बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६० नारदीयपुराणम् उपस्थाय शिवां दुर्गामुपतिमथार्चयेत् । धूपदीपैश्च नैवेद्यैर्गन्धमाल्यानुलेपनेः ॥७७॥ ततः शुक्लाम्बरधरः शुक्लमाल्यानुलेपनः । ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्वस्त्रयुग्मं गुरोरपि ॥७८॥ एवं विनायकं पूज्य ग्रहाँश्चैव प्रपूजयेत् । श्रीकामः शांतिकामो वा पुष्टिवृद्धयायुवीर्यवान् ॥७६॥ सूर्य्यः सोमो महीपुत्रो बुधो जीवो भृगुः शनिः । राहुकेतू नवायते स्थापनीया ग्रहाः क्रमात् ॥८०॥ ताम्रकाद्रजताद्रक्तचंदनात्स्वर्णकादपि । हेम्नो रजतादयसः सीसात्कार्या शुभाप्तये ॥८१॥ स्ववर्णैर्वा पटे लेख्या गंधेमंडलिकेषु च । यथावर्णं प्रदेयानि वासांसि कुसुमानि च ॥८२॥ गंधाश्च बलयश्चैव धूपो देयश्च गुग्गुलुः । कर्तव्या मंत्रवंतश्च चरवः प्रतिदेवतम् ॥८३॥ आकृष्णेन इमं देवा अग्निमूर्द्धादिवः ककुत् । उद्वुध्यस्वाग्नि यदर्यर्णस्तथैवान्नात्परिस्रुतः ॥८४॥ शन्नोदेवीस्तथा कांडात्केतुं कृण्वन्नकेतवः ॥८५॥ अर्कः पलाशः खदिरस्त्वपामार्गोऽथपिप्पलः । उदुंबरः शमी दूर्वा कुशाश्च समिधः क्रमात् ॥८६॥ एकैकस्मादष्टशत मष्टाविंशतिरेव च । होतव्या मधुसर्पिभ्यां दध्ना क्षीरेण वा पुनः ॥८७॥ गुडौदनं पायसं च हविष्यंक्षीरषाष्टिकम् । दध्योदनं हविश्चूर्णं माषं चित्रान्नमेव च ॥८८॥ दद्याद्ग्रहक्रमादेतद्विद्वेजेभ्यो भोजनं बुधः । शक्तितोऽपि यथा लाभं सत्कृत्य विधिपूर्वकम् ॥८६॥ धेनुः शंखस्तथाऽनडुवान्हिमवासो हयः क्रमात् । कृष्णा गौरायसं छाग एता वै दक्षिणाः स्मृताः ॥६०॥ यस्य यस्य तु यद्द्रव्यं पलेनार्च्यः स तेन च । ब्रह्मणैषां वरो दत्तः पूजिताः पूजयिष्यथ ॥६१॥ अनुलेपन से भगवान् शंकर की पूजा करे। तत्पश्चात् शुक्ल वस्त्र, श्वेतमाल और अनुलेपन धारण करके ब्राह्मणों को भोजन कराकर गुरु को एक जोड़ा वस्त्र दे। इस प्रकार विनायक की पूजा करने के अनन्तर श्री, शान्ति, पुष्टि, वृद्धि तथा आयु चाहने वाला पराक्रमी व्यक्ति नवग्रहों की पूजा करे। सूर्य, सोम, मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु इन नवग्रहों की क्रमशः ताँबा, चाँदी, लाल चन्दन, स्वर्ण, हेम, रजत, लोह और सीसे की मूर्ति बनावे ॥७३-८१॥ अथवा किसी वस्त्रपर सुवर्ण अथवा गंध से मण्डल बनाकर उनमें ग्रहों की आकृति बनावे। प्रत्येक ग्रहों के वर्ण के अनुसार वस्त्र, पुष्प, गन्ध, बलय, धूप और गुग्गुल चढ़ावें और प्रति देव- ताओं के मन्त्र के अनुसार चरु प्रदान करे ॥८२-८३॥ इन ग्रहों के मन्त्र इस प्रकार हैं 'आकृष्णेन रजसा' इत्यादि मन्त्र सूर्य का' 'इमं देवा' इत्यादि मन्त्र सोम का, 'अग्निमूर्द्धा दिवः ककुत्' इत्यादि मन्त्र मंगल का 'उद्बुध्यस्व' इत्यादि मन्त्र बुध का, 'बृहस्पते अतियदर्य' इत्यादि मन्त्र वृहस्पति का 'अन्नात्परि स्रुतः' इत्यादि मन्त्र शुक्र का, शन्नो देवी 'इत्यादि मन्त्र शनि का, कांडात् इत्यादि मन्त्र राहु का, 'केतुं कृण्वन्नकेतवः' इत्यादि मन्त्र केतु का है। अर्क, पलाश, खैर, चिंचिड़ा (अपामार्ग), पीपल, गूलर, शमी, दुर्वा और कुश ये क्रमशः सूर्यादि की समिधायें हैं । ॥८४-८६॥ एक-एक से एक सो आठ बार अथवा अट्ठाईस बार मधु, घी, दही, दूध आदि से हवन करना चाहिए। पुनः क्रमशः नव ग्रहों को गुड़ मिला चावल, पायस, हविष्य, दूध मिला हुआ साठी के चावल का भात, दही भात, घी भात, तिल चूर्ण मिश्रित भात, उड़द युक्त भात, और चित्रान्न (खिचड़ी) ये वस्तुएँ ग्रह के क्रमानुसार विद्वान् व्यक्ति शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन के लिये दे, और अपनी आय के अनुसार विधिपूर्वक उनका सत्कार करके क्रमशः धेनु, शंख, बैल, सोना, वस्त्र, अश्व, काली गाय, लोहा और बकरी की दक्षिणा सूर्यादिग्रह के लिये दे ॥८७-९०॥ जिस ग्रह के लिए जो द्रव्य विहित है उसका एक पल परिमाण लेकर पूजा करनी चाहिए। ब्रह्मा ने इन ग्रहों को वर दिया है कि जो तुम्हारी पूजा करे उनकी तुम भी पूजा (मनोरथपूर्ति) करना ॥६१॥ राजाओं का विभव, वंश-वृद्धि,