो लब्धि हो, उसे अधिमास की संख्या मानना चाहिए । अब उसको प्रथम स्थानस्थित मासगण में जोड़ देना चाहिए । (योगफल बीते हुए चान्द्रमासों की संख्या होती है) । उस संख्या को तीस से गुणा करे (तो गुणन- फल तिथि-संख्या होगी), उसमें वर्तमान मास की शुक्ल-प्रतिपदा से इष्टतिथि की संख्या जोड़े, (जोड़ने से चान्द्र दिनों की संख्या ज्ञात होती है) । इसको भी दो स्थानों में रखकर दूसरे स्थान में स्थित संख्या को युग के लिए कथित तिथिक्षय-संख्या से गुणा करे । गुणनफल में युग को चान्द्रदिनों (तिथियों की संख्या से भाग दे तो अभीष्ट दिन का लंकाधंरात्रिकालिक सावन दिनगण (अहर्गण) होता है । इससे दिनपति, मासपति और वर्षपति का ज्ञान करना चाहिए ॥७६-७९॥ यथा—दिनगण में ७ से भाग देने पर शेष बचे हुए १ आदि संख्या के अनुसार सूर्य आदि वारेश समझने चाहिए । तथा दिनगणमें ३० से भाग देकर लब्धि को २ से गुणा करके गुणनफल में १ जोड़ दे । फिर उसमें ७ से भाग देकर १ आदि शेष होने पर सूर्य आदि मासेश समझने चाहिए । इसी प्रकार दिनगण में ३६० से भाग देकर लब्धि को ३ से गुणा करके गुणनफल में १ जोड़े, फिर उसमें ७ से भाग देने पर १ आदि शेष संख्या के अनुसार सूर्य आदि 'वर्तमान' वर्षेश होते हैं ॥८०-१॥ मध्यमग्रहज्ञान—युग के लिए कथित भगण की संख्या से दिनगण को गुणा करे । गुणनफल में युग की कुदिन (सावनदिन)—संख्या से भाग देने पर भगणादिन ग्रह लंकाधंरात्रिकालिक होता है । इसी प्रकार पूर्वाभिमुख गति वाले जो शीघ्रोच्च और मन्दोच्च कहे गये हैं, उनके भगण में द्वारा उनका भी साधन होता है ॥८१-८२॥ विलोम (पश्चिमाभिमुख) गति वाले जो ग्रहों के पातभगण कहे गये हैं, उनके द्वारा इसी प्रकार जो पात सिद्ध हों, १२ राशि में घटाने से शेष मेषादि क्रम से राश्यादिपात होते हैं ॥८२ १/२॥ (भूपरिधिप्रमाण)—पृथ्वी का व्यास १६०० योजन है । इस (१६००) के वर्ग को १० से गुणा करके गुणनफल का वर्ग मूल भूमध्यपरिधि होता है; अर्थात् वर्गमूल की जो संख्या हो, उतने योजन पृथ्वी की परिधि समझनी चाहिए । इस भूमध्यपरिधि की संख्या को अपने-अपने लम्बांशज्या से गुणा करके उसमें त्रिज्या (३४३८) से भाग देकर जो लब्धि हो, वह स्पष्ट भूपरिधि का मान होता है ॥८३-८४॥ (ग्रहों में देशान्तर-संस्कार)—ग्रह की कलादि मध्यम गति को देशान्तर-योजन (रेखा-देश से जितने योजन पूर्व या पश्चिम इष्ट स्थान हो उस) से गुणा करके गुणन-फल में 'स्पष्टभूपरिधि-योजन' के द्वारा भाग देने पर जो लब्धि हो, वह कला आदि है । उस लब्धि को रेखा से पूर्व देश में पूर्वसाधित ग्रह में घटाने से और पश्चिम देश में जोड़ने से स्वस्थानीय अर्धरात्रिकालिक ग्रह होता है ॥८५ १/२॥