बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३८३ तेन देशांतराभ्यस्ता ग्रहभुक्तिर्विभाजिता । कलादितत्फलं प्राच्यां ग्रहेभ्यः परिशोधयेत् ॥८५॥ रेखाप्रतीचि संस्थाने प्रक्षिपेत्स्युः स्वदेशतः । राक्षसातपदेवौकःशैलयोर्मध्यसूत्रगाः ॥८६॥ अवन्तिकारोहितकं तथा सन्निहितं सरः । वारप्रवृत्तिःप्राग्देशे क्षपार्द्धेभ्यधिको भवेत् ॥८७॥ तद्देशांतरनाडीभिः पश्चादूने विनिर्दिशेत् । इष्टनाडीगुणा भुक्तिः षष्ट्या भक्ता कलादिकम् ॥८८॥ गते शोध्यं तथा योज्ये गम्ये तात्कालिको ग्रहः । भचक्र लिप्ताशीत्यंशः परमं दक्षिणोत्तरम् ॥८९॥ विक्षिप्यते स्वपातेन स्वक्रांत्यंतादनुष्णगुः । तत्र वासं द्विगुणितं जीवस्त्रिगुणितं कुजः ॥६०॥ बुधशुक्रार्कजाः पातैर्विक्षिप्यंते चतुर्गुणम् । राशिलिप्ताष्टमो भागः प्रथमं ज्यार्द्धमुच्यते ॥६१॥ ततो द्विभक्तलब्धोनमिश्रितं तद्वितीयकम् । आद्येनैव क्रमात्पिण्डान्मक्तालब्धोनितैय तान् ॥६२॥ खंडकाः स्युश्चतुर्विंशा ज्यार्द्धपिंडाःक्रमादमी । परमापक्रमज्या तु सप्तरंध्रमुणेदवः ॥६३॥ तद्गणज्या त्रिजोवाप्ता तच्चापं क्रांतिरुच्यते । ग्रहं संशोध्य मंदोच्चत्तथा शीघ्राद्विशोध्य च ॥६४॥ शेषं केंद्रपदं तस्माद्भुजज्या कोटिरेव च । गताद्भूजज्याविषमे गम्यात्कोटिः पदे भवेत् ॥६५॥ (रेखा-देश) भूमध्यरेखा से पूर्वदेश में रेखा-देशीय मध्यरात्रि से, देशान्तर घटोतुल्य पूर्व ही वारप्रवृत्ति (रवि-आदि वारों का आरंभ) होती है ॥८७॥ (इष्टकाल में मध्यम ग्रह जानने की विधि)--मध्यरात्रि से जितनी घड़ी बाद ग्रह बनाना हो, उस संख्या से ग्रह की कलादि गति को गुणा करके गुणनफल में ६० से भाग देकर लब्धितुल्य कलादि फल को पूर्व- साधित ग्रह में जोड़ने से; तथा जितनी घड़ी मध्यरात्रि से पूर्व ग्रह बनाना हो, उतनी संख्या से गति को गुणा करके गुणनफल में ६० से भाग देकर कलादि फल को पूर्वसाधित ग्रह में घटाने से इष्टकालिक ग्रह होता है ॥८८॥ (चन्द्रादि ग्रहों के परम विक्षेप) - भचक्रकला (२१६००) के ८०वां भाग अर्थात् २७० कलापर्यन्त क्रान्तिवृत्त (सूर्य के मार्ग) से परम दक्षिण और उत्तर चन्द्रमा विक्षिप्त होता (हटता) है। एवं गुरु ६० कला, मंगल ९० कला, बुध, शुक्र और शनि - ये तोनों १२० कला पर्यन्त क्रान्तिवृत्त से दक्षिण और उत्तर हटते रहते हैं ॥८९-९०३॥ (अभीष्ट जीवासाधन के लिए उपयोगी २४ जीवासाधन) -१ राशि-कला १८०० का आठवां भाग (२२५ कला) प्रथम जीवाधं कहा जाता है। उस (प्रथम जीवाधं) से प्रथम जीवाधं में भाग देकर लब्धि को प्रथम जीवाधं में ही घटाकर शेष (प्रथमखण्ड) को प्रथम जीवाधं में ही जोड़ने से द्वितीय जीवाधं होता है। इसी प्रकार प्रथम जीवा से ही द्वितीय जीवा में भाग देकर लब्धि को द्वितीय खंड में घटाकर शेष को द्वितीय जीवाधं में जोड़ने से तृतीय जीवाधं होता है। इसी तरह आगे भी क्रिया करने से क्रमशः २४ जीवाधं सिद्ध होते हैं ॥९१-९२३॥ इस प्रकार सूर्य की परमक्रान्तिज्या १३९७ होती है। इस (परमक्रान्तिज्या) से ग्रह को ज्या (भुजज्या) को गुणा करके त्रिज्या के द्वारा भाग देने से 'इष्टक्रान्ति-ज्या' प्राप्त होतो है। उसका चाप बनाने से 'इष्टक्रान्ति' (मध्यमा) कहलाती है ॥९३३॥ ('भुजज्या' और 'कोटिज्या' बनाने की रीति) ग्रहों को अपने-अपने मन्दोच्च में घटाने से शेष उस ग्रह का 'मन्द केन्द्र' तथा शीघ्रोच्च में घटाने से शेष उस ग्रह का 'शीघ्र केन्द्र' कहलाता है। उस राश्यादि केन्द्र की 'भुजज्या' और 'कोटिज्या' बनानी चाहिए। विषय (१,३) पद में 'गत' चाप की जीवा भुजज्या और 'गम्य' चाप की जीवा कोटिज्या कहलाती है। सम (२,४) पद में 'गम्य' चाप की जीवा 'भुजज्या' और गत' चाप की जीवा 'कोटिज्या' होती है ॥९४-६५३॥