भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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३६२ नारदीयपुराणम् तच्छेषं विवरेणाथ हन्यात्त्रिज्यांत्यकर्णयोः । चलकर्णहृतं भुक्तौ कर्णे त्रिज्याधिके धनम् ॥११५॥ ऋणमनेऽधिके प्रोह्य शेषं वक्रगतिर्भवेत् । कृतर्तुचंद्रैर्वेदैर्द्रैः शून्यद्वयेकैर्गुणाष्टभिः ॥११६॥ शररुद्रैश्चतुर्थां शुक्रेंद्रांशैर्भुसुतादयः । वक्रिणश्चक्रशुद्धैस्तैरंशैरुज्जह्नितवक्रताम् ॥११७॥ क्रमज्या विषुवद्भाघ्नी क्षितिज्या द्वादशोद्धृता । त्रिज्यागुणा दिनव्यासभक्ता चापं च रासवः ॥११८॥ तत्कार्मुकमृदक्रांतौ धनहीनो पृथक्स्थिते । स्वाहोरात्रचतुर्भागे दिनरात्रिवले स्मृते ॥११९॥ याम्यक्रांतौ विपर्यस्ते द्विगुणैते दिनक्षये । भभोगोऽष्टशतीलिप्ताः खाशिवशैलास्तथातिथेः ॥१२०॥ ग्रहलिप्ता भभोगाप्तामानि भुक्त्यादिनादिकम् । रवींदुयोगलिप्तास्तु योगाभभोगभाजिताः ॥१२१॥ गतगद्याश्च षष्ठिघ्ना भुक्तियोगाप्तनाडिकाः । अर्कोनचंद्रलिप्तास्तु तिथयो भोगभाजिताः ॥१२२॥ और अल्प हो तो घटा दें; यह स्पष्ट गति होती है यदि साधित ऋणगतिफल मन्दस्पष्ट गति से अधिक हो तो उसी (ऋणगतिफल) में मन्दस्पष्ट गति को घटाना चाहिए; जो शेष आवे, वह वक्रगति होती है । इस स्थिति में वह ग्रह वक्रगति रहता है । ११४-११५ १/२॥ ग्रहों की वक्र केंद्रांश-संख्या—मंगल अपने चतुर्थ शीघ्र केंद्रांश १६४ में, बुध १४४ केंद्रांश में, गुरु १३० केंद्रांश में, शुक्र १६२ केंद्रांश में और शनि ११५ शीघ्र केंद्रांश में वक्रगति होता है। अपने-अपने वक्रकेंद्रांश को ३६० में घटाने से शेष के तुल्य केंद्रांश होने पर पुनः वह ग्रह मार्ग-गति-वाला होता है ॥११७॥ कालज्ञान--रवि-क्रान्तिज्या को पलभा (३० घड़ी का दिन हो तो उस दिन के दोपहर में १२ अंगुल शंकु की छाया को 'पलभा कहा जाता है) से गुणा करके गुणनफल में १२ से भाग देने पर लब्धि क्षितिज्या या कुज्या' होती है । उस (कुज्या) को त्रिज्या से गुणा करके अहोरात्रार्धरूप कर्ण (द्युज्या कान्ति की कोटिज्या) से भाग देने से लब्धि चरज्या होतो है । उसके चाप बनाने से चरासु होते हैं । उस चर-चाप को यदि उत्तर क्रान्ति हो तो १५ घटी में जोड़ने से दिनार्ध और १५ घटी में घटाने से रात्र्यर्ध होता है। दक्षिणक्रान्ति हो तो विपरीत (याने १५ घटी में घटाने से दिनार्ध और जोड़ने से रात्र्यर्ध) होता है। दिनार्ध को दुगना करने से दिनमान और रात्र्यर्ध को दूना करने से रात्रिमान प्राप्त होता है ॥११८-११९ १/२॥ पञ्चाङ्ग साधन—८०० कला एक-एक नक्षत्र का और ७२० कला एक-एक तिथि को भोगमान होता है। (अतः ग्रह किस नक्षत्र में है, यह जानने के लिये) राश्यादि ग्रह को कलात्मक बनाकर उसमें भभोग (८००) के द्वारा भाग देने से जो लब्धि आये; उसके अनुसार अश्विनी आदि गतनक्षत्र समझने चाहिए । शेष कलादि से ग्रह की गति के द्वारा उसकी गत और गम्यघटी जानना चाहिए ॥१२० १/२॥ उदयकालिक स्पष्टरवि और चन्द्र का योग करके उसकी कला में भभोग (८००) के द्वारा भाग देकर लब्धितुल्य विष्कम्भ आदि योग होते हैं। शेष वर्तमान योग की गत-कला है। उसको ८०० में घटा देने से गम्य- कला होती है। उस गत और गम्यकला को ६० से गुणा करके उससे रवि और चन्द्र की गतिकला के योग से भाग देने पर गत और गम्यघटी होती है ॥१२१॥ स्पष्ट चन्द्र में स्पष्ट सूर्य को घटाकर शेष राश्यादि को कला बनाकर उसमें तिथिभोग (७२०) से भाग देने पर लब्धि गततिथि-संख्या होती है। शेष वर्तमान तिथि की गतकला है। उसको ७२० में घटाने से गम्यकला होती है । गत और गम्यकला को पृथक् ६० से गुणाकर चन्द्र और रवि के स्पष्ट गत्यन्तर से भाग देकर लब्धि- क्रम से भुक्त (गत) और गम्य घटो होतो हैं। (पञ्चांग में वर्तमान तिथि के आगे गम्यघटी लिखी जाती है) ॥१२२ १/२॥