भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 375

३५६ नारदीयपुराणम् अमृतस्य क्षयं दृष्ट्वा ब्रह्माद्यैः सर्वदैवतैः । वेद्यां निधापितस्तस्मात्समिद्गर्भो हुताशनः ॥२१॥ दक्षिणस्यां दानवाद्याः स्थिता यज्ञस्य नारद । तेभ्यः संरक्षणार्थाय ब्रह्माणं तद्दिशि न्यसेत् ॥२२॥ उत्तरे सर्वपात्राणि प्रणीताद्यानि पश्चिमे । यजमानः पुर्वतः स्युर्द्विजाः सर्वेऽपि नारद ॥२३॥ द्यूते च व्यवहारे च यज्ञकर्मणि चेद्भवेत् । कर्तोदासीनचित्तस्तत्कर्म नश्येदिति स्थितिः ॥२४॥ ब्रह्माचार्यौ स्वशाखौ हि कर्त्तव्यौ यज्ञकर्मणि । ऋत्विजां नियमो नास्ति यथालाभं समर्च्चयेत् ॥२५॥ द्वे पवित्रे द्व्यंगुले स्तः प्रोक्षिणी चतुरंगुला । आज्यस्थाली त्र्यंगुलाथ चरुस्थाली षडंगुला ॥२६॥ द्वद्यंगुलं तूपयमनमेकं संमार्जनांगुलम् । स्रुवं षडंगुलं प्रोक्तं स्रुचं सार्द्धत्रयांगुलम् ॥२७॥ प्रादेशमात्राः समिधः पूर्णपात्रं षडंगुलम् । प्रोक्षिण्या उत्तरे भागे प्रणीतापात्रमष्टभिः ॥२८॥ यानि कानि च तीर्थानि समुद्राः सरितस्तथा । प्रणीतायां समासन्नास्तस्मात्तां पूरयेज्जलैः ॥२९॥ वेदिका वस्त्रहीना च नग्ना संप्रोच्यते द्विज । परिस्तीर्य ततो दर्भैः परिदध्यादिमां बुधः ॥३०॥ इंद्रवज्रं विष्णुचक्रं वामदेवत्रिशूलकम् । दर्भरूपतया त्रीणि पवित्रच्छेदनानि च ॥३१॥ प्रोक्षणी च प्रकर्तव्या प्रणीतोदकसंयुता । तेनातिपुण्यदं कर्म पवित्रमिति कीर्तितम् ॥३२॥ आज्यस्थाली प्रकर्तव्या पलमात्रप्रमाणिका । कुलालचक्रघटितं आसुरं मृन्मयं स्मृतम् ॥३३॥ तदेव हस्तघटितं स्थाल्यादि दैविकं भवेत् । स्रुवे च सर्वकर्माणि शुभान्यप्यशुभानि च ॥३४॥ तस्य चैव पवित्रार्थं वह्नौ तापनमीरितम् । अग्रे धृतेन वैधव्ये मध्ये चैव प्रजाक्षयः ॥३५॥ देखकर समिद्गर्भ (समिधायुक्त) अग्नि को वेदी के मध्य में रखा ॥२१॥ नारद ! यज्ञ के दक्षिण भाग में राक्षस, दानव आदि रहते हैं। उनसे रक्षा के लिए उस दिशा में ब्रह्मा को स्थापित करना चाहिए ॥२२॥ नारद ! उत्तर दिशा में प्रणीता आदि सब पात्रों को रखना चाहिए। वेदी के पश्चिम ओर यजमान और पूर्व की ओर सब ब्राह्मण बैठें ॥२३॥ जुआ खेलने, व्यापार या परस्पर व्यवहार में और यज्ञ में जो कर्ता उदासीन रहता है उसका वह कर्म अवश्य नष्ट हो जाता है ॥२४॥ यज्ञ कर्म में ब्रह्मा और आचार्य को अपनी शाखा का ही होना चाहिए, ऋत्विजों के लिए कोई नियम नहीं है। यथालाभ उनकी पूजा कर यज्ञ करना चाहिए ॥२५॥ पवित्रो (कुश की बनी हुई) दो अंगुल को, प्रोक्षणी चार अंगुल की, आज्यस्थाली तीन अंगुल की और चरुस्थाली छह अंगुल की होनी चाहिए ॥२६॥ उपयमन कुशा दो अंगुल का और संमार्जन कुशा एक अंगुल का होना चाहिए। स्रुवा छह अंगुल का और किसी के मतसे साढ़े तीन अंगुल का होना चाहिए ॥२७॥ समिधा प्रादेश मात्र की और पूर्णपात्र छह अंगुल का होना श्रेयस्कर है। प्रोक्षणी के उत्तर भाग में आठ अंगुल की प्रणीता रखना चाहिए ॥२८॥ जितने तीर्थ, समुद्र और नदियां हैं वे प्रणीता में स्थित रहती हैं, अतः उसको जल से भर देना चाहिए ॥२९॥ द्विज ! वस्त्रहीन वेदी नग्न कही जाती है। इसलिए विद्वान् व्यक्ति उस वेदी को कुशों को फैलाकर ढक दे ॥३०॥ कुश के ही इन्द्रवज्र, विष्णु चक्र और शिव त्रिशूल ओर ये तीनों कुश रूप से पवित्र छेदन होते हैं ॥३१॥ प्रोक्षणी को प्रणीता के जल से संयुक्त कर देना चाहिए। इस विधि से किया हुआ कर्म अति पवित्र और पुण्यप्रद कहा गया है ॥३२॥ आज्यस्थाली एक पल की होनी चाहिए। कुम्हार के चक्के का बना मिट्टी का पात्र आसुर कहा जाता है। वही पात्र यदि हाथ का बना हो तो दैविक होता है ॥३३॥ स्रुवा में शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के कर्म रहते हैं। इसीलिए उसको पवित्र करने के लिए तपाना चाहिए, ऐसा कहा गया है ॥३४॥ स्रुवा का अगला भाग पकड़ने से स्वामी का नाश, बीच में पकड़ने से पुत्र का नाश और मूल पकड़ने से होता की मृत्यु होती है। अतएव भली भाँति विचारपूर्वक उसको पकड़ना