भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३८१ मुहूर्तोपग्रहाः सूर्यसंक्रांतिर्गोचरःक्रमात् । चंद्रताराबलं चैव सर्वलग्नार्तवाह्वयः ॥१८॥ आधानपुंससीमंतजातनामन्नभुक्तयः । चौलङ्कर्णव्यणं मौंजी क्षुरिकाबंधनं तथा ॥१०॥ समावर्तनवैवाहप्रतिष्ठासद्मलक्षणम् । वात्राप्रवेशनं सद्योवृष्टिः कर्मविलक्षणम् ॥११॥ उत्पत्तिलक्षणं चैव सर्वं संक्षेपतो ब्रुवे। एकं दश शतं चैव सहस्रायुतलक्ष कम् ॥१२॥ प्रयुतं कोटिसंज्ञां चार्वुदमब्जं च खर्वकम् । निखवं च महापद्मं शंकुर्जलंघिरेव च ॥१३॥ अन्त्यं मध्यं परार्द्धं च संज्ञा दशगुणोत्तराः । क्रमाद्व्युत्क्रमतो वापि योगः कार्योत्तरं तथा ॥१४॥ हन्याद्गुणेन गुण्यं स्यात्तेनैवोपांतिमादिकान् । शुद्धेद्वरोद्यदुगुणश्च भाज्यांत्यात्तफलं मुने ॥१५॥ समांकतोऽथो वर्गःस्यात्तमेवाहुः कृतिं बुधः । अंत्यात्तु विषमात्त्यक्त्वा कृतिं मूलं न्यसेत्पृथक् ॥१६॥ द्विगुणोनामुना भक्ते फलं मूले न्यसेत्क्रमात् । तत्कृतिं च त्यजेद्विप्रे मूलेन विभजेत्पुनः ॥१७॥ का बल, सम्पूर्ण लग्नों तथा ऋतुदर्शन का विचार, गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्न- प्राशन, चूडाकरण, कर्णवेध, उपनयन, मौञ्जीबन्धन (वेदारम्भ), क्षुरिकाबन्धन, समावर्तन, विवाह, प्रतिष्ठा, गृहलक्षण, यात्रा, गृहप्रवेश, तत्काल वृष्टिज्ञान, कर्मवैलक्षण्य तथा उत्पत्ति का लक्षण—इन सब विषयों का संक्षेप से वर्णन करूंगा ॥८-११३॥ [अब गणित का प्रकरण प्रारंभ किया जाता है-] एक (इकाई), दस (दहाई), शत (सैकड़ा), सहस्र (हजार), अयुत (दस हजार), लक्ष (लाख), प्रयुत (दस लाख), कोटि करोड़, अर्बुद (दस करोड़), अब्ज (अरब), खवं (दस अरब), निखवं, (खर्व), महापद्म (दस खर्व), शंकु (नील), जलधि (दस नील), अन्त्य (पद्म), मध्य (दस पद्म), परार्ध (शंख) इत्यादि संख्याबोधक संज्ञाओं को उत्तरोत्तर दस गुना माना गया है। यथास्थानीय अंकों का योग या अन्तर क्रम या व्युत्क्रम से करें ॥१२-१४॥ गुण्य के अन्तिम अंक को गुणक से गुणा करें। फिर उसके पार्श्ववर्ती अंक को भी उसी गुणक से गुणा कर दें। इस तरह आदि अंक तक गुणा करने पर गुणनफल प्राप्त हो जाता है। मुने ! इसी प्रकार भागफल जानने के लिए भी यत्न करना चाहिए जितने अंक से भाजक के साथ गुणा करने पर भाज्य में से घट जाय, वही अंक लब्धि अथवा भागफल होता है ॥१५॥ दो समान अंकों के गुणनफल को वर्ग कहा गया है। विद्वान् पुरुष उसी को कृति कहते हैं। (जैसे ४ वर्ग का ४ × ४ = १६ और ९ का वर्ग ९ × ९ = ८१ होता है) [वर्गमूल जानने के लिए दाहिने अंक से लेकर बायें अंक तक अर्थात् आदि से अन्त तक विषम और सम का चिह्न कर देना चाहिए। खड़ी लकीर को विषम का ओर पड़ी को सम का चिह्न माना गया है]। अन्तिम विषम में जितने वर्ग घट सकें उतने घटा देना चाहिए। उस वर्ग का मूल लेकर उसे पृथक् रख देना चाहिए ॥१६॥ फिर द्विगुणित मूल से सम अंक में भाग दे और जो लब्धि आये उसका वर्ग विषम में घटा दे। फिर उसे दूना करके पंक्ति में रख दे। मुनीश्वर ! इस प्रकार बार-बार करने से पंक्ति का आधा वर्गमूल होता है ॥१७३॥ समान तीन अंकों के गुणनफल को घन कहा गया है। अब घनमूत्न निकालने की विधि बतायी जाती है-दाहिने के प्रथम अंक पर घन या विषम का चिह्न (खड़ी लकीर के रूप में) तथा उसके वामभाग में पार्श्ववर्ती दो अंकों पर (पड़ी लकीर के रूप में) अघन या सम का चिह्न लगावे । इसी प्रकार अन्तिम अंक तक एक घन (विषम) और दो अघन (सम) के चिह्न लगाने चाहिए। अन्तिम या विषम घन में जितने घन घट सकें उतने घटा ले। उस घन को अलग रखे । उसका घनमूल ले और उस घनमूत्र का वर्ग मरे, फिर उसमें तीन से गुणा करे। उससे आदि अंक में भाग दे, लब्धि को अलग लिख