बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३५६ गौरसर्षपकल्केन स्वस्ति वाच्या द्विजैः शुभाः ॥६३॥ अश्वस्थानाद्गजस्थानाद्वल्मीकात्संगमाद्ध्रदात् । मृत्तिकां रोचनां गंधान् गुग्गुलं चाशु निक्षिपेत् ॥६४॥ पाल्याहृता ह्येकवर्णैश्चतुर्भिः कलशैर्हदात् । चर्मण्यानुडुहे रक्ते स्थाप्यं भद्रासनं ततः ॥६५॥ सहस्राक्षं शतधारमृषिभिः पावनं कृतम् । तेन त्वामभिषिञ्चामि पावमान्याः पुनंतु ते ॥६६॥ भगं ते वरुणो राजा भगं सूर्यो बृहस्पतिः । भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो ददुः ॥६७॥ यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमंते यच्च मूर्द्धनि । ललाटे कर्णयोरक्ष्णोरापस्तुदंतु सर्वदा ॥६८॥ स्नानस्य सार्षपं तैलं स्रुवेणौदुम्बरेण तु । जुहुयान्मूर्द्धनि कुशान्सव्येन परिगृह्य च ॥६९॥ मितश्च संमितश्चैव तथा शालकटंकटौ । कूष्माण्डो राजपुत्रश्चेत्यंते स्वाहासमन्वितैः ॥७०॥ नामभिर्बलिमंत्रैश्च नमस्कारसमन्वितैः । दद्याच्चतुष्पथे सूर्ये कुशानास्तीर्य सर्वतः ॥७१॥ कृता कृलांस्तंडुलींश्च पललौदनमेव च । मत्स्यान्पक्वांस्तथैवामांन्मांसमेतावदेव तु ॥७२॥ पुष्पं चित्रं सुगंधं च सुरांच विविधांमपि । मूलकं पूरिकापूपांस्तथैवोल्लण्डजोपि च ॥७३॥ दध्यन्नं पायसं चैव गुडपिष्टं समोदकम् । एतान्सर्वानुपाहृत्य भूमौ कृत्वा ततः शिरः ॥७४॥ विनायकस्य जननीमुपतिष्ठेत्ततोऽम्बिकाम् । दूर्वासर्षपपुष्पाणां दत्त्वाध्यं पूर्णमञ्जलिम् ॥७५॥ रूपं देहि यशो देहि भगं भगवति देहि मे । पुत्रांन्देहि धनं देहि सर्वान्कामांश्च देहि मे ॥७६॥
ऐसे व्यक्ति को, जिसके ऊपर गणेश का कोप हो गया हो, किसी पुण्य तिथि के दिन विधिपूर्वक अभिषेक करना चाहिए। पहले उसके शरीर पर श्वेत सरसों का उबटन लगाना चाहिए। उस समय ब्राह्मण स्वस्ति पाठ करें ॥६३॥ अश्वशाला, गजशाला, वल्मीक (बाँबी), नदीसंगम (अथवा चौराहा) और तालाब की मिट्टी लाकर उसमें रोचन, गंध और गुग्गुल मिलावे ॥६४॥ वे और एक ही प्रकार के चार कलशों में तालाब से जल लाकर उसमें उपर्युक्त मिश्रित पदार्थ को मिला दे। फिर लाल वृषभचर्म पर भद्रासन लगाकर उस पर 'सहस्राक्ष' शतधारं ऋषिभिः पावनं कृतम् । तेन त्वामभिषिञ्चामि पावमान्याः पुनन्तु ते ।' इस मन्त्र से उसके ऊपर कलश में से जल छिड़के ॥६५-६६॥ 'राजा वरुण तुमको ऐश्वर्य दें, सूर्य, बृहस्पति, इन्द्र, वायु और सप्तर्षि तुमको ऐश्वर्य दें इस अर्थ वाले 'भगं ते वरुणो राजा...' इत्यादि मन्त्र को और 'तुम्हारे केशों में जो दुर्भाग्य है, शिर, सीमन्त, मूर्द्धा ललाट, कान और नेत्र में जो दुर्भाग्य है उसको वरुण देवता अथवा यह जल दूर करे' इस अर्थ वाले 'यत्ते के षेषु दौर्भाग्यं...' इत्यादि मंत्र को पढ़ते हुए जल से अभिषेक करने के अनन्तर गूलर के बने स्रुवा को साथ ही दाहिने हाथ में कुश पकड़ कर 'मिताय स्वाहा, संमिताय स्वाहा, शालाय स्वाहा, कटंकटाय स्वाहा, कूष्माण्डाय स्वाहा, राजपुत्राय स्वाहा' इन मन्त्रों से उस अभिषिक्त व्यक्ति के शिर पर सरसों के तेल का हवन करे अर्थात् शिर पर सरसों का तेल छोड़े ॥६७-७०॥ अनन्तर यजमान चौराहे पर और मदार के वृक्ष पर कुश चारों ओर फैला कर नमस्कार करता हुआ, नामोच्चारण और बलि मन्त्र को पढ़ता हुआ (तण्डुल पका चावल), मांस, भात मछली का पका मांस अथवा कच्चा मांस इनकी बलि दे ॥७१-७२॥ चित्र विचित्र फूल, तीन प्रकार की सुरा, मूली, पूड़ी, पूआ, धूप, माला, दही मिला अन्न, पायस, गुड़ पोठी और मिठाई इन सामग्रियों को इकट्ठा कर पृथ्वी पर शिर नवा कर विनायक, जननी-अम्बिका (गौरी) की पूजा करे और दूब, सरसों और फूलों का अञ्जलि पूर्ण अर्घ्य देकर 'हे भगवति मुझे रूप दो, यश दो, पुत्र दो, धन दो और सभी कामनाएं पूर्ण करो।' इस प्रकार भगवती दुर्गा का उपस्थान करके धूप, दीप, नैवेद्य, गन्ध, माल्य और