बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३८७ स्वयंभुवा शरगतानब्दान्संपिण्ड्य नारद। खचरानयनं कार्यमथ वेष्टयुगादितः ॥६४॥ युगे सूर्यज्ञशुक्राणां खचतुष्करदार्णवाः । कुजांगिगुरुशुक्राणां भगणाः पूर्वयायिनाम् ॥६५॥ इंदोरसाग्निवित्रीजु सप्त भूधरमार्गणाः । दस्रत्यष्टरसांकाशिवलोचनानि कुजस्य तु ॥६६॥ बुधशोघ्रस्य शून्येतु'खाद्रित्यंकनगेंदवः । बहस्पतेः खदस्त्राक्षिवेदषड्वह्वयस्तथा ॥६७॥ सितशीघ्रस्य षट्सप्तत्रियमाशिखभूधराः । शनेभु'जगषट्पञ्चरसवेद निशाकराः ॥६८॥ चंद्रोच्चस्याग्निशून्याक्षिवसुसर्पार्णवा युगे। वामं पातस्य वस्वग्नियमाशिखभूधराःशर ॥६६॥ उदयादुदयं भानोर्भूमैः सावनवासराः । वसद्व्य ष्टाद्रिरूपांकसप्ताद्रितिथयो युगे ॥७०॥ षड्वह्वित्रिहुताशांकतिथयश्चाधिमासकाः । तिथिक्षयायमार्थीक्षिवचष्टव्योमशराश्विनः ॥७१॥ खचतुष्का समुद्राष्टकुपञ्चरविमासकाः । षट्द्व्यग्नित्तयग्निवेदामिपंचशुश्रांशुमासकाः ॥७२॥ प्राग्गतेः सूर्यमंदस्य कल्पेसप्ताष्टवह्वयः। कौजस्य वेदखयमा बौधस्याष्टतु वह्वयः ॥७३॥ खखरंध्राणि जैवस्य शौक्रस्यार्थगुणेबवः । गौरनयः शनिमंदस्य पातानामथ वामतः ॥७४॥ मनुदस्रास्तु कौजस्य बौधस्याष्टाष्टसागराः। कृताद्रिचन्द्रा जैवस्य शौक्रस्याग्निखनंदकाः ॥७५॥ शनिपातस्य भगणाः कल्पे यमरसर्तवः । वर्तमानयुगे यातावत्सरभगणाभिधाः ॥७६॥ मासीकृतायुता मासैर्मधुशुक्लादिभिर्गंतैः । पृथक्स्थासिधिमासप्तासुर्यमासविभाजिताः ॥७७॥
हे ॥६३॥ नारद ! ब्रह्मा के वर्तमान कल्प में जितने वर्ष बीत गये हैं, उन्हें एकत्र करके ग्रहानयन (ग्रहसाधन) करना चाहिए। अथवा इष्ट युगादि से ग्रह-साधन करना चाहिए ॥६४॥ एक युग में अपनी कक्षा में पूर्व दिशा को ओर चलते हुए सूर्य बुध और शुक्र के ४३२०००० 'भगण' होते हैं । तथा मंगल, शनि और बृहस्पति के शीघ्रोच्च गण भी उतने हो होते हैं ॥६५॥ एक युग में चन्द्रमा के भगण ५७७५३३३६ होते हैं। भौम के २२९६८३२ बुध के शीघ्रोच्च के १७६३७०६०, बृहस्पति के ३६४२२०, शुक्र के शीघ्रोच्च के ७०२२३७६, शनि के १४६५६८ तथा चन्द्रमा के उच्च के भगण ४८८२०३ होने हैं। चन्द्रमा के पात की वामगतिसम्बन्धी भगणों की संख्या २३२२३८ है ॥६६-६९॥ सूर्य के एक उदय से दूसरे उदय पर्यन्त जो दिन का मान होता है, उसे भौमवासर या सावनवासर कहते हैं। एक महायुग (चतुर्युग) में १५७७९१७८२८ सावनदिन होते हैं। (चान्द्र दिवस १६०३००००८०) होते हैं। अधिमास १५९३३३६ होते हैं तथा तिथिक्षय २५०८२२५२ होते हैं ॥७०-७१॥ एक युग में रविमासों को संख्या ५१८४०००० है तथा चान्द्र मासों की संख्या ५३४३३३३६ होती हैं ॥७२॥ पूर्वाभिमुख गति के क्रम से एक कल्प में सूर्य के मन्दोच्च भगण ३८७, मंगल के मन्दोच्च भगण २०४, बुध के मन्दोच्च ३६८, गुरु के मन्दोच्च ९००, शुक्र के मन्दोच्च ५३५ तथा शनि के मन्दोच्च भगण ३९ होते हैं। अब मंगल आदि ग्रहों के पातों को विलोम गति (पश्चिम गमन) के अनुसार एक कल्प में होने वाले भगण बताये जाते हैं ॥७३-७४॥ भौमपात के भगण २१४, बुधपात के भगण ४८८, गुरुपात के भगण १७४, शुक्रपात के भगण ९०३ तथा शनिपात के भगण ६६२ होते हैं ॥७५३॥ वर्तमान युग (जिस युग में, जिस समय के अहर्गण या ग्रहादि का ज्ञान करना हो उस समय) में सृष्ट्यादि काल या युगादि काल से अब तक जितने वर्ष बीत चुके हों, वे सूर्य के भगण होते हैं। भगण को बारह से गुणा करके मास बनाना चाहिए। उसमें 'वर्तमान वर्ष' के चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से लेकर वर्तमान मास तक जितने मास बीते हों, उनकी संख्या जोड़कर योगफल को दो स्थानों में रखना चाहिए। द्वितीय स्थान में रखे हुए मासगण को