भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 377

३५८ नारदीयपुराणम् उपवीतसमायुक्तं जटाकुंडलमंडितम् । ज्ञात्वैवमग्निदेहं तु होमकर्मसमाचरेत् ॥५१॥ पयो दधि घृतं चैव स्नेहपक्वं तथैव च । जुहुयाद्यस्तु हस्तेन स विप्रो ब्रह्महा भवेत् ॥५२॥ यदन्नं पुरुषोऽश्नाति तदन्नं तस्य देवताः । सर्वकामसमृद्धयर्थं तिलाधिक्यं हविर्मतम् ॥५३॥ हाये मुद्रात्रयं प्रोक्तं मृगी हंसी च सूकरी । अभिचारे सूकरी स्यान्मृगी हंसी शुभात्मके ॥५४॥ सर्वांगुलोभिः क्रोडी स्याद्धंसी मुक्तकनिष्ठिका । मध्यमानामिकांगुष्ठैर्मृगी मद्रा प्रकीर्तिता ॥५५॥ पूर्वप्रमाणमाहृत्य पंचांगुलिगृहीतया । दधिमध्वाज्यसंयुक्तै ऋत्विग्भिर्जुहुयात्तिलैः ॥५६॥ कुशास्त्वनामिकाासक्ताः कार्याः स्युः पुण्यकर्मणि ॥५७॥ विनायकः कर्मविघ्नसिद्ध्यर्थं विनियोजितः । गणानामाधिपत्ये च रुद्रेण ब्रह्मणा तथा ॥५८॥ तेनोपसृष्टो यस्तस्य लक्षणानि निबोध मे । स्वमेव गाहतेऽत्यर्थं जलं मुंडांश्च पश्यति ॥५६॥ काषायवाससश्चैव क्रव्यादांश्चाधिरोहति । अंत्यजैर्गद्द भैरुष्ट्रैः सह्रैकत्रावतिष्ठते ॥६०॥ व्रजन्नपि तथात्मानं मन्यतेऽनुगतं परैः । विमना विफलांरभः संसीदत्यनिमित्ततः ॥६१॥ तेनोपसृष्टो लभते न राज्यं राजनंदनः । कुमारी न च भर्तारमपत्यं गर्भमंगना । आचार्यत्वं श्रोत्रियश्च न शिष्योऽध्ययनं तथा ॥६२॥ वणिग्लाभं न चाप्नोति कृषि चापि कृषीबलः । स्नपने तस्य कर्तव्यं पुण्येऽह्नि विधिपूर्वकम् । इस प्रकार अग्नि के रूप का परिचय प्राप्त करके ही हवन कर्म करना चाहिए ॥४९-५१॥ दूध, दही, घी और घी या तेल से पकाई हुई वस्तु को जो हाथ से उठाकर हवन करता है वह ब्राह्मण ब्रह्महत्या का भागी होता है ॥५२॥ मनुष्य जो अन्न स्वयं खाता है उसके देवता भी वही अन्न खाते हैं। परन्तु सब कामों की सिद्धि के लिए हवि में तिल की अधिकता ही श्रेयस्कर है ॥५३॥ होम में मृगी, हंसी और सूकरी ये तीन प्रकार की मुद्रायें विहित हैं। अभिचार (मारण मोहन आदि) में सूकरी मुद्रा ओर शुभ कार्यों में शेष दो मुद्रायें प्रशस्त मानी गई हैं ॥५४। सब अंगुलियों को मिला देने से सूकरी मुद्रा और मध्यमा अनामिका तथा अंगूठे को मिला देने से मृगी मुद्रा बनती है ॥५५॥ केवल कनिष्ठिका को छोड़ देने से हंसी मुद्रा बनती है। ऋत्विज पूर्व में कहे गये प्रमाण के अनुसार पाँचों अंगुलियों से निकाल कर मधु, दधि, घी से मिश्रित तिलों से हवन करें ॥५६॥ पुण्य कर्मों में कुश को अनामिका से सटाये रखे ॥५७॥ रुद्र और ब्रह्मा ने विनायक को विघ्नों के विनाश के लिए गणों का आधिपत्य दिया। विनायक से बाधा पहुँचने पर कौन-कौन उपद्रव होते हैं, उनके लक्षण मुझसे सुनो ॥५८½॥ उनके क्रुद्ध होने पर वह व्यक्ति स्वप्न में अपने को जल में डूबता हुआ देखता है। फिर मूंड मुड़ाये मनुष्यों को तथा गेरुआ वस्त्र धारण करने वाले पुरुषों को वह देखता है। कच्चा मांस खाने वाले गृध्रादि पक्षियों तथा व्याघ्र आदि पशुओं पर वह चढ़ता है। एक स्थान पर अन्त्यज, गदहे और ऊंटों के बीच अपने को पाता है ॥५९-६०॥ जब चलता है तो ऐसा जान पड़ता है मानो उसके पीछे और लोग भी आ रहे हैं। स्वयं अन्यमनस्क-सा रहता है। उसके सभी प्रयत्न विफल हो जाते और अकारण उसको असफलतायें प्राप्त हो जाती हैं ॥६१॥ विनायक के प्रकोप से राजपुत्र राज्य नहीं प्राप्त कर सकता। न तो कोई कुमारी कन्या योग्य पति ही प्राप्त कर सकती और न तो कोई गर्भिणी स्त्री पुत्र पा सकती है। इसी प्रकार कोई श्रोत्रिय आचार्य पद को, विद्यार्थी विद्या को, बनिया व्यापार में लाभ तथा कोई किसान अच्छी खेती का फल नहीं पाता है ॥६२½॥