भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 405

३८६ नारदीयपुराणम् लब्धोनवृत्तवर्गाद्रिपदेर्घातपतिते धनुः । स्थूलमध्यापृवन्नवेधो वृत्तांकाशेषभागिकः ॥५१॥ वृत्तांगांशकृतिर्वेधनिघ्नीयनकरामिताभ् । वारिव्यासहृतं दैर्घ्यंवेधांगुलहतं पुनः ॥५२॥ खखेंदुरामविहृतं मानं द्रोणादिवारिणः । विस्तारायामवेधानांगुल्योन्योन्यनाडिहताः ॥५३॥ रसांकाभ्राब्धिभिर्भक्ता धान्ये द्रोणादिकामितिः । उत्सेधव्यासदैर्घ्याणामंगुल्यान्यस्य नो द्विज ॥५४॥ मिथोघ्नाति भजेत्खाभ्रेशैर्द्रोणादिमितिर्भवेत् । विस्तारांगुलान्येवं मिथोघ्नान्यपसां भवेत् ॥५५॥ वाणेभमार्गणेर्लब्धं द्रोणाद्यं मानमादिशेत् । दीपशंकुतलच्छिद्रघ्नः शंकुर्भवेत्तवेन्मुने ॥५६॥ नरो न दीपकशिखौच्यभक्तो ह्यथ भोद्रने । शंकौन्दीपोधपादशच्छिद्रघ्नैर्र्दीपौच्चयं नरान्विते ॥५७॥ विशंकुदीपौच्च्यगुणाच्छाया शंकुहृता भवेत् । दीपशंकवंतंरं चाथ च्छायाग्राविवरघ्नमा ॥५८॥ मानांतरहृदूभूमिः स्यादथोनूनराहितः । प्रभाप्ता जायते दीपशिखौच्च्यं स्यात्त्रिराशिकात् ॥५६॥ एतत्संक्षेपतः प्रोक्तं गणिते परिकर्मकम् । ग्रहमध्यादिकं वक्ष्ये गणिते नातिविस्तरन् ॥६०॥ युगमानं स्मृतं विप्र खचतुष्करदार्णवाः । तद्दशांशास्तु चत्वारः कृताख्यं पादमुच्यते ॥६१॥ त्रयस्त्रेता द्वापरः द्वौ कलिरेकः प्रकीर्तितः । मनु कृताब्दसहिता युगानामेकसप्ततिः ॥६२॥ विधेर्दिने स्युर्विप्रेंद्र मनवस्तु चतुर्दश । तावत्येव निशा तस्य विप्रेंद्र परिकीर्तिता ॥६३॥ (अन्नादि राशि-व्यवहार) राशि-व्यवहार में स्थूल, मध्यम, सूक्ष्म, अन्नराशियों में क्रमशः उनकी परिधि का नवमांश, दशमांश और एकादशांश वेध होता है । परिधि का षष्ठांश लेकर उसका वर्ग करना चाहिए और उसे वेध से गुणा कर देना चाहिए । उसका नाम 'घनहस्त' होगा । जल के व्यास (चौड़ाई) से लम्बाई को गुणा कर देना फिर उसी को गहराई के अंगुल मान से गुणा कर देना तथा ३१०० से भाग देना चाहिए । इससे जल का द्रोणात्मक मान ज्ञात होगा ॥५१-५२॥ चौड़ाई, गहराई और लम्बाई के अंगुलात्मक मान को परस्पर गुणा कर उसमें ४०९६ से भाग दें तो अन्न का द्रोणादि मान प्राप्त होगा । ऊँचाई, व्यास (चौड़ाई) और लम्बाई के अंगुलात्मक मान को परस्पर गुणा करके ११५० से भाग देना चाहिए; वह पत्थर का द्रोणात्मक मान होगा । विस्तार आदि के अंगुलात्मक मान को परस्पर गुणा करके ५८५ से भाग देना चाहिए, तो लब्धि लोहे के द्रोणात्मक मान का सूचक होती है ॥५३-५५॥ छाया-साधन में प्रदीप और शंकुतल का जो अन्तर हो, उससे शंकु को गुणा कर देना और दीपक की ऊंचाई में शंकु को घटाकर उससे उस गुणित शंकु में भाग देने से छाया का मान प्राप्त होगा । शंकु और दीपतल के अन्तर से शंकु को गुणा कर दें और छाया से भाग दें; फिर लब्धि में शंकु को जोड़ दें तो दीपक की ऊँचाई ज्ञात हो जायगी । शंकुरहित दीपक की ऊँचाई से छाया को गुणा करें और शंकु से भाग दें तो शंकु तथा दीपक का अन्तर ज्ञात होगा । छायाग्र के अन्तर से छाया को गुणा करें और छाया के प्रमाणान्तर से भाग दें तो 'भू' होगी । 'भू' और शंकु का घात (गुणा) करें और छाया से भाग दें तो दीपक की ऊँचाई ज्ञात होगी । उपर्युक्त सब बातों का ज्ञान त्रैराशिक से हो होता है । यह परिकर्मगणित मैंने संक्षेप से कहा । अब ग्रह का मध्यादिक गणित बताता हूँ, वह भी अधिक विस्तार से नहीं ॥५६-६०॥ विप्र ! चारों युगों का सम्मिलित मान तैंतालीस लाख बीस हजार वर्ष बतलाया गया है । उसके दशांश में चार का गुणा करने पर सत्ययुग नामक पाद होगा । (उसका मान १७ लाख २८ हजार वर्ष है) । दशांश में तीन का गुणा करने पर (१२९६००० वर्ष) त्रेता नामक पाद होता है । दशांश में दो का गुणा करने पर (८६४००० वर्ष) द्वापर नामक पाद होता है और उक्त दशांश को एक-गुना ही रखने पर (४३२००० वर्ष) कलियुग नामक पाद कहा गया है । कृताब्दसहित (एक सत्ययुग अधिक) इकहत्तर चतुर्युग का एक मन्वन्तर होता है ॥६१-६२॥ ब्रह्मन् ! ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु होते हैं और उतने ही समय की ब्रह्मा की एक रात्रि होती