बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 399, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सनंदन उवाच ज्योतिषांगं प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ब्रह्मणा पुरा । यस्य विज्ञान मात्रेण धर्मसिद्धिर्भवेन्नृणाम् ॥१॥ त्रिस्कंधं ज्योतिषं शास्त्रं चतुर्लक्षमुदाहृतम् । गणितं जातकं विप्र संहितास्कंधसंज्ञिताः ॥२॥ गणिते परिकर्मादि खगमध्यस्फुटक्रिये । अनुयोगश्चंद्रसूर्यग्रहणं चोदयास्तकम् ॥३॥ छाया शृङ्गोन्नतिद्युती पातसाधनमीरितम् । जातके राशिभेदाश्च ग्रहयोनिश्च योनिजम् ॥४॥ निषेकजन्मारिष्टानि ह्यायुर्दायो दशाक्रमः । कर्माजीवं चाष्टवर्गो राजयोगाश्च नाभसाः ॥५॥ चन्द्रयोगाः प्रव्रज्याख्या राशिशीलं च दृक्फलम् । ग्रहभावफलं चैवाश्रययोगप्रकीर्णके ॥६॥ अनिष्टयोगाः स्त्रीजन्मफलं निर्याणमेव च । नष्टजन्मविधानां च तथा द्रेष्काणलक्षणम् ॥७॥ संहिताशास्त्ररूपं च ग्रहचारोऽब्दलक्षणम् । तिथिवारसनक्षत्रयोगतिथ्यर्द्धसंज्ञकाः ॥८॥
अध्याय ५४ ज्योतिष वर्णन
सनन्दन बोले—अब मैं ज्योतिष शास्त्र का वर्णन कर रहा हूँ जिसका वर्णन पहले ब्रह्मा ने स्वयं किया है। और जिसके ज्ञानमात्र से मनुष्यों को धर्मसिद्धि प्राप्त हो जाती है। ज्योतिष शास्त्र तीन स्कन्धोंवाला है और चार लाख श्लोकों में वर्णित है। गणित, जातक (होरा) और संहिता इसके तीन स्कन्ध हैं। गणित में परिकर्म¹ ग्रहों की चाल और स्फुट क्रिया का वर्णन है। अनुयोग (देश, दिशा और काल ज्ञान) चन्द्र और सूर्य ग्रहण, उदय, अस्त, छायाधिकार, चन्द्रशृङ्गोन्नति,² ग्रहयुति (ग्रहों का योग) तथा पात (महापात-सूर्यचन्द्रमा के क्रान्तिसाम्य) का साधन-प्रकार कहा गया है ॥१-३॥ जातकस्कन्ध में राशि भेद, ग्रहयोनि (ग्रहों की जाति, रूप और गुण आदि) वियोनिज (मानवेतर जन्म-फल), गर्भाधान, जन्म, अरिष्ट, आयुर्दाय, दशाक्रम, कर्माजीव (आजीविका), अष्टकवर्ग, राजयोग, नाभसयोग, चन्द्रयोग, प्रव्रज्यायोग, राशिशील, ग्रहदृष्टिफल, ग्रहों के भाव- फल, आश्रययोग, प्रकीर्ण, अनिष्टयोग, स्त्रीजातकफल, निर्याण (मृत्युविषयक विचार), नष्ट-जन्म-विधान (अज्ञात जन्म-काल को जानने का प्रकार) तथा द्रेष्काणों के (राशि के तृतीय भाग (१० अंश) को 'द्रेष्काण' संज्ञा है) स्वरूप—इन सब विषयों का बयान है ॥४-७॥ अब संहितास्कन्ध के स्वरूप का परिचय दिया जाता है। उसमें ग्रहचार (ग्रहों की गति), वर्षलक्षण, तिथि, दिन, नक्षत्र, योग, करण, मुहूर्त, उपग्रह, सूर्य-संक्रान्ति, ग्रहगोचर, चन्द्रमा और तारा
१. योग, अन्तर; गुणन, भजन, वर्ग, वर्गमूल, घन और घनमूल—ये परिकर्म कहे गये हैं। २. द्वितीया को चन्द्रोदय होता है, उसमें कभी चन्द्रमा का दक्षिण सींग और कभी उत्तर सींग (नोक) ऊपर को उठा रहता है, उसी को 'चन्द्रशृङ्गोन्नति' कहा गया है। ज्योतिष में उसके परिणाम का विचार किया गया है।