बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३८० नारदीयपुराणम् समेति गम्याद्बाहुज्या कोटिज्यानुगता भवेत् । लिप्तास्तत्त्वयमैर्भक्ता लब्धज्या पिण्डकं गतम् ॥६६॥ गतगम्यान्तराभ्यस्तं विभजेत्तत्त्वलोचनैः । तदवाप्तफलं योज्यं ज्यापिण्डे गतसंज्ञके ॥६७॥ स्यात्क्रमज्याविधिश्चैवं मुक्तक्रमज्यास्य विस्तृतः । ज्यां प्रोह्य शेषं तत्त्वश्विविहतं तद्विवरोद्धृतम् ॥६८॥ संख्यातत्वाश्विसंवर्ग्य संयोज्यं धनुरुच्यते । स्तैर्मन्दपरिध्यंशा मनवः शीतगोरदाः ॥६९॥ युष्मांते विषमांते तु नखलिप्तोनितास्तयोः । युग्मांतेर्थाद्रियः स्वाग्निसुराः सूर्या नवाणँवाः ॥१००॥ ओजेद्वचगा वसुयमारदाह्रदगजाब्धयः । कुजादीनामतः शोध्यायुग्मांतेर्थाग्निसखाः ॥१०१॥ गुणाग्निचंद्राः खनगाद्विरसाक्षौणि गोऽग्नयः । ओजांते द्वित्रियमलाद्विविश्वेयमपर्वताः ॥१०२॥ खर्तुदलावियद्वेदाः शैघ्रकर्मणि कीर्तिताः । ओजयुग्मांतरगुणाभुजज्यात्रिज्ययोद्धृताः ॥१०३॥ युग्मवृत्तेधनर्णश्यादोजादूनेऽधिके स्फुटम् । तद्गुणे भुजकोटिज्येभगणांशविभाजिते ॥१०४॥ (इष्टज्यासाधनविधि)--जितने राश्यादि चाप को जीवा बनानी हो, उसको कला बनाकर उसमें २२५ से भाग दें जो लब्धि हों, उसे (सिद्ध २४ ज्या-पिण्ड में) गत ज्यापिण्ड की संख्या समझें । शेष कला को 'गतज्या' और 'गम्यज्या' के अन्तर से गुणा करें, उसमें २२५ से भाग देकर लब्ध कलादि को 'गतज्या'-पिण्ड में जोड़ने 'अभीष्ट ज्या' प्राप्त होती है। 'उत्क्रमज्या' भी इसी विधि से ज्ञात की जाती है ॥६६-६७१/२॥ (जीवा से चाप बनाने की विधि)--इष्ट जीवा की कला में सिद्ध जीवापिण्डों में से जितनी संख्या वाली जीवा घटे, उसको घटाना चाहिए। शेष कला को २२५ से गुणा करके गुणनफल में गत और गम्य जीवा के अन्तर से भाग देकर जो लब्धि कलादि प्राप्त हो, उसको घटायी हुई सिद्ध-जीवा-संख्या से गुणित २२५ में जोड़ने से से इष्टज्या का चाप होता है ॥६८१/२॥ (रवि और चन्द्रमा के मन्दपरिध्यंश)--समपद के अन्त में सूर्य के १४ अंश और चन्द्रमा के ३२ अंश मन्दपरिधि मान होते हैं। और विषम पद के अन्त में २० कला कम अर्थात् सूर्य के १३।४० अंशादि और चन्द्रमा के ३१।४० अंशादि मन्दपरिध्यंश के मान होते हैं ॥९९१/२॥ (मङ्गलादि ग्रहों की मन्द और शीघ्र परिधि)--समपदान्त में मंगल के ७५, बुध के ३०, गुरु के ३३, शुक्र के १२ और शनि के ४९ तथा विषमपदान्त में मंगल के ७२, बुध के २८, गुरु के ३२, शुक्र के ११ और शनि के ४८ मन्द परिध्यंश हैं। इसी प्रकार समपद के अन्त में मंगल के २३५, बुध के १३३, गुरु के ७०, शुक्र के २६२ और शनि के ३६ तथा विषमपदान्त में मंगल के २३२, बुध के १३२, गुरु के ७२, शुक्र के २६० और शनि के ४० शीघ्र परिध्यंश होते हैं ॥१२०-१०२१/२॥ (अभीष्ट स्थान में परिधिसाधन)--अभीष्ट स्थान में मन्द या शीघ्र परिधि बनानी हो तो उस ग्रह की भुजज्या को विषम पदान्त और समापदान्त-परिधि के अन्तर से गुणा करके गुणा करके गुणनफल में त्रिज्या (३४३८) से भाग देकर जो अंशादि लब्धि हो, उसको समपदान्त-परिधि में जोड़ने या घटाने से इष्टस्थान में क्रमशः स्पष्ट मन्द परिध्यंश या शीघ्र-परिध्यंश होते हैं ॥१०३१/२॥ (भुजफल-कोटिफल-साधन)--इस प्रकार से सिद्ध की गयी स्पष्ट परिधि से ग्रह की 'भुजज्या' और 'कोटिज्या' को पृथक्-पृथक् गुणा करके भगणांश (३६०) से भाग देकर लब्ध (भुजज्या से निकालने पर) भुजफल और (कोटिज्या) से निकालने पर) कोटिफल होते हैं। इसी प्रकार मन्द परिधि द्वारा मन्दफल और शीघ्र परिधि द्वारा शीघ्र फल का मान ज्ञात करना चाहिए । यहाँ मन्द परिधिवश भुजज्या द्वारा जो भुजफल आये, उसका चाप बनाने से मन्द कलाहि पद प्राप्त होता है ॥१०४१/२॥