बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३७० नारदीयपुराणम् अपरश्चतुरोऽप्येतद्यावत्ताक्तिकमसौ द्वयम् । युष्मदस्मच्च प्रथमश्चरमोऽल्पस्तथार्धकः ॥४८॥ नोरः कतिपयो द्वे च त्रयो शुद्ध्रादयस्तथा । स्वेकाभुविरोधपरि विपर्ययश्चाव्ययास्तथा ॥५०॥ तद्धिताश्चाप्यपत्यार्थं पांडवाः श्रैधरस्तथा । गार्ग्यो नाडायनात्रेयौ गांगेयः पैतृष्वसीयः ॥५१॥ देवतार्थे चेदमर्थे ह्येन्द्र ब्राह्मो हविर्बली । क्रियायुजोः कर्मकत्र्तोर्धौरेयः कौङ्कुमं तथा ॥५२॥ भवाद्यर्थे तु कानीनः क्षत्रियो वैदिकः स्वकः । स्वार्थे चौरस्तु तुल्यार्थे चंद्रवन्मुखमीक्षते ॥५३॥ ब्राह्मणत्वं ब्राह्मणता भावे ब्राह्मण्यमेव च । गोमान्धनी च धनवानस्त्यर्थे प्रमितौ कियान् ॥५४॥ जातार्थे तुंदिलः श्रद्धालु रौन्नत्ये तु दंतुरः । स्रग्वी तपस्वी मेधावी मायाव्यस्त्यर्थ एव च ॥५५॥ वाचाटो वाचालश्चैव बहुकुत्सितभाषिणि । ईषदपरिसमाप्तौ कल्पब्देशीय एव च ॥५६॥ कविकल्पः कविदेश्यः प्रकारवचने तथा । पटुजातीयः कुत्सायां वैद्यपाशः प्रशंसने ॥५७॥ वैद्यरूपो भूतपूर्वे मतो दृष्टचरो मुने । प्राचुर्यादिष्वन्नमयो मृण्मयः स्त्रीमयस्तथा ॥५८॥ जातार्थे लज्जितोऽत्यर्थं श्रेयाञ्श्रेष्ठश्च नारद । कृष्णतरः शुक्लमः किम् आख्यानतोऽव्ययान् ॥५९॥ किंतरां चैवातितरामभिद्युच्चैस्तरामपि । परिमाणे जानुदघ्नं जानुद्वयसमित्यपि ॥६०॥ जानुमात्रं च निर्धार बहुनां व द्वयोः क्रमात् । कतमः कतरः संख्येयविशेषावधारणे ॥६१॥ द्वितीयश्च तृतीयश्च चतुर्थः षष्ठपंचमौ । एकादशः कतिपयः कतिथः कति नारद ॥६२॥ के समान हो हैं। प्रथम, चरम, तय, अल्प, अर्ध, कतिपय और नेम--इन शब्दों के प्रथमा के बहुवचन में दो रूप होते हैं। स्वरादि और निपात तथा उपसर्ग, विभक्ति एवं स्वर के प्रतिरूपक शब्द अव्ययसंज्ञक होते हैं ॥४७-५०॥ तद्धित के उदाहरण ये हैं-पांडवाः श्रैधरः, गार्ग्यः, नाडायनः, आत्रेयः, गांगेयः, पैतृष्वस्त्रीयः। देवता अर्थ में, इदम् अर्थ में ऐन्द्र और ब्राह्म शब्द बनते हैं। क्रिया से युक्त रहने वाले कर्म और कर्त्ता में तद्धित प्रत्यय होते हैं, जैसे धौरेय और कौङ्कुम । भवादि अर्थ में कानीन, क्षत्रिय, और वैदिक निष्पन्न होते हैं। स्वकः में स्वार्थ में कन् प्रत्यय हुआ है। चौर में भी स्वार्थ में ही अ प्रत्यय हुआ है। तुल्यार्थ में चन्द्रवन् मुखमीक्षते में वत् प्रत्यय है। ब्राह्मणत्व, ब्राह्मणता, ब्राह्मण्य यहीं भाव में प्रत्यय हैं। गोमान्, धनी और धनवान् में अस्त्यर्थ में प्रत्यय हुआ है। प्रमिति अर्थ में कियान् शब्द बनता है। जातार्थ में ही तुन्दिलः, श्रद्धालुः बनते हैं। औन्नत्यार्थ में दन्तुर होता है। स्रग्वी, तपस्वी, मेधावी और मायावी अस्त्यर्थ में ही होते हैं। अधिक और अनापशनाप बकने वाले के अर्थ में वाचाल और वाचाट बनते हैं। अल्प और असमाप्ति के अर्थ में कल्पप्, देश्य तथा देशीय प्रत्यय होते हैं। कविकल्पः, कविदेश्यः इसके उदाहरण हैं। प्रकार वचन में पटुजातीयः, कुत्सा में वैद्यपाशः, प्रशंसा अर्थ में वैद्यरूपः प्रयोग बनता है। मुने ! भूतपूर्वे इस अर्थ में दृष्टचर होता है। प्राचुर्य आदि अर्थ में अन्नमय, मृण्मय और स्त्रीमय होता है। नारद ! जातार्थ में लज्जित, अत्यर्थ में श्रेयान् ओर श्रेष्ठ बनता है। इसी प्रकार अपेक्षाकृत अधिक अर्थ में कृष्णतर तथा शुक्लम प्रयोग होते हैं। किम्, क्रियावाचक शब्द (तिङन्त) और अव्यय से परे जो तर और तम प्रत्यय हैं, उनके अन्त में आम् लग जाता है। उदाहरण के लिए किन्तराम्, अतितराम् तथा उच्चैस्तराम् आदि प्रयोग हैं ॥५१-५६३॥ प्रमाण में जानुदघ्नम्, जानुद्वयसम् और जानुमात्रम् बनता है। बहुतों में से एक का निर्धारण करने और दो में से एक का निर्धारण करने में कतमः कतरः बनता है। नारद ! संख्येय विशेष के निश्चय में द्वितीयः तृतीयः, चतुर्थः, षष्ठः, पंचम, एकादशः, कतिपयः, कतिथः, कति, विंशः, विंशतितमः और शततमः बनते हैं।