भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 398

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त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [पृष्ठ ३७६]


ऊदृदंतैयौंति रुक्ष्णुशीङ्स्नुक्षुश्विडीङ्श्विभिः। वृङ्वृञ्भ्यां च विनैकाचोऽजंतेषु निहताः स्मृताः ॥७७॥ शक्लप्च्मुच् रिच्वच् विच् सिच्प्रच्छित्यज् निजिर्भजः। भञ्जभुञ्ज्रस्ज्मस्जियज्युरुज्रजञ्- विजिर्स्वजिसञ्जसृजः ॥७८॥ अद्क्षुद्खिद्छिद्तुद्नुदः पद्यभिद्विद्यतिविन्द। शद्सदी स्विद्यतिस्कन्दिर्ह्रदी क्रुधक्षुधि- बुध्वती ॥७९॥ बंधिर्युधिरथोराधिर्व्यधशुधः साधिसिध्यतौ। मन्यहन्नाप्क्षिपूक्षुपिप्तप्तिप्तृप्यतिदृप्यतौ ॥८०॥ लिब्लुब्वप्शप्स्वप्स्पियरभरभलभगम्नम् यमो रमिः। कुशिर्दशिदिशि दृश्मृश्रिश्रूशलिश- विश्सृशः कृषिः ॥८१॥ त्विष्तुष्दुष्पुष्विष्विशूशिष्शुष्श्लिष्यतयो घसिः। वसतिर्दह् दिहिद्रुहो नह्मिह् रुह्लिह्- वहिस्तथा ॥८२॥ अनुदात्ता हलंतेषु धातवो द्व्यधिकं शतम्। चाद्या निपाता गतयः प्राद्याः दिग्देशकालजाः ॥८३॥ शब्दाः प्रोक्ता ह्यनेकार्थाः सर्वलिंगा अपि द्विज। गणपाठः सूत्रपाठो धातुपाठस्तथैव च ॥८४॥ पाठोऽनुनासिकानां च परायणमिहोच्यते। शब्दाः सिद्धा वैदिकास्तु लौकिकाश्चापि नारद ॥८५॥ शब्दपरायणं तस्मात्कारणं शब्दसंग्रहे। लघुमार्गेण शब्दानां साधूनां संनिरूपणम् ॥८६॥ प्रकृतिप्रत्ययादेशलोपागममुखैः कृतम्। इत्थमेतत्सम्आख्यातं निरुक्तं किंचिदेव ते कार्त्स्न्येन वक्तुमानंत्यात्कोऽपि शक्तो न नारद ॥८७॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे निरुक्तलक्षणनिरूपणं नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५३॥


हिन्दी अनुवाद

अजन्त धातुओं में जकारान्त, ऋकारान्त, यु, रु क्ष्ण, शीङ्, स्नु, नु, क्षु, श्वि, डीङ्, श्वि, वृङ्, वृञ् इनको छोड़कर शेष धातु, अनुदात्तेत् हैं ॥७७॥ ककारान्तों में शक्, चकारान्तों में पच्, मुच्, रिच, वच्, विच्, सिच्, छान्त में केवल प्रच्छ, जान्तों में त्यज्, निज्, भज्, भञ्ज्, भुज्, भ्रस्ज्, मस्ज्, यज्, युज्, रुज्, रञ्ज, विजिर्, स्वञ्जि, सञ्ज और सृज्, ॥७८॥ दान्तों में अद्, क्षुद्, खिद्, छिद्, तुद्, नुद्, पद्, भिद्, विद् (सत्ता) विद्, (विचारणी) शद्, सद्, स्विद्, स्कन्दिर्, ह्दी; धान्तों में क्रुध्, क्षुध्, बुध् ॥७९॥ बन्ध्, युध्, रुध्, राध् व्यध्, शुध्, साधि, सिध्; नान्तों में मन्, हन्; पान्तधातुओं में आप्, क्षुप्, क्षिप्, तप्, तिप्, तृप्, दृप्, ॥८०॥ लिप्, लुप्, वप्, शप्, स्वप्, सृपि; भान्तों में यभ्, लभ्; मान्तों में गम्, नम्, यम्; शान्तधातुओं में, कृशि, दंश्, दिश्, मृश्, रिश्, रुश्, लिश, विश्, स्पृश; षान्तों में कृष्, त्विष्, तुष्, द्विष्, दुष्, पुष, विष, विष्, शिष्, श्लिष्, सान्तों में घस्, वस्; हान्तों में ह, दिह्, ह, दुह्, नह्, मिह्, रुह्, लिह, तथा वह् ॥८१-८२॥ हलन्तों में इतने एक सौ दो धातु अनुदात्त हैं। 'च' आदि की निपात संज्ञा होती है। 'प्र' आदि उपसर्ग 'गति' कहलाते हैं। भिन्न-भिन्न दिशा, देश और काल में प्रकट हुए शब्द अनेक अर्थों के बोधक होते हैं। विप्रवर ! वे देश कालों के भेद से सब स्त्री- लिंगों में प्रयुक्त होते हैं। गणपाठ, सूत्रपाठ, धातुपाठ और अनुनासिकों का पाठ यहाँ आवृत्ति-रूप में कहा गया हैं ॥८३-८४॥ नारद ! वैदिक और लौकिक सभी शब्द नित्य सिद्ध हैं। इसलिए ऐसे सिद्ध (बने बनाये) शब्दों के ज्ञान के लिए पारायण पाठ आवश्यक है ॥८५॥ सिद्ध शब्दों का ही प्रकृति, प्रत्यय, आदेश और आगम आदि के द्वारा लघुमार्ग से सम्यक् निरूपण किया जाता है। नारद ! इस प्रकार यहाँ सूक्ष्म रूप में शब्दों की निरुक्ति कही गई है। इसका पूर्ण रूप से वर्णन तो कोई नहीं कर सकता; क्योंकि शब्द अनन्त हैं ॥८६-८८॥

श्रीनारदीयमहापुराण में तिरपनवां अध्याय समाप्त ॥५३॥