भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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३८२ नारदीयपुराणम् एवं मुहुर्वर्गमूलं जायते च मुनीश्वर । समत्यङ्ककृतिः प्रोक्तो घनस्तंत्रविधिः पदे ॥११८॥ प्रोच्यते विषमं त्वाद्यं समे द्वे च ततः परम् । विशोध्यं विषमादंत्याद्घनं तन्मूलमुच्यते ॥११६॥ विघ्नाद्भजेन्मूलकृत्या समं मूले न्यसेत्फलम् । तत्कृतिस्त्रेन निहतान्निघ्नीं चापि विशोधयेत् ॥१२०॥ घनं च विषमादेवं घनमूलं मुहुर्भवेत् । अन्योन्यहारनिहतौ हरांशौ तु समुच्छिदा ॥१२१॥ लवा लवघ्नाश्च हरा हरघ्ना हि सवर्णनम् । भागप्रभागे विज्ञेयं मुने शास्त्रार्थचित्तकैः ॥१२२॥ अनुबंधेऽपवाहे चैकस्य चेदधिकोनकः । भागातस्तस्थहारेण हरं स्वांशाधिकेन तान् ॥१२३॥ ऊनेन चापि गुणयेद्धनं चिंतयेत्तथा । कार्यस्तुल्यहरांशानां योगश्चाप्यंततो मुने ॥१२४॥ अहारराशी रूढ्यं तु कल्पयेद्धरमप्यथा । अंशाहतिश्छेदधातहृद्भिन्नगुणने फलम् ॥१२५॥ छेदं चापि लवं विद्वन्परिवर्त्य हरस्य च । शेषः कार्यो भागहारे कर्तव्यो गुणनाविधिः ॥१२६॥ हारांशयोः कृती वर्गे घनो घनविधौ मुने । पदसिद्धये पदे कुर्यादथो स्वं सर्वतश्स्वस्वम् ॥१२७॥ छेदं गुणं गुणं छेदं वर्गं मूलं पदं कृतिम् । ऋणं स्वं स्वमृणं कुर्याद्दृश्ये राशिप्रसिद्धये ॥१२८॥ ले, उस लब्धि का वर्ग करे और और उसमें अन्त्य (प्रथम मूलाङ्क) एवं तीन से गुणा करे, फिर उसके बाद के अंक में उसे घटा दे तथा अलग रखी हुई लब्धि के घन को अगले घन अंक में घटा दे । इस प्रकार बार-बार करने से घनमूल सिद्ध होता है ॥११८-२०॥ भिन्न अंकों के परस्पर हर से हर (भाजक) और अंश (भाज्य) दोनों को गुणा कर देने से सबके नीचे बराबर हर हो जाता है । भागप्रभाग में अंश को अंश से और हर से गुणा करना चाहिए । भागानुबन्ध एवं भागापवाह में यदि एक अंक अपने अंश से अधिक या ऊन हो तो तलस्थ हर ऊपर वाले हर को गुणा कर देना चाहिए। उसके बाद अपने अंश से अधिक ऊन किये हुए हर से (अर्थात् भागानुबन्ध में हर अंश का योग करके और भागापवाह में हर अंश का अन्तर करके) अंश को गुणा कर देना चाहिए । ऐसा करने से भागानुबन्ध और भागापवाह का फल सिद्ध होगा । जिसके नीचे हर न हो उसके नीचे एक हर मान लेना चाहिए। भिन्न गुणन-साधन में अंश-अंश का गुणन करना और हर-हर के गुणन से भाग देना चाहिए । इससे भिन्न का गुणन-फल प्राप्त होगा । (यथा $\frac{२}{७} \times \frac{३}{\ell}$ यहाँ २ और ३ अंश हैं और ७, ८ हर हैं, इनमें अंश-अंश से गुणा करने पर २ $\times$ ३ = ६ हुआ और हर-हर के गुणन से ७ $\times$ ८ = ५६ हुआ । फिर ६ $\div$ ५६ करने से $\frac{\xi}{\chi\xi}$ जिसे दो से काटने पर $\frac{३}{\ell}$ उत्तर हुआ) ॥१२१-२५॥ विद्वन् ! भिन्न-संख्या के भाग में भाजक के हर और अंश को परिवर्तित कर (हर को अंश और अंश को हर बनाकर) फिर भाज्य के हर-अंश के साथ गुणन-क्रिया करना चाहिए, इससे भागफल सिद्ध होता है । (यथा $\frac{२}{७} \div \frac{\chi}{\xi}$ में हर और अंश के परिवर्तन से $\frac{२}{७} \times \frac{\xi}{\chi} = \frac{१२}{३५}$ यही भागफल हुआ) ॥ भिन्नांक के वर्गादि-साधन में यदि वर्ग करना हो तो हर और अंश दोनों का वर्ग करे तथा घन करना हो तो दोनों का घन करे। इसी प्रकार वर्गमूल निकालना हो तो दोनों का वर्गमूल और घनमूल निकालना हो तो भी दोनों का घनमूल निकालना चाहिए। (यथा—$\frac{३}{७}$ का वर्ग $\frac{\rho}{\gamma\rho}$ और मूल होगा $\frac{३}{७}$, इसी प्रकार $\frac{३}{७}$ का घन और $\frac{२७}{३४३}$ मूल $\frac{३}{७}$ होगा) ॥१२६-२७॥ विलोमविधि से राशि जानने के लिए दृश्य में हर को गुणक, गुणक को हर, वर्ग को मूल, मूल को वर्ग, ऋण को धन और धन को ऋण बनाकर अन्त में उलटी क्रिया करने से राशि (इष्ट संख्या) प्राप्त होती है।