भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 404

चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३८५ व्यस्तं गच्छतं फलं यद्गुणवर्ग भजहि तत् । व्येकं व्येकगुणाप्तं च प्राघ्नं मानं गुणोत्तरे ॥४३॥ भुजकोटिकृतियोगमूलं कर्णश्च दोर्भवेत् । श्रुतिकृत्यंतरपदं कोटिर्दोः कर्णवर्गयोः ॥४४॥ विवरात्तत्कर्णपदं क्षेत्रे त्रिचतुरस्रके । राश्योरंतरवर्गे च द्विघ्ने घाते युते तयोः ॥४५॥ वर्गयोगोथ योगांतहतिर्वर्गांतरं भवेत् । व्यास आकृतिसंक्षण्णोव्यासात्यात्परिधिर्मुने ॥४६॥ ज्याव्यासयोगविवराहतमूलोनितोऽद्धितः । व्यासः शरः शरोनाच्च व्यासाच्छरगुणात्पदम् ॥४७॥ द्विघ्नं जीवाथ जीवाद्धेवर्गे शरहृते युते । व्यासोष्टतेभवेदेवं प्रोक्तं गणितकोविदैः ॥४८॥ चापोननिघ्नतः परिधिः प्रागाङ्कः परिधेः कृते । तुर्यांशेन शरध्नेनाघे निनाधं चतुर्गुणम् ॥४६॥ व्यासघ्नं प्रभजेद्विप्र ज्या काशं जायते स्फुटा । ज्यांघ्रीबुघ्नोवृत्तवर्गोद्विघ्नतव्यासाम्चमविहृत् ॥५०॥ चाहिए। फिर अन्त्य चिह्न से उलटा गुणज और वर्गफल साधन करके आद्य चिह्न तक जो फल हो, उसमें १ घटाकर शेष में एकोन गुणक से भाग देना चाहिए । लब्धि को आदि अंक से गुणा करने पर सर्वधन होता है ॥४२-४३॥ (क्षेत्रव्यवहार--रेखागणित-प्रकरण)--भुज (लम्ब) और कोटि (आधार) के वर्गों के योग का मूल कर्ण होता है, भुज और कर्ण के वर्गान्तर का मूल कोटि होता है तथा कोटि एवं कर्ण के वर्गान्तर का मूल भुज होता है । यह बात त्रिभुज अथवा चतुर्भुज क्षेत्र के लिए कही गई है । अथवा भुज और कोटि की राशियों के अन्तरवर्ग में उन्हीं दोनों राशियों के गुणनफल का दूना जोड़ दे तो उन राशियों के वर्गों का योग होता है अथवा उन्हीं दोनों राशियों के योग और अन्तर का गुणनफल उनके वर्गों का अन्तर होता है ॥४४-४५½॥ (अब वृत्त के विषय में बताते हैं ।) मुने ! व्यास को २२ से गुणा करना और ७ से भाग देना चाहिए । इससे स्थूल परिधि का ज्ञान होता है ॥४६॥ वृत्त की ज्या (जीवा) और व्यास का योग एक जगह रखना और अन्तर को दूसरी जगह रखना चाहिए । फिर इन दोनों का (गुणा) करना चाहिए । उस गुणनफल का वर्ग मूल लेकर उसको व्यास में घटा देना चाहिए । फिर उसका आधा करे, वही 'शर' होगा । व्यास में शर को घटाना, अन्तर को शर से गुणा करना, उसका मूल लेकर उसका दूना करना चाहिए, तो 'जीवा' हो जायगो । जीवा का आधा करें उसका वर्ग करें, शर से भाग देना ओर लब्धि में शर को जोड़ दें तो व्यास का मान होगा ॥४७-४८॥ परिधि और चाप की नाप ज्ञात होने पर जीवा की लम्बाई निकालना । परिधि से चाप को घटाकर शेष में चाप से ही गुणा करने पर गुणनफल 'प्रथमाङ्क' कहलाता है । परिधि का वर्ग करें, उसका चौथा भाग लें, उसे पांच से गुणा करें और उसमें 'प्रथम' को घटा दें; यह भाजक होगा । चतुर्गुणित व्यास को प्रथम से गुणा करने पर भाज्य प्राप्त हुआ । भाज्य में भाजक से भाग देने पर जीवा सात हो जायगी ॥४९½॥ व्यास को चार से गुणा करके उसमें जीवा को जोड़ दें, यह भाजक हुआ । परिधि के वर्ग को जीवा की चौथाई और पांच से गुणा करें, यह भाज्य हुआ । भाजक से भाज्य में भाग दें, जो लब्धि आवे, उसे परिधि के वर्ग के चतुर्थांश में घटा दें और शेष का मूल लें, उसे वृत्त (परिधि) के आधे में घटा देने पर धनु (चाप) प्राप्त होगा ॥५०½॥ ४६ ना० पु०