बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६२ | नारदीयपुराणम् पितृमातृपराश्चैव ब्राह्मणाः श्राद्धसंपदः । रोगी न्यूनातिरिक्तांगः काणः पौनर्भवस्तथा ॥११०६॥ अवकीर्णी कुंडगोलो कुनखी श्यावदंतकः । भृतकाध्यापकः क्लीबः कन्यादूष्यभिशस्तकः ॥११०७॥ मित्रधुक् पिशुनः सोमविक्रयी परिविन्दकः । मातृपितृगुरुत्यागी कुंडाशी वृषलात्मजः ॥११०८॥ परिपूर्वापतिः स्तेनः कर्मभ्रष्टाश्च निंदिताः । निमंत्रयीत पूर्वेद्युर्ब्राह्मणान्नात्मवान् शुचिः ॥११०८½॥ तैश्चापि संयतैर्भाव्यं मनोवाक्कायकर्मभिः । अपराह्ने समभ्यर्च्य स्वागतेनागतांस्तु तान् ॥१११०॥ पवित्रपाणिराचांतानासने चोपवेशयेत् । विप्रान्दैवे यथाशक्ति पित्र्येऽयुग्मांस्तथैव च ॥११११॥ पराश्रिते शुचौ देशे दक्षिणाप्रवणं तथा । द्वौ दैवे प्राक् त्रयः पित्र्ये उदगैकैकमेव च ॥१११२॥ मातामहानामप्येवं तत्र वा वैश्वदैविकम् । पाणिप्रक्षालनं दत्त्वा विष्टरार्थं कुशानपि ॥१११३॥ आवाहयेदनुज्ञातो विश्वेदेवास इत्यृचा । यवैरन्वावकीर्याथ भाजने सपवित्रके ॥१११४॥ शन्नो देव्या अपः क्षिप्त्वा यवोऽसीति यवांस्तथा । या दिव्या इति मंत्रेण हस्ते पाद्यं विनिक्षिपेत् ॥१११५॥ दत्त्वोदकं गंधमाल्यं प्रदायान्नं सदीपकम् । अपसव्यं ततः कृत्वा पितॄणां सप्रदक्षिणम् ॥१११६॥ द्विगुणांस्तु कुशान्दत्त्वा ह्यु शंतस्त्वेत्यृचा पितॄन् । आवाह्य तदनुज्ञातो जपेदायंतु नस्ततः ॥१११७॥ रोगी, न्यून और अतिरिक्त अंग वाले, काना, पौनर्भव, अवकीर्णी (क्षतव्रत) कुण्ड, गोलक, कुनखी, श्यावदन्तक (काले दाँत वाले), भृतकाध्यापक (घर पर पैसे लेकर पढ़ाने वाले), नपुंसक, कन्या दूषक, अभिशस्तक (जिस पर व्यभिचार का दोषारोप हो), मित्रद्रोही, चुगलखोर, सोमविक्रयी, परिविन्दक (बड़े भाई के अविवाहित रहते हुए विवाह करने वाला छोटा भाई) माता-पिता और गुरु का त्याग करने वाला, कुण्ड¹ का अन्न खाने वाला, वृषल का पुत्र, पूर्व पति को छोड़कर आयी स्त्री से विवाह करने वाला, चोर और कर्मभ्रष्ट ये यज्ञ में निन्दित हैं ॥११०६-१०८½॥ श्राद्ध में एक दिन पहले ही आत्मज्ञ पवित्र श्राद्धकर्ता ब्राह्मणों को निमन्त्रण दे दे । वे निमन्त्रित ब्राह्मण भी मन, वाणी और कर्म से संयमी हों । अपराह्न काल में स्वागतपूर्वक उन आगत ब्राह्मणों को आचमन करने के बाद यजमान, पवित्र पाणि होकर आसन पर बैठावे । देव कार्य में युग्म ब्राह्मणों और पितर कार्य में यथा- शक्ति अयुग्म (विषम संख्या) ब्राह्मणों को निमंत्रित करना चाहिए ॥११०९-११११॥ सब ओर से घिरे हुए पवित्र स्थान में, दक्षिण दिशा की ओर नीची भूमि में श्राद्ध करना चाहिए । वैश्वदेव श्राद्ध में दो ब्राह्मणों को पूर्वाभिमुख और पितृ कार्य में तीन ब्राह्मणों को उत्तराभिमुख अथवा दोनों में एक-एक ब्राह्मण को ही सम्मिलित करे । इसी प्रकार मातामह के श्राद्ध और वैश्वदेव कर्म में करना उचित है । हस्त प्रक्षालन के लिए जल देकर विष्टर के लिए कुश देना चाहिए ॥१११२-११३॥ पुनः आज्ञा लेकर 'विश्वेदेवास...' इस ऋचा से आवाहन करे । पहले यव छोड़कर पवित्रक युक्त पात्र में 'शन्नो देव्या...., इस मन्त्र से जल छोड़े 'यवोऽसि'... इस मन्त्र से यव बिखेरे । 'या दिव्या आपः' इस मन्त्र से हाथ में पाद्य के लिए जल दे ॥१११४-११५॥ जल, गन्ध, माला और अन्न देकर दीपक दिखावे । तत्पश्चात् अपसव्य होकर बिना प्रदक्षिणा किये दो कुश आसन के लिए बिछाकर 'उशन्त...' इस ऋचा से पितरों का आवाहन कर उनसे आवाहित ब्राह्मण से आज्ञा लेकर 'आयन्तु नः पितर...' इस मन्त्र का जप करे । यव के स्थान पर पितृ कर्म में तिल का प्रयोग करना चाहिए, अर्घ्य आदि पूर्व की ही भाँति दे। १. अपने पति के रहते दूसरे पति से उत्पन्न किया हुआ पुत्र ।