भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 374, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 374

शांतिकल्पे तु दिव्यानां भौमानां मुनिसत्तम । तथांतरिक्षोत्पातानां शांतयो ह्युदिताः पृथक् ॥७॥ संक्षेपेणैतदुद्दिष्टं लक्षणं कल्पलक्षणे । विशेषः पृथगेतेषां स्थितः शंखांतरेषु च ॥८॥ गृह्यकल्पे तु सर्वेषामुपयोगितयाऽधुना । वक्ष्यामि ते द्विजश्रेष्ठ सावधानतया श्रृणु ॥६॥ ओंकारश्चाथ शब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा । कंठं भित्वा विनिर्यातो तस्मान्मांग्ल्यकाविमौ ॥१०॥ कृत्वा प्रोक्तानि कर्माणि तदूर्द्धानि करोतियः । सोऽथशब्दं प्रयुंजीत तदानंत्यार्थमिष्यते ॥११॥ कुशाः परिसमूह्याय व्यस्तशाखाः प्रकीर्तिताः । न्यूनाधिका निष्फलाय कर्मणोऽभिमतस्य च ॥१२॥ कृमिकीटपतंगाद्या भ्रमंति वसुधातले । तेषां संरक्षणार्थाय प्रोक्तं परिसमूहनम् ॥१३॥ रेखाः प्रोक्ताश्च यास्तिस्रः कर्तव्यास्ताः समा द्विज । न्यूनाधिका न कर्त्तव्या इत्येव परिभाषितम् ॥१४॥ मेदिनी मेदसा व्याप्ता मधुकैटभदैत्ययोः । गोमयेनोपलेप्येयं तदर्थमिति नारद ॥१५॥ वंध्या दुष्टा च दीनांगी मृतवत्सा च या भवेत् । यज्ञार्थं गोमयं तस्या नाहरेदिति भाषितम् ॥१६॥ ये भ्रमंति सदाऽऽकाशे पतंगाद्या भयंकाराः । तेषां प्रहरणार्थाय मतं प्रोद्धरणं द्विज ॥१७॥ स्रुवेण च कुशेनापि कुर्यादुल्लेखनं भुवः । अस्थिकंटकसिद्धयर्थं ब्रह्मणा परिभाषितम् ॥१८॥ आपो देवगणाः सर्व तथा पितृगणा द्विज । तेनाद्भिरक्षणं प्रोक्तं मुनिभिर्विधिकोविदैः ॥१९॥ अग्नेरानयनं प्रोक्तं सौभाग्यस्त्रीभिरेव च । शुभदे मृण्मये पात्रे प्रोक्ष्याद्भिमस्तं निधापयेत् ॥२०॥

मुनिवर्य ! शान्ति कल्प में दिव्य, भौम और अन्तरिक्ष सम्बन्धी उत्पात की शान्ति के विधान हैं ॥७॥ संक्षेप में मैंने कल्प और उनके लक्षणों को कहा है। इनके सम्बन्ध में विशेष ज्ञान की बातें अन्य शाखाओं में कही गई हैं ॥८॥ द्विजश्रेष्ठ ! सबके उपकार और उपयोग की दृष्टि से गृह्यकल्प की उपयोगी बातों को कह रहा हूँ, उसको सावधान होकर सुनो ॥९॥ सृष्टि के आदि में ब्रह्मा के कण्ठ से ओंकार और अथ ये दो शब्द निकले। इसलिये दोनों ही मांगलिक शब्द माने जाते हैं ॥१०॥ जो अपने कल्प-प्रोक्त कर्मों को समाप्त कर पुनः आगे भी कर्म करना चाहता है वह अवश्य अथ-शब्द का प्रयोग करे। ऐसा करने से वह अनन्त फल को प्राप्त करता है ॥११॥ परिसमूहन के लिए परिगणितकुशों की शाखा बनानी चाहिए। इसमें न्यूनता या अधिकता करने से अभीष्ट कर्म निष्फल हो जाते हैं ॥१२॥ कीड़े-मकोड़े और पतङ्ग आदि पृथिवी पर घूमते रहते हैं। उनकी रक्षा के लिए परि- समूहन कर्म करना चाहिए ॥१३॥ द्विज, जिन तीन रेखाओं को खींचने को कहा है, उनको बराबर बनाना चाहिए। वे न्यून या अधिक न हों, ऐसी ही शास्त्रों की आज्ञा है ॥१४॥ नारद ! यह पृथ्वो दैत्य मधु कैटभ को चर्बी से लिप्त है, अतः उसको गोबर से लीपकर शुद्ध कर लेना चाहिए ॥१५॥ परन्तु बन्ध्या, दुष्ट, दुबली और मृतवत्सा गाय का गोबर यज्ञ के कामों में नहीं लाना चाहिए ॥१६॥ द्विज ! सर्वदा आकाश में जो भयंकर कीट-पतंग उड़ा करते हैं उनको दूर करने लिए प्रोद्धरण किया जाता है ॥१७॥ ब्रह्मा ने बतलाया है कि हड्डी और कांटों का शोधन करने के लिए स्रुव अथवा कुश के मूल से पृथ्वो पर रेखा खींचनी चाहिए ॥१८॥ द्विज ! सब देवता और पितर जल- रूप हैं इसलिए विधिज्ञ मुनियों ने जल सिंचन करने के लिए कहा है ॥१९॥ सौभाग्यशाली स्त्रियों के द्वारा ही अग्नि का आनयन शुभदायक मिट्टी के पात्र में होना चाहिए । सबसे पहले उस आनीत पात्र अग्नि का जल से प्रोक्षण कर तदुपरान्त यज्ञ कुण्ड में रखना चाहिए ॥२०॥ ब्रह्माआदि सब देवताओं ने अमृत का क्षय