बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुःपञ्चशत्तमोऽध्यायः ३६१ तद्भूजयफलधनुर्मादं लिप्तादिकं फलम् । शैघ् यकोटिफलं केंद्रे मकरादौ धनं स्मृतम् ॥१०५॥ संशोध्यं तु त्रिजोवायां कर्कादौ कोटिजं फलम् । तद्बाहुफलवर्गेव्यानमूलकर्णश्चलाभिधः ॥१०६॥ त्रिज्याभ्यस्तं भुजफलं चलकर्णविभाजितम् । लब्धस्य चापं लिप्तादि फलं शैघ् यमिदं स्मृतम् ॥१०७॥ एतदादौ कुजादीनां चतुर्थे चैव कर्मणि । मांद्यं कर्मैककेंद्वोभौ मादीनामथोच्यते ॥१०८॥ शैघ् यं माद्यं पुनर्माद्यं शैघ् यं चत्वार्यनुक्रमात् । अजादिकेंद्रे सर्वेषां मांद्ये शैघ् ये च कर्मणि ॥१०६॥ धनं ग्रहाणां लिप्तादि तुलादावृणमेव तत् । अर्कबाहुफलाभ्यस्ता ग्रहभुक्तिविभाजिताः ॥११०॥ भचक्रकलिकाभिस्तु लिप्ताः कार्या ग्रहेऽर्कवत् । स्वमन्दभुक्तिसंशुद्धा मध्यभुक्तिर्निशापतेः ॥१११॥ दोर्ज्यान्तरादिकं कृत्वा भुक्तावृणधनं भवेत् । ग्रहभुक्तेः फलं कार्यं ग्रहवन्मंदकर्मणि ॥११२॥ कर्कादौ तद्धनं तत्र मकरादावृणं स्मृतम् । दोर्ज्यान्तरगुणामुक्तिस्तत्तत्वेनावोद्धता पुनः ॥११३॥ स्वमंदपरिधिक्षुण्णा भगणांशोद्धताःकलाः । मंदस्फुटकृता भुक्तिः प्रोह्या शीघ्रोच्चभुविततः ॥११४॥ (शीघ्र कर्णसाधन) —पूर्व विधि से शीघ्र परिधि द्वारा जो कोटिफल प्राप्त हो, उसको मकरादि केन्द्र होने पर त्रिज्या (३४३८) में जोड़े तथा कर्कादि केन्द्र होने पर घटाये । जोड़ने या घटाने पर जो फल प्राप्त हो, उसके वर्ग में शीघ्र भुजफल के वर्ग को जोड़ दे । फिर उसका मूल लेने से शीघ्र कर्ण प्राप्त होता है ॥१०५-१०६॥ शीघ्र फलसाधन -- पूर्वविधि से साधित शीघ्र भुजफल को त्रिज्या से गुणा करके शीघ्र कर्ण के द्वारा भाग देने पर जो कलादि लब्धि हो, उसके चाप बनाने से शीघ्र 'भुजफल' प्राप्त होता है । यह शीघ्रफल मंगलादि ५ ग्रहों में प्रथम और चतुर्थ कर्म में संस्कृत (धन या ऋण) किया जाता है ॥१०७३॥ रवि और चन्द्रमा में केवल एक ही मन्दफल का संस्कार (धन या ऋण) किया जाता है। मुने ! अब मंगलादि ५ ग्रहों के संस्कार का वर्णन करता हूँ। उनमें प्रथम शीघ्रफल का, द्वितीय मन्दफल का, तृतीय भी मन्दफल का और चतुर्थ शीघ्रफल का संस्कार किया जाता हैं ॥१०८३॥ संस्कारविधि--शीघ्र या मन्द्र केन्द्र मेषादि (६ राशि के भीतर) हो तो शीघ्रफल और मन्दफल जोड़ना चाहिए । यदि तुलादि केन्द्र (६ राशि से ऊपर) हो तो घटाना चाहिए । रविभुजफल-संस्कार-प्रत्येक ग्रह की गतिकला को पृथक्-पृथक् सूर्य के मन्द भुजफल-कला से गुणा करके उसमें २१६०० के द्वारा भाग देने से जो कलादि लब्धि हो, उसको पूर्वसाधित उदयकालिक ग्रहों में रविमन्दफलवत् संस्कार (मन्दफल धन हो तो धन, ऋण हो तो ऋण) करने से स्पष्ट सूर्योदयकालिक ग्रह होते हैं ॥११०३॥ स्पष्टग्रहगतिसाधनार्थं गतिफल--चन्द्रमध्यगति में चन्द्रमन्दोच्च गति को घटाकर उससे (अर्थात् चन्द्रकेन्द्रगति से) तथा अन्य ग्रहों की स्वल्पान्तर से अपनी-अपनी गति से हो मन्दस्पष्टगतिसाधन में फल साधन करना चाहिए । यथा--उक्त गति (चन्द्र की केन्द्रगति और अन्य ग्रहों की गति) को दोर्ज्यान्तर (गम्यज्या और गतज्या के अन्तर) से गुणा करके उसको २२५ के द्वारा भाग देकर लब्धि को अपनी-अपनी मन्दपरिधि से गुणा करके भगणांश (३६०) के द्वारा भाग देने से जो कलादि फल लब्धि हो, उसको यदि कर्कादि (३ से ऊपर ६ राशि के भीतर) केन्द्र हो तो मध्यगति में धन कर दें (जोड़ दें) तथा मकरादि (९ राशि से ऊपर ३ राशि तक) केन्द्र हो तो घटा दें, यह मन्दस्पष्ट गति होती है ॥११३३॥ पुनः इस मन्दस्पष्ट गति को अपनी शीघ्रोच्च गति में घटाकर शेष को त्रिज्या तथा अन्तिम शीघ्रकर्ण के अन्तर से गुणा करके पूर्वसाधित शीघ्रकर्ण के द्वारा भाग देने से जो लब्धि (कलादि) हो, उसको, यदि कर्ण त्रिज्या से अधिक हो तो मन्दस्पष्ट गति में धन करें (जोड़ने)