भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 352, कुल 1008 में से

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पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३३३ सनंदन उवाच एकः समस्तं यदिहास्ति किंचित्तदच्युतो नास्ति परं ततोऽन्यत् । सोऽहं स च त्वं स च सर्वमेतदात्मा स्वयं भात्यपभेदमोहः ॥६१॥ सनंदन उवाच इतोरितस्तेन स राजवर्यस्तत्याज भेदं परमार्थदृष्टिः । स चापि जातिस्मरणायबोधस्तत्रैव जन्मन्यपवर्गमाप ॥६२॥ परमार्थोऽध्यात्ममेतत्तभ्यमुक्तं मुनीश्वर । ब्राह्मणक्षत्रियविशां श्रोतॄणां चापि मुक्तिदम् ॥६३॥ यथा पृष्टं त्वया ब्रह्म स्तथा ते गदितं मया । ब्रह्मज्ञानमिदं शुद्धं किमन्यत्कथयामि वै ॥६४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वि० पा० एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥४६॥

अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सूत उवाच श्रुत्वा सनंदनस्येत्थं वचनं नारदो मुनिः । असंतुष्ट इव प्राह भ्रातरं तं सनंदनम् ॥१॥

सनन्दन ने कहा- ब्राह्मण के मुख से इस प्रकार का उपदेश सुनकर राजा ने सारे भेद-भाव का त्याग कर परमार्थ दृष्टि प्राप्त कर ली और उसको जातिस्मर का ज्ञान हो जाने के कारण उसी जन्म में मुक्ति भी मिल गई ॥९२॥ मुनीश्वर ! इस परमार्थ अध्यात्म को तुमसे मैंने कह दिया जिसका सुनना ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सबको मुक्ति देने वाला है। ब्रह्मन् ! तुमने जैसे पूछा मैंने तदनुकूल उत्तर भी दे दिया, यही शुद्ध ब्रह्मज्ञान है। अब कहो और मैं क्या कहूँ ॥९३-९४॥ श्रीनारदीय महापुराण में उनचासवाँ अध्याय समाप्त ॥४९॥

अध्याय ५० शिक्षा-निरूपण सूत जी बोले- सनन्दन की बातों को सुनकर नारद असन्तुष्ट-से रहे और फिर अपने भाई सनन्दन से कहा ॥१॥

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