भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 376, कुल 1008 में से

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मूले च म्रियते होता तस्माद्ग्राह्यं विचार्य तत् । अग्निः सूर्य्यश्च सोमश्च विरिंचिरनिलो यमः ॥३६॥ स्रुवे षडेते देवास्तु प्रत्यंगुलमुपाश्रिताः । अग्निर्भोगार्थनाशाय सूर्यो व्याधिकरो भवेत् ॥३७॥ निष्फलस्तु स्मृतः सोमो विरिंचिः सर्वकामदः । अनिलो वृद्धदः प्रोक्तो यमो मृत्युप्रदो मतः ॥३८॥ संमार्जनोपयमनं कर्त्तव्यं च कुशद्वयम् । पूर्वं तु सप्तशाखं स्यात्पंचशाखं तथापरम् ॥३६॥ श्रीपर्णी च शमी तद्वत्खदिरश्च विकंकतः । पलाशश्चैव विज्ञेयाः स्रुवे चैव तथा स्रुचि ॥४०॥ हस्तोन्मितं स्रुवं शस्तं त्रिंशांगुलिकं स्रुचम् । विप्राणां चैतदाख्यातं ह्यन्येषामंगुलोनकम् ॥४१॥ शूद्राणां पतितानां च खरादीनां च नारद । दृष्टिदोषविनाशार्थं पात्राणां प्रोक्षणं स्मृतम् ॥४२॥ अकृते पूर्णपात्रे तु यज्ञच्छिद्रं समुद्भवेत् । तस्मिन्पूर्णे कृते विप्र यज्ञसंपूर्णता भवेत् ॥४३॥ अष्टमुष्टिर्भवेत्किंचित्पुष्कलं तच्चतुष्टयम् । पुष्कलानि तु चत्वारि पूर्णपात्रं विदुर्बुधाः ॥४४॥ होमकाले तु संप्राप्ते न दद्यादासनं क्वचित् । दत्तेऽतृप्तो भवेद्वह्निः शापं दद्याच्च दारुणम् ॥४५॥ आधारौ नासिके प्राक्तौ आज्यभागौ च चक्षुषी । प्राजापत्यं मुखं प्रोक्तं कटिव्र्व्याहृतिभिः स्मृता ॥४६॥ शीर्षहस्तौ च पादौ च पंचवारुणमीरितम् । तथा स्विष्टकृतं विप्र श्रोत्रे पूर्णाहूतिस्तथा ॥४७॥ द्विमुखं चैकहृदयं चतुःश्रोत्रं द्विनासिकम् । द्विशीर्षकं च षण्णेत्रं पिंगलं सप्तजिह्वकम् ॥४८॥ सव्यभागे त्रिहस्तं च चतुर्हस्तञ्च दक्षिणे । स्रुकुस्रुवौ चाक्षमाला च या शक्तिर्दक्षिणे करे ॥४६॥ त्रिमेखलं त्रिपादं च घृतपात्रं द्विचामरम् । मेषारूढं चतुःशृंगं बालादित्यसमप्रभम् ॥५०॥

चाहिए ॥३५॥ स्रुवा में एक-एक अंगुल पर अग्नि, सूर्य, सोम, ब्रह्मा, वायु और यम—ये छह देवता रहते हैं। अग्नि भोगार्थ के नाश के लिए, सूर्य रोग उत्पन्न करने के लिए, चन्द्र निष्फल कहा गया है। ब्रह्मा सब कामनाओं को सिद्ध करने के लिए स्थित रहते हैं। इसी प्रकार वायु श्रीवृद्धि करने वाले और यम मृत्युदाता हैं ॥३६-३८॥ (अतः स्रुवा को मूल भाग की ओर तीन अंगुल छोड़कर चौथे-पाँचवें अंगुल पर पकड़ना चाहिए।) संमार्जन और उपयमन नामक दो कुश बनाने चाहिए। पहला सात शाखाओं सहित रहे, परन्तु दूसरा केवल पाँच पत्तियों से ही युक्त हो ॥३९॥ स्रुव और स्रुक् श्रीपर्णी (गंभारी) शमी, खैर, विकंकत (कंटाई) और पलाश का होना चाहिए ॥४०॥ एक हाथ स्रुव और तीस अंगुल लम्बा स्रुक् प्रशस्त माने गए हैं। विप्र यजमान के लिए ऐसी विधि है अन्यों के लिए एक अंगुल का ही प्रमाण माना गया है ॥४१॥ शूद्र, पतित और गदहे आदि के दृष्टिदोष को दूर करने के लिए पात्रों का प्रोक्षण करना चाहिए ॥४२॥ पूर्णपात्र को न रखने पर यज्ञ फल में त्रुटि हो जाती है, विप्र! उसको पूर्ण कर देने पर यज्ञ पूर्ण फलदायक होता है ॥४३॥ आठ मुट्ठो का 'किञ्चित्' कहा जाता है। चार 'किञ्चित्' का 'पुष्कल' और उसके चौगुने को पूर्ण पात्र कहते हैं ॥४४॥ होमकाल आ जाने पर कहीं पर आसन नहीं देना चाहिए अर्थात् खाट आदि नहीं बिछाना चाहिए। ऐसा करने पर अग्नि अतृप्त होते और होता को दारुण शाप देते हैं। आधार (देवता को घी की आहुति देना) अग्नि देव की नासिका, आज्य भाग नेत्र, प्राजापत्य मुख, व्याहृतियां कटि, पंच वारुणी शिर, हाथ और पैर हैं। विप्र! इसी प्रकार स्विष्टकृत और पूर्णाहुति कान हैं ॥४५-४७॥ अग्नि देव द्विमुख, एक हृदय, चार कान वाले, दो नासिका, दो शिर, छः नेत्र, पिंगलवर्ण और सात जीभ वाले हैं ॥४८॥ बायें भाग की ओर तीन हाथ और दक्षिण की ओर चार हाथ हैं। दक्षिण करों में स्रुव स्रुक्, अक्षमाला और शक्ति रहती है। तीन मेखला, तीन चरणों घृतपात्र दो चँवर और चार सींगों से युक्त अग्नि देव भेड़ पर सवार रहते हैं। बाल सूर्य के समान अरुणवर्ण अग्नि यज्ञोपवीत, जटा और कुण्डल से सुशोभित रहते हैं।

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