भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 396

त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३७७ स्वरितेद्धै भृञाख्यात उदात्तेद्वाक् प्रकीर्तितः । माङ्-हाङ्द्धावनुदात्तेतौ स्वरितेद्धानधातुषु ॥४६॥ वाणिजिराग्यास्त्रयश्चापि स्वरितेत उदाहृताः । घुमुखा द्वादश तथा परस्मैपदिनो मताः ॥४७॥ द्वाविंशतिरिहोद्दिष्टा धातवो ह्वादिके गणे । परस्मैपदिनः प्रोक्ता दिवाद्याः पंचविंशतिः ॥४८॥ आत्मनेपदिनौ धातू पूङ्-डूङ्द्धावपि नारद । ओदितः पूङ्मुखाः सप्त आत्मनेपदिनो मताः ॥४६॥ आत्मनेपदिनो विप्र दीङ्मुखास्त्विह कीर्तिताः । स्यतिप्रभृतयो वेदाः परस्मैपदिनो मताः ॥५०॥ जन्यादयः पंचदश आत्मनेपदिनो मुने । मृषाद्याः स्वरितेतस्तु धातवः पंच कीर्तिताः ॥५१॥ एकादश पदाद्यास्तु ह्यात्मनेपदिनो मताः । राधोः कर्मक एवात्र वृद्धौ स्वादिचुरादिके ॥५२॥ उदात्तेतस्तुदाद्यास्तु त्रयोदश समीरिताः । परस्मैपदिनोऽष्टात्र रधाद्याःपरिकीर्तिताः ॥५३॥ समाद्याश्चाप्युदात्तेतः षट्चत्वारिंशदुदीरिताः । चत्वारिंशच्छतं चापि दिवाद्यौ धातवो मताः ॥५४॥ स्वाद्यः स्वरितेत्तोका धातवः परिकीर्तिताः । सप्ताख्यातो दुनोतिस्तु परस्मैपदिनो मुने ॥५५॥ अष्टिधावनुदात्तेतौ धातू द्वौ परिकीर्तितौ । परस्मैपदिनस्त्वत्र तिकाद्यास्तु चतुर्दश ॥५६॥ द्वाविंशद्वातवः प्रोक्ता विप्रेन्द्र स्वादिके गणे । स्वरितेतः षडाख्यातास्तुदाद्या मुनिसत्तम ॥५७॥ ऋष्युदात्तेञ्जुषीपूर्वा आत्मनेपदिनोर्णवाः । व्रश्चादय उदात्तेतः प्रोक्ताः पंचाधिकं शतम् ॥५८॥ गूर्युदात्तेदिहोद्दिष्टो धातुरेको मुनीश्वर । णूमूखाश्चैव चत्वारः परस्मैपदिनो मताः ॥५६॥ कुडाख्यातोऽनुदात्तेच्च कुटाद्याः पूतिमागताः । पृङ् मृङ् चात्मनेभावौ षट् परस्मैपदे रिषेः ॥६०॥ आत्मनेपदिनौ धातू दृङ्घूङ्द्धौ चाप्युदाहृतौ । प्रच्छादिषोडशाख्याताः परस्मैपदिनो मुने ॥६१॥ स्वरितेतः षट् ततश्च प्रोक्ता मिलमुखा मुने । कृतीप्रभृतयश्चापि परस्मैपदिनस्त्रयः ॥६२॥ धातुयें अनुदात्तेत् हैं स्वरितेत् धातुओं से आनच् प्रत्यय होता है ॥४६॥ णिजिर् आदि तीनों धातु स्वरितेत् हैं । घू आदि बारह धातु परस्मैपदी है ॥४७॥ जुहोत्यादि गण में बाईस धातुयें हैं । दिव् आदि पचीस धातु परस्मैपदी हैं ॥४८॥ नारद ! पूङ् और डूङ् दोनों आत्मनेपदी धातु धातु हैं । पूङ् आदि सात ओदित धातु आत्मपदी हैं ॥४६॥ विप्र ! दीङ् प्रभृति धातु आत्मनेपदी हैं । षो आदि चार धातु परस्मैपदी हैं ॥५०॥ मुने ! जनी आदि पन्द्रह धातु आत्मनेपदी हैं । मृष् आदि पांच धातु स्वरितेत् हैं ॥५१॥ पद् आदि ग्यारह धातु आत्मनेपदी हैं । अकर्मक राध् धातु से वृद्धि अर्थ में श्यन् प्रत्यय होता है । यह स्वादि और चुरादि भी है ॥५२॥ तुद् आदि तेरह धातु उदात्तेत् हैं । रध् आदि आठ धातु परस्मैपदी हैं ॥५३॥ सम् आदि छियालीस धातु उदात्तेत् हैं । दिवादि गण में एक सौ चालीस धातु हैं ॥५४॥ सु आदि नव धातु स्वरितेत् हैं । मुने ! दु आदि सात धातु परस्मैपदी हैं ॥५५॥ अश् और टिघ् धातु अनुदात्तेत् हैं । तिक् आदि चौदह धातु परस्मैपदी हैं ॥५६॥ विप्रेन्द्र ! स्वादि गण में बत्तीस धातु हैं । मुनिवर्य ! तुद् आदि छः धातु स्वरितेत् हैं ॥५७॥ ऋषि धातु उदात्तेत् है और जुष् आदि चार धातु आत्मनेपदी हैं । व्रश्च् आदि एक सौ पाँच धातु उदात्तेत् हैं ॥५८॥ मुनीश्वर ! केवल गुरी धातु उदात्तेत् है । णू आदि चार धातु परस्मैपदी हैं ॥५६॥ कुङ् अनुदात्तेत् है कुट् भी अनुदात्तेत् ही है । पृङ् मृङ् आत्मनेपदी तथा रि और पि आदि छः परस्मैपदी हैं ॥६०॥ हङ् और घूङ् दो धातु आत्मनेपदी हैं । मुने ! प्रच्छ आदि सोलह धातु परस्मैपदी हैं ॥६१॥ मुने ! इसके अनन्तर मिल् आदि सोलह धातु स्वरितेत् हैं । कृत् आदि तीन धातु परस्मैपदी हैं । तुदादि गण में एक सौ सत्तावन धातु हैं ॥६२॥ ४८ ना० पु०