बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 380, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३६१ ग्रहाधीना नरेन्द्राणां धनजात्युच्छ्रयास्तथा । भावाभावौ च जगतस्तस्मात्पूज्यतमा ग्रहाः ॥९२॥ आदित्यस्य सदा पूजा तिलक स्वामीनस्तथा । महागणपतेश्चैव कुर्वन्सिद्धिमवाप्नुयात् ॥९३॥ कर्मणा सफलत्वं च श्रियं वाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥९४॥ अकृत्वा मातृयागं तु यो ग्रहार्था समारभेत् । कुप्यंति मातरस्तस्य प्रत्यूहं कुर्वते तथा ॥९५॥ वसोः पवित्रमंत्रेण वसोद्धारां प्रकल्प्य च । गोर्याद्या मातरः पूज्या मांगल्पेषु शुभार्थिभिः ॥९६॥ गौरी पद्मा शची मेधा सावित्री विजया जया । देवसेना स्वधा स्वाहा मातृका वैघृतिर्धृतिः ॥९७॥ पुष्टिस्तुष्टिरस्तथा तुष्टिरात्मदेवतया सह । गणेशेनाधिका ह्येता वृद्धौ पूज्यास्तु षोडश ॥९८॥ आवाहनं तथा पाद्यमर्घ्यं स्नानं च चंदनम् । अक्षतांश्चैव पुष्पाणि धूपं दीपं फलानि च ॥९६॥ नैवेद्याचमनीयं च तांबूलं पूगमेव च । नीराजनं दक्षिणां च क्रमाद्दद्याच्च तुष्टये ॥१००॥ पितृकल्पं प्रवक्ष्यामि धनसंततिवर्द्धनम् । अमावश्याष्टका वृद्धिः कृष्णपक्षायनद्वयम् ॥१०१॥ द्रव्यं ब्राह्मणसंपत्तिविषुवत्सूर्यसंक्रमः । व्यतीपातो गजच्छाया ग्रहणं चंद्रसूर्ययोः ॥१०२॥ श्राद्धं प्रतिरुचिश्चैव श्राद्धकालाः प्रकीर्तिताः । अग्र्याः सर्वेषु वेदेषु श्रोत्रियो ब्रह्मविद्युवा ॥१०३॥ वेदार्थविज्ज्येष्ठसामा त्रिमधुस्त्रिसपर्णकः । स्वस्त्रीय ऋत्विग्जामाता याज्यश्वशुरमातुलाः ॥१०४॥ त्रिणाचिकेत दौहित्रशिष्यसंबंधिबांधवाः । कर्मनिष्ठास्तपोनिष्ठाः पंचाग्निब्रह्मचारिणः ॥१०५॥
राज्य की प्राप्ति और नाश यथा जगत् की जन्म-मृत्यु भी सब ग्रहों के ही अधीन है। इसलिए ग्रह सबसे अधिक पूज्य हैं ॥९२॥ सर्वदा सूर्य की पूजा महागणपति और स्वामी (स्कन्ध) की पूजा और तिलक अथवा सेवा करने से सिद्धि, कार्यों में सफलता और उत्तम श्री प्राप्त होती है। जो व्यक्ति मातृयोग के बिना ग्रह पूजा प्रारम्भ करता है उसके ऊपर मातृकाएं कुपित हो जाती हैं और विघ्न बाधायें करती हैं ॥९३-९५॥ इसलिये 'वसो पवित्र' इस मन्त्र से वसुधारा की क्रिया कर शुभाकांक्षी जन शुभ कार्यों में गौरी आदि माताओं की पूजा करें ॥९६॥ जो गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, मातृकाएँ, वैधृति, धृति, पुष्टि, हृष्टि, तुष्टि इन सोलह माताओं की अपनी कुल देवी तथा गणेश के सहित पूजा करता है उसकी श्री वृद्धि होती है। इनका आवाहन करने के अनन्तर पाद्य-अर्घ्य और स्नान के लिए जल देना चाहिए फिर चन्दन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, फल, गुड़ अर्पित कर आचमन, ताम्बूल, पुंगी-फल, नीराजन और दक्षिणा देनी चाहिए ॥९७-१००॥ अब धन और वंश की वृद्धि करने वाले पितृकल्प को कह रहा हूँ। अमावस्या, अष्टका, वृद्धि, कृष्णपक्ष, दोनों अयनों के आरंभ का दिन, श्राद्धीय द्रव्य की उपस्थिति, उत्तम ब्राह्मण की प्राप्ति, विषुवत् योग, सूर्य की संक्रांति, व्यतोपात योग, गजच्छाया, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण तथा श्राद्ध के लिए रुचि का होना—ये सभी श्राद्ध के समय अथवा अवसर कहे गए हैं। सब वेदों में अग्रणी, श्रोत्रीय, ब्रह्मज्ञानी युवक, वेदार्थज्ञ, ज्येष्ठ साम का गायक, त्रिमधु, १ त्रिसुपर्ण २ भानजा, ऋत्विक्, जामाता, यजमान, श्वशुर, मामा, त्रिणाचिकेत ३ कन्या का पुत्र (नाती) ४ शिष्य, संबन्धी, बान्धव, कर्मनिष्ठ, तपोनिष्ठ, पंचाग्नि-सेवी ५ ब्रह्मचारी ओर पिता-माता के भक्त ब्राह्मण श्राद्ध की सम्पत्ति माने गये हैं ॥१०१-१०५॥
१. 'मधुवाता' इत्यादि तीन ऋचाओं का जप और तदनुकूल व्रत का आचरण करने वाला । २. त्रिसौपर्णी ऋचाओं का अध्येता और तत्सम्बन्धी व्रत का पालन करने वाला । ३. त्रिणाचिकेतसंज्ञक त्रिविध अग्निविद्या को जानने वाला और तदनुकूल व्रत का पालक । ४. सभ्य, आवसथ्य तथा त्रिणाचिकेत--इन पांच अग्नियों का उपासक । ४६ ना० पु०